अगर एसएसपी संदीप की नजर उस दिन उस पोस्टर पर नहीं पड़ती, तो दिल्ली ब्लास्ट का सच यह होता कि 6 दिसंबर 2025 को एक साथ छह शहरों में 32 कार बमों का धमाका होता। सैकड़ों मासूमों की जानें जातीं। लेकिन एक पोस्टर, एक अफसर की पैनी नजर और फिर दिल्ली ब्लास्ट का सच धीरे-धीरे परत-दर-परत खुलता चला गया।
दिल्ली ब्लास्ट का सच एक ऐसी कहानी है जो कश्मीर के एक छोटे से गांव से शुरू होती है, मेडिकल कॉलेजों के कमरों में पलती है, फरीदाबाद की एक संदिग्ध यूनिवर्सिटी में आकार लेती है और फिर लाल किले के पास एक पार्किंग में अपने खूनी रूप में सामने आती है।
वो गांव जहां से शुरू हुआ दिल्ली ब्लास्ट का सच
जम्मू-कश्मीर की पुलवामा जिले में एक गांव है कॉइल। हाउस नंबर 581, मुस्लिम पोरा, कॉइल, पुलवामा। 24 फरवरी 1989 को इस घर में सरकारी टीचर गुलाम नबी भट्ट के घर एक बेटे ने जन्म लिया। नाम रखा गया उमर उन नबी।
कॉइल को लोग ‘विलेज ऑफ डॉक्टर्स’ कहते थे। यहां ज्यादातर घरों में डॉक्टर या मेडिकल लाइन से जुड़े लोग थे। उमर के घर में भी सपना था कि यह बच्चा एक दिन डॉक्टर बनेगा।
दिल्ली ब्लास्ट का सच यह है कि उसी घर में पले-बढ़े उमर ने एक दिन उसी दिल्ली में खून बहाया जहां पहुंचना हर होनहार का सपना होता है।
पढ़ाई में होशियार, लेकिन दिल में था कुछ और
साल 2002-03 में उमर का दाखिला एक सरकारी स्कूल में हुआ। कुछ साल बाद उसने डॉक्टर बनने की तैयारी शुरू की। जम्मू-कश्मीर में मेडिकल एंट्रेंस के लिए CET यानी कॉमन एंट्रेंस टेस्ट होता था।
उमर ने पहली बार 148 नंबर लिए। गवर्नमेंट कॉलेज के लिए 158 से ज्यादा चाहिए थे। उमर ने एक साल ड्रॉप लिया। 2010 में दोबारा परीक्षा दी। इस बार उसके 1995 नंबर आए और पूरे जम्मू-कश्मीर में 28वीं रैंक मिली। उमर को GMC यानी गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज श्रीनगर में MBBS मिल गई।
उसी दौर में उमर के घर से कुछ ही दूर रहने वाला मुजम्मिल शकील भी CET की तैयारी कर रहा था। दोनों साथ पढ़ते थे, साथ तैयारी करते थे। 2010 की परीक्षा में मुजम्मिल को 143 नंबर मिले, 701 रैंक आई। उसने ESCOM प्राइवेट कॉलेज में दाखिला लिया।
दिल्ली ब्लास्ट का सच यहीं से बुना जाना शुरू हुआ, उन्हीं कॉलेज के कमरों में जहां किताबें होनी चाहिए थीं।
वो दो लोग जिन्होंने उमर का दिमाग बदल दिया
GMC श्रीनगर में दो लोग थे जिनकी वजह से दिल्ली ब्लास्ट का सच आकार लेने लगा।
पहला था इरफान अहमद। GMC में पैरामेडिकल सपोर्ट स्टाफ था। कश्मीर के सोपियान जिले से आता था। पाकिस्तान के आउटफिट जैश-ए-मोहम्मद और अंसार गजवात उल हिंद ने उसे अपनी तरफ कर लिया था। इरफान का काम था पढ़े-लिखे नौजवानों को, खासकर डॉक्टरों और इंजीनियरों को, टेलीग्राम के जरिए ब्रेनवॉश करना और पाकिस्तान के आतंकी नेटवर्क से जोड़ना।
