युवराज सिंह: कैंसर से लड़कर वर्ल्ड कप जिताने वाला असली योद्धा

युवराज सिंह: कैंसर से लड़कर वर्ल्ड कप जिताने वाला असली योद्धा

वो एक ऐसा इंसान था जिसका पैर चलती ट्रेन के नीचे आते-आते बचा। जिसके पिता एक दिन लोडेड पिस्तौल लेकर कपिल देव को मारने निकल पड़े। जो वाइस कैप्टन होते हुए भी कप्तानी से वंचित रह गया। जिसे एंड्रू फ्लिंटॉफ ने अपमानित किया और उसने जवाब दिया छह गेंदों में छह छक्कों से। जो पूरे वर्ल्ड कप के दौरान खून की उल्टियाँ करता रहा और मैदान पर सेंचुरी भी लगाता रहा। जिसके चेस्ट का एक्स-रे आया तो एक फेफड़ा ही गायब था। और जो कैंसर से वापस आकर अपना हाईएस्ट वनडे स्कोर बना गया।

यह कहानी है युवराज सिंह की। भारतीय क्रिकेट के असली योद्धा की।

पिता की नाकाम महत्वाकांक्षा और एक बेटे का बोझ

युवराज सिंह की कहानी शुरू होती है उनसे नहीं, बल्कि उनके पिता योगराज सिंह से। योगराज सिंह का जन्म पंजाब की एक जाट सिख परिवार में हुआ था जहाँ इज्जत और अभिमान ही सब कुछ था। 13-14 साल की उम्र में उन्होंने स्कूल में एक शानदार बाउंसर डाली जिससे प्रभावित होकर कोच डीपी आज़ाद ने उनकी क्रिकेट ट्रेनिंग शुरू कर दी।

योगराज सिंह ने पंजाब डोमेस्टिक सर्किट में तेज़ी से नाम बनाया और 1977 में महज़ 19 साल की उम्र में भारत की अंडर-19 टीम में चुने गए। कपिल देव से भी पहले। बोर्ड प्रेसिडेंट्स इलेवन बनाम पाकिस्तान के एक मैच में उन्होंने केवल 29 रन देकर तीन विकेट लिए जिसमें जावेद मियांदाद और वसीम राज़ा के विकेट शामिल थे। उनकी आक्रामक गेंदबाज़ी और जुनून को देखते हुए उन्हें शेर नाम से पुकारा जाने लगा।

दिसंबर 1980 में आखिरकार उनका चयन भारतीय टीम में हुआ। अगले दो महीनों में उन्होंने ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड मिलाकर कुल छह वनडे और एक टेस्ट मैच खेला। लेकिन परफॉर्मेंस निराशाजनक रही और किस्मत भी साथ नहीं दी। उनके पिता बीमार पड़ गए, चोटों ने शरीर जकड़ लिया और घरेलू क्रिकेट में भी फॉर्म गिर गई। पंजाब स्टेट टीम और फिर नॉर्थ ज़ोन से भी बाहर कर दिए गए।

उस वक्त कपिल देव नॉर्थ ज़ोन के कप्तान थे और 1982 में भारतीय कप्तान बने। योगराज ने अपनी तमाम विफलताओं का ठीकरा कपिल देव और चयनकर्ता बिशन सिंह बेदी पर फोड़ दिया। कपिल देव के खिलाफ उनकी नफरत इस हद तक पहुँच गई कि 1981 में वो एक दिन लोडेड पिस्तौल लेकर कपिल देव के घर जा पहुँचे। केवल इसलिए रुके क्योंकि कपिल की माँ वहाँ मौजूद थीं।

अब योगराज क्रिकेट तो छोड़ चुके थे लेकिन बदले की आग अंदर धधक रही थी। उन्होंने ठान लिया कि जो अधूरा रह गया है उसे पूरा करेगा उनका बेटा युवराज सिंह।

युवराज सिंह का बचपन: हर सपना छीना गया

युवराज सिंह का जन्म 12 दिसंबर 1981 को हुआ। बचपन से ही उन्हें खेलकूद और बाहरी गतिविधियाँ पसंद थीं। पढ़ाई से कोई नाता नहीं था। छठी कक्षा में केवल 37 प्रतिशत अंक आए।

