भाग 1: परिचय — जब दो पड़ोसी देश आमने-सामने आए
भारत के दो पड़ोसी देश — पाकिस्तान और अफगानिस्तान — आज एक-दूसरे के खिलाफ खुली जंग में उतर चुके हैं। सरहद पर गोलियां चल रही हैं, हवाई हमले हो रहे हैं और दोनों तरफ से कैजुअल्टी की लंबी-लंबी लिस्टें सामने आ रही हैं। तालिबान का दावा है कि उन्होंने पाकिस्तान के 130 से ज्यादा सैनिकों को मार गिराया है, 40 मिलिट्री पोस्ट को अपने कब्जे में ले लिया है और भारी मात्रा में हथियार और सैन्य सामान छीन लिया है। पाकिस्तान ने भी जवाब में ऑपरेशन लॉन्च किया, जिसके बाद नुकसान की एक बड़ी सूची सामने आई।
लेकिन यह पाकिस्तान-अफगानिस्तान युद्ध सिर्फ दो देशों की लड़ाई नहीं है। जरा नक्शे पर जूम आउट करें तो एक तीसरा खिलाड़ी भी नजर आता है — भारत। पाकिस्तान का सीधा आरोप है कि अफगानिस्तान अब भारत की एक कॉलोनी बन चुका है। पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने खुलकर कहा है कि तालिबान भारत का एक प्रॉक्सी बन चुका है और भारत अफगानिस्तान के जरिए पाकिस्तान के खिलाफ एक कम-तीव्रता वाला युद्ध लड़ रहा है।
यहां तक कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA भी यह दावा करती है कि भारत, तालिबान नेटवर्क का इस्तेमाल करके पाकिस्तान में कश्मीरी मिलिटेंट्स को खत्म करवा रहा है। यह जानकारी जाहिर तौर पर सार्वजनिक रूप से साबित नहीं की जा सकती — लेकिन जब हम मोटिव, पैटर्न और इंसेंटिव को एक साथ देखते हैं, तो तस्वीर बड़ी साफ होने लगती है।
इस लेख में हम पूरे पाकिस्तान-अफगानिस्तान युद्ध को गहराई से समझेंगे। डूरंड लाइन का इतिहास, तालिबान का उदय, भारत की बदलती रणनीति, टीटीपी का खतरा, बलोचिस्तान आंदोलन और इस पूरे जियोपॉलिटिकल खेल में भारत का संभावित छिपा हुआ रोल — सब कुछ विस्तार से।
भाग 2: इतिहास की पृष्ठभूमि — डूरंड लाइन और दो देशों की नफरत
पाकिस्तान-अफगानिस्तान युद्ध:
पाकिस्तान और अफगानिस्तान की दुश्मनी को समझना है तो 1893 में जाना होगा। उस वक्त ब्रिटेन और रूस के बीच मध्य एशिया पर कब्जे की एक बड़ी होड़ चल रही थी, जिसे इतिहास में “द ग्रेट गेम” कहा जाता है। रूस कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान को जीतते हुए तेजी से आगे बढ़ रहा था। अगला निशाना भारत हो सकता था — जो उस वक्त ब्रिटेन का सबसे कीमती उपनिवेश था।
ब्रिटेन ने अफगानिस्तान से तीन बड़ी जंगें लड़ीं, लेकिन उन्हें कभी हरा नहीं सका। तब ब्रिटेन ने रणनीति बदली। 1893 में ब्रिटिश डिप्लोमैट सर मोर्टिमर डूरंड ने अफगान शासक आमिर अब्दुल रहमान से बातचीत करके नक्शे पर एक लाइन खींच दी — यही लाइन “डूरंड लाइन” कहलाई। डूरंड लाइन का मकसद था भारत और अफगानिस्तान के बीच एक बफर जोन बनाना, ताकि रूस सीधे भारत तक न पहुंच सके।
लेकिन डूरंड लाइन ने एक बड़ी गलती की — इसने पश्तून कबीलों को दो टुकड़ों में बांट दिया। कुछ पश्तून अफगानिस्तान में रहे और कुछ उस इलाके में जो बाद में पाकिस्तान बना। यह पश्तून जनजाति हमेशा से एक रही थी — एक भाषा, एक संस्कृति, एक पहचान। डूरंड लाइन ने उन्हें जबरदस्ती बांट दिया।
1947 में जब पाकिस्तान आजाद हुआ, तो उसने पश्तूनों को सिर्फ दो विकल्प दिए — भारत में मिलो या पाकिस्तान में मिलो। एक अलग “पश्तूनिस्तान” का कोई विकल्प ही नहीं दिया गया। यही पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच पहली और सबसे बड़ी दरार थी। सितंबर 1947 में जब पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता के लिए आवेदन किया, तो पूरी दुनिया में सिर्फ एक देश ने पाकिस्तान के खिलाफ वोट दिया — और वो था अफगानिस्तान।
