नॉर्थ पोल की यात्रा: परमाणु आइसब्रेकर से 90° उत्तरी ध्रुव तक
नॉर्थ पोल। पृथ्वी का सबसे ऊपरी बिंदु। एक ऐसी जगह जहाँ माइनस 40 डिग्री तक तापमान गिरता है, जहाँ कंपास सही दिशा बताना बंद कर देता है और जहाँ भौतिकी के सामान्य नियम काम करना बंद कर देते हैं। दुनिया के हर 1.6 करोड़ लोगों में से सिर्फ एक इंसान नॉर्थ पोल तक पहुँच पाता है। यानी दुनिया की महज 0.00006 फीसदी आबादी ने यह जगह देखी है।
और मैं वहाँ गया — एक परमाणु आइसब्रेकर पर सवार होकर, 10 दिनों तक। वो सब देखा और महसूस किया जो शायद आपने कभी किसी वीडियो या किताब में नहीं देखा होगा। यह नॉर्थ पोल की कहानी है — विज्ञान की, साहस की और एक ऐसे इंसान की जो तैरना नहीं जानता था फिर भी आर्कटिक महासागर में कूद गया।
नॉर्थ पोल की शुरुआत — मर्मंस्क, रूस से
नॉर्थ पोल की यात्रा शुरू होती है रूस के मर्मंस्क शहर से। यह शहर 2.8 लाख की आबादी वाला एक खास शहर है — इसकी खाड़ी कभी नहीं जमती, यहाँ तक कि कड़ाके की सर्दियों में भी यहाँ का तापमान शून्य से नीचे नहीं जाता। यहीं से आर्कटिक की तरफ रास्ता खुलता है और यहीं से नॉर्थ पोल का सफर शुरू होता है।
लेकिन नॉर्थ पोल पहुँचने से पहले जहाज पर चढ़ने के लिए एक अनिवार्य मेडिकल टेस्ट से गुजरना पड़ता है। अगर फेल हो गए तो नॉर्थ पोल का सपना वहीं टूट जाता है। यह फिटनेस का मामला नहीं, सुरक्षा का मामला है। क्योंकि नॉर्थ पोल जाने के लिए शारीरिक रूप से योग्य होना अनिवार्य है।
50 Years of Victory — नॉर्थ पोल का परमाणु राक्षस
नॉर्थ पोल तक पहुँचाने वाला जहाज कोई साधारण जहाज नहीं है। यह है “50 Years of Victory” — एक परमाणु आइसब्रेकर जो नॉर्थ पोल यात्रा का सबसे शक्तिशाली माध्यम है।
इसकी ऊँचाई पाँच मंजिला इमारत जितनी है। लंबाई डेढ़ फुटबॉल मैदान के बराबर। और वजन 50 Boeing 747 विमानों को एक के ऊपर एक रखने जितना यानी 25,000 टन। लेकिन इस विशाल नॉर्थ पोल यात्री जहाज के बावजूद यह 14 करोड़ वर्ग किलोमीटर के जमे हुए आर्कटिक महासागर के सामने एक छोटे से बैक्टीरिया जैसा लगता है।
नॉर्थ पोल के आसपास आर्कटिक महासागर पानी नहीं बल्कि ठोस बर्फ है — 10 फुट मोटी, पक्के कंक्रीट जैसी। और इसी बर्फ को तोड़कर नॉर्थ पोल तक पहुँचना होता है।
क्यों टाइटैनिक डूबा और नॉर्थ पोल का जहाज क्यों नहीं डूबता
नॉर्थ पोल यात्रा में बर्फ सबसे बड़ा दुश्मन है। 1912 में टाइटैनिक के साथ यही हुआ था। माइनस दो डिग्री तापमान में साधारण स्टील काँच की तरह भुरभुरा हो जाता है। एक टक्कर और टाइटैनिक सिर्फ 2 घंटे 40 मिनट में डूब गया।
