ईरान-अमेरिका युद्ध: में असली विजेता चीन कैसे बन रहा है?

ईरान-अमेरिका युद्ध: में असली विजेता चीन कैसे बन रहा है?

एनी मैन हू मस्ट से आई एम द किंग इज नो ट्रू किंग। मशहूर लेखक जॉर्ज आरआर मार्टिन की ये पंक्तियाँ आज डोनाल्ड ट्रंप पर बिल्कुल सटीक बैठती हैं। पिछले एक महीने में ट्रंप को हर दिन चिल्लाकर कहना पड़ रहा है कि मैं सही हूँ, ईरान के साथ यह जंग मैं जीत चुका हूँ, मैं विश्वगुरु हूँ, ईरान को मैंने मिट्टी में मिला दिया है।

लेकिन जब कोई नेता हर दूसरे घंटे खुद को विजेता घोषित करने पर मजबूर हो तो समझ लीजिए कि जीत अभी कोसों दूर है।

इस पूरे ईरान-अमेरिका युद्ध में असली सवाल यह नहीं है कि अमेरिका जीत रहा है या ईरान। असली सवाल यह है कि इस युद्ध का सबसे बड़ा फायदा आखिर कौन उठा रहा है? और जवाब मिलता है ईरान के पूर्व में, हजारों किलोमीटर दूर बैठे चीन में।

ट्रंप की विजय घोषणा और ज़मीनी हकीकत

1 अप्रैल को ट्रंप ने टेलीविज़न पर देश को संबोधित करते हुए कहा कि उन्होंने चार हफ्तों में ईरान को इतनी अच्छी तरह खत्म कर दिया है कि तीन-चार हफ्ते और लगेंगे उसे दोबारा हराने में। ट्रंप का यह भाषण खत्म होते-होते ईरान में तालियाँ बजने लगीं और ईरान की सरकार ने इज़राइल की तरफ कुछ और मिसाइलें रवाना कर दीं।

ईरान-अमेरिका युद्ध की जमीनी हकीकत यह है कि ट्रंप ने भले ही ईरान की वायुसेना और वायु रक्षा को नुकसान पहुँचाया हो, लेकिन ईरान अमेरिका के उन्नत F-35 समेत 30 विमानों को नष्ट कर चुका है। आईआरजीसी ने 3 अप्रैल को एक और लड़ाकू विमान मार गिराने का दावा किया।

अमेरिका और इज़राइल के लिए ईरान-अमेरिका युद्ध की रणनीति शुरू से ही उल्टी पड़ती दिखी है। युद्ध के बीचोंबीच आर्मी चीफ ऑफ स्टाफ जनरल रैंडी जॉर्ज को इस्तीफा देने को कहा गया। कहा जा रहा है कि वो ग्राउंड इन्वेज़न के मामले में असहमत थे। कई और वरिष्ठ अफसरों को भी हटाया जा रहा है।

अमेरिका ने क्या-क्या खोया इस युद्ध में

ईरान-अमेरिका युद्ध में अमेरिका के नुकसान के आँकड़े चौंकाने वाले हैं। बीते एक महीने में 15 अमेरिकी सैनिकों की मौत हो चुकी है और 300 से ज़्यादा घायल हैं। हालाँकि दावा है कि असली संख्या और अधिक है जिसे सरकार छुपा रही है।

सबसे घातक हमला हुआ सऊदी अरब के प्रिंस सुल्तान एयरबेस पर जहाँ ईरान ने आठ KC-135 रिफ्यूलिंग टैंकरों को तबाह कर दिया। साथ ही एक E-3 सेंट्री AWACS विमान को शहीद ड्रोन से निशाना बनाया। यह विमान करीब 400 किलोमीटर तक ड्रोन, मिसाइल और विमानों को ट्रैक कर सकता है और पूरे क्षेत्र में कमान और समन्वय बनाए रखता है। इसका नुकसान अमेरिका के हवाई अभियानों के लिए बड़ा झटका है।

ईरान-अमेरिका युद्ध में कुल विमान नुकसान की बात करें तो कम से कम 30 अमेरिकी विमान नष्ट हो चुके हैं। इनमें 16 MQ-9 रीपर सर्वेलेंस ड्रोन शामिल हैं जिनकी कीमत 30 मिलियन डॉलर प्रति ड्रोन से अधिक है। भारत ने भी इसी के MQ-9B संस्करण के 31 ड्रोन 3.5 बिलियन डॉलर में खरीदे हैं। इसके अलावा तीन F-15 फाइटर मित्रपक्ष की गोलाबारी में मारे गए और आठ F-35 को ईरान ने थर्मल इमेजिंग से निशाना बनाया। कुल बिल अमेरिकी करदाताओं के लिए पहले ही 3 बिलियन डॉलर से ऊपर है।