यही डूरंड लाइन का घाव और पश्तूनिस्तान का सवाल आज भी पाकिस्तान-अफगानिस्तान के बीच जलती हुई आग की तरह है। अफगानिस्तान ने आज तक डूरंड लाइन को पाकिस्तान की वैध सीमा के रूप में मान्यता नहीं दी है। इसी नफरत की वजह से अफगानिस्तान हमेशा से स्वाभाविक रूप से भारत की तरफ झुकता रहा है।
भाग 3: पाकिस्तान की रणनीति — तालिबान का जन्म और प्रॉक्सी वॉर
पाकिस्तान-अफगानिस्तान युद्ध:
1979 में सोवियत संघ ने अफगानिस्तान पर हमला कर दिया। यह अमेरिका के लिए एक बड़ा खतरा था, लेकिन सीधी जंग का जोखिम मोल लेना संभव नहीं था। इसलिए शुरू हुआ “ऑपरेशन साइक्लोन”। CIA ने पाकिस्तान को प्रॉक्सी के तौर पर चुना — पैसा, हथियार और ट्रेनिंग CIA देगी, जमीन पर काम पाकिस्तान करेगा।
पाकिस्तान ने अफगान सीमा से लगे इलाकों में मुजाहिद्दीन ट्रेनिंग कैंप खोले। ये कैंप असल में सीक्रेट लैब्स की तरह थे जहां पाकिस्तान पांच बड़े हथियार तैयार कर रहा था — पहला: अफगानी तालिबान, दूसरा: हक्कानी नेटवर्क, तीसरा: हिज्ब-ए-इस्लामी, चौथा: अलकायदा और पांचवां: मुजाहिद्दीन के कई गुट। मुल्ला उमर और जलालुद्दीन हक्कानी — दोनों को पाकिस्तान के इन्हीं ट्रेनिंग कैंप्स में तैयार किया गया।
पाकिस्तान की इस रणनीति के पीछे तीन बड़े मकसद थे। पहला — अफगानिस्तान से सोवियत संघ का प्रभाव खत्म करना। दूसरा — काबुल में एक ऐसी कठपुतली सरकार बिठाना जो डूरंड लाइन को स्वीकार करे और पश्तूनिस्तान की मांग को दबा दे। तीसरा — भारत के खिलाफ एक नया वॉर फ्रंट खोलना।
पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री परवेज मुशर्रफ ने खुद एक मीडिया इंटरव्यू में छाती ठोककर स्वीकार किया था कि उन्होंने अमेरिकी सहायता का इस्तेमाल भारत के खिलाफ किया। 1996 में पाकिस्तान की यह मेहनत रंग लाई। तालिबान ने काबुल पर कब्जा कर लिया। पाकिस्तान को लगा उसने खेल जीत लिया। लेकिन जिस राक्षस को उसने पाला था, वो बहुत जल्द उसी के हाथ से निकल गया।
2001 में 9/11 के हमले के बाद अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमला किया और तालिबान सरकार गिरा दी। 2012 में NATO की एक स्टडी सामने आई जिसमें 4,000 से ज्यादा तालिबानी लड़ाकों से पूछताछ के नतीजे थे। निष्कर्ष एक ही था — ISI के सहयोग के बिना तालिबान का जीवित रहना और वापसी दोनों असंभव थे।
भाग 4: टीटीपी और बलोचिस्तान — पाकिस्तान की आंतरिक आग
2001 के बाद अमेरिका और पश्चिमी देशों के भारी दबाव में पाकिस्तान को मजबूरन अपने पाले हुए मिलिटेंट्स पर कार्रवाई करनी पड़ी। जब पाकिस्तानी सेना FATA इलाके में घुसी, तो वे मिलिटेंट्स जो कभी पाकिस्तान के हीरो थे, पाकिस्तान के दुश्मन बन गए।
इन्हीं में से एक था बैतुल्लाह महसूद — जिसने “तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान” यानी TTP की नींव रखी। TTP का मकसद था पाकिस्तान में इस्लामिक खिलाफत स्थापित करना और खैबर पख्तूनख्वा के पश्तून इलाकों को आजाद करना। आज भी पाकिस्तान में 85 प्रतिशत से ज्यादा आतंकी हिंसा खैबर पख्तूनख्वा और बलोचिस्तान में ही होती है।
