लीला होटल्स की कहानी: एक प्यून के बेटे ने बनाया दुनिया का बेस्ट होटल

लीला होटल्स की कहानी शुरू होती है एक 7 साल के उस लड़के से जो मैसूर पैलेस के सामने खड़ा था और बस एक बार उसके अंदर झांकना चाहता था। एक तरफ वह शाही महल था और दूसरी तरफ एक मामूली सरकारी चपरासी का बेटा। उस दिन उसकी ख्वाहिश अधूरी रह गई।

लेकिन लीला होटल्स की कहानी यह है कि उसी लड़के ने आगे चलकर न सिर्फ मैसूर पैलेस से प्रेरित होकर अपना खुद का पैलेस होटल बनाया, बल्कि दुनिया की सबसे बेहतरीन होटल चेन खड़ी कर दी।

लीला होटल्स की कहानी की शुरुआत: एक टूटी झोपड़ी से

लीला होटल्स की कहानी 1922 में केरल के कन्नूर के पास एक छोटे से गांव में शुरू होती है। उस टूटी-फूटी झोपड़ी में जन्म हुआ कृष्णन नायर का। पिता सरकारी चपरासी थे। मां नारियल से तेल निकालकर बेचती थीं और उनके हाथों में छाले पड़े रहते थे।

परिवार की हालत देखकर कृष्णन को बचपन में ही पढ़ाई की कीमत समझ आ गई। उन्होंने स्कूल को अपना मंदिर बना लिया। संस्कृत से लेकर विज्ञान तक हर विषय में खुद को डुबो दिया। उनकी लगन और प्रतिभा देखकर वहां के राजा इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने एलान कर दिया कि कृष्णन की उच्च शिक्षा का पूरा खर्च वो उठाएंगे।

इसी सहारे कृष्णन ने मद्रास के गवर्नमेंट आर्ट्स कॉलेज में दाखिला लिया। सपना था कि पढ़ाई पूरी करके एक इज्जतदार नौकरी करेंगे। लेकिन लीला होटल्स की कहानी उतनी सीधी नहीं थी।

1942 में, जब वो बस 20 साल के थे, घर की आर्थिक तंगी ने उन्हें कॉलेज बीच में ही छुड़वा दिया। उन्होंने ब्रिटिश इंडियन आर्मी में नौकरी ली और सिविलियन वायरलेस ऑफिसर के तौर पर अबोटाबाद की बर्फीली पहाड़ियों में तैनात हो गए। वहां उनका काम था मित्र सेना के कूटबद्ध संदेशों को सुनना और डिकोड करके मुख्यालय भेजना।

अकाल का दर्द और वापसी

लीला होटल्स की कहानी में पहला बड़ा मोड़ आया जब केरल में भयंकर अकाल पड़ा। करीब 400 लोगों की जान जाने वाली थी। एक तरफ आर्मी बेस में तीन वक्त का खाना गारंटीड था और दूसरी तरफ उनके गांव के लोग, उनके बचपन के दोस्त, भूख से दम तोड़ रहे थे।

यह बात कृष्णन के लिए अस्वीकार्य थी। उन्होंने नौकरी छोड़ी और केरल वापस लौट आए।

सरकार के सिविल सप्लाई डिपार्टमेंट में शामिल होकर उन्हें चावल, चीनी और केरोसिन जैसी जरूरी चीजें आम लोगों तक पहुंचाने का जिम्मा मिला। लेकिन पूरा तंत्र भ्रष्ट था। खाना लोगों तक नहीं, काले बाजार में जा रहा था।

कृष्णन ने चार्ज लेते ही यह सब एक झटके में बंद करवा दिया। निकलने वाले एक-एक दाने का हिसाब रखने लगे और भ्रष्ट डीलरों को ब्लैकलिस्ट कर दिया। बहुत जल्द पूरे कन्नूर में उनकी ईमानदारी की चर्चा होने लगी।

लीला होटल्स की कहानी में यही वो दौर था जब कृष्णन ने साबित किया कि वो सिर्फ एक अच्छे अफसर नहीं, एक अच्छे इंसान भी हैं।