नॉर्थ पोल के आइसब्रेकर ने इस समस्या का समाधान विज्ञान से निकाला। इसमें दोहरी दीवार है। बाहरी दीवार 48 मिलीमीटर की मजबूत स्टील की — साधारण जहाज से तीन गुना मोटी। और अंदर एक और 20-25 मिलीमीटर की दीवार। दोनों के बीच पानी भरा टैंक। यानी बाहरी दीवार टूट भी जाए तो अंदर कुछ नहीं होगा।
आइसब्रेकर बर्फ कैसे तोड़ता है — नॉर्थ पोल यात्रा का विज्ञान
नॉर्थ पोल यात्रा में सबसे दिलचस्प विज्ञान यही है। साधारण जहाज V-आकार के नाक से पानी को काटते हैं। लेकिन नॉर्थ पोल का आइसब्रेकर चम्मच की तरह आकार वाले नाक से बर्फ पर चढ़ता है — 30 डिग्री के कोण पर। जैसे स्केटबोर्ड बर्फ पर चढ़ता है।
और फिर 25,000 टन वजन गुरुत्वाकर्षण की मदद से उस बर्फ को तोड़ देता है। गुरुत्वाकर्षण ही हथियार बन जाता है और 10 फुट मोटी ठोस बर्फ टुकड़ों में बिखर जाती है।
इसके अलावा नॉर्थ पोल के आइसब्रेकर के तले में छोटे-छोटे छेद हैं जहाँ से दबाव वाला पानी निकलता है। इससे जहाज और बर्फ के बीच घर्षण कम होता है। नॉर्थ पोल तक पहुँचने के लिए यह जहाज आर्कटिक में मूनवॉक कर रहा था।
परमाणु ऊर्जा का चमत्कार — नॉर्थ पोल के दिल के अंदर
नॉर्थ पोल के आइसब्रेकर की असली ताकत है उसके परमाणु रिएक्टर। यह एक तैरता हुआ परमाणु शहर है।
जहाँ एक सामान्य परमाणु बिजलीघर 400-500 एकड़ यानी 250 से ज्यादा फुटबॉल मैदानों में फैला होता है, वहाँ नॉर्थ पोल के इस जहाज में पूरा परमाणु बिजलीघर आधे फुटबॉल मैदान में समेट दिया गया है। यह 99.8 फीसदी की कमी है — जैसे एक विशाल इमारत को एक सूटकेस में भर दिया हो।
और फिर भी यह छोटा परमाणु केंद्र 171 मेगावाट ऊर्जा पैदा करता है। यह ऊर्जा 2 लाख की आबादी वाले पूरे शहर को बिजली देने के लिए काफी है।
नॉर्थ पोल के जहाज के नीचे हर सेकंड तीन ट्रिलियन परमाणु विखंडित होते हैं। एक कोयले के परमाणु से मिलने वाली ऊर्जा से 5 करोड़ गुना ज्यादा ऊर्जा एक विखंडन प्रतिक्रिया से मिलती है। और एक रिएक्टर में हर सेकंड तीन ट्रिलियन ऐसी प्रतिक्रियाएं होती हैं।
परमाणु रिएक्टर कैसे काम करता है — सबसे सरल समझ
नॉर्थ पोल के आइसब्रेकर के परमाणु रिएक्टर को समझना मुश्किल नहीं। रिएक्टर के केंद्र में यूरेनियम-235 और यूरेनियम-238 की पतली छड़ें होती हैं। यूरेनियम-235 तुरंत ऊर्जा देता है और यूरेनियम-238 धीरे-धीरे।
इन छड़ों पर न्यूट्रॉन दागे जाते हैं जो यूरेनियम परमाणुओं को अस्थिर करते हैं। यूरेनियम टूटता है — जैसे कैरम बोर्ड पर मारबल मारने पर सभी गोटियाँ बिखर जाती हैं — और भारी मात्रा में ऊर्जा निकलती है। यही आइंस्टाइन का E=mc² है। द्रव्यमान ऊर्जा में बदलता है।
