छत्रपति-शिवाजी-महाराजः-असली-इतिहास-जो-आपसे-छुपाया-गया-जानिए-सच्चाई

छत्रपति शिवाजी महाराजः असली इतिहास जो आपसे छुपाया गया, जानिए सच्चाई

परिचयः वो सच जो कहना मुश्किल था

छत्रपति शिवाजी महाराज का नाम सुनते ही हर भारतीय के मन में एक वीर योद्धा की छवि उभरती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि छत्रपति शिवाजी महाराज का असली इतिहास आज भी अधूरा पढ़ाया जाता है? छत्रपति शिवाजी महाराज के बारे में इंटरनेट पर ऐसे कई मिथक फैले हुए हैं जो सच्चाई से कोसों दूर हैं। यह लेख उन्हीं मिथकों को तोड़ने की एक कोशिश क कोशिश है। छत्रपति शिवाजी महाराज के जीवन से जुड़े चार बड़े सवालों के जवाब यहाँ विस्तार से दिए गए हैं।
पहला सवाल – क्या छत्रपति शिवाजी महाराज धर्मनिरपेक्ष थे? दूसरा सवाल- मुगलों और मराठों में क्या फर्क था? तीसरा सवाल – छत्रपति शिवाजी महाराज का इतिहास हमसे क्यों छुपाया गया? और चौथा सवाल – क्या छत्रपति शिवाजी महाराज आज भी प्रासंगिक हैं? इन चारों सवालों के जवाब जानने के लिए इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें।

क्या छत्रपति शिवाजी महाराज सच में धर्मनिरपेक्ष थे?

जब भी छत्रपति शिवाजी महाराज की बात होती है, तो एक तबका यह कहता है कि वे धर्मनिरपेक्ष राजा थे। लेकिन यह सच्चाई नहीं है। सच यह है कि छत्रपति शिवाजी महाराज धर्मनिर्देशक थे, धर्मनिरपेक्ष नहीं। इन दोनों शब्दों में बहुत बड़ा फर्क है। धर्मनिर्देशक का अर्थ है जो धर्म के मार्गदर्शन में चले, जो अपने धर्म को सर्वोच्च मानते हुए दूसरों के साथ न्याय करे।
छत्रपति शिवाजी महाराज के अष्टप्रधान मंडल में ‘धर्माज्ञा पंडित’ नामक एक विशेष पद था। अगर छत्रपति शिवाजी महाराज पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष होते, तो यह पद कभी नहीं बनता। उस समय का संविधान धर्म था। जब राष्ट्र धर्म के आधार पर चलता है, तो राजा अपने धर्म को ही प्रमुखता देता है। छत्रपति शिवाजी महाराज हिंदू थे, इसलिए उन्होंने हिंदू धर्म और हिंदू संस्कृति की रक्षा को अपना प्रमुख कर्तव्य माना।
एक और उदाहरण देखें- नेताजी पालकर, जिन्हें औरंगजेब ने जबरदस्ती इस्लाम कबूल करवाया था, छत्रपति शिवाजी महाराज ने उन्हें वापस हिंदू धर्म में लाया। अगर वे धर्मनिरपेक्ष होते तो यह कदम क्यों उठाते? इसके अलावा, कल्याण-भिवंडी की मस्जिदें जो आदिल शाह के अधीन थीं, उन्हें छत्रपति शिवाजी महाराज ने अनाज भंडार में बदल दिया। मौलवियों का कोष बंद कर दिया गया। ये सब कार्य कार्य एक ऐसे राजा के हैं जो अपनी सभ्यता और अपने धर्म की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध था।
यह भी सच है कि छत्रपति शिवाजी महाराज की सेना में कुछ मुसलमान योद्धा भी थे। लेकिन इसे धर्मनिरपेक्षता का प्रमाण मानना गलत है। ठीक वैसे ही जैसे आज़ाद हिंद सेना में कुछ अंग्रेज भी थे। जो लोग आपके उद्देश्य में विश्वास रखते हों, जो देश और धर्म से प्रेम करते हों उनका साथ लेना बुद्धिमानी है। छत्रपति शिवाजी महाराज किसी भी धर्म से नफरत नहीं करते थे। लेकिन उनके लिए उनकी भूमि, उनके लोग और उनका धर्म सर्वोपरि था।

धर्मनिरपेक्षता के नाम पर इतिहास को क्यों तोड़ा-मरोड़ा जाता है?