दूसरा था निसार उल हसन। GMC में जनरल मेडिसिन पढ़ाता था। देखने में एक सामान्य टीचर, लेकिन असल में अलगाववादी था जो इंडिया के खिलाफ काम करता था। मई 2014 में FIR दर्ज होने के बाद इसे कॉलेज से सस्पेंड कर दिया गया, लेकिन फिर भी यह आता-जाता रहा।
जब उमर GMC पहुंचा तो इरफान ने उसमें एक ‘पोटेंशियल कैंडिडेट’ देखा। उमर के मन में भारत के खिलाफ पहले से कुछ गुस्सा था। इरफान ने उसी को हवा दी।
कैसे बना आतंकी नेटवर्क
दिल्ली ब्लास्ट का सच यह है कि यह नेटवर्क एक ही जगह से नहीं, बल्कि दो कॉलेजों से एक साथ बुना गया।
GMC में उमर को आदिल अहमद से मिलवाया गया। आदिल भी वहीं MBBS कर रहा था। आदिल का भाई मुजफ्फर अहमद ESCOM में था, यानी मुजम्मिल के साथ। इस तरह दो कॉलेजों में दो जोड़ियां बन गईं। GMC में उमर-आदिल और ESCOM में मुजम्मिल-मुजफ्फर। ऊपर से इरफान और निसार का नेटवर्क इन सबको एक सूत्र में पिरोता रहा।
इन सबने मिलकर टेलीग्राम ग्रुप बनाए। ‘फर्जन्दान ए दारुल उलूम’ और ‘काफिला-ए-गुरबा’। इन्हीं ग्रुप्स के जरिए कश्मीरी युवाओं का ब्रेनवॉश होता था।
दिल्ली ब्लास्ट का सच यह भी है कि यह सब करते हुए ये लोग पढ़ाई में भी शानदार थे। उमर ने J&K PSC परीक्षा में पूरे राज्य में पहली रैंक हासिल की। लेकिन जब जॉब जॉइन करने का वक्त आया तो उसने इनकार कर दिया। आर्टिकल 370 हटने के बाद उसका मन पूरी तरह बदल चुका था।
MBBS के बाद MD और फिर फरीदाबाद का रास्ता
2017 में उमर ने GMC से MBBS पूरी की। मुजम्मिल ने ESCOM से। दोनों ने NEET PG दिया। उमर की ऑल इंडिया रैंक 1334 और J&K में 17वीं रैंक आई। उमर ने वापस GMC श्रीनगर में MD शुरू कर दी।
इस दौरान सभी ने अंसार गजवात उल हिंद की सदस्यता ले ली और पाकिस्तानी हैंडलर्स के संपर्क में आ गए। थ्रीमा, सिग्नल, सेशन, ब्रायर जैसी एन्क्रिप्टेड एप्स के जरिए पाकिस्तान से निर्देश आते और इरफान उन्हें आगे पहुंचाता।
अक्टूबर 2021 में उमर और मुजम्मिल ने MD पूरी की। दिसंबर 2021 में उमर, मुजम्मिल और मुजफ्फर, ये तीनों जम्मू-कश्मीर छोड़कर फरीदाबाद की अलफला यूनिवर्सिटी पहुंच गए। यहीं से दिल्ली ब्लास्ट का सच अपने सबसे खतरनाक मोड़ पर आया।
अलफला यूनिवर्सिटी का काला इतिहास
दिल्ली ब्लास्ट का सच समझने के लिए अलफला यूनिवर्सिटी का पूरा पिछला सच जानना जरूरी है।
यह यूनिवर्सिटी अलफला चैरिटेबल ट्रस्ट चलाती है। इसका कर्ताधर्ता है जावेद अहमद सिद्दीकी। 1991 में इसने एक इन्वेस्टमेंट कंपनी खोली और हाई रिटर्न का वादा करके 7.5 करोड़ का चिट फंड स्कैम किया। पकड़ा गया तो तीन साल तिहाड़ में बिताए।