यह ऊर्जा 300 डिग्री तापमान पर दबावयुक्त पानी को गर्म करती है। दबाव की वजह से यह पानी 300 डिग्री पर भी तरल रहता है। यही गर्म पानी दूसरे चक्र के पानी को भाप में बदलता है। यह भाप टर्बाइन घुमाती है। टर्बाइन से बिजली बनती है। और इसी बिजली से नॉर्थ पोल के जहाज के तीन विशाल इंजन चलते हैं जो प्रोपेलर को ताकत देते हैं।
एक मोटर की ताकत 25,000 हॉर्सपावर है — यानी 40 फेरारी कारों से भी ज्यादा।
नॉर्थ पोल के जहाज का दिमाग — कैप्टन का कॉकपिट
नॉर्थ पोल यात्रा को नियंत्रित करने का केंद्र है कैप्टन का कॉकपिट। 25 मीटर चौड़ा कमरा, 360 डिग्री पैनोरामिक काँच का दृश्य — किसी अंतरिक्ष यान के नियंत्रण कक्ष जैसा।
यहाँ तीन इंजन हैं — दो गति के लिए और एक दिशा के लिए। और यहीं से नॉर्थ पोल की दिशा में जहाज को चलाया जाता है।
लेकिन नॉर्थ पोल के पास एक बड़ी समस्या है। चुंबकीय कंपास नॉर्थ पोल के पास ठीक से काम नहीं करता क्योंकि चुंबकीय उत्तरी ध्रुव और भौगोलिक उत्तरी ध्रुव अलग-अलग जगह हैं। चुंबकीय उत्तरी ध्रुव हर साल खिसकता रहता है।
इसीलिए नॉर्थ पोल के इस जहाज में तीन कंपास हैं। पहला चुंबकीय कंपास। दूसरा जायरो कंपास जो पृथ्वी के असली भौगोलिक उत्तरी ध्रुव यानी नॉर्थ पोल की दिशा बताता है। और तीसरा उपग्रह कंपास जो सबसे सटीक है। साथ में रडार भी है जो बर्फ की सघनता दिखाता है ताकि नॉर्थ पोल तक का रास्ता बनाया जा सके।
तीसरे दिन भूकंप जैसी थरथराहट — नॉर्थ पोल यात्रा का रोमांच
नॉर्थ पोल यात्रा के तीसरे दिन रात के खाने के दौरान अचानक जहाज हिल गया जैसे भूकंप आ गया हो। घोषणा हुई — विशाल हिमखंड आ गए हैं।
नॉर्थ पोल का आइसब्रेकर एक विशाल हिमखंड पर चढ़ा और उसे दो टुकड़ों में चीरते हुए आगे बढ़ गया। यह वो पल था जब एक अचल वस्तु और अजेय ताकत का सामना हुआ। कोई साधारण जहाज यहाँ बहुत पहले हार मान लेता।
नॉर्थ पोल पर 3 बजे सुबह — एक अलौकिक अनुभव
रात के 3 बजकर 10 मिनट पर नॉर्थ पोल पर पहुँचा। 90 डिग्री उत्तरी अक्षांश। पृथ्वी का सबसे ऊपरी बिंदु।
नॉर्थ पोल देखने में कैसा लगता है? एक सफेद रेगिस्तान। चारों तरफ बर्फ। यहाँ एक अजीब बात है — नॉर्थ पोल पर खड़े होकर जब आप चारों तरफ देखते हैं तो हर दिशा दक्षिण है। यह पृथ्वी का सबसे उत्तरी बिंदु है और इसके नीचे सब कुछ दक्षिण है।
नॉर्थ पोल पर बर्फबारी हो रही थी — जीवन में पहली बार असली बर्फबारी देखी। माइनस 10-12 डिग्री तापमान था और हवाएं इतनी तेज थीं कि दो घंटे में चेहरे की मांसपेशियाँ जम गईं और बोलना मुश्किल हो गया।