आज के दौर में ‘धर्मनिरपेक्षता’ का अर्थ बदल गया है। इसका इस्तेमाल अब सत्य को छुपाने के लिए होता है। जो इतिहास की सच्चाई को बताता है, उसे ‘सांप्रदायिक’ कहा जाता है। जो झूठ को छुपाता है, वह ‘धर्मनिरपेक्ष कहलाता है। यह बेहद खतरनाक प्रवृत्ति है। छत्रपति शिवाजी महाराज के बारे में ऐसे कई झूठ फैलाए गए हैं। इन झूठों को तोड़ना बेहद जरूरी है। सच्चाई यह है कि धर्मनिरपेक्षता संवाद से आती है, न कि सच्चाई को दबाने से।

मुगलों और मराठों में क्या फर्क था? छत्रपति शिवाजी महाराज बनाम औरंगजेब

कुछ लोग यह तर्क देते हैं कि मुगल और मराठे एक जैसे थे। दोनों अपने साम्राज्य का विस्तार कर रहे थे। मुगल ज्यादा सफल रहे इसलिए उनका इतिहास ज्यादा पढ़ाया जाता है। लेकिन यह तुलना पूरी तरह गलत है। छत्रपति शिवाजी महाराज और औरंगजेब में जमीन-आसमान का फर्क था।
एक उदाहरण से समझें। मान लीजिए आप अपने घर में शांति से रह रहे हैं। अचानक कोई बाहर से आता है, आपके घर पर कब्जा करता है, आपकी बहू-बेटियों पर अत्याचार करता है, आपके मंदिर तोड़ता है, आपका उपनाम बदल देता है और कहता है अब से मुझे पापा बुलाओ। यही औरंगजेब ने किया। जबकि छत्रपति शिवाजी महाराज ने अपनी भूमि, अपने लोगों की रक्षा की।
औरंगजेब ने जजिया कर लगाया। जजिया एक ऐसा कर था जो गैर-मुस्लिमों पर लगाया जाता था। जो व्यक्ति प्रति माह 100 दिनार कमाता था, उसे इतना ज्यादा जजिया देना पड़ता था कि उसके पास कुछ भी नहीं बचता था। इस आर्थिक दबाव की वजह से लोग धर्म परिवर्तन करने पर मजबूर हो जाते थे। तलवार और अर्थव्यवस्था दोनों तरफ से धर्म परिवर्तन कराया जाता था। यही औरंगजेब की नीति थी।
इसके विपरीत, छत्रपति शिवाजी महाराज ने जब राजा छत्रसाल के साथ मिलकर काम किया, तो उन्होंने कहा ‘तुम राजा बनो, मैं नहीं।’ कर्नाटक में मल्लम्मा देवी की घटना में जब छत्रपति शिवाजी महाराज को वह क्षेत्र मिला, तो उन्होंने उसे वापस मल्लम्मा देवी को ही सौंप दिया। छत्रपति शिवाजी महाराज ने किसी भी किले को अपना नाम नहीं दिया। उन्होंने अपने राज्य को अपना नाम नहीं दिया। यहाँ तक कि वे अपना राज्याभिषेक भी नहीं कराना चाहते थे।