वो मुलाकात जिसने जिंदगी बदल दी

हालात सुधरने के बाद कृष्णन ने दोबारा आर्मी ज्वाइन की। इस बार शॉर्ट कमीशन ऑफिसर के तौर पर, एक असली कॉम्बैट रोल। मराठा लाइट इनफेंट्री में तैनाती हुई और कुछ ही सालों में वो कैप्टन की रैंक तक पहुंच गए।

तभी लीला होटल्स की कहानी में एक अहम शख्स की एंट्री हुई। कन्नूर के सबसे सम्मानित व्यापारी एके नायर कई सालों से कृष्णन को देख रहे थे। अकाल के दौरान उनके काम और आर्मी में उनके करियर से वो बेहद प्रभावित थे। उन्होंने अपनी बेटी की शादी कृष्णन से तय कर दी।

1950 में शादी हुई। एके नायर की बेटी का नाम था लीला। वही लीला जिसके नाम पर कृष्णन एक दिन दुनिया का सबसे बेहतरीन होटल ब्रांड बनाने वाले थे।

जहां बाकी सब कृष्णन में एक सफल फौजी अफसर देख रहे थे, वहीं लीला ने उनमें एक ऐसा नेता देखा जो खुद का कारोबारी साम्राज्य बना सकता था।

फैब्रिक से शुरू हुआ कारोबार

लीला होटल्स की कहानी का व्यापारिक अध्याय 1952 में शुरू हुआ जब लीला की सलाह पर कृष्णन ने आर्मी छोड़ दी। लीला के पिता कन्नूर में राजेश्वरी मिल्स चलाते थे जहां उच्च गुणवत्ता के कपड़े बनते थे।

कृष्णन ने तय किया कि वो इस मिल के लिए सेल्स एजेंट बनेंगे। कन्नूर से कपड़े के नमूने उठाते और बॉम्बे के मुलजी जेठा मार्केट में दुकान-दुकान घूमकर ऑर्डर लेते। एक रात में वो एक सम्मानित फौजी अफसर से गली-गली भटकने वाले सेल्समैन बन गए। पीठ पीछे लोग हंसते थे।

लेकिन वो चुपचाप इस धंधे को समझ रहे थे।

1958 में कृष्णन ने तमिलनाडु में एक अनोखा कपड़ा खोजा। हल्का, हवादार सूती कपड़ा जिसे नीले रंग, हल्दी और तिल के तेल जैसे प्राकृतिक तत्वों से रंगा जाता था। रंग जीवंत थे और खुशबू बिल्कुल कुदरती।

लेकिन एक बड़ी समस्या थी। धोने पर इसके अलग-अलग रंग एक-दूसरे में मिल जाते थे।

कृष्णन ने इसी कमी को ताकत बना दिया। उन्होंने अमेरिकी आयातकों को यह कहकर पेश किया कि हर धुलाई के साथ इस कपड़े में एक नया पैटर्न बनेगा। एक खरीद पर कपड़ा बार-बार नया दिखेगा। अमेरिका में इससे जैकेट, शर्ट और शॉर्ट्स बनाए गए। इसे नाम मिला ब्लीडिंग मद्रास।

एक हफ्ते में पहला लॉट बिक गया और यह अमेरिका में एक फैशन सनसनी बन गया। कृष्णन के पास ऑर्डरों की लाइन लग गई।

इंडिया का पहला लेस मैन्युफैक्चरिंग यूनिट

लीला होटल्स की कहानी में अगला बड़ा कदम आया लंदन की एक यात्रा के दौरान। लीला ने वहां स्कॉटिश लेस को पर्दों, मेज़पोश और ड्रेसों में इस्तेमाल होते देखा और कृष्णन को इसे भारत में बनाने का आइडिया दिया।

इसके लिए परिष्कृत स्कॉटिश मशीनें, भारी पूंजी और कुशल कारीगर चाहिए थे। कृष्णन ने किसी तरह सब जुगाड़ किया और 1964 में मुंबई में शुरू हुआ लीला स्कॉटिश लेस। भारत की पहली लेस मैन्युफैक्चरिंग इकाई।

सफलता तुरंत मिली। मिस इंडिया मेहर मिस्त्री ने उनके लेस से बनी पोशाक मंच पर पहनी। राजेश खन्ना ने उनका कुर्ता अपने जन्मदिन पर पहना। पूरे भारत में उनका ब्रांड विलासिता का पर्याय बन गया।

