क्या आपने कभी सोचा है कि एक 4 रुपये का पान मसाला का छोटा सा पाउच अजय देवगन, शाहरुख खान और अक्षय कुमार जैसे करोड़ों की फीस लेने वाले एक्टर्स को कैसे अफोर्ड कर लेता है? एक पाउच जिसकी कीमत चार रुपये है, वो एक ऐसे एक्टर को साइन कर लेता है जिसकी एक फिल्म का बजट ही सौ करोड़ से ऊपर होता है। पान मसाला का यह सच जानकर आप हैरान रह जाएंगे।
पान मसाला का सच यह है कि यह इंडस्ट्री जितनी छोटी दिखती है, उतनी है नहीं। बल्कि यह एक ऐसा खेल है जो बहुत चालाकी से खेला जा रहा है — आपकी सेहत के साथ, आपके देश के साथ और आपकी जिंदगी के साथ। आज हम पान मसाला का सच उसकी तह तक जाकर समझेंगे। इसलिए इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें।
पान मसाला का सच नंबर एक: यह इंडस्ट्री कितनी बड़ी है?
पान मसाला का सच जानना शुरू करते हैं एक आंकड़े से। भारत में पान मसाला का बाजार 41,000 करोड़ रुपये का है।
यह सुनकर आंखें चौड़ी हो जाती हैं। लेकिन इसे ठीक से समझने के लिए थोड़ी तुलना करते हैं। भारत में चॉकलेट का पूरा बाजार 16,000 करोड़ रुपये का है। बिस्किट की पूरी इंडस्ट्री 37,000 करोड़ रुपये की है। और पान मसाला? 41,000 करोड़। यानी पान मसाला का बाजार चॉकलेट से ढाई गुना और बिस्किट से भी बड़ा है।
अब जब यह बात समझ में आ गई तो पान मसाला का सच और भी साफ होता है। बड़े सितारे एक विज्ञापन के लिए 5 से 10 करोड़ रुपये तक लेते हैं। लेकिन 41,000 करोड़ की इंडस्ट्री के लिए यह रकम महज 0.02 प्रतिशत है। यानी इस इंडस्ट्री के लिए शाहरुख खान को हायर करना ऐसा है जैसे आप अपनी 10,000 रुपये की सैलरी में से दो रुपये खर्च करें।
पान मसाला का सच यह भी है कि भारत पान मसाला के निर्यात में दुनिया में सबसे आगे है। UAE इसका सबसे बड़ा खरीदार है। भारत की तंबाकू इंडस्ट्री में 4.5 करोड़ लोगों को रोजगार मिला हुआ है। इसीलिए यह इंडस्ट्री फिल्म अवार्ड्स को स्पॉन्सर करती है, बड़े-बड़े अखबारों में पूरे पेज के विज्ञापन छपवाती है और विदेशों में 30 सेकंड के विज्ञापन की शूटिंग करती है।
यह सब इसलिए हो पाता है क्योंकि पान मसाला का सच यही है — यह एक बेहद मुनाफे वाला कारोबार है।
पान मसाला का सच नंबर दो: क्या कैंसर बेचना कानूनी है?
पान मसाला का सच जानने के लिए अब सीधे उस सवाल पर आते हैं जो सबसे जरूरी है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी WHO के मुताबिक तंबाकू से होने वाले कैंसर की वजह से अब तक 10 करोड़ लोगों की मौत हो चुकी है। 21वीं सदी में यह आंकड़ा बढ़कर 100 करोड़ तक पहुंचने की आशंका है। 100 करोड़ लोग। यह पूरी दुनिया की आबादी का करीब 12 प्रतिशत है।
आपने फिल्में देखने से पहले थिएटर में वो विज्ञापन जरूर देखे होंगे जो कैंसर और तंबाकू के बीच सीधे संबंध की बात करते हैं। इसके लिए वैज्ञानिक होने की जरूरत नहीं है। यह सबको पता है। फिर भी पान मसाला का सच यह है कि यह इंडस्ट्री लगातार बढ़ रही है।
लेकिन कैसे?
पान मसाला का सच यहां और गहरा हो जाता है — यह इंडस्ट्री मार्केटिंग की जीनियस है।
पान मसाला का सच नंबर तीन: तंबाकू नहीं है, तो क्या है?
भारत में तंबाकू का सीधा प्रचार नहीं किया जा सकता। साल 2011 के बाद सभी राज्यों ने पान मसाले के साथ तंबाकू बेचने पर रोक लगा दी। तो कंपनियों ने क्या किया?
