ज़ेप्टो, जिसने पूरी दुनिया को बताया कि ग्रोसरी मँगवाने के लिए 10 मिनट ही काफी हैं। यह कंपनी दो साल में यूनिकॉर्न बन गई और आज इसकी वैल्यूएशन 7 बिलियन डॉलर से भी ज़्यादा है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह कारनामा किसी अनुभवी व्यापारी ने नहीं बल्कि सिर्फ 20 साल के दो किशोरों ने कर दिखाया?
जिस उम्र में ज़्यादातर लोग कॉलेज में मस्ती करते हैं उस उम्र में आदित्य पालीचा और कैवल्य बोहरा ने ज़ेप्टो जैसी अरबों डॉलर की कंपनी खड़ी कर दी। आइए जानते हैं ज़ेप्टो की पूरी कहानी, कैसे यह कंपनी बनी, कैसे बढ़ी और कौन है वो तीसरा नाम जो आज अपनी इक्विटी की लड़ाई लड़ रहा है।
ज़ेप्टो की कहानी: दो बचपन के दोस्त और एक बड़ा सपना
ज़ेप्टो की कहानी शुरू होती है 2020 के लॉकडाउन से। पूरी दुनिया घरों में बंद थी। बाहर निकलना जोखिम भरा था और हर किसी के मन में एक ही सवाल था कि ग्रोसरी कहाँ से आएगी।
उसी समय करीब 20 साल के दो युवा दोस्त आदित्य पालीचा और कैवल्य बोहरा भी इसी समस्या से जूझ रहे थे। ये दोनों बचपन के दोस्त थे जो मुंबई में पैदा हुए और दुबई में एक साथ पढ़े। वहाँ दोनों ने मिलकर कई छोटे टेक प्रोजेक्ट्स पर काम किया जिनमें एक था गो-पूल ऐप, एक कार-पूलिंग सेवा जो पड़ोस के बच्चों को एक ही गाड़ी से स्कूल पहुँचाने की सुविधा देती थी।
इस प्रोजेक्ट ने दोनों का आत्मविश्वास बढ़ाया और वो स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी से कंप्यूटर साइंस पढ़ने चले गए। लेकिन कोविड-19 महामारी ने उन्हें वापस मुंबई लौटने पर मजबूर कर दिया।
मुंबई लौटने पर उन्होंने देखा कि लोगों को दूध, सब्जियाँ और दाल-चावल जैसी रोज़मर्रा की चीज़ें समय पर नहीं मिल रही थीं। ऑनलाइन डिलीवरी ऐप्स बहुत धीमी थीं और सामान आने में दो दिन से दो हफ्ते तक लग जाते थे। एक सर्वे में 79 प्रतिशत लोगों ने बताया कि उनके ऑर्डर या तो देर से आ रहे थे या कैंसिल हो जा रहे थे।
अमेरिका में इंस्टाकार्ट मॉडल से प्रभावित होकर दोनों ने सोचा कि भारत में भी एक ऐसा हाइपर-लोकल डिलीवरी सिस्टम बनाया जाए जो लोगों को ग्रोसरी सिर्फ 30 मिनट में पहुँचा सके।
ज़ेप्टो की कहानी: WhatsApp ग्रुप से शुरू हुई अरबों की कंपनी
ज़ेप्टो की शुरुआत एक साधारण WhatsApp ग्रुप से हुई। आदित्य और कैवल्य ने अपने आसपास के लोगों से ऑर्डर लेने शुरू किए। धीरे-धीरे ग्रुप फैलता गया। पहले 20 लोग जुड़े, फिर 50, फिर 100 और देखते-देखते पूरा मोहल्ला जुड़ गया। लेकिन जल्द ही WhatsApp की 256 सदस्यों की सीमा भर गई।
अब समय आ गया था इस आइडिया को एक प्रॉपर डिजिटल प्लेटफॉर्म में बदलने का। इस तरह 2020 के मध्य में उन्होंने किराना कार्ट की शुरुआत की। यह एक ऐसा प्लेटफॉर्म था जहाँ लोग दाल, चावल, सब्जी, ब्रेड, दूध और स्नैक्स ऑर्डर कर सकते थे। ऑर्डर अपने आप ग्राहक के आसपास के लोकल किराना स्टोर तक पहुँच जाता था और किराना कार्ट के डिलीवरी पार्टनर सामान ग्राहक तक 30 से 45 मिनट में पहुँचाते थे।
शुरुआत में किराना कार्ट ने मुंबई के बोरीवली, अंधेरी, बांद्रा, जुहू और कोलाबा जैसे इलाकों में कई लोकल दुकानों से साझेदारी की। जनवरी 2021 में कंपनी ने अपने पहले प्री-सीड फंडिंग राउंड में ग्लोबल फाउंडर्स कैपिटल और अन्य निवेशकों से 300,000 डॉलर जुटाए और कंपनी की वैल्यूएशन 2.5 मिलियन डॉलर तक पहुँच गई।
पहला बड़ा संकट और नई दिशा
जब लॉकडाउन खत्म हुआ तो लोगों का शॉपिंग व्यवहार पूरी तरह बदल गया। जो लोग घरों में बंद थे वो अब खुद बाहर जाकर सामान खरीदने लगे। उनका तर्क सरल था कि जब 10 मिनट में खुद दुकान से ला सकते हैं तो डिलीवरी का इंतज़ार क्यों करें?