युवराज को प्यार हुआ टेनिस से। वो हर रोज घंटों प्रैक्टिस करते थे और बोरिस बेकर जैसा बनना चाहते थे। एक मैच में निराश होकर उन्होंने अपना 2100 रुपये का रैकेट तोड़ दिया। उसी दिन पिता ने टेनिस हमेशा के लिए बंद करवा दी।

इसके बाद युवराज ने स्केटिंग चुनी। चंडीगढ़ के सेक्टर 10 रिंक में हफ्ते के छह दिन प्रैक्टिस करने लगे। केवल 11 साल की उम्र में अंडर-14 नेशनल्स के लिए क्वालीफाई किया और 50 लैप्स की रेस में गोल्ड मेडल जीता। जब उन्होंने गाड़ी में पिता को मेडल दिखाया तो योगराज ने वो मेडल और स्केट्स दोनों खिड़की से बाहर फेंक दिए और कहा, आज से तू क्रिकेट खेलेगा, यह लड़कियों का खेल नहीं। क्रिकेट नहीं खेला तो पैर तोड़ दूँगा।

युवराज ने कुछ समय एक बाल कलाकार के तौर पर भी काम किया। पंजाबी फिल्मों में। लेकिन सोनीपत में एक दृश्य के दौरान उनका पैर फिसला और वो चलती ट्रेन के नीचे आते-आते बचे। उसी दिन अभिनय करियर भी खत्म कर दिया गया।

युवराज की पसंद की हर चीज़ एक-एक करके छीन ली गई। क्योंकि पिता के मन में बेटे के लिए केवल एक मंजिल थी, क्रिकेट।

क्रूर ट्रेनिंग और टूटते-बनते सपने

1992 में 11 साल के युवराज को योगराज ने पटियाला का महारानी क्लब ज्वाइन करवाया। यहीं भारतीय सलामी बल्लेबाज़ नवजोत सिंह सिद्धू नियमित रूप से खेलते थे। योगराज ने सिद्धू को युवी की बैटिंग देखने को कहा। कुछ ही देर में सिद्धू ने कह दिया, यह लड़का क्रिकेट के लिए नहीं बना। योगराज को इतना गुस्सा आया कि उन्होंने कहा, बस्ता उठा और घर चल। अब मैं देखता हूँ कि तू क्रिकेट कैसे नहीं खेलता।

चंडीगढ़ वापस आकर योगराज ने अपना रूद्र रूप दिखाया। जमा देने वाली ठंड में भी युवी को सुबह चार बजे उठना पड़ता था। न उठे तो बर्फीला पानी उड़ेल दिया जाता था। माँ शबनम का सुंदर बगीचा उजाड़कर उसे अभ्यास मैदान बना दिया गया। फ्लडलाइट्स लगा दी गईं ताकि अंधेरे में भी प्रैक्टिस न रुके। स्कूल और प्रैक्टिस के बीच युवी को दोस्तों से मिलने के लिए केवल आधा घंटा मिलता था।

बिशन सिंह बेदी के कैंप में 12 साल के युवराज ने बैटिंग में मन लगाया और स्पिन गेंदबाज़ी भी सीखी। 1997 में महज़ 15 साल की उम्र में पंजाब के लिए फर्स्ट क्लास क्रिकेट में डेब्यू किया। लेकिन वो डेब्यू आपदा बन गया। बल्ले से जीरो रन और एक कैच भी छोड़ दिया। दो साल तक कोई मौका नहीं मिला।

1999 में वापसी हुई लेकिन फिर से 20 रन ही बने। एक रणजी अभ्यास मैच में 39 रन पर आउट होने पर घर पर योगराज ने दूध का गिलास फेंककर मारा और कहा, तूने मेरी इज्जत मिट्टी में मिला दी। अगर मेरा बेटा नहीं होता तो गोली मार देता।

लेकिन फिर हरियाणा के खिलाफ एक मैच में सब कुछ बदल गया। युवराज ने 149 रन बनाए। 21 चौके और दो छक्के। यह उनकी पहली फर्स्ट क्लास सेंचुरी थी।