अगले 15 सालों में कृष्णन के कारोबार ने जबरदस्त तरक्की देखी।

वो तूफान जिसने सब उलट दिया

लीला होटल्स की कहानी का सबसे दर्दनाक मोड़ आया 1979 में। फैक्ट्री की कई मशीनें एक साथ बंद पड़ गईं। स्पेयर पार्ट्स स्कॉटलैंड से मंगवाने थे लेकिन भारत में विदेशी मुद्रा संकट के कारण सरकार ने आयात पर रोक लगा दी। उत्पादन ठप। ऑर्डर रद्द। और जो पैसा विस्तार और कच्चे माल में लगाया था, वो सब डूब गया।

57 साल की उम्र में कृष्णन की हैसियत शून्य नहीं, नकारात्मक हो चुकी थी। कर्ज चुकाने के लिए मुंबई का घर बिकने की नौबत आ गई।

लेकिन लीला होटल्स की कहानी यहां खत्म नहीं हुई। एक उड़ान में उन्हें राजेंद्र सिंह नाम के एक व्यापारी मिले जो अमेरिकी ब्रांड्स के लिए भारत में तैयार कपड़े बनवाना चाहते थे। उनके ग्राहक दो हफ्तों में नमूने देखने आने वाले थे।

कृष्णन तुरंत काम पर लग गए। थोड़े पैसे जुटाए, बंद होती फैक्ट्री से सस्ती मशीनें खरीदीं और अपनी पुरानी फैक्ट्री में छोटा सा सेटअप किया।

उन्होंने चुना चीज़क्लॉथ। एक मुलायम, हवादार कपड़ा जो कैजुअल वियर के लिए परफेक्ट था। इसे नेचुरल ऑफ-व्हाइट में रखा जा सकता था, किसी भी रंग में रंगा जा सकता था या धारीदार या चेक पैटर्न में बुना जा सकता था।

नमूने देखकर ग्राहक खुश हो गए। उन्होंने इस कपड़े को नाम दिया निर्वाणा। एक्सक्लूसिव ऑर्डर मिले। 12 महीनों में न सिर्फ सारे कर्ज चुक गए बल्कि कृष्णन फिर से मुनाफे में आ गए।

अगले कुछ सालों में Liz Claiborne, Calvin Klein और Jordache जैसे बड़े अमेरिकी ब्रांड्स के लिए भी कपड़े बनने लगे। 1980 तक लीला स्कॉटिश लेस अमेरिका को तैयार कपड़े निर्यात करने वाली भारत की सबसे बड़ी कंपनी बन गई।

होटल एंपायर का सपना

लीला होटल्स की कहानी का सबसे रोमांचक अध्याय 1983 में शुरू हुआ जब कृष्णन 61 साल के थे। कोई और होता तो रिटायरमेंट की सोचता। लेकिन कृष्णन के लिए यह सिर्फ शुरुआत थी।

सालों पहले एक कारोबारी यात्रा पर वो न्यूयॉर्क के वाल्डोर्फ एस्टोरिया में रुके थे। उस होटल का अपना निजी रेलवे प्लेटफॉर्म था, खुद का पावर प्लांट था और शाही साज-सज्जा थी। इसी होटल से प्रेरणा लेकर उन्होंने ठान लिया कि भारत में एक विश्वस्तरीय होटल साम्राज्य बनाएंगे।

उन्होंने देखा कि उत्तरी मुंबई में सहार अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा बन रहा था लेकिन वहां कोई लग्जरी होटल नहीं था। उद्योग की मान्यता थी कि एयरपोर्ट होटल सस्ते होते हैं, बस कुछ घंटे रुकने के लिए। लेकिन कृष्णन ने देखा कि मुंबई भारत की वित्तीय राजधानी है। यहां बड़े व्यापारी, हस्तियां और वीआईपी आते हैं। उन्हें पास में एक लग्जरी होटल चाहिए होगा।

उन्होंने होटल लीला वेंचर्स लिमिटेड बनाई। हवाई अड्डे के पास 13 एकड़ जमीन ली। 250 कमरों का होटल विशाल हरे बगीचों के बीच बनाया। लंदन के इंटीरियर डिजाइनर फ्रैंक सोलानो ने शानदार साज-सज्जा की।