24,400 से ज़्यादा पैट्रियट इंटरसेप्टर इस्तेमाल हो चुके हैं। इन्हें दोबारा बनाने में चार से पाँच साल लग सकते हैं। कुल इंटरसेप्टरों का 40 प्रतिशत खत्म हो चुका है। यहाँ तक कि दक्षिण-पूर्व एशिया से मध्य पूर्व में इंटरसेप्टर भेजने पड़ रहे हैं और पोलैंड से माँगने पड़ रहे हैं।

दुनिया के सबसे बड़े युद्धपोत USS गेराल्ड आर. फोर्ड एयरक्राफ्ट कैरियर के लॉन्ड्री रूम में आग लग गई जिससे 200 सैनिक घायल हो गए और जहाज को युद्ध से दूर ले जाना पड़ा। मरम्मत में एक-दो साल लगेंगे।

चीन की चुप्पी में छुपी है असली चाल

ईरान-अमेरिका युद्ध में जब न अमेरिका जीत रहा है न ईरान, तो जीत कौन रहा है? जवाब है चीन। और चीन यह सब बिना एक भी सैनिक युद्ध के मैदान में उतारे कर रहा है।

चीन में एक पुरानी कहावत है जिसे वहाँ की सरकार ने हमेशा माना है, हाइड योर स्ट्रेंथ, बाइड योर टाइम। जहाँ अमेरिका दिन-रात अपना शक्ति प्रदर्शन करने में लगा रहता है, वहीं चीन अपनी शक्ति और मंसूबों को छुपाकर आगे बढ़ता है। ईरान-अमेरिका युद्ध में भी चीन ने यही रणनीति अपनाई है।

ईरान-अमेरिका युद्ध में चीन को पाँच बड़े फायदे मिल रहे हैं।

पहला फायदा है खुफिया सैन्य जानकारी। चीनी जासूसी उपग्रहों ने इस पूरे युद्ध में ईरान को अमेरिकी सेना के बारे में सटीक जानकारी दी है। अमेरिकी रडार कहाँ हैं, विमान कहाँ खड़े हैं, युद्धपोतों की स्थिति क्या है, यह सारी जानकारी चीन ईरान को दे रहा है। जब आपके पास सीमित मिसाइलें हों तो ऐसी जानकारी बेहद कीमती होती है। चीन की बेइडू नेविगेशन सैटेलाइट प्रणाली का उपयोग करके शहीद ड्रोनों को घातक सटीकता मिली जो अमेरिका ने पहले कभी नहीं देखी थी। भारत को यह बात गंभीरता से लेनी चाहिए क्योंकि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी चीन ने पाकिस्तान को भारत के बारे में वही सारी जानकारी और फाइटर डेटा दिया था।

दूसरा फायदा है हथियारों की आपूर्ति। ईरान के पास इतनी बैलिस्टिक मिसाइलें कहाँ से आईं? इसका जवाब है चीन। दुनिया के लाख मना करने के बावजूद चीन ईरान को रॉकेट ईंधन का महत्वपूर्ण घटक सोडियम पर्क्लोरेट लगातार आपूर्ति करता रहा है। साथ ही उन्नत रडार प्रणाली, सेमीकंडक्टर, सेंसर और CM-302 एंटी-शिप मिसाइलें भी चीन ने ईरान को दी हैं। इस सब का कुल बिल 5 बिलियन डॉलर है जो ईरान ने चीन को अदा किया है। बदले में ईरान अपना 80 प्रतिशत तेल निर्यात चीन को सस्ते में बेचता है। प्रतिबंधों के बावजूद चीन ने पिछले पाँच वर्षों में 140 बिलियन डॉलर का तेल ईरान से खरीदा है। यह सस्ता तेल भारत भी खरीद सकता था लेकिन अमेरिका के डर से हमने ईरान से मुँह फेर लिया और चाबहार पोर्ट से भी बाहर आ गए।

तीसरा फायदा है अमेरिकी सैन्य रणनीति का अध्ययन। ईरान-अमेरिका युद्ध चीन के लिए एक जीती-जागती प्रयोगशाला बन गया है। अमेरिकी रणनीति, प्रदर्शन, रसद, हथियारों की सीमाएँ, सब कुछ रियल टाइम में स्टडी किया जा रहा है। उपग्रहों से आँकड़े एकत्र किए जा रहे हैं। दक्षिण चीन सागर पर सैन्यीकरण अलग से बढ़ रहा है। कल जब चीन ताइवान पर दबाव बनाएगा तो उसके पास अमेरिका का पूरा खेल-पुस्तिका होगी कि अमेरिका क्या कहेगा, क्या करेगा, क्या कर सकता है और एक बार कोई हथियार खत्म हो जाए तो उसे दोबारा तैयार होने में कितना समय लगेगा।