यह बदलाव आदित्य और कैवल्य के लिए बड़ी मुसीबत बन गया। तभी उनके दिमाग में एक शानदार आइडिया आया कि क्यों न हम खुद ही लोगों तक 10 मिनट में सामान पहुँचाएँ?
इसी दौरान उनकी मुलाकात सुबीर सुजन से हुई जो नेक्सस वेंचर पार्टनर्स के सह-संस्थापक हैं और उन्होंने साल 2000 में बाजी.कॉम नाम की ई-कॉमर्स कंपनी भी शुरू की थी जिसे बाद में eBay ने खरीद लिया था। सुबीर ने किराना कार्ट के मॉडल को ध्यान से समझकर साफ कहा कि यह किराना-आधारित मॉडल लंबे समय तक नहीं टिक पाएगा क्योंकि मार्जिन बहुत कम हैं और पूरा बिजनेस लोकल किराना स्टोर पर निर्भर है जिसे कंपनी कंट्रोल नहीं कर सकती।
सुबीर ने उन्हें एक गेम-चेंजिंग सलाह दी, अगर 10 मिनट डिलीवरी और प्रॉफिटेबल बिजनेस चाहिए तो खुद का सप्लाई चेन बनाना होगा। और यहीं से जन्म हुआ डार्क स्टोर मॉडल का।
डार्क स्टोर मॉडल: ज़ेप्टो की असली ताकत
डार्क स्टोर असल में माइक्रो-वेयरहाउस होते हैं जो शहरों के रणनीतिक बिंदुओं पर बनाए जाते हैं जैसे रेज़िडेंशियल कॉलोनियों या बिज़नेस हब्स के बिल्कुल पास। इन स्टोर्स में वो सामान पहले से रखा जाता है जो उस इलाके में सबसे ज़्यादा माँग में रहता है।
जब भी कोई ग्राहक ऑर्डर करता है तो डिलीवरी पार्टनर को किसी बाहरी दुकान पर नहीं जाना पड़ता। वो सीधे अपने ज़ोन के डार्क स्टोर से सामान उठाता है और कुछ ही मिनटों में घर तक पहुँचा देता है। न शॉपकीपर की निर्भरता, न लंबी दूरी की यात्रा।
अप्रैल 2021 में आदित्य और कैवल्य ने किराना कार्ट को पूरी तरह रीब्रांड किया और नाम रखा ज़ेप्टो। यह नाम आया ज़ेप्टो सेकंड से जो भौतिकी में सबसे छोटी मापने योग्य इकाई है। नाम के पीछे एक ही संदेश था, सबसे तेज़ डिलीवरी।
60 मिलियन डॉलर की फंडिंग और यूनिकॉर्न का सफर
अक्टूबर 2021 में किस्मत ने करवट ली। नेक्सस वेंचर पार्टनर्स, Y Combinator और कई प्रसिद्ध एंजेल निवेशकों जैसे WhatsApp के पूर्व कार्यकारी नीरज अरोड़ा और Uber के पूर्व प्रोडक्ट हेड मणिक गुप्ता ने मिलकर ज़ेप्टो को 60 मिलियन डॉलर की फंडिंग दी। इस डील के बाद ज़ेप्टो की वैल्यूएशन सीधे 225 मिलियन डॉलर तक पहुँच गई।
ज़ेप्टो ने मुंबई के प्रमुख आवासीय और व्यावसायिक क्षेत्रों में अपने डार्क स्टोर लॉन्च किए। हर लोकेशन सोच-समझकर चुनी गई ताकि ऑर्डर 10 मिनट में ग्राहक तक पहुँच सके। कुछ ही हफ्तों में ज़ेप्टो रोज़ाना हज़ारों ऑर्डर डिलीवर करने लगा।