पूर्व ISI प्रमुख असद दुरानी से जब पूछा गया कि आपके ही पाले मिलिटेंट्स आज पाकिस्तान में आतंक क्यों मचा रहे हैं, तो उन्होंने कहा — “यह ब्लोबैक है।” पाकिस्तान ने एक ऐसा फ्रेंकेनस्टाइन बना लिया था जिस पर अब उसका कोई नियंत्रण नहीं रहा।
बलोचिस्तान की आग भी लगातार भड़क रही है। बलोच लिबरेशन आर्मी यानी BLA हर साल पाकिस्तान में 150 से 200 आतंकी हमले करती है। 2020 के बाद यह संख्या चार गुना बढ़ चुकी है। जनवरी 2026 में BLA ने “ऑपरेशन हेरो” के तहत एक ही दिन में पाकिस्तान के 48 इलाकों में हमले किए और 102 पाकिस्तानी सैनिक मारे गए।
BLF, BRA, UBF, लश्कर-ए-बलोचिस्तान — बलोचिस्तान में कई विद्रोही गुट सक्रिय हैं और सबका एक ही मकसद है — पाकिस्तान से आजादी। TTP और BLA ने आपस में हाथ भी मिला लिया है, जो पाकिस्तान को अंदर से खोखला कर रहा है।
भाग 5: अमेरिका का जाना और बदलता जियोपॉलिटिकल समीकरण
2021 में अमेरिका ने अफगानिस्तान छोड़ दिया और तालिबान ने काबुल पर कब्जा कर लिया। यह भारत के लिए एक बड़ा झटका था। 1950 से 2021 तक लगभग सभी अफगान सरकारें भारत-समर्थक रही थीं। अब तालिबान सत्ता में था — जिसे पाकिस्तान ने जन्म दिया था।
ISI के टॉप अधिकारियों की काबुल में तालिबान नेताओं के साथ तस्वीरें वायरल होने लगीं। तालिबान ने पाकिस्तान को भाई कहा। तालिबान ने कश्मीर का मुद्दा उठाया। सितंबर 2021 में भारत ने तालिबानी सरकार को मान्यता देने से इनकार कर दिया और क्षेत्रीय सुरक्षा शिखर सम्मेलन में तालिबान की जमकर आलोचना की।
लेकिन 2022 में एक बड़ा बदलाव आया।
2022 में तालिबान के सत्ता में आते ही अफगानिस्तान में भारी आर्थिक संकट शुरू हो गया। विदेशी भंडार फ्रीज हो गए, पश्चिमी सहायता रुक गई और देश भुखमरी की तरफ बढ़ने लगा। लाखों अफगान बच्चे कुपोषण के शिकार हो रहे थे। तालिबान को तुरंत खाना, दवाई और आर्थिक मदद की जरूरत थी।
पाकिस्तान खुद उस वक्त आर्थिक संकट में डूबा था — विदेशी भंडार खतरनाक रूप से कम थे, महंगाई 20-30 प्रतिशत तक थी और IMF के कर्ज पर जिंदगी चल रही थी। पाकिस्तान अफगानिस्तान को बड़े पैमाने पर सहायता देने की स्थिति में बिल्कुल नहीं था। यहीं भारत ने मौका देखा।
भाग 6: भारत और तालिबान — दोस्ती नहीं, एक स्मार्ट व्यावहारिक डील
भारत और तालिबान के बदलते रिश्ते जियोपॉलिटिक्स की सबसे दिलचस्प कहानियों में से एक हैं। 2021 में जो भारत तालिबान की आलोचना कर रहा था, 2022 में उसी भारत ने तालिबान को 2,000 मेट्रिक टन गेहूं, 13 टन दवाइयां, 5 लाख कोविड वैक्सीन, 6 करोड़ पोलियो वैक्सीन और जरूरी दवाइयां भेजीं।
2022 के केंद्रीय बजट में भारत ने अफगानिस्तान के लिए 27 मिलियन डॉलर का विशेष फंड आवंटित किया। भारत ने तालिबान को मुंबई और हैदराबाद में अफगान कांसुलेट चलाने की अनुमति दी। दोनों देशों के कूटनीतिक बयानों में एक नई मिठास आ गई। इसी दौरान तालिबान ने भारत की तारीफ करनी शुरू की और जब पाकिस्तान ने खराब क्वालिटी का गेहूं भेजा तो तालिबान ने पाकिस्तान को सार्वजनिक रूप से आलोचना की।
भारत ने हक्कानी फैक्शन के प्रमुख सिराजुद्दीन हक्कानी और तालिबान के उप विदेश मंत्री अब्बास स्तानिकजई के साथ बैक-चैनल संपर्क बनाने की कोशिश की। बातचीत में क्या हुआ, यह सार्वजनिक नहीं है। लेकिन इसके बाद हक्कानी फैक्शन ने पाकिस्तान को खुलकर समर्थन देना बंद कर दिया। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ने खुद नाराजगी जताते हुए कहा — “तुमने हमें धोखा दिया, अभी तय करो — पाकिस्तान के साथ हो या भारत के?”