लेकिन लीला होटल्स की कहानी में एक और रुकावट आई। इंडियन एक्सप्रेस में खबर छपी कि होटल निर्माण में 19 नियम तोड़े जा रहे हैं और इसकी ऊंचाई से उड़ानों का रास्ता प्रभावित होगा। विरोध हुआ, निर्माण रुका, जांच बैठी। महीनों तक काम बंद रहा और लागत बढ़ती गई।

कृष्णन टूटे हुए थे क्योंकि उन्हें पता था कि आरोप निराधार हैं। अंततः प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने एक अधिकारी को जांच के लिए भेजा जिसने पाया कि सारे आरोप बेबुनियाद हैं। निर्माण फिर शुरू हुआ।

12 अक्टूबर 1986 को द लीला मुंबई ने मेहमानों के लिए दरवाजे खोले। यह एयरपोर्ट होटल नहीं, एक महल था। संगमरमर के फर्श, क्रिस्टल झाड़-फानूस, हर कोने में कलाकृतियां। स्टाफ को ऐसी ट्रेनिंग मिली थी कि वो मेहमान की जरूरत बोलने से पहले भांप ले।

एक बार होटल के माली ने देखा कि एक मेहमान बगीचे में गिरे प्लुमेरिया के फूल उठा रहे हैं। अगले दिन जब वो नीचे आए तो स्टाफ ने उन्हें प्लुमेरिया फूलों से भरा पूरा कटोरा भेंट किया। वो मेहमान जिंदगी भर के लिए लीला का वफादार ग्राहक बन गया।

लीला होटल्स की कहानी में एक और चतुर चाल यह थी कि अधिकतर अंतरराष्ट्रीय उड़ानें रात 12 बजे के आसपास आती-जाती थीं। यानी एक कमरे से एक दिन में दो बार किराया मिलता था।

मुंबई की सफलता के बाद लीला होटल बॉलीवुड हस्तियों, बड़े व्यापारियों और वीआईपी का पहला पसंदीदा ठिकाना बन गया।

मैसूर का सपना बेंगलुरु में पूरा हुआ

लीला होटल्स की कहानी का भावुक करने वाला पल आया 1990 में। बचपन में वो बच्चा मैसूर पैलेस के अंदर नहीं जा सका था। अब 65 साल बाद उसी कृष्णन ने तय किया कि वो उसी पैलेस से प्रेरित एक पैलेस होटल बनाएंगे।

बेंगलुरु में आईटी बूम था। इन्फोसिस, विप्रो, IBM, Oracle जैसी कंपनियां ऑफिस खोल रही थीं। उनके शीर्ष अधिकारियों और विदेशी ग्राहकों को प्रीमियम रहने की जगह चाहिए थी।

ताज वेस्टएंड के पास 106 कमरे और ओबेरॉय के पास 120 कमरे थे। कृष्णन ने एलान किया कि वो 256 कमरों का होटल बनाएंगे, यानी दोनों प्रतिद्वंद्वियों से मिलाकर भी बड़ा।

होटल खुलने से पहले ही लीला पैलेस को बेंगलुरु के सबसे बड़े लग्जरी होटल की ब्रांडिंग मिल गई।

लेकिन निर्माण में देरी हुई और कर्ज चुकाने का वक्त आ गया। कंपनी लगभग दिवालिया हो चुकी थी। कृष्णन ने HDFC बैंक के चेयरमैन दीपक पारेख के सामने बेंगलुरु प्रोजेक्ट का विजन आत्मविश्वास से पेश किया। दीपक पारेख मान गए और आपातकालीन फंडिंग मंजूर की।

कृष्णन ने होटल को चरणों में बनाया। पहले पश्चिमी विंग के 90 कमरे, लॉबी और सिट्रस रेस्टोरेंट खुले। आमदनी आने लगी। फिर एक-एक करके पूरा होटल तैयार हुआ।

जहां दूसरे होटल लग्जरी देते थे, वहां लीला पैलेस बेंगलुरु राजसी ठाट देता था। 90 प्रतिशत कब्जे की दर के साथ यह कंपनी के लिए सोने का अंडा देने वाली मुर्गी बन गया।