चौथा फायदा है डॉलर को कमज़ोर करना। ईरान-अमेरिका युद्ध के दौरान चीन स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज को उन देशों के लिए खुला रख रहा है जो चीनी युआन में तेल खरीद रहे हैं। अगर और देश भी युआन में तेल खरीदने लगें तो पेट्रो-डॉलर की व्यवस्था हिल सकती है। चीन बिना एक गोली चलाए अमेरिकी डॉलर को कमज़ोर कर पा रहा है।

पाँचवाँ फायदा है वैश्विक छवि का निर्माण। ईरान-अमेरिका युद्ध में जहाँ ट्रंप बेतुकी बातें कर रहे हैं वहीं चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग खुद को एक स्थिर, परिपक्व और गंभीर नेता के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं जो संयुक्त राष्ट्र के नियमों और वैश्विक स्थिरता का समर्थन करते हैं।

अमेरिका के साथी भी छोड़ रहे हैं साथ

ईरान-अमेरिका युद्ध का एक और बड़ा परिणाम यह है कि अमेरिका के सबसे करीबी सहयोगी भी उससे मुँह मोड़ रहे हैं। स्पेन ने अमेरिकी सेना के लिए अपना हवाई क्षेत्र बंद कर दिया। फ्रांस ने इज़राइल को सैन्य आपूर्ति करने वाले विमानों को अपने हवाई क्षेत्र से गुज़रने से रोक दिया। इटली ने अपने सैन्य अड्डों का उपयोग करने की अनुमति नहीं दी। पोलैंड ने साफ कहा कि पैट्रियट मिसाइलें आप नहीं ले जा सकते।

यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष, कनाडा के प्रधानमंत्री, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री और जर्मनी के चांसलर, ये सभी बीजिंग गए और शी जिनपिंग से मिलकर व्यापारिक साझेदारी की बात की। इससे वैश्विक मंच पर चीन की प्रतिष्ठा और बढ़ी जबकि ट्रंप आग-बबूला होते रहे।

एक समय था जब पूरी दुनिया अमेरिका को सम्मान की नजर से देखती थी। अब वो सम्मान उसके मित्र देश भी नहीं दे रहे। ईरान-अमेरिका युद्ध ने इस बदलाव को और तेज़ कर दिया है।

चीन की असली रणनीति और भारत के लिए सबक

ईरान-अमेरिका युद्ध में चीन की रणनीति को एक पुरानी कहावत से समझा जा सकता है। जब दुश्मन गलती कर रहा हो तो उसे टोकना नहीं चाहिए। चीन ठीक यही कर रहा है। चुपचाप खेल खेल रहा है, ईरान को समर्थन दे रहा है, अपना फायदा निकाल रहा है और दुनिया के सामने एक गंभीर और स्थिर नेता की तरह उभर रहा है।

ईरान-अमेरिका युद्ध से भारत को भी कई सबक मिलते हैं। पहला, चीन ने ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान को जो सैन्य जानकारी दी थी, वही काम वो आज ईरान के साथ कर रहा है। हमें इस बात का गंभीरता से संज्ञान लेना होगा। दूसरा, ईरान का सस्ता तेल भारत खरीद सकता था लेकिन अमेरिका के डर से हमने वो अवसर गँवा दिया और चीन ने वहाँ बाज़ी मार ली।

ट्रंप ने भारत पर टैरिफ की जो मार दी है उसने व्यावहारिक रूप से प्रधानमंत्री मोदी को चीन की ओर धकेल दिया है। यह ईरान-अमेरिका युद्ध का एक अप्रत्यक्ष लेकिन महत्वपूर्ण परिणाम है।

अमेरिका की चीख और चीन की मुस्कान

ईरान-अमेरिका युद्ध का सार यही है कि अमेरिका जितना ज़ोर-ज़ोर से विजय का ऐलान कर रहा है, उतना ही कमज़ोर दिख रहा है। उसकी सैन्य विश्वसनीयता धूल में मिल रही है। डॉलर कमज़ोर हो रहा है। सहयोगी साथ छोड़ रहे हैं और नेतृत्व की छवि बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुकी है।

वहीं दूसरी तरफ चीन चुपचाप खड़ा होकर मुस्करा रहा है। बिना एक सैनिक खोए, बिना एक गोली चलाए, बिना किसी कूटनीतिक विवाद के, चीन ने ईरान-अमेरिका युद्ध से वो सब कुछ हासिल कर लिया जो वो हमेशा से चाहता था। अमेरिका कमज़ोर हो, उसकी वैश्विक साख गिरे और चीन का दबदबा बढ़े।

सालों से चीन का एक सपना था। दुनिया की नजरों में अमेरिका गिरे और दुनिया की नजरों में चीन उभरे। ईरान-अमेरिका युद्ध में ट्रंप ने चीन के इस सपने को पूरा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। और चीन वहाँ चुपचाप खड़ा होकर कह रहा है, बेटा तुम और गलतियाँ करो। वर्चस्व तो अब हमारा ही होगा।

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