उन्होंने पान मसाले से तंबाकू हटा दिया। पान मसाला, पान और दूसरी चीजों का मिश्रण होता है। इसीलिए इसे ‘केसर इलायची’ जैसे मासूम नामों से बेचा जाता है। एक खाद्य पदार्थ की तरह। हैरानी की बात यह है कि पान मसाले को वही संस्था रेगुलेट करती है जो बिस्किट को रेगुलेट करती है।
ठीक है, तंबाकू नहीं है तो फिर नुकसान क्या है?
यहां पान मसाला का सच सबसे ज्यादा चौंकाने वाला है।
जब आप किसी पान की दुकान से पान मसाला खरीदते हैं तो दुकानदार आपको एक छोटा सा अलग पैकेट भी देता है। एक गुप्त पैकेट। इसमें वो चीजें होती हैं जो लोग असल में चाहते हैं। यह पैकेट तंबाकू का ही एक रूप होता है। और जब इसे पान मसाले में मिलाकर खाया जाता है तो मुंह के कैंसर का रास्ता खुल जाता है।
इस बात को साबित करने के लिए एक प्रयोग किया गया। पान मसाला मांगा गया और बिना मांगे वो छोटा पैकेट भी आ गया।
यही पान मसाला का सच है। कंपनियां कहती हैं हमारे प्रोडक्ट में तंबाकू नहीं है। और तकनीकी रूप से वो सही भी हैं। लेकिन वो यह भी जानती हैं कि उनका प्रोडक्ट कहां जाकर इस्तेमाल होगा। इसीलिए उस गुप्त पैकेट पर कैंसर की कोई चेतावनी नहीं होती। और इसी नैतिकता की आड़ में बड़े-बड़े सितारे इस पान मसाले का चेहरा बन जाते हैं।
पान मसाला का सच नंबर चार: सरोगेट एडवर्टाइजिंग का खेल
पान मसाला का सच समझने के लिए शराब इंडस्ट्री का उदाहरण लेते हैं।
भारत में शराब का सीधा प्रचार प्रतिबंधित है। तो शराब कंपनियां क्या करती हैं? वो अपने क्लब सोडा का विज्ञापन करती हैं ताकि ब्रांड की छवि बनी रहे। संगीत सीडी जारी करती हैं ताकि आपको ब्रांड का नाम याद रहे। लोकप्रिय विज्ञापन अभियान चलाती हैं। विज्ञापन में दिखाया गया प्रोडक्ट वो होता है जिसे आप कभी नहीं खरीदते। लेकिन जब आप शराब की दुकान पर जाते हैं तो ब्रांड का नाम जुबान पर चढ़ा होता है।
पान मसाला भी यही करता है। ब्रांड चांदी की परत चढ़ी इलायची बेचते हैं। पैकेजिंग पान मसाले की पैकेजिंग से बिल्कुल मिलती-जुलती होती है लेकिन विज्ञापन में इसका जिक्र नहीं होता। इलायची बेचना कोई अपराध नहीं है। इसलिए कानूनी तौर पर सब ठीक है।
पान मसाला का सच यह है कि यह इंडस्ट्री सरोगेट एडवर्टाइजिंग में माहिर है। और इस खेल में किसी भी बड़े एक्टर ने ना नहीं कहा। बॉलीवुड हो या साउथ, नया हो या पुराना, सब इस खेल का हिस्सा बन गए।
5 से 10 करोड़ रुपये में कौन मना करेगा?
पान मसाला का सच नंबर पांच: यह सिर्फ कैंसर नहीं, TB भी है
पान मसाला का सच यहां और खतरनाक हो जाता है। और यह वो हिस्सा है जिसके बारे में कोई बात नहीं करता।
भारत में कोविड-19 से मरने वालों का आधिकारिक आंकड़ा 5 लाख है। लेकिन एक ऐसी बीमारी है जो हर साल 5 लाख लोगों की जान लेती है। हर साल। यह कहानी हर बार दोहराई जाती है। इस बीमारी को टीबी यानी ट्यूबरकुलोसिस कहते हैं।
TB के बारे में कोई बात नहीं करता। लेकिन पान मसाला का सच यह है कि दुनिया में TB के कुल मामलों में से एक तिहाई अकेले भारत से आते हैं। एक तिहाई।
क्यों?
