न्यू होराइजंस मिशन का सच शुरू होता है उस रात से जब पूरी दुनिया नए साल का जश्न मना रही थी। 1 जनवरी 2019। दुनिया भर में लोग उत्सव में डूबे थे लेकिन NASA की एक टीम किसी उत्सव में नहीं थी। वो लोग अपनी स्क्रीनों पर आंखें गड़ाए बैठे थे। 13 साल की कड़ी मेहनत का फैसला होने वाला था।
न्यू होराइजंस मिशन का सच यह है कि उस वक्त धरती से तीन से चार अरब मील दूर एक छोटा सा स्पेसक्राफ्ट 32,000 मील प्रति घंटे की रफ्तार से अपनी मंजिल की तरफ बढ़ रहा था। उसका लक्ष्य था एक ऐसा रहस्यमयी पिंड जो सौरमंडल की सीमाओं से भी बाहर था और जो हमारी धरती के जन्म से जुड़े गहरे रहस्य खोल सकता था।
न्यू होराइजंस मिशन का सच: यात्रा की शुरुआत
न्यू होराइजंस मिशन का सच जानने के लिए 19 जनवरी 2006 पर लौटना होगा जब यह स्पेसक्राफ्ट लॉन्च हुआ था। इसके दो बड़े लक्ष्य थे, दोनों ही सौरमंडल के सुदूर बाहरी हिस्से में।
लॉन्च के 87 दिन बाद न्यू होराइजंस मंगल की कक्षा से होकर गुजरा। दो महीने बाद उसने एक क्षुद्रग्रह को पार किया। करीब एक साल बाद यह विशाल ग्रह बृहस्पति के पास पहुंचा जहां उसने बृहस्पति के चंद्रमा आयो पर हो रहे ज्वालामुखी विस्फोट की तस्वीरें लीं।
न्यू होराइजंस मिशन का सच यह है कि यह अंतरिक्ष यान बिना किसी रुकावट के लगातार आगे बढ़ता रहा। तीन और ग्रहों को पार करते हुए इसने करीब ढाई अरब मील का सफर पूरा किया।
न्यू होराइजंस मिशन का सच: प्लूटो से मुलाकात
न्यू होराइजंस मिशन का सच तब और रोमांचक हो जाता है जब 2015 की गर्मियां आईं। धरती से अरबों मील दूर प्लूटो के बारे में हमारे पास सिर्फ कुछ धुंधले पिक्सेल थे। लेकिन जैसे-जैसे न्यू होराइजंस करीब आता गया, प्लूटो की तस्वीरें साफ होती गईं।
4 जुलाई 2015 को यानी प्लूटो के पास से गुजरने के ठीक 10 दिन पहले टीम ने स्पेसक्राफ्ट से संपर्क खो दिया। मिशन में पहली बार ऐसी रुकावट आई थी जिसने सबको चिंता में डाल दिया। क्या स्पेसक्राफ्ट किसी चीज से टकरा गया था?
न्यू होराइजंस मिशन का सच यह था कि टीम ने जल्द ही कारण खोज लिया। स्पेसक्राफ्ट में लगे कंप्यूटर को गलती से ओवरलोड कर दिया गया था। लेकिन प्लूटो तक पहुंचने में सिर्फ एक हफ्ता था। क्या इतने कम समय में खराबी ठीक हो सकती थी?