10 मिनट ग्रोसरी डिलीवरी भारत के लिए बिल्कुल अनोखा कांसेप्ट था। सोशल मीडिया पर चैलेंज चलने लगा यह देखने के लिए कि ज़ेप्टो सच में 10 मिनट में डिलीवरी करता है या नहीं। इस तरह ज़ेप्टो ने बहुत कम समय में ज़बरदस्त लोकप्रियता हासिल कर ली।
AI तकनीक से बदला पूरा खेल
जब दिसंबर 2021 में ग्रोफर्स ने खुद को ब्लिंकिट के नाम से रीब्रांड करके क्विक कॉमर्स में उतरा तो ज़ेप्टो के लिए मुकाबला कठिन हो गया। ब्लिंकिट के पास पहले से ही मज़बूत सप्लाई चेन और बड़े वेयरहाउस थे।
लेकिन आदित्य और कैवल्य ने हार नहीं मानी। उन्हें समझ आया कि अगर मार्केट में जीतना है तो सिर्फ तेज़ डिलीवरी नहीं बल्कि स्मार्ट तकनीक भी चाहिए। उन्होंने AI-संचालित लॉजिस्टिक्स सिस्टम लॉन्च किया।
इस सिस्टम में स्मार्ट रूटिंग एल्गोरिदम तैयार किए गए जो डिलीवरी पार्टनरों को सबसे तेज़ और छोटा रास्ता बताते थे। रियल-टाइम ट्रैकिंग फीचर शुरू किया गया जिससे ग्राहक अपना ऑर्डर लाइव देख सकते थे। प्रेडिक्टिव एनालिटिक्स से पहले ही पता लग जाता था कि किस समय ज़्यादा ऑर्डर आएँगे और उसी हिसाब से संसाधन तैनात होते थे।
इन प्रयासों का असर तुरंत दिखा। ज़ेप्टो की डिलीवरी स्पीड 30 प्रतिशत तेज़ हो गई। औसत डिलीवरी समय 10 मिनट से घटकर 8 मिनट 47 सेकंड पर आ गया और कंपनी का खर्च 20 प्रतिशत तक कम हुआ।
तीसरा नाम और इक्विटी की लड़ाई
ज़ेप्टो की तेज़ ग्रोथ के बीच अगस्त 2021 में 20 साल के छात्र उद्यमी अंश नंदा ने दोनों संस्थापकों पर इक्विटी फ्रॉड का आरोप लगाया। अंश का दावा था कि उन्होंने ज़ेप्टो के पहले संस्करण यानी किराना कार्ट का अधिकांश कोड खुद लिखा था लेकिन Y Combinator में चुने जाने के बाद उनका 20 प्रतिशत शेयर घटाकर 4 प्रतिशत कर दिया गया। उन्होंने IPC 420 और 506 के तहत FIR दर्ज कराई।
बाद में दोनों पक्षों ने कोर्ट के बाहर ही सेटलमेंट कर लिया जिससे कंपनी की प्रतिष्ठा पर कोई खास असर नहीं पड़ा।
ज़ेप्टो कैफे और ज़ेप्टो ब्लूम
इक्विटी विवाद से बाहर आने के बाद संस्थापकों ने फिर से बिजनेस पर ध्यान लगाया। उन्होंने देखा कि लोग अब ग्रोसरी के साथ-साथ कॉफी, चाय और स्नैक्स की भी तेज़ डिलीवरी चाहते हैं।
अप्रैल 2022 में ज़ेप्टो ने ज़ेप्टो कैफे लॉन्च किया जहाँ से लोग कॉफी, बेवरेजेस और स्नैक्स मँगवा सकते हैं। ज़ेप्टो कैफे ने अलग-अलग कैफे और क्लाउड किचन से साझेदारी की। ऑर्डर मिलते ही सामान तैयार होता और कुछ मिनटों में ग्राहक तक पहुँच जाता। लॉन्च के कुछ समय बाद ही ज़ेप्टो कैफे ने एक लाख ऑर्डर प्रतिदिन का माइलस्टोन पार कर लिया।