कूच बिहार ट्रॉफी: जब पूरी टीम से एक रन ज़्यादा बनाए

इसके बाद आया कूच बिहार ट्रॉफी का फाइनल। युवराज की टीम पंजाब का मुकाबला बिहार से था जिसमें महेंद्र सिंह धोनी नाम का एक युवा विकेटकीपर भी था। बिहार की पूरी टीम ने बनाए 357 रन। युवराज ने अकेले बना डाले 358 रन, पूरी बिहार टीम से एक रन ज़्यादा।

इस प्रदर्शन ने उन्हें भारत की अंडर-19 वर्ल्ड कप टीम में जगह दिलाई। श्रीलंका में हुए अंडर-19 वर्ल्ड कप में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ सेमीफाइनल में 25 गेंदों में 58 रन जड़कर टीम को फाइनल में पहुँचाया। फाइनल में श्रीलंका को हराकर भारत ने अंडर-19 वर्ल्ड कप जीता और युवराज सिंह बने प्लेयर ऑफ द टूर्नामेंट। 203 रन और 12 विकेट।

अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में धमाकेदार आगाज़

सितंबर 2000 में केवल 18 साल की उम्र में युवराज को भारतीय टीम में बुलावा आया। नैरोबी में ICC नॉकआउट ट्रॉफी के लिए। इंटरनेशनल क्रिकेट में उनका दूसरा ही मैच ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ था। भारत ने पिछले सात वनडे में ऑस्ट्रेलिया को नहीं हराया था। युवराज चार नंबर पर उतरे और मैकग्रा और ब्रेटली जैसे दिग्गज गेंदबाज़ों को खेलते हुए 84 रन बनाए। एक डाइविंग कैच और एक सीधा रन आउट भी किया। भारत ने वर्ल्ड चैंपियंस को हरा दिया।

पहली बड़ी कमाई से युवराज ने माँ शबनम के लिए एक घर खरीदा ताकि उन्हें पिता के नियंत्रण से निकाल सकें।

2002 में लॉर्ड्स में इंग्लैंड के खिलाफ यादगार पारी आई। भारत 146 रन पर पाँच विकेट गँवा चुका था। तब युवराज और मोहम्मद कैफ ने क्रिकेट इतिहास की महानतम साझेदारियों में से एक रची और भारत वो मैच जीत गया। उसी मैच के बाद सौरभ गांगुली ने अपनी शर्ट उतारकर जश्न मनाया था।

2007 T20 वर्ल्ड कप: छह गेंद, छह छक्के, अमर हो गई दास्तान

2007 का T20 वर्ल्ड कप आया। टूर्नामेंट से ठीक पहले एक बड़ा झटका लगा। युवराज उस समय वनडे टीम के वाइस कैप्टन थे। सभी को लगा कि T20 का कप्तान उन्हें ही बनाया जाएगा। लेकिन एमएस धोनी को बनाया गया। 2022 के एक इंटरव्यू में युवराज ने बताया कि कप्तानी उन्हें मिलने वाली थी लेकिन ग्रेग चैपल बनाम सीनियर खिलाड़ियों की लड़ाई में उन्होंने कोच के बजाय अपने सीनियर्स का साथ दिया। BCCI के कुछ अधिकारियों को यह पसंद नहीं आया।

19 सितंबर 2007 को इंग्लैंड के खिलाफ मैच में युवराज 17वें ओवर में उतरे और छह गेंदों में 14 रन जड़ दिए। जब उन्होंने एंड्रू फ्लिंटॉफ की दो बाउंड्री मारी तो फ्लिंटॉफ चिढ़ गए। जब युवराज सिंगल लेकर दूसरे छोर पहुँचे तो फ्लिंटॉफ ने कहा, आई एम गोना कट योर थ्रोट। युवराज ने बल्ला दिखाते हुए जवाब दिया। फिर फ्लिंटॉफ ने थूक दिया।

अंपायरों ने दोनों को रोका लेकिन तब तक फ्लिंटॉफ से बहुत बड़ी गलती हो चुकी थी। युवराज सिंह आग में थे। 19वें ओवर में गेंद थी 21 साल के नए गेंदबाज़ स्टुअर्ट ब्रॉड के हाथ में। पहली गेंद पर छक्का। फिर दूसरी, तीसरी, चौथी, पाँचवीं। हर छक्के के बाद युवराज ने फ्लिंटॉफ को घूरा। आखिरी गेंद वाइड मिड-ऑन पर डाली गई, युवराज ने उसे भी छक्का मारा। छह गेंद, छह छक्के। और साथ में 12 गेंदों में अर्धशतक, T20 का उस वक्त का सबसे तेज़ पचासा।