यह याद रखें — भारत ने तालिबान से दोस्ती नहीं की है, बल्कि अफगानिस्तान में अपना प्रभाव बनाए रखने के लिए एक व्यावहारिक समझौता किया है। भारत आज भी ऑफिशियली तालिबान को एक वैध सरकार के रूप में मान्यता नहीं देता।
भाग 7: पाकिस्तान-अफगानिस्तान खुला युद्ध — असल वजहें और घटनाक्रम
पाकिस्तान-अफगानिस्तान युद्ध अचानक नहीं छिड़ा। इसकी जड़ें दशकों पुरानी हैं और इसका विस्फोट तय था।
2022 में पाकिस्तान ने अफगानिस्तान पर एयर स्ट्राइक किया। तालिबान ने सीधा जवाब दिया — “जो अफगानों का हौसला आजमाना चाहता है, वो पहले अंग्रेजों से, फिर रूस से और फिर अमेरिका से पूछे।” TTP के लड़ाके अफगानिस्तान की जमीन से पाकिस्तान पर हमले करते रहे और तालिबान ने उन्हें अफगानी धरती से खदेड़ने से इनकार कर दिया।
डूरंड लाइन पर हिंसा लगातार बढ़ती रही। पाकिस्तान का आरोप है कि तालिबान TTP को पनाह देता है। तालिबान का जवाब है कि पाकिस्तान डूरंड लाइन पर किलेबंदी करके पश्तून भाइयों को बांट रहा है।
पाकिस्तान का यह भी दावा है कि इन हमलों के पीछे भारत का हाथ है। 2017 में TTP के पूर्व कमांडर एहसानुल्लाह एहसान ने एक वीडियो में कहा था कि अफगानिस्तान में भारत ने TTP को आर्थिक सहायता दी थी। पाकिस्तान और CIA दोनों यह दावा करते हैं कि भारत तालिबान नेटवर्क का इस्तेमाल करके पाकिस्तान में कश्मीरी मिलिटेंट्स को खत्म करवा रहा है।
पाकिस्तान-अफगानिस्तान युद्ध अब सिर्फ एक सीमा विवाद नहीं रहा — यह 30 साल पुरानी पाकिस्तानी नीति का एक अपेक्षित पतन है।
भाग 8: भारत का रणनीतिक फायदा — CPEC और चीन-पाकिस्तान गठजोड़
पाकिस्तान-अफगानिस्तान युद्ध से सबसे बड़ा रणनीतिक फायदा किसे होगा? जवाब है — भारत को।
चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर यानी CPEC एक 60 अरब डॉलर का महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट है जिसे चीन पाकिस्तान के जरिए मध्य एशिया और अरब सागर तक पहुंचने के लिए बना रहा है। भारत CPEC का सबसे बड़ा विरोधी है — क्योंकि CPEC पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से गुजरता है।
CPEC को बार-बार हिंसा का निशाना बनाया जाता है। BLA के हमले, TTP की गतिविधियां और पाकिस्तान की आंतरिक अस्थिरता — ये सब CPEC की सफलता के रास्ते में सबसे बड़ी रुकावटें हैं। पाकिस्तान का आरोप है कि इन हमलों के पीछे भारत की खुफिया एजेंसी RAW का हाथ है।
भारत अगर वाकई में अफगानिस्तान में पाकिस्तान-विरोधी ताकतों को सहयोग दे रहा है, तो यह उसके लिए तीन तरफा फायदे का सौदा है — CPEC को कमजोर करना, पाकिस्तान को दो मोर्चों पर उलझाए रखना और अफगानिस्तान में अपना प्रभाव मजबूत करना। यह एक ऐसा जियोपॉलिटिकल पैटर्न है जिसे नजरअंदाज करना मुश्किल है।
भाग 9: पाकिस्तान की आर्थिक और राजनीतिक तबाही