टीम ने डबल शिफ्ट में काम शुरू किया। रात को घर नहीं गए। कंप्यूटर को भेजे जाने वाले सभी निर्देश फिर से तैयार किए और दोबारा अपलोड किए। यह काम स्पेसक्राफ्ट के प्लूटो तक पहुंचने की समयसीमा के कुछ ही घंटे पहले पूरा हुआ।
14 जुलाई 2015 का दिन था। सारे निर्देश भेजे जा चुके थे। टीम इंतजार में थी। न्यू होराइजंस धरती से इतनी दूर था कि उसके सिग्नल आने में चार घंटे से ज्यादा लगते थे। इसलिए यह इंतजार और लंबा हो रहा था।
और फिर सिग्नल मिला। न्यू होराइजंस एकदम सही था। उसने प्लूटो का ढेर सारा डेटा रिकॉर्ड किया था। एक बड़ी मुसीबत टल चुकी थी।
न्यू होराइजंस मिशन का सच: प्लूटो की अनजान दुनिया
न्यू होराइजंस मिशन का सच जब प्लूटो की तस्वीरें सामने आईं तो पूरी दुनिया चौंक गई। यह छोटा सा पिंड जिसका व्यास 1520 मील से भी कम है, एक अनोखी दुनिया के रूप में सामने आया।
इस पर चट्टानें दिखीं जो कुछ मील ऊंची थीं लेकिन यह पत्थर की नहीं बल्कि बर्फ से बनी चट्टानें थीं। प्लूटो का सबसे शानदार फीचर था इसकी सतह पर बना दिल की आकार का ग्लेशियर जो नाइट्रोजन और मीथेन गैस से बना है।
न्यू होराइजंस मिशन का सच यह है कि प्लूटो पर होने वाली प्रक्रियाएं धरती के माहौल से काफी मेल खाती थीं, बस फर्क यह था कि यह एक अलग दुनिया थी जिसमें बर्फ और जमी हुई गैसों से चट्टानें और ग्लेशियर बने थे। टीम को प्लूटो पर एक ज्वालामुखी जैसी आकृति भी दिखी जो शायद बर्फ से बना ज्वालामुखी था।
न्यू होराइजंस मिशन का सच: प्लूटो के मौसम का रहस्य
न्यू होराइजंस मिशन का सच जानते-जानते यह भी समझ आया कि प्लूटो पर मौसम बदलाव कितना अनोखा होता है।
धरती पर मौसम इसलिए बदलते हैं क्योंकि हम सूरज के चारों ओर एक सर्कुलर कक्षा में घूमते हैं। लेकिन प्लूटो के साथ ऐसा नहीं है। यह सूर्य की परिक्रमा एक बेहद लंबी और अंडाकार कक्षा में लगाता है।
जब प्लूटो सूरज के पास होता है तो इसकी सतह गर्म होती है। लेकिन जब यह सूरज से अरबों मील दूर होता है तो इसकी सतह पूरी तरह बेजान और जमी हुई हो जाती है।
न्यू होराइजंस मिशन का सच यह है कि प्लूटो पर एक मौसम बदलने में 248 साल लगते हैं। जी हां, प्लूटो सूरज का एक चक्कर 248 साल में पूरा करता है। इसलिए प्लूटो की जो तस्वीर हम आज देख रहे हैं जरूरी नहीं कि कुछ दशकों बाद यह वैसा ही दिखे।
न्यू होराइजंस मिशन का सच: क्या है प्लूटो का असली स्वरूप?
न्यू होराइजंस मिशन का सच यहां एक बड़े सवाल की तरफ ले जाता है। क्या प्लूटो वाकई एक ग्रह है?