जेल से निकलने के बाद मरे हुए लोगों के नाम पर फर्जी पावर ऑफ अटर्नी बनाकर जमीन खरीदी। शेल कंपनियां बनाईं। उसी पैसे से फरीदाबाद के दौज गांव में अलफला स्कूल ऑफ इंजीनियरिंग खोला। यूजीसी के सेक्शन 12B का दर्जा नहीं था, फिर भी फर्जी क्लेम करके AICTE से 1.10 करोड़, अल्पसंख्यक मंत्रालय से 6 करोड़ और स्कॉलरशिप के नाम पर 10 करोड़ सरकार से ले लिए।
ट्रस्टी और रजिस्ट्रार दोनों पाकिस्तान जा आए थे। एक पुराना छात्र इंडियन मुजाहिद्दीन का आतंकी निकला था। इतना सब होने के बाद भी NAAC से A ग्रेड मिल गया था।
दिल्ली ब्लास्ट का सच यह है कि इस पूरे खेल में न किसी ने इस यूनिवर्सिटी पर ध्यान दिया, न किसी ने सवाल पूछा।
तुर्की में ट्रेनिंग और ऑपरेशन D6 का प्लान
अलफला में पहुंचने के बाद इरफान के जरिए इन लोगों को TTP यानी तहरीक तालिबान पाकिस्तान के एक मेंबर ‘उकासा’ से मिलाया गया। मार्च 2022 में उमर, मुजम्मिल और मुजफ्फर तुर्की गए। वहां 20 दिन ट्रेनिंग हुई। VBIED यानी कार बम बनाना सिखाया गया। ड्रोन की ट्रेनिंग दी गई।
वापस आकर प्लान बनाया गया। 32 कारों में बम फिट करके एक साथ छह शहरों में हमला। हमास स्टाइल ड्रोन हमला भी साथ में। इस ऑपरेशन का नाम रखा गया — ऑपरेशन D6। तारीख तय हुई 6 दिसंबर 2025।
काम बंट गया। उमर और मुजम्मिल पूरे ऑपरेशन की लीड करेंगे। शाहीन सईद को सुसाइड बॉम्बर ढूंढने थे, फंड जुटाने था और महिला आतंकी विंग बनानी थी।
दिल्ली ब्लास्ट का सच यह है कि ये सब डॉक्टर थे, इसलिए इन पर शक भी नहीं गया।
शाहीन सईद: लखनऊ से पाकिस्तान तक का सफर
दिल्ली ब्लास्ट का सच समझना हो तो शाहीन सईद की कहानी भी जाननी होगी।
लखनऊ के कैसरबाग की रहने वाली शाहीन ने UP CET टॉप किया था। GSVM मेडिकल कॉलेज में सरकारी डॉक्टर बन गई। लेकिन 2013 में अचानक बिना किसी को बताए नौकरी छोड़ गायब हो गई। विभाग के नोटिस अनसुने रहे।
इसके बाद थाईलैंड, सऊदी अरब, UAE में रही। UAE में जैश-ए-मोहम्मद के हैंडलर से मिली। तीन बार पाकिस्तान गई। तीन अलग-अलग पते पर तीन पासपोर्ट बनवाए। अलफला में उमर के आने से एक महीने पहले वहां ज्वाइन कर लिया।
अलफला में उमर से मिलने के बाद वो इस पूरे ऑपरेशन की मुख्य फंड कोऑर्डिनेटर बन गई। उसके मोबाइल में दो नंबर थे — एक ‘मैडम X’ और एक ‘मैडम Z’ के नाम से। इन्हीं से पूरा ऑपरेशन कोऑर्डिनेट होता था।
मुजम्मिल और शाहीन का प्यार और शादी
दिल्ली ब्लास्ट का सच यहां एक अजीब मोड़ लेता है। बम बनाते-बनाते मुजम्मिल और शाहीन एक-दूसरे के करीब आ गए। शाहीन 11 साल बड़ी थी, तलाकशुदा थी। लेकिन सितंबर 2023 में दोनों ने अलफला यूनिवर्सिटी के पास की एक मस्जिद में सिर्फ 6000 रुपये मेहर देकर निकाह कर लिया।