कवि भूषण की कहानी- जब एक मुगल कवि ने छत्रपति को माना अपना नायक

औरंगजेब के दरबारी कवि भूषण की एक अद्भुत कहानी है। वे मुगलों के लिए काम करते थे और उनकी प्रशंसा में कविताएं लिखते थे। एक बार औरंगजेब ने उनसे कहा कि असली कविता लिखो, चापलुसी नहीं। कवि भूषण ने एक पंक्ति लिखी – ‘सौ चूहों ने बिल्ली को खाया और हज के लिए रवाना हो गए।’ यह सुनकर औरंगजेब क्रोधित हो गया।
जब कवि भूषण को छत्रपति शिवाजी महाराज के बारे में पता चला कि दक्षिण में एक ऐसा राजा है जो अपने लोगों के लिए लड़ रहा है है – तो वे उनसे मिलने आए। कवि भूषण ने छत्रपति शिवाजी महाराज के लिए एक कविता लिखी जिसमें कहा गयाः ‘काशी का कला रूप मथुरा, मदीना रहा होता। अगर शिवाजी न होते तो सुन्नत होती, सब मुसलमान बन जाते।’ यह एक मुगल कवि के शब्द हैं यही छत्रपति शिवाजी महाराज की असली महानता का प्रमाण है।

छत्रपति शिवाजी महाराज का इतिहास हमसे क्यों छुपाया गया?

यह सवाल बेहद जरूरी है। छत्रपति शिवाजी महाराज जैसे महान राजा का इतिहास महाराष्ट्र के बाहर ठीक से क्यों नहीं पढ़ाया जाता? इसके पीछे एक सोची-समझी राजनीति है। वे लोग जो दिल्ली में बैठने वाले राजा को ही ‘असली राजा’ मानते थे उनके लिए छत्रपति शिवाजी महाराज खतरा थे। क्योंकि छत्रपति शिवाजी महाराज ने स्वराज्य की अवधारणा दी यानी अपना खुद का राज्य।
इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में मुगल सल्तनत को विस्तार से पढ़ाया जाता है, लेकिन जब मुगल हारे वह कैसे हारे, किसने उन्हें हराया यह नहीं बताया जाता। दिल्ली सल्तनत के बारे में सब कुछ बताया जाता है, लेकिन छत्रपति शिवाजी महाराज के योगदान को या तो कम करके दिखाया जाता है या फिर विकृत करके दिखाया जाता है। कुछ तथाकथित इतिहासकारों ने तो यहाँ तक कह दिया कि छत्रपति शिवाजी महाराज खुद हिंदू मंदिर लूटते थे लेकिन जब इस दावे की तथ्य जांच हुई तो वे बुरी तरह बेनकाब हो गए।

इतिहास में प्रचार का घुसपैठ – वामपंथी इतिहासकारों की भूमिका

कार्ल मार्क्स ने कहा था कि क्रांति बाईं ओर से आएगी। समय के साथ वामपंथियों ने महसूस किया कि सिर्फ हिंसा से बदलाव नहीं आएगा। उन्होंने शिक्षा और संस्कृति को अपना हथियार बनाया। पहले उन्होंने रामायण और महाभारत को काल्पनिक कहानियाँ बताया। फिर धीरे-धीरे इतिहास को बदलना शुरू किया। टीपू सुल्तान को स्वतंत्रता सेनानी बताया गया, जबकि उसने तुर्क साम्राज्य को पत्र लिखकर भारत में आने और धर्म परिवर्तन करने में सहयोग माँगा था।
औरंगजेब के अपराधों को सफेद करने का काम भी इन्हीं तथाकथित इतिहासकारों ने किया। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऑड्रे टुश्के जैसे इतिहासकार यह कहते हैं कि औरंगजेब ने इतने मंदिर नहीं तोड़े, बल्कि उसने मंदिरों का निर्माण भी किया। लेकिन जब आप स्वयं मुगलों के पत्रों, उनके जीवनीकारों की लेखनी को देखते हैं तो उनमें गर्व के साथ मंदिर विध्वंस का उल्लेख है। फिर भी आज ये इतिहासकार उसे सफेद करने में लगे हैं।
भारत की शिक्षा प्रणाली की यह सबसे बड़ी विफलता है। अलग-अलग समुदायों को अलग-अलग इतिहास पढ़ाया जाता है। एक बच्चे को एक इतिहास सिखाया जाता है, दूसरे बच्चे को अलग। महाराष्ट्र में छत्रपति शिवाजी महाराज का इतिहास पढ़ाया जाता है, लेकिन उत्तर भारत में में नहीं। नहीं। इससे समाज में एकता नहीं बनती, बल्कि टकराव बढ़ता है। जब एक ही घटना को अलग-अलग नजरिए से पढ़ाया जाए, तो देश एक कैसे रहेगा?