वैज्ञानिकों ने इसे पूर्ण ग्रह का दर्जा देने से हमेशा इनकार किया। प्लूटो का आकार धरती के चंद्रमा से भी छोटा है। यह बाकी ग्रहों जैसी सर्कुलर कक्षा में नहीं घूमता। यह न तो पृथ्वी या मंगल जैसा चट्टानी ग्रह है न किसी गैसीय दानव जैसा।
लेकिन न्यू होराइजंस मिशन का सच यह भी है कि प्लूटो की अहमियत इसकी श्रेणी से नहीं बल्कि इसकी अद्भुत प्रकृति से है। यह वही पिंड है जिसने हमें अपने सौरमंडल के उस हिस्से की खोज में मदद की जिसके बारे में हमें पता ही नहीं था।
न्यू होराइजंस मिशन का सच: काइपर बेल्ट की खोज
न्यू होराइजंस मिशन का सच तब और गहरा हो जाता है जब हम काइपर बेल्ट की बात करते हैं।
1992 में दो खगोलविदों डेविड जेवित और जेन लू ने हवाई की एक वेधशाला से एक अजीब खोज की। वहां एक छोटा सा पिंड था जो नेप्चून से परे सूरज का चक्कर लगा रहा था। और यह कोई अकेला नहीं था। नेप्चून के बाहर का पूरा अंतरिक्ष ऐसे पिंडों से भरा पड़ा था जो पहले कभी नहीं देखे गए थे।
इस इलाके को काइपर बेल्ट का नाम दिया गया। खगोलविदों का मानना है कि काइपर बेल्ट में क्षुद्रग्रह पट्टी से हजारों गुना ज्यादा पिंड हैं। यह सब अरबों साल पुराने वो टुकड़े हैं जो ग्रह बनने से रह गए थे।
न्यू होराइजंस मिशन का सच यह है कि हाल के दशकों में काइपर बेल्ट में कई ऐसी वस्तुएं खोजी गई हैं जो प्लूटो जितनी बड़ी या उससे भी बड़ी हैं। किसी पर बर्फ है, किसी पर वायुमंडल है, तो कुछ के अपने चंद्रमा भी हैं।
समय की बर्फ में जमे ये टुकड़े हमें अरबों साल पुराने अतीत की झलक दिखा सकते हैं।
न्यू होराइजंस मिशन का सच: अल्टिमा थुले की खोज
न्यू होराइजंस मिशन का सच यहां सबसे रोमांचक मोड़ पर आता है।
प्लूटो मिशन के बाद टीम के सामने एक नई चुनौती थी। स्पेसक्राफ्ट अभी भी काम कर रहा था। इसे काइपर बेल्ट में किसी पिंड के पास भेजा जा सकता था। लेकिन उस पिंड को ढूंढना था।
11 अप्रैल 2011 को न्यू होराइजंस प्लूटो के आगे निकल चुका था। अगले लक्ष्य को लेकर टीम के सामने कई चुनौतियां थीं। स्पेसक्राफ्ट में ईंधन सीमित था। अगर गलत दिशा में मोड़ दिया तो सालों की मेहनत बर्बाद।
न्यू होराइजंस मिशन का सच यह है कि टीम को 2014 तक अगले पिंड को ढूंढना था वरना स्पेसक्राफ्ट को सही दिशा में नहीं मोड़ा जा सकता था।
2014 में हबल टेलिस्कोप की मदद से टीम ने आखिरकार वह पिंड ढूंढ लिया। इसका आधिकारिक नाम था 2014 MU69 लेकिन न्यू होराइजंस की टीम ने इसे एक खास नाम दिया। उन्होंने इसे अल्टिमा थुले कहा जिसका अर्थ था सबसे दूर मौजूद सीमा के पार।
न्यू होराइजंस मिशन का सच: तीन बार की हार और एक जीत
न्यू होराइजंस मिशन का सच यहां और भी रोमांचक हो जाता है। अल्टिमा का आकार और बनावट जानने के लिए टीम को एक खगोलीय घटना का इंतजार था जिसे ओकल्टेशन कहते हैं।
जब कोई पिंड किसी दूर के तारे के सामने से गुजरता है तो उसकी परछाई धरती पर बनती है। अगर उस परछाई के समय और आकार को नापा जाए तो पिंड की साइज और बनावट का पता लगाया जा सकता है।