कोविड की तरह ही TB भी बूंदों के जरिए फैलता है। जब कोई संक्रमित व्यक्ति छींकता है, खांसता है या थूकता है तो संक्रमित बूंदें हवा में फैल जाती हैं।
सवाल यह है कि क्या विदेशों में लोग छींकते या खांसते नहीं हैं? बेशक करते हैं। लेकिन वो थूकते नहीं हैं।
और यहीं पर पान मसाला का सच सबसे ज्यादा चुभता है।
पान मसाला चबाने वाला कोई भी व्यक्ति औसतन हर 10 मिनट में 20 से 30 बार थूकता है। सोचिए एक रिक्शा चालक जो पूरे शहर में घूमता है, अगर उसके शरीर में TB का इन्फेक्शन है तो वो सचमुच पूरे शहर में TB फैला सकता है। वो इसे आपके घर तक भी पहुंचा सकता है, बिना आपकी किसी गलती के।
पान मसाला का सच यह है कि यह सिर्फ उसकी समस्या नहीं जो खाता है। यह उन करोड़ों लोगों की समस्या है जो पान मसाला कभी नहीं खाते लेकिन इसके शिकार हो जाते हैं।
पान मसाला का सच नंबर छह: रेलवे साफ करती है, जिम्मेदारी कौन लेगा?
भारतीय रेलवे हर साल सिर्फ थूक के दाग साफ करने पर 1200 करोड़ रुपये खर्च करती है। 1200 करोड़ रुपये। यह पैसा टैक्सपेयर का पैसा है। यानी आपका और मेरा पैसा।
पान मसाला का सच यह है कि एक इंडस्ट्री जो 41,000 करोड़ रुपये कमाती है, उसकी वजह से होने वाली गंदगी की कीमत हम सब मिलकर चुका रहे हैं।
तो सवाल यह है कि इस नुकसान की जिम्मेदारी कौन लेगा?
अगर विज्ञापनों पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा सकते हैं, अगर एक विज्ञापन में एक से ज्यादा स्टार हो सकते हैं, तो क्या कुल बजट में से एक छोटी सी रकम लोगों को यह सिखाने पर खर्च नहीं की जा सकती कि ‘थूकना नहीं है’?
क्या 41,000 करोड़ की इंडस्ट्री अपने टर्नओवर का सिर्फ 0.01 प्रतिशत इन गंदे दागों को साफ करने पर खर्च नहीं कर सकती?
पान मसाला का सच यह है कि यह इंडस्ट्री जिम्मेदारी से भागने में उतनी ही माहिर है जितनी मुनाफा कमाने में।
पान मसाला का सच नंबर सात: सितारों की जिम्मेदारी
पान मसाला का सच अगर किसी ने सबसे ज्यादा अनदेखा किया है तो वो हैं हमारे पसंदीदा सितारे।
यह समझ आता है कि 10 करोड़ रुपये की पेशकश ठुकराना मुश्किल है। लेकिन जो लोग करोड़ों की फिल्में बनाते हैं, जिनके ट्वीट पर देश रिएक्ट करता है, जिनकी एक बात से ट्रेंड चल पड़ते हैं, क्या उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं बनती?
पान मसाला का सच यह है कि जब एक बड़ा सितारा किसी पान मसाले का चेहरा बनता है तो वो सिर्फ अपना चेहरा नहीं बेचता। वो एक संदेश देता है कि यह प्रोडक्ट ठीक है। यह प्रोडक्ट आपकी जिंदगी का हिस्सा हो सकता है। और जब यह संदेश करोड़ों लोगों तक पहुंचता है, खासतौर पर उन युवाओं तक जो अपने हीरो को फॉलो करते हैं, तो नुकसान कितना बड़ा होता है, इसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है।
पान मसाला का सच यह है कि इन सितारों को शायद पूरी जानकारी नहीं है। या शायद वो जानना नहीं चाहते। या शायद 10 करोड़ के सामने यह सब छोटा लगता है।
लेकिन जिम्मेदारी छोटी नहीं होती।
पान मसाला का सच नंबर आठ: हम क्या कर सकते हैं?
पान मसाला का सच जानने के बाद अगला सवाल यह है कि हम क्या कर सकते हैं?