1600 किलो विस्फोटक और छुपाने का पूरा जाल
हरियाणा की दो दुकानों लक्ष्मी बीज भंडार और मदन बीज भंडार से थोड़ा-थोड़ा करके 1600 किलो अमोनियम नाइट्रेट और NPK फर्टिलाइजर खरीदा गया। अलफला की केमिस्ट्री लैब से चोरी-छुपे केमिकल्स इकट्ठे किए गए। अमोनियम नाइट्रेट पीसने के लिए चक्की की मशीन और धातु पिघलाने के लिए इलेक्ट्रिक फर्नेस भी खरीदे।
बम का सामान दो रेंटेड कमरों में छुपाया गया। 358 किलो बम सूटकेस में रेडी-टू-यूज कंडीशन में था। 2553 किलो अमोनियम नाइट्रेट और 2900 किलो एक्सप्लोसिव भी जमा था।
कमांड सेंटर था अलफला की बिल्डिंग नंबर 17 का कमरा। 17 सिम अलग-अलग ID पर खरीदे गए। सात सेकेंड हैंड फोन नेपाल से मंगाए। कोड में बातें होती थीं, हथियारों को ‘मेडिसिन स्टॉक’, हमले की जगह को ‘ऑपरेशन थिएटर’ और बम तैयार होने पर संदेश जाता था — ‘बिरयानी इज रेडी, गेट रेडी फॉर दावत।’
Gmail की एक ID बनाई गई जिसका पासवर्ड सबके पास था। सीधे ईमेल नहीं भेजते, ड्राफ्ट में लिखते और दूसरा पढ़ लेता। दिल्ली ब्लास्ट का सच यह है कि इतनी चालाकी के बावजूद एक पोस्टर ने सब उलट दिया।
वो पोस्टर जिसने दिल्ली बचा ली
17 अक्टूबर 2025 को दीवाली से कुछ दिन पहले श्रीनगर के नौगाम के बुनपुरा इलाके में जैश-ए-मोहम्मद ने कुछ पोस्टर लगाए। इसमें लिखा था कि जो लोग भारतीय सुरक्षा बलों को पनाह दे रहे हैं उनके खिलाफ कार्रवाई होगी।
बहुत से लोग ऐसे पोस्टर अनदेखे कर देते हैं। लेकिन उसी दिन उस पोस्टर पर SSP जीवी संदीप चक्रवर्ती की नजर पड़ी। उन्हें कुछ अजीब लगा। अगले दिन UAPA समेत कई धाराओं में FIR दर्ज की और CCTV फुटेज खंगालना शुरू किया।
फुटेज में तीन लोग दिखे। पूछताछ में इरफान का नाम सामने आया। इरफान को उसी दिन उसके घर से उठा लिया गया। लैपटॉप और फोन जब्त हुए। इरफान ने फरीदाबाद के पूरे प्लान का खुलासा कर दिया।
रेड, गिरफ्तारियां और दिल्ली ब्लास्ट का सच सामने आया
30 अक्टूबर 2025 को जम्मू-कश्मीर पुलिस और हरियाणा पुलिस ने एक साथ अलफला यूनिवर्सिटी पर छापा मारा। मुजम्मिल पकड़ा गया। उमर और शाहीन भाग निकले।
27 अक्टूबर को आदिल ने श्रीनगर में पोस्टर लगाते वक्त CCTV में कैद हो गया था। वो भागा। 5 नवंबर को सहारनपुर के अस्पताल से आदिल को गिरफ्तार कर लिया गया। उसने रॉ मटेरियल और हथियारों की पूरी जानकारी दे दी। GMC अनंतनाग के लॉकर से AK-47 बरामद हुई।
12 सूटकेसों में 358 किलो बम और भारी मात्रा में हथियार मिले। दिल्ली ब्लास्ट का सच पूरी तरह बाहर आ चुका था।
9 दिन एक कमरे में छुपा उमर और फिर लाल किला