भारत वो मैच जीता और आगे बढ़ते-बढ़ते T20 वर्ल्ड चैंपियन बन गया।

2011 वर्ल्ड कप: जब एक मरता हुआ इंसान जीता रहा

2011 वनडे वर्ल्ड कप। युवराज सिंह की ज़िंदगी का सबसे बड़ा टूर्नामेंट। उन्होंने दो बल्ले तैयार किए थे लेकिन एक रहस्यमय तरीके से गायब हो गया। सच यह था कि माँ चुपके से वो बल्ला फतेहगढ़ के बड़े बाबा जी की संगत में ले गई थीं जहाँ हज़ारों लोगों ने उसे आशीर्वाद दिया।

वर्ल्ड कप में युवराज ने एक के बाद एक शानदार प्रदर्शन किए। इंग्लैंड के खिलाफ 58 रन। आयरलैंड के खिलाफ अर्धशतक और वर्ल्ड कप इतिहास के पहले खिलाड़ी बने जिसने एक मैच में पाँच विकेट लिए। नीदरलैंड्स के खिलाफ भी अर्धशतक, यानी तीन मैचों में अर्धशतकों की हैट्रिक।

लेकिन बाहरी शानदार प्रदर्शन के पीछे एक भयानक सच्चाई थी जो किसी को नहीं पता थी। युवराज सिंह लगातार उल्टियाँ कर रहे थे। एक भी सिंगल दौड़ने पर साँस फूल जाती थी। महीनों से नींद की गोलियों के बिना नींद नहीं आई थी। उनके सीने में एक ट्यूमर था जो हर दिन बड़ा हो रहा था। यह ट्यूमर उनकी पल्मोनरी आर्टरी को दबा रहा था, बाएँ फेफड़े और दिल को धीरे-धीरे कुचल रहा था। मतलब वर्ल्ड कप के दौरान लिया हर रन, हर बाउंड्री और हर विकेट उनकी जान ले सकता था क्योंकि किसी भी झटके पर दिल का दौरा पड़ सकता था।

वेस्ट इंडीज के खिलाफ मैच में बल्लेबाज़ी के दौरान युवराज सिंह खून की उल्टियाँ करते रहे। मैच दो बार रुकवाना पड़ा। अंपायर साइमन टफल ने पूछा कि क्या वो पवेलियन वापस जाना चाहेंगे? युवराज का जवाब था, अगर मैं बेहोश हो जाऊँ तो हॉस्पिटल ले जाना, उससे पहले नहीं।

युवराज ने उस दिन 113 रन बनाए। दो विकेट लिए। भारत को सेमीफाइनल में पहुँचाया।

फाइनल से एक रात पहले भी खून की उल्टियाँ हो रही थीं। उस रात उन्होंने प्रार्थना की, भगवान चाहे बाद में मैं मर जाऊँ लेकिन बस एक बार भारत वर्ल्ड कप जीत जाए।

2 अप्रैल 2011। मुंबई का वानखेड़े स्टेडियम। भारत बनाम श्रीलंका वर्ल्ड कप फाइनल। जब धोनी ने वो ऐतिहासिक जीत का छक्का मारा तो युवराज नॉन-स्ट्राइकर छोर पर खड़े थे। भारत वर्ल्ड चैंपियन बन गया। युवराज सिंह को 362 रन और 15 विकेट के लिए प्लेयर ऑफ द टूर्नामेंट घोषित किया गया।

कैंसर की जंग: जब मौत एक कदम दूर थी

वर्ल्ड कप के केवल आठ दिन बाद IPL शुरू हुआ। युवराज ने कुछ असामान्य नोटिस किया। ज़्यादा ट्रेनिंग करने पर भी कमज़ोरी आ रही थी, अच्छा खाने पर भी वज़न घट रहा था। दोस्त जतिन चौधरी ने लगातार खाँसी देखकर डॉक्टर को दिखाने को कहा।