नॉर्थ पोल पर एक और खतरा था — ध्रुवीय भालू। 600 किलोग्राम के ये जानवर 16 किलोमीटर दूर से इंसान की गंध सूँघ सकते हैं। यही कारण था कि नॉर्थ पोल पर हर कोने में सशस्त्र गार्ड तैनात थे।
नॉर्थ पोल की बर्फ कोई जमीन नहीं है। यह 10 फुट मोटी जमी हुई बर्फ की चादर है जो पानी पर तैर रही है और नीचे 4 किलोमीटर गहरा आर्कटिक महासागर है।
नॉर्थ पोल में डुबकी — वो पल जो जिंदगी बदल देता है
नॉर्थ पोल पर वो पल आया जिसके बारे में मैंने कभी सोचा नहीं था। आर्कटिक महासागर में डुबकी लगाना। और यह तब जबकि मुझे तैरना नहीं आता।
नॉर्थ पोल के पास ही एक वालरस यानी समुद्री हाथी भी देखा गया था। पानी की गहरी अंधेरी गहराई देखकर दिल डूबने लगा। ऊपर से सारे लोग देख रहे थे। डूब गए और रस्सी से निकालना पड़ा तो शर्मिंदगी की कोई सीमा नहीं रहती।
नॉर्थ पोल पर 10 सेकंड में फैसला लिया। कूदना है।
और कूद गया।
उस पल जब नॉर्थ पोल के आर्कटिक पानी में उतरा तो ऐसा लगा जैसे हजारों सुइयाँ एक साथ पूरे शरीर में चुभ रही हों। दिल की धड़कन तुरंत तेज हो गई। घबराहट में हाथ-पैर मारने लगा। बाहर निकलते ही ठंड का ऐसा झटका लगा कि कंधे में ऐंठन आ गई जो हफ्तों तक रही।
लेकिन नॉर्थ पोल की इस डुबकी ने एक नई सोच दी। असली मानसिक विकास हमेशा सुरक्षित दायरे से बाहर होता है। जो जोखिम नहीं लेते वो बढ़ते नहीं। बड़ी चुनौतियों से डरे बिना सीधे उनका सामना करो — चाहे असफल हो जाओ, साहस दस गुना बढ़ेगा।
नॉर्थ पोल पर भारत का तिरंगा
नॉर्थ पोल पर भारत का झंडा लहराया। उस जमीन पर जहाँ कभी 140 लोगों का एक अभियान दल गायब हो गया था। उस जमीन पर जहाँ सिर्फ 0.00006 फीसदी लोग पहुँच पाते हैं।
नॉर्थ पोल पर यह एहसास हुआ कि यह मैं नॉर्थ पोल को नहीं खोज रहा था। नॉर्थ पोल मुझे खोज रहा था। यह एक उजाड़, वीरान जगह है जहाँ ध्रुवीय भालू किसी भी इंसान को भोजन समझ सकते हैं।
नॉर्थ पोल की वापसी पर ध्रुवीय भालू का दर्शन
नॉर्थ पोल से वापस आते वक्त रात को वो दिखा जो आर्कटिक का असली राजा है — ध्रुवीय भालू। विकास के लाखों सालों का परिणाम। प्रकृति ने जो करोड़ों साल में हासिल किया वो इंसान ने विज्ञान से 160 साल में कर लिया।
नॉर्थ पोल की यह यात्रा सिखाती है कि हमारी प्रवृत्तियाँ हमें सीमित करती हैं लेकिन विज्ञान हमें आजाद करता है। एक साधारण इंसान जो सिर्फ कैमरे के सामने दुनिया दिखाता था — नॉर्थ पोल पर देश का झंडा लगाकर महसूस किया कि विज्ञान को जीवन में उतारने की सोच सच में पृथ्वी के सबसे ऊपरी बिंदु तक पहुँचा सकती है।
नॉर्थ पोल पहुँचने वाले लोग इतिहास में बहुत कम हैं। और उनमें से एक होना — यह गर्व की बात है।