उमर अलफला से भागकर फरीदाबाद के नूंह हिदायत कॉलोनी में एक 10×14 फीट के किराये के कमरे में छुप गया। 9 दिन वहां रहा। न नहाया, न कपड़े बदले। कमरे की दीवार पर ही टॉयलेट करता रहा। प्लास्टिक बैग में मल। इतनी बदबू हो गई कि मकान मालकिन ने शिकायत की।
रात 10-11 बजे चुपके से पास के ढाबे पर खाना खाने जाता। बाकी पूरा दिन कमरे में बंद। हैंडलर से मकान मालिक के हॉटस्पॉट से बात करता।
9 नवंबर की रात 11 बजे उमर कमरे से निकला। i20 कार लेकर। रात भर दिल्ली-मथुरा-मानेसर पर घूमता रहा। अगले दिन आश्रम चौक, DNF फ्लाईओवर, मयूर विहार, इंडिया गेट, कनॉट प्लेस घूमा।
दोपहर में तुर्कमान गेट के पास फैज इलाही मस्जिद गया। 3:29 बजे सुनहरी मस्जिद की पार्किंग में कार रोकी। सोमवार था, लाल किला बंद था, पार्किंग खाली थी। तीन घंटे वहीं बैठकर बम असेंबल किया।
शाम 6:28 बजे पार्किंग से निकला। 6:52 बजे लाल किला मेट्रो स्टेशन के गेट नंबर 4 के पास लाल बत्ती पर रुककर कार उड़ा दी।
15 लोग मारे गए। 20 से ज्यादा घायल।
न्याय और वो सवाल जो बचा रह गया
उसी दिन FIR नंबर 1049 दर्ज हुई। 11 नवंबर को NIA ने केस अपने हाथ में लिया। उसी दिन लखनऊ से शाहीन गिरफ्तार हुई जो दुबई भागने की तैयारी में थी।
13 नवंबर को अलफला यूनिवर्सिटी की मान्यता निलंबित की गई। ED ने जावेद सिद्दीकी को मनी लॉन्ड्रिंग में गिरफ्तार किया।
NIA की टीम उमर के गांव कॉइल पहुंची। परिवार का DNA लिया। मैच हुआ। उमर के भाई ने खबर आते ही मोबाइल तालाब में फेंक दिया था। NIA ने वो भी निकाल लिया। 12 वीडियो मिलीं। एक वायरल हुई।
उमर का वो घर जहां से यह सफर शुरू हुआ था, अब गिरा दिया गया है।
दिल्ली ब्लास्ट का सच जो भुला दिया गया
दिल्ली ब्लास्ट का सच यह है कि ऑपरेशन सिंदूर चलता रहा, खबरें और चीजों से भर गईं, और उन 15 लोगों की बात धीरे-धीरे गायब हो गई जिनकी जान गई।
दिल्ली ब्लास्ट का सच यह भी है कि एक एसएसपी की नजर एक पोस्टर पर पड़ी और लाखों जिंदगियां बच गईं। वरना 6 दिसंबर को एक साथ छह शहरों में धमाके होते। 32 कार बम। हमास स्टाइल ड्रोन हमला। और राइसिन पोइजन वाटर सप्लाई में।
दिल्ली ब्लास्ट का सच यह भी है कि एक यूनिवर्सिटी जिसके संस्थापक ने चिट फंड स्कैम किया, तिहाड़ में रहे, फर्जी दस्तावेजों पर जमीन ली, और जिसके एक छात्र का नाम आतंकी विस्फोटों में आया था, उसे NAAC का A ग्रेड और सरकारी फंड मिलता रहा।
दिल्ली ब्लास्ट का सच यह है कि डॉक्टर की डिग्री, पहली रैंक और एक सफल करियर सब होने के बावजूद नफरत ने उमर से सब छीन लिया। और उसने 15 मासूमों से उनकी जिंदगी।
पान मसाला का सच: 41000 करोड़ की इंडस्ट्री जो देश को बर्बाद कर रही है