जब चेस्ट का एक्स-रे आया तो सिर्फ एक फेफड़ा दिख रहा था क्योंकि दाएँ फेफड़े को 15×13×11 सेंटीमीटर का एक विशाल ट्यूमर दबा रहा था। डॉक्टर ने कहा कि यह ट्यूमर कैंसरस हो सकता है। आसपास खड़ा परिवार रो पड़ा। युवराज को लगा कि उनके नीचे से ज़मीन खींच ली गई।

युवराज ने अमेरिका के डॉ. लॉरेंस आइनहॉर्न से इलाज करवाने का फैसला किया जिन्होंने कीमोथेरेपी में क्रांति लाई थी और जीवित रहने की दर पाँच प्रतिशत से बढ़ाकर 95 प्रतिशत तक पहुँचाई थी।

इलाज तीन चक्रों में हुआ। हर चक्र 21 दिनों का। हर हफ्ते लगातार पाँच दिन शरीर में शक्तिशाली दवाइयाँ इंजेक्ट की जाती थीं। ये दवाइयाँ केवल ट्यूमर पर नहीं बल्कि शरीर की हर तेज़ी से बढ़ने वाली चीज़ पर हमला करती थीं, पेट की परत पर, अस्थि मज्जा पर, बालों पर।

इंजेक्शन शुरू होते ही मितली होती थी। खाने की गंध से ही उल्टियाँ शुरू हो जाती थीं। नींद पूरी तरह उड़ चुकी थी। बाल झड़ रहे थे। ऐसा लगता था जैसे त्वचा के अंदर नुकीली चीज़ें चुभ रही हैं। लेकिन युवराज हर दिन हिम्मत करके खुद को कीमो स्टेशन तक पहुँचाते रहे।

तीनों चक्र पूरे हुए और जब आखिरी स्कैन आया तो पता चला कि ट्यूमर गायब हो चुका था।

कैंसर के बाद वापसी: असली चैंपियन की पहचान

इलाज के बाद शरीर सूज गया था और वज़न 103 किलो हो गया था। जो खिलाड़ी शक्तिशाली छक्के मारता था वो आज अपने पैरों पर खड़े होने के लिए संघर्ष कर रहा था। लेकिन महत्वपूर्ण यह था कि वो जीवित था।

महीनों की कठिन रिकवरी के बाद युवराज सिंह ने क्रिकेट में वापसी की। 2013 में 14 करोड़ रुपये के दाम पर IPL इतिहास के सबसे महँगे खिलाड़ी बने। 2015 में 16 करोड़ के साथ नया रिकॉर्ड बनाया। और 2017 में 150 रन की पारी खेलकर अपना सर्वोच्च वनडे स्कोर भी बनाया।

10 जून 2019 को युवराज सिंह ने क्रिकेट को हमेशा के लिए अलविदा कहा। 11778 अंतर्राष्ट्रीय रन, 148 विकेट और दो वर्ल्ड कप खिताब लेकर।

युवराज सिंह का संदेश: ज़िंदगी ही सबसे बड़ी जीत है

आज युवराज यूवी कैन फाउंडेशन चलाते हैं जिसने हज़ारों कैंसर पीड़ितों की मदद की है। अपनी किताब में उन्होंने लिखा है कि जब आप जवान होते हो तो एक छोटी सी चोट भी परेशान कर देती है। लेकिन एक बार मौत को नज़दीक से देख लेते हो तो ज़िंदगी की असली कीमत समझ में आती है। साँस लेना, खाना खाने का आनंद लेना, वो छोटी-छोटी चीज़ें जिन्हें हम당연한 मानते हैं, वो अनमोल लगने लगती हैं।

युवराज सिंह की कहानी सिखाती है कि हमेशा वापसी करो। ज़िंदगी में कुछ बड़ा पाने के लिए संघर्ष करो। लेकिन इस दौड़ में इतना मत खो जाओ कि ज़िंदगी जीना ही भूल जाओ।

यही है भारतीय क्रिकेट के असली योद्धा युवराज सिंह की कहानी।

पान मसाला का सच: 41000 करोड़ की इंडस्ट्री जो देश को बर्बाद कर रही है