उदयपुर: सबसे बड़ी चुनौती

लीला होटल्स की कहानी की सबसे बड़ी परीक्षा उदयपुर में हुई।

उदयपुर भारत की अल्ट्रा लग्जरी शादियों का केंद्र था। 1983 में जेम्स बॉन्ड की फिल्म के बाद दुनिया भर के सैलानियों की नजर इस पर थी। यहां ताज लेक पैलेस था, 270 साल पुराना संगमरमर का महल, पिछोला झील के बीचोंबीच। ओबेरॉय उदय विलास था, 30 एकड़ में फैला शाही होटल।

कृष्णन ने ठान लिया कि वो उदयपुर में भी जगह बनाएंगे। पिछोला झील के किनारे एक गुलाबी खंडहर में उन्होंने अपना भविष्य देखा। छह एकड़ जमीन खरीदी, निर्माण शुरू किया।

योजना थी कि होटल का मुख्य द्वार झील की तरफ खुलेगा और मेहमान नाव से आएंगे।

लेकिन जब होटल बनकर तैयार हुआ तो पिछोला झील पूरी तरह सूख गई। मेहमानों के आने का रास्ता ही नहीं था।

कृष्णन ने हिसाब लगाया और तय किया कि विपरीत दिशा में डेढ़ एकड़ जमीन खरीदकर मुख्य सड़क से जोड़ने वाली सड़क बनाई जाएगी। उस डेढ़ एकड़ पर कई अलग-अलग लोग रहते थे। सबसे बातचीत करना, उन्हें मनाना बेहद मुश्किल था।

लेकिन एक-एक करके सौदे हुए, जमीन मिली और सड़क बनी। कुछ महीनों बाद झील की समस्या भी हल हो गई।

लीला होटल्स की कहानी में उदयपुर का यह होटल एक रत्न साबित हुआ। ताज और ओबेरॉय से बड़े कमरे, हर कमरे से झील का नजारा, और ऐसी सेवा जो मेहमान को राजा-रानी महसूस कराए।

एक बार एक महिला मेहमान अपनी भगवान की मूर्तियां ड्रेसिंग टेबल पर छोड़कर घूमने चली गईं। जब वापस आईं तो देखा कि होटल के कर्मचारियों ने मूर्तियों को लाल रेशमी कपड़े पर पूरे सम्मान के साथ रखा था और विधि के अनुसार गेंदे के फूल चढ़ाए थे।

लीला होटल्स की कहानी में एक और चतुर कदम यह था कि उनके होटल का सबसे अच्छा नजारा मिलता था ताज लेक पैलेस से, क्योंकि वो बिल्कुल सामने था। कृष्णन ने एक वास्तुकार और प्रकाश विशेषज्ञ को बुलाकर ऐसी रोशनी लगवाई कि रात होते ही लीला पैलेस किसी सपने के महल की तरह चमकने लगे।

ताज में रुकने वाले मेहमान इसे देखते, अगले दिन कॉफी के बहाने लीला विजिट करते और अगली यात्रा पर लीला को चुनते।

सम्मान और विरासत

लीला होटल्स की कहानी को उसकी सही पहचान मिली जब 2009 में इंटरनेशनल होटल्स एंड रेस्टोरेंट एसोसिएशन ने कृष्णन नायर को होटलियर ऑफ द सेंचुरी की उपाधि दी। 2010 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया।

मुंबई और बेंगलुरु के बाद गोवा, कोवलम, गुड़गांव और दिल्ली में भी लीला के होटल खुले।

2014 में 92 साल की उम्र में कृष्णन नायर ने अंतिम सांस ली। लेकिन पीछे छोड़ गए एक ऐसा होटल ब्रांड जिसने उन्हें हमेशा के लिए अमर कर दिया।

2019 में ट्रैवल प्लस लेजर ने लीला पैलेस उदयपुर को दुनिया का बेस्ट होटल नाम दिया। 2020 और 2021 में लगातार दो साल लीला पैलेस होटल्स एंड रिसॉर्ट्स को दुनिया का बेस्ट होटल ब्रांड का खिताब मिला।

लीला होटल्स की कहानी यह है कि एक टूटी झोपड़ी से निकले लड़के ने आतिथ्य की दुनिया का ऑस्कर जीत लिया।

कैप्टन कृष्णन नायर का कहना था — असफलता एक अल्पविराम हो सकती है, लेकिन यह कभी पूर्णविराम नहीं है।

3i Atlas का सच: क्या यह एलियन यान हमारे सौरमंडल में जीवन बो रहा है?