2017 की गर्मियों में एक ऐसा तारा मिला जिसकी रोशनी के रास्ते से गुजरकर अल्टिमा धरती पर अपनी परछाई बनाने वाला था। यह परछाई अर्जेंटीना के पहाड़ों और दक्षिण अफ्रीका के ग्रामीण इलाकों में दिखने वाली थी।
न्यू होराइजंस मिशन का सच यह है कि 154 लोगों की टीम साउथ अफ्रीका और अर्जेंटीना पहुंची। टेलीस्कोप लगाए। लेकिन आसमान साफ होने का इंतजार करती रह गई। कोई परछाई नहीं दिखी। पहली कोशिश नाकाम।
10 जुलाई 2017 को एक और मौका था। इस बार दक्षिण प्रशांत महासागर के ऊपर परछाई दिखनी थी। इसे सोफिया नाम के एक उड़ते हुए दूरबीन से देखा जा सकता था। सोफिया एक विमान में रखी दूरबीन है जो 40,000 फीट की ऊंचाई पर काम करती है।
न्यू होराइजंस मिशन का सच यह था कि यहां भी टीम को कुछ नहीं दिखा। दूसरी कोशिश भी नाकाम।
लेकिन टीम के पास एक और मौका था। तीसरा मौका था पेटागोनिया में। टीम के पास सिर्फ सात दिन थे।
उन्होंने जल्दी से तैयारी की और अगली मंजिल पर पहुंच गए। वहां तेज हवा की दिक्कत थी। टीम ने हर तरफ से हवा को रोकने की व्यवस्था की। और फिर इंतजार शुरू हुआ। पांच मिनट के इंतजार के बाद आखिरकार तारा एक पल के लिए धीमा हुआ।
न्यू होराइजंस मिशन का सच यह था कि इस एक सेकंड के लिए उन्होंने छह महीने की तैयारी की थी। तीसरी कोशिश में सफलता मिली। पांच अलग-अलग दूरबीनों ने इस परछाई को कैप्चर किया।
डेटा से पता चला कि अल्टिमा की लंबाई करीब 20 मील है। लेकिन सबसे बड़ी बात इसकी आकृति को लेकर सामने आई। खगोलविद किसी गोल पिंड की उम्मीद कर रहे थे लेकिन यह गोल नहीं था। इसकी आकृति बेढंगी और अनोखी थी। अनुमान लगाया जाने लगा कि या तो यह दो पिंड हैं जो एक-दूसरे के चक्कर लगा रहे हैं या फिर यह किसी अजीब आकृति का एक पिंड है।
न्यू होराइजंस मिशन का सच: अल्टिमा का रहस्य खुला
न्यू होराइजंस मिशन का सच तब सबसे ज्यादा रोमांचक हुआ जब 24 अक्टूबर 2018 को अल्टिमा से मिलने में सिर्फ 69 दिन का फासला रह गया था।
टीम बड़ी सावधानी से अल्टिमा की कक्षा को ट्रैक कर रही थी। स्पेसक्राफ्ट पर लगी लॉन्ग-रेंज दूरबीन से तस्वीरें आ रही थीं। उन तस्वीरों में तारों की घनी भीड़ के बीच अल्टिमा को ट्रैक करना बेहद मुश्किल था।
लेकिन टीम के सामने एक बड़ी समस्या आई। उनका पुराना अनुमान थोड़ा गलत निकल रहा था। स्क्रीन पर दिख रहा हरा निशान बता रहा था कि अल्टिमा की असली जगह वहां से अलग है जहां टीम ने अनुमान लगाया था। यह फर्क छोटा दिखता था लेकिन अंतरिक्ष में इसका मतलब था कि दोनों के बीच 60 मील का फासला था।
न्यू होराइजंस मिशन का सच यह है कि टीम ने फौरन काम शुरू किया। आने वाले हफ्तों में स्पेसक्राफ्ट और अल्टिमा दोनों पर कड़ी निगरानी रखी। हर तस्वीर का हर पिक्सेल ध्यान से देखा। और उसी के हिसाब से स्पेसक्राफ्ट की दिशा में छोटे-छोटे बदलाव किए।
न्यू होराइजंस मिशन का सच: वो ऐतिहासिक क्षण