मुंबई में एक प्रयोग किया गया। रिक्शे में बैठने से पहले रिक्शा चालक से एक सवाल पूछा जाता है — क्या आप सड़क पर थूकेंगे? अगर जवाब हां है या मुंह में कुछ दिखता है तो उस रिक्शा में नहीं बैठते।
पहले यह लगा कि फिर रिक्शा मिलेगा ही नहीं। लेकिन हुआ यह कि एक-दो बार रिक्शा छोड़नी पड़ी लेकिन दूसरी तुरंत मिल गई।
इस छोटे से कदम से दो काम होते हैं।
पहला, पैसा सिर्फ उन्हीं लोगों को जाता है जो नशीले पदार्थों का सेवन नहीं करते। अच्छे लोगों को फायदा होता है और नुकसानदेह लोगों को प्रोत्साहन नहीं मिलता। TB होने का खतरा भी कम हो जाता है।
दूसरा, जो लोग थूकते हैं उन्हें एक सीख मिलती है। दुनिया में कुछ ऐसे लोग भी हैं जो सवाल पूछते हैं। अगर उन्हें थोड़ी भी शर्म आए तो वो समझेंगे कि देश को गंदा करना गलत है।
पान मसाला का सच यह है कि जो लोग गलती कर रहे हैं उन्हें कोई रोक नहीं रहा। उनसे सवाल पूछने वाला कोई नहीं है। यहां तक कि कानून लागू करने वाले भी इसी काम में लगे हैं।
पान मसाला का सच और आपकी जिम्मेदारी
पान मसाला का सच जानने के बाद तीन सवाल बचते हैं।
क्या आप उन लोगों को पैसे देंगे जो आपके देश पर थूकते हैं?
क्या आप उस इंडस्ट्री का साथ देंगे जो अपनी गंदगी खुद साफ नहीं करती?
क्या आप उन सितारों की फिल्मों के लिए उत्साहित होंगे जिन्हें इस बात का अंदाजा नहीं कि उनके कामों की वजह से भारत में कैंसर और TB फैल रहा है?
पान मसाला का सच यह नहीं है कि सिर्फ खाने वाले को नुकसान है। पान मसाला का सच यह है कि इसका असर हम सब पर पड़ता है। उन पर भी जो कभी इसे छूते तक नहीं।
महामारी के दौरान हम दो साल घरों में बंद रहे। हमने सोचा था कि अब तो लोग बदलेंगे। लेकिन पान मसाला का सच यह है कि हम उन्हीं गलतियों की तरफ वापस लौट आए।
भारत महान है, यह हम गाड़ियों के पीछे लिखते हैं। और जैसे ही गाड़ी रुकती है उसी भारत पर थूक देते हैं। पान मसाला का सच यही कड़वी हकीकत है।
पान मसाला का सच: बदलाव की शुरुआत कहां से होगी?
पान मसाला का सच बताना इसलिए जरूरी है क्योंकि यह सिर्फ एक इंडस्ट्री की कहानी नहीं है। यह हमारे समाज की कहानी है। यह हमारी सेहत की कहानी है। यह हमारे देश की कहानी है।
पान मसाला का सच यह है कि 41,000 करोड़ की एक इंडस्ट्री बेहद चालाकी से कानून के छेदों से निकल जाती है। तकनीकी रूप से वो गलत नहीं हैं। लेकिन नैतिक रूप से?
पान मसाला का सच यह है कि बड़े सितारे 10 करोड़ रुपये लेकर उस प्रोडक्ट का चेहरा बन जाते हैं जो अप्रत्यक्ष रूप से कैंसर और TB की जमीन तैयार करता है। तकनीकी रूप से वो भी गलत नहीं हैं। लेकिन नैतिक रूप से?
पान मसाला का सच यह है कि हम सब जानते हुए भी चुप रहते हैं। क्योंकि सच बोलने में डर लगता है। क्योंकि सवाल पूछना मुश्किल लगता है। क्योंकि लगता है कि मेरे अकेले से क्या फर्क पड़ेगा।
लेकिन पान मसाला का सच जानने के बाद एक बात तय है — अगर हम नहीं बोलेंगे तो कोई नहीं बोलेगा।
अगर आपको मुंह का कैंसर चाहिए तो शौक से करें। लेकिन थूकें नहीं। यह संदेश हर भारतीय तक पहुंचना चाहिए।
पान मसाला का सच यह है कि एक इंसान अकेले शायद बड़ा फर्क न ला पाए। लेकिन हम सब मिलकर बहुत बड़ा फर्क ला सकते हैं। और इन छोटी-छोटी बातों में एक छोटा सा फर्क ही बड़े बदलाव की शुरुआत है।
यही वजह है कि पान मसाला का सच जानना और इसे आगे फैलाना जरूरी है।
एक गलती जो बचा सकती थी दुनिया: मेटाकॉग्निटिव इंटेलिजेंस का सच