पाकिस्तान-अफगानिस्तान युद्ध ऐसे वक्त छिड़ा है जब पाकिस्तान खुद बेहद कमजोर स्थिति में है।
आर्थिक मोर्चे पर पाकिस्तान की हालत बेहद खराब है। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने खुद कहा कि उन्हें दुनियाभर में जाकर पैसों की भीख मांगनी पड़ती है। पाकिस्तान IMF के कर्ज और बेलआउट पर टिका हुआ है। बिजली के बिल आसमान पर हैं, पेट्रोल और गैस महंगी है और आम आदमी की जेब पूरी तरह खाली है। टमाटर 400 रुपये किलो तक पहुंच चुका है।
राजनीतिक मोर्चे पर भी हालत गंभीर है। सिंधुदेश आंदोलन, पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में विद्रोह, बलोचिस्तान में अलगाववादी संघर्ष — ये सब एक साथ पाकिस्तान को कमजोर कर रहे हैं।
ऐसे में यह सवाल बहुत जरूरी है — क्या पाकिस्तान वाकई में इस वक्त जंग चाहता है? या यह आग किसी और के इशारे पर भड़क रही है?
पाकिस्तान-अफगानिस्तान युद्ध यदि लंबा खिंचा, तो 50 लाख से ज्यादा अफगान शरणार्थी जो पाकिस्तान में रहते हैं, वो स्वाभाविक रूप से अपनी कौम के साथ खड़े होंगे। पाकिस्तान के अंदर ये शरणार्थी एक भारी आंतरिक सुरक्षा समस्या बन सकते हैं।
भाग 10: RAW और भारत का गुप्त रोल — सबूत, संभावनाएं और सच्चाई
क्या भारत की खुफिया एजेंसी RAW वाकई में पाकिस्तान-अफगानिस्तान युद्ध के पीछे है? इसका कोई ठोस सार्वजनिक सबूत अभी तक नहीं मिला है। और शायद मिलेगा भी नहीं — क्योंकि गुप्त ऑपरेशन दशकों तक वर्गीकृत रहते हैं और कुछ तो कभी सार्वजनिक नहीं होते।
1980 में RAW प्रमुख नौशेरवान सुंतूक के सामने एक तस्वीर आई — जलालुद्दीन हक्कानी और ISI प्रमुख हामिद गुल एक साथ। यह भारत के लिए एक बड़ी चेतावनी थी। तब से भारत ने अफगानिस्तान में अपना प्रभाव बनाए रखने की हर कोशिश की।
खुफिया दुनिया का पहला नियम है — मोटिव ढूंढो। इस पाकिस्तान-अफगानिस्तान युद्ध से सबसे ज्यादा रणनीतिक फायदा किसे होगा? भारत को। पाकिस्तान अगर दो मोर्चों पर लड़ रहा है तो वो भारत पर ध्यान कम देगा। CPEC कमजोर होगा। चीन-पाकिस्तान गठजोड़ पर दबाव बढ़ेगा।
पाकिस्तान, ISI और CIA तीनों यह दावा करते हैं कि भारत तालिबान के साथ मिलकर पाकिस्तान के खिलाफ गुप्त ऑपरेशन चलाता है। लेकिन भारत की तरफ से कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है।
अमेरिकी-पाकिस्तानी विश्लेषक हसन अब्बास ने अपनी किताब “The Return of the Taliban” में लिखा है कि 2022 के बाद से तालिबान ने पाकिस्तान पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए कई साझेदार बनाए — भारत, चीन, ईरान, खाड़ी देश। यह कदम तालिबान की रणनीतिक परिपक्वता की निशानी है — और इसमें भारत का योगदान छोटा नहीं है।
RAW के गुप्त ऑपरेशन हों या न हों — एक बात तय है: पाकिस्तान और अफगानिस्तान की दुश्मनी जितनी गहरी होगी, भारत का रणनीतिक लाभ उतना ही बड़ा होगा।