न्यू होराइजंस मिशन का सच अपने सबसे भावुक पल पर 1 जनवरी 2019 को आया।
वो दिन आ गया था। लेकिन यहां भी इंतजार था, 6 घंटे का। न्यू होराइजंस इतनी दूर जा चुका था कि उसके सिग्नल धरती तक पहुंचने में 6 घंटे लगते थे।
पूरी टीम अपने परिवार के साथ बैठी थी। 13 साल की मेहनत का नतीजा आने वाला था।
और फिर सिग्नल मिला।
न्यू होराइजंस मिशन का सच यह था कि स्पेसक्राफ्ट सही सलामत था। उसके सभी सिस्टम ठीक काम कर रहे थे। उसने अल्टिमा का ढेर सारा डेटा रिकॉर्ड किया था।
जब अल्टिमा की पहली तस्वीर सामने आई तो सभी चौंक गए। अल्टिमा दो पिंडों के आपस में जुड़ने से बना एक बड़ा पिंड था। बिल्कुल वैसा ही जैसा ओकल्टेशन से अनुमान लगाया गया था।
टीम के सभी लोग भावुक थे। उनके 13 साल की तपस्या आखिरकार सफल हो चुकी थी।
न्यू होराइजंस मिशन का सच: अतीत का एक टुकड़ा
न्यू होराइजंस मिशन का सच यह है कि अल्टिमा थुले कोई साधारण पिंड नहीं है। यह हमारे सौरमंडल के करीब साढे चार अरब साल पुराने रूप का एक छोटा सा टुकड़ा है।
वैज्ञानिक जानते हैं कि सौरमंडल का निर्माण कैसे शुरू होता है। तारे के चारों ओर जमा धूल और गैस से ग्रह बनना शुरू होते हैं। इन्हीं प्राथमिक कणों से मिलकर बने हैं अल्टिमा जैसे पिंड जिन्हें प्रकृति ने अरबों मील दूर, अंतरिक्ष की गहराई में, अरबों सालों से संरक्षित रखा हुआ है।
अगर हम इनमें से किसी एक के बारे में जान पाएं तो हमें पता लगेगा कि हमारे बनने की शुरुआत कैसे हुई। हम किन चीजों से मिलकर बने हैं। वो कौन सी रेसिपी है जिससे धरती जैसे ग्रह बनते हैं।
न्यू होराइजंस मिशन का सच: विज्ञान को आगे जानें
न्यू होराइजंस मिशन का सच यह भी है कि 1 जनवरी 2019 से यह स्पेसक्राफ्ट हमें अपना रिकॉर्ड किया डेटा भेज रहा है। इसे सारा डेटा भेजने में कई महीने लगे। टीम का अनुमान है कि यह काइपर बेल्ट में दूसरे पिंडों के बारे में भी जानकारी देता रहेगा।
न्यू होराइजंस अब धरती से अरबों मील से भी ज्यादा दूर निकल चुका है। ठंडी और अंधेरी अंतरिक्ष की गहराई में यह एक अनजान तारामंडल की तरफ अकेला बढ़ रहा है। आने वाले लाखों सालों तक यह अनदेखी और अनजान ब्रह्मांड में इंसान की मेहनत, लगन और जुनून का सबूत देता रहेगा।
न्यू होराइजंस मिशन का सच: एक बड़ा सबक
न्यू होराइजंस मिशन का सच एक बड़ा सबक भी सिखाता है। 13 साल, अरबों मील की दूरी, तीन बार की नाकामी, कंप्यूटर ओवरलोड जैसी मुश्किलें, लेकिन टीम ने हार नहीं मानी।
न्यू होराइजंस मिशन का सच यह है कि एक छोटी सी वस्तु की एक सेकंड की परछाई को धरती के हर कोने में जाकर पकड़ने की कोशिश की गई। यह पागलपन की हद को दिखाता है जिसमें अंजाम की परवाह नहीं।
यह मिशन हमें बताता है कि अंतरिक्ष की गहराई में, अरबों मील दूर, किसी छोटी सी चीज को ढूंढने का नामुमकिन सपना हकीकत बन सकता है। बस जरूरत है तो कई सालों की कड़ी मेहनत की, एक ऐसे जुनून की जिसमें अंजाम की कोई परवाह न हो।
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