छत्रपति शिवाजी महाराज आज भी क्यों प्रासंगिक हैं?

यह सवाल सबसे महत्वपूर्ण है। जब हम कहते हैं कि छत्रपति शिवाजी महाराज प्रासंगिक हैं, तो इसका क्या मतलब है? इसका सीधा अर्थ है- स्वराज्य की अवधारणा आज भी जीवित है। स्वराज्य का अर्थ केवल अपना राज्य नहीं है। स्वराज्य का अर्थ है- एक ऐसा समाज जहाँ हर व्यक्ति बिना डर के जी सके।
छत्रपति शिवाजी महाराज ने शाहजी राजा की स्वराज्य की अवधारणा को फैलाया। इसी विचार को आगे चलकर झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई ने अपनाया। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने जब स्वतंत्रता आंदोलन शुरू किया तो उन्होंने भी स्वराज्य का नारा दिया। यहाँ तक कि कई अंग्रेज सेनापतियों ने कहा था ‘अगर शिवाजी हमारे देश में पैदा होते तो हम बहुत पहले विश्व विजेता बन जाते।’ यही छत्रपति शिवाजी महाराज की असली महानता है।
जीवन के तीन स्तंभ – बुद्धि, शरीर और आत्मा
छत्रपति शिवाजी महाराज का जीवन हमें तीन चीजें सिखाता है बुद्धि, शरीर और आत्मा। जब ज्ञान नष्ट होता है, तो इतिहास बदल जाता है- जैसे हमारी रामायण, वेद और पुराण बदले गए। जब शरीर कमजोर होता है, तो आक्रमणकारी हमला करते हैं। और जब आत्मा मर जाती है, तो समाज खुद नष्ट हो जाता है।
जीजाबाई ने जब पुणे आकर आलंदी में ज्ञानेश्वर माउली की समाधि को फिर से स्थापित करवाया, तो वे आत्मा को जागृत कर रही थीं। रही थीं। जब उन्होंने सभी लोगों को एकत्रित किया, तो तो वे समाज के शरीर को मजबूत कर रही थीं। और जब उन्होंने शिवाजी को शिक्षा दी, तो वे ज्ञान का विस्तार कर रही थीं। यही तीनों मिलकर छत्रपति शिवाजी महाराज को एक महान राजा बनाते हैं।
सामूहिक चेतना – छत्रपति शिवाजी महाराज का सबसे बड़ा संदेश
छत्रपति शिवाजी महाराज ने कभी नहीं कहा कि यह मेरा सपना है। उन्होंने हमेशा कहा- यह हमारा सपना है। इसे ‘सामूहिक चेतना’ कहते हैं। जब अफजल खान आया तो छत्रपति शिवाजी महाराज ने नवंबर में उसे मार गिराया। लेकिन उससे पहले सितंबर में उनकी पहली पत्नी साई बाई का निधन हो चुका था। इस व्यक्तिगत दुख के बावजूद छत्रपति शिवाजी महाराज ने अपने कर्तव्यों का पालन किया। यही सच्चा नेतृत्व है। जब राज्याभिषेक के बाद छत्रपति शिवाजी महाराज सिंहासन पर बैठने जा रहे थे, तो उन्हें बाजी प्रभु देशपांडे याद आए जिन्होंने उनके लिए अपनी जान दे दी। उन्हें धनाजी, शिवा काशीद सभी वीर याद आए। इसीलिए उन्होंने कहा था ‘इतना बड़ा सिंहासन दो कि मेरे सभी साथी उस पर बैठ सकें।’ यही उनकी महानता थी।

आज के युग में छत्रपति शिवाजी महाराज से क्या सीखें?