भाग 11: भारत का अफगानिस्तान में सॉफ्ट पावर — जनता का अटूट प्यार
पाकिस्तान-अफगानिस्तान युद्ध के बीच एक बात जो बिल्कुल साफ है वो यह है कि अफगान जनता भारत से गहरा लगाव रखती है।
अफगानिस्तान में जाकर किसी से पूछिए — “हिंदुस्तान के बारे में क्या सोचते हो?” — जवाब आएगा “भाई, हिंदुस्तान और अफगानिस्तान भाई-भाई।” यही अफगानी पाकिस्तान से कट्टर नफरत करते हैं। भारत का मोबाइल कवर लगाने से लेकर भारतीय नोट को संभाल कर रखने तक — भारत के प्रति यह प्यार बेहद गहरा और सच्चा है।
यह सॉफ्ट पावर कोई रातोंरात नहीं बना। 1950 से 2021 तक लगभग हर अफगान सरकार के साथ भारत के अच्छे संबंध रहे। भारत ने अफगानिस्तान में अस्पताल बनाए, स्कूल बनाए, सलमा डैम बनाया, सड़कें बनाईं और हजारों अफगान छात्रों को भारत में पढ़ने का मौका दिया।
जियोपॉलिटिक्स में जनता का प्यार भी एक ताकतवर हथियार होता है — और इस हथियार में भारत पाकिस्तान से बहुत आगे है। पाकिस्तान अफगानिस्तान में कभी भी वो भरोसा नहीं जीत सका जो भारत ने बिना कोई जंग लड़े हासिल कर लिया।
भाग 12: निष्कर्ष — जंग का असली सबक और भारत का भविष्य
पाकिस्तान-अफगानिस्तान युद्ध सिर्फ दो देशों की लड़ाई नहीं है। यह 30 साल पुरानी असफल पाकिस्तानी रणनीति का एक अपेक्षित और अटल पतन है। पाकिस्तान ने जो मिलिटेंट ग्रुप अफगानिस्तान में भारत और सोवियत संघ के खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए पाले थे, आज वही उसके सबसे बड़े दुश्मन बन चुके हैं।
डूरंड लाइन का घाव, पश्तूनिस्तान का अनसुलझा सवाल, तालिबान का उदय, TTP का बढ़ता आतंक, BLA का बलोचिस्तान में विद्रोह और आर्थिक तबाही — पाकिस्तान एक साथ इतने सारे मोर्चों पर उलझा हुआ है कि उसकी हालत हर रोज खराब हो रही है।
दूसरी तरफ भारत ने चुपचाप एक बड़ा खेल खेला है। उसने तालिबान को मान्यता नहीं दी, लेकिन उसके साथ एक व्यावहारिक समझौता किया। मानवीय सहायता से शुरू हुआ यह रिश्ता अब एक गहरी रणनीतिक साझेदारी की शक्ल ले रहा है। भारत ने अफगानिस्तान में पाकिस्तान की एकाधिकार को तोड़ दिया है।
क्या RAW वाकई में पाकिस्तान-अफगानिस्तान युद्ध के पीछे है? इसका जवाब शायद कभी सार्वजनिक न हो। लेकिन एक बात बिल्कुल साफ है — नक्शे पर सरहदें दिखती हैं, खबरों में हवाई हमले दिखते हैं, नेताओं के बयान दिखते हैं। लेकिन असली कहानी उन डॉट्स में छिपी होती है जिन्हें खुद जोड़ना पड़ता है।
पाकिस्तान-अफगानिस्तान युद्ध आज सबसे बड़ा सबक यही दे रहा है — जब आप दूसरों को कमजोर करने के लिए राक्षसों को पालते हैं, तो एक दिन वो राक्षस खुद आप पर हावी हो जाते हैं। रणनीति और राक्षस में एक ही फर्क होता है — रणनीति आपके काबू में होती है, राक्षस नहीं।
भारत ने यह फर्क समझ लिया है। पाकिस्तान अभी भी समझने की कोशिश कर रहा है।
जय हिंद।