फरवरी 2023 में ज़ेप्टो ने ज़ेप्टो ब्लूम लॉन्च किया जो खासतौर पर किसानों के लिए बनाया गया था। इसका मकसद था किसानों को सीधे ज़ेप्टो के सप्लाई चेन से जोड़ना ताकि वो अपने फल और सब्जियाँ बिना किसी बिचौलिए के सीधे शहरों तक भेज सकें।
यूनिकॉर्न बनी ज़ेप्टो
अगस्त 2023 में ज़ेप्टो ने 200 मिलियन डॉलर की फंडिंग जुटाई जिससे कंपनी की वैल्यूएशन 1.4 बिलियन डॉलर तक पहुँच गई। इस तरह ज़ेप्टो 2023 की पहली भारतीय यूनिकॉर्न कंपनी बन गई। वो स्टार्टअप जिसने लॉकडाउन में एक छोटे से अपार्टमेंट से शुरुआत की थी, अब अरबों डॉलर की कंपनी बन चुका था।
विस्तार, नुकसान और वापसी
जैसे-जैसे ज़ेप्टो की लोकप्रियता बढ़ी, प्रतिस्पर्धा का दबाव भी बढ़ा। कंपनी ने जल्द-से-जल्द हर बड़े शहर में विस्तार करने की कोशिश की। लेकिन कई इलाकों में उतने ऑर्डर नहीं आए जितनी उम्मीद थी। विशेषज्ञों के मुताबिक किसी भी डार्क स्टोर को मुनाफे तक आने में 12 से 18 महीने लग जाते हैं। 2024 में ज़ेप्टो का नुकसान 1248 करोड़ रुपये तक पहुँच गया।
इसके बाद ज़ेप्टो ने अपना विस्तार धीमा किया और करीब 50 कैफे आउटलेट बंद किए। मेडिसिन डिलीवरी में भी हाथ आज़माया लेकिन वहाँ भी सप्लाई चेन की दिक्कतें आईं।
आखिरकार ज़ेप्टो ने फैसला किया कि उसे वही करना चाहिए जिसमें वो सबसे बेहतर है, ग्रोसरी डिलीवरी। कंपनी ने फिर से अपनी पूरी ऊर्जा कोर ग्रोसरी बिजनेस पर लगाई और महसूस किया कि दीर्घकालिक सफलता सिर्फ स्पीड से नहीं बल्कि बेहतर अनुभव और निरंतरता से मिलती है।
आज ज़ेप्टो कहाँ है
2024 में ज़ेप्टो के पास 900 से भी ज़्यादा डार्क स्टोर हो गए। कंपनी का राजस्व 2023 में 2025 करोड़ से बढ़कर 2024 में 4454 करोड़ तक पहुँच गया। वित्त वर्ष 2025 में राजस्व 150 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 11,100 करोड़ रुपये तक पहुँच गया।
अक्टूबर 2025 में ज़ेप्टो की वैल्यूएशन बढ़कर 7 बिलियन डॉलर हो गई। मार्च 2025 के आँकड़ों के अनुसार ज़ेप्टो हर दिन करीब 1.5 लाख ऑर्डर डिलीवर कर रहा है।
ज़ेप्टो अब 2026 तक अपना IPO लाने की तैयारी में है ताकि आम लोग भी इसमें निवेश कर सकें। हालाँकि कंपनी अभी भी हर महीने करीब 700 करोड़ रुपये खर्च कर रही है और प्रॉफिटेबिलिटी अभी भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
ज़ेप्टो की कहानी यह साबित करती है कि सही समय पर सही समस्या पहचानकर, लगातार प्रयोग करते हुए और असफलताओं से सीखते हुए कोई भी 20 साल का नौजवान भी अरबों डॉलर की कंपनी खड़ी कर सकता है।
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