छत्रपति शिवाजी महाराज का जीवन हर उम्र में मार्गदर्शन करता है। बचपन में माता-पिता की जिम्मेदारी है कि वे अपने बच्चों को छत्रपति शिवाजी महाराज का असली इतिहास पढ़ाएं। क्योंकि छत्रपति शिवाजी महाराज जीजाबाई और शाहजी राजा के संस्कारों से महान बने। 16 से 24 साल की उम्र में अच्छे दोस्त बनाना जरूरी है। आप अपने दोस्तों के समूह के औसत के बराबर होते हैं। छत्रपति शिवाजी महाराज के सभी साथी असाधारण थे।
युवाओं के लिए छत्रपति शिवाजी महाराज का संदेश है- भगवद गीता का वह सिद्धांत जो वे अपने साथियों को सुनाते थेः ‘सुनो अर्जुन, तुम और मैं अलग नहीं हैं। यह राज मेरा नहीं है। अगर तुम्हें लगता है कि तुम्हारे घर की महिलाएं सुरक्षित हैं, तो अपने राज के लिए लड़ो। अगर तुम्हारे आंगन की तुलसी सुरक्षित है, तो उसके लिए लड़ो।’ इसीलिए लोग उनके लिए मरने-मारने को तैयार रहते थे।
आज का स्वराज्य इस तरह दिखता है- अगर मैं रास्ते पर जा रहा हूँ, तो मुझे डर नहीं होना चाहिए। अगर कोई महिला रास्ते पर जा रही है, तो उसे डर नहीं होना चाहिए। लोकतंत्र में हम खुद राजा हैं। प्रधानमंत्री हमारे राजा नहीं हैं। संविधान हमारा सर्वोच्च है। यही आज का स्वराज्य है और यही छत्रपति शिवाजी महाराज का सपना था

निष्कर्षः छत्रपति शिवाजी महाराज का सपना जियो

छत्रपति शिवाजी महाराज का कोई बुढ़ापा नहीं था। वे उम्र में ही चले गए लेकिन उनका जीवन और उनके आदर्श अमर हैं। आज भारत को ऐसे नेताओं की जरूरत है जो चुनाव के बारे में कम और देश के भविष्य के बारे में ज्यादा सोचें। जो देश को जाति, भाषा और संप्रदाय के नाम पर बाँटने की बजाय एकत्रित करें।
अगर छत्रपति शिवाजी महाराज आज जीवित होते, तो सबसे पहले वे उन लोगों की खबर लेते जो उनके नाम पर वोट माँगते हैं लेकिन उनके किलों की मरम्मत नहीं करवाते। स्वराज्य कोई मंजिल नहीं है- स्वराज्य एक प्रक्रिया है। और इस प्रक्रिया में हर ‘मावले’ की जरूरत है।
छत्रपति शिवाजी महाराज का असली इतिहास पढ़ना अधिकारी को, हर राजनेता को, हर माता-पिता को महाराज सिर्फ इतिहास की किताबों तक सीमित न रहें, हर भारतीय का अधिकार और कर्तव्य दोनों है। हर पुलिस सबको यह इतिहास पढ़ाना होगा। ताकि छत्रपति शिवाजी बल्कि हमारे जीवन का मार्गदर्शन करते रहें।
जैसा कि फिल्म ‘सेविंग प्राइवेट रायन’ में कहा गया ‘एक अच्छा जीवन जियो।’ तो छत्रपति शिवाजी महाराज का संदेश यही है- एक अच्छे पति बनो, एक अच्छे पिता बनो, एक अच्छे बेटे बनो, एक अच्छे नागरिक बनो। अगर तुम इतना भी कर लोगे तो यह काफी है। क्योंकि किसी ने अपनी पत्नी को अपने आखिरी पलों में नहीं देखा, ताकि तुम अपनी पत्नी के साथ खुशी से जी सको। कम से कम उस बात को तो पूरा करो।
भारत एक राष्ट्र तभी बन पाएगा जब इस राष्ट्र की आत्मा फिर से जीवित होगी। और इस आत्मा को पुनर्जीवित करने के लिए हमें छत्रपति शिवाजी महाराज की जरूरत है। जय शिवाजी! जय महाराष्ट्र! जय भारत !

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