स्टिंग: गरीबों का रेडबुल या भारत की सबसे बड़ी एनर्जी ड्रिंक?

आज सोशल मीडिया पर अगर आप स्टिंग एनर्जी ड्रिंक का नाम लेते हैं तो लोग तुरंत दो तरह की प्रतिक्रिया देते हैं। एक तरफ वो लोग हैं जो इसे “गरीबों का रेडबुल” और “छपरियों की ड्रिंक” कहकर मजाक उड़ाते हैं। दूसरी तरफ वो लोग हैं जो रोज इस लाल रंग की बोतल को खरीदकर पीते हैं और उन्हें इस मजाक की कोई परवाह नहीं है। लेकिन अगर आप स्क्रीन से बाहर निकलकर असली दुनिया की जमीनी हकीकत देखें तो तस्वीर बिल्कुल अलग नजर आती है। यह वही स्टिंग एनर्जी ड्रिंक है जिसने कोका-कोला, रेडबुल और मॉन्स्टर जैसे दिग्गज ब्रांड्स को इतनी जबरदस्त टक्कर दी कि वो आज भी उस झटके से उबर नहीं पाए हैं।

आज स्टिंग एनर्जी ड्रिंक इंडिया की पूरी एनर्जी ड्रिंक मार्केट का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा कंट्रोल करती है। यह संख्या पढ़कर आपको शायद यकीन न हो, लेकिन यह सच है। कुछ साल पहले तक रेडबुल इसी एनर्जी ड्रिंक मार्केट का बेताज बादशाह हुआ करता था। कोका-कोला ने तीन बार अलग-अलग एनर्जी ड्रिंक के साथ इस मार्केट में एंट्री मारने की कोशिश की। मॉन्स्टर, बिसलरी, क्लाउड 9 और जिंगा जैसे कई बड़े ब्रांड्स आए लेकिन कोई भी रेडबुल को उसकी कुर्सी से हिला तक नहीं सका। ऐसे में सवाल यह उठता है कि जब इतने बड़े-बड़े ब्रांड्स फेल हो गए तो स्टिंग एनर्जी ड्रिंक ने यह कमाल कैसे कर दिखाया? वो भी तब जब रेडबुल जैसा ग्लोबल जाइंट सामने खड़ा था? और सबसे मजेदार सवाल यह है कि इतनी बड़ी सफलता के बावजूद स्टिंग एनर्जी ड्रिंक को आखिर “छपरी ड्रिंक” का टैग क्यों मिला?

आइए इस पूरी कहानी को शुरू से समझते हैं। सॉफ्ट ड्रिंक और एनर्जी ड्रिंक में फर्क क्या होता है

स्टिंग एनर्जी ड्रिंक की सफलता को सही तरीके से समझने के लिए पहले यह जानना जरूरी है कि सॉफ्ट ड्रिंक और एनर्जी ड्रिंक में असल में फर्क क्या होता है। ज्यादातर लोग इन दोनों को एक जैसा मानते हैं, लेकिन यह दोनों बिल्कुल अलग-अलग कैटेगरी की ड्रिंक्स हैं।

सॉफ्ट ड्रिंक उस पल के लिए बनाई जाती है जब प्यास लगी हो या जीभ को कुछ अच्छा चाहिए हो। शुगर, गैस और फ्लेवर को मिलाकर बनाई गई यह ड्रिंक आपको थोड़ी देर के लिए ताजगी का अहसास जरूर दिलाती है लेकिन शरीर को असली एनर्जी देने का कोई दावा नहीं करती। इसमें कैफीन हो सकता है, लेकिन वो एनर्जी बूस्ट के लिए नहीं बल्कि टेस्ट को थोड़ा तीखा और आदत बनाने वाला बनाने के लिए डाला जाता है।

दूसरी तरफ एनर्जी ड्रिंक उस वक्त के लिए बनाई जाती है जब आंखों पर नींद हावी हो रही हो या शरीर और दिमाग पूरी तरह थका हुआ महसूस कर रहा हो। एनर्जी ड्रिंक का मकसद प्यास बुझाना नहीं बल्कि शरीर और दिमाग को थोड़े वक्त के लिए अलर्ट और एक्टिव करना होता है। इसी वजह से एनर्जी ड्रिंक में कैफीन की मात्रा काफी ज्यादा होती है। साथ ही इसमें टॉरिन और बी विटामिन जैसे इंग्रेडिएंट्स भी मिलाए जाते हैं ताकि थकान कम हो, फोकस बना रहे और रिएक्शन तेज रहे।

यही वजह है कि एनर्जी ड्रिंक हर किसी के लिए नहीं बल्कि खास तौर पर नाइट शिफ्ट में काम करने वाले लोगों, लंबी दूरी के ड्राइवर्स और एथलीट्स के लिए ज्यादा उपयोगी होती है। यानी वो लोग जिनके लिए अलर्ट रहना एक विकल्प नहीं बल्कि जरूरत है।

एनर्जी ड्रिंक का कांसेप्ट कहाँ से आया

एनर्जी ड्रिंक का यह कांसेप्ट थाईलैंड से आया था। 1970 के दशक में एक थाई बिजनेसमैन चेलियो युवेदिया ने एक साधारण टॉनिक बनाया था जिसका नाम था क्रेटिंग डैंग। इस एनर्जी ड्रिंक का मकसद मजदूरों और ट्रक ड्राइवर्स को घंटों की लगातार मेहनत के बाद अलर्ट रखना था। यह कोई स्टाइल या स्टेटस सिंबल नहीं था। यह एक जरूरत से पैदा हुआ प्रोडक्ट था।

कुछ साल बाद ऑस्ट्रिया के एक बिजनेसमैन डिट्रिक मैटिस एक लंबी इंटरनेशनल फ्लाइट के बाद जेट लैग से परेशान थे। उस हालत में उन्होंने यह एनर्जी ड्रिंक पी और उन्हें तुरंत इसकी ताकत का अहसास हो गया। उनके दिमाग में यह आइडिया आया कि अगर इस एनर्जी ड्रिंक को थोड़ा रीब्रांड किया जाए, पैकेजिंग बदली जाए और इसे एक लाइफस्टाइल प्रोडक्ट की तरह पेश किया जाए तो यह पूरी दुनिया में तहलका मचा सकता है। इसी सोच के साथ उन्होंने चेलियो युवेदिया के साथ पार्टनरशिप की, ओरिजिनल फार्मूला में कुछ बदलाव किए और इस एनर्जी ड्रिंक को रेडबुल के नाम से दुनिया के सामने पेश किया।

और यहीं से एनर्जी ड्रिंक मजदूरों की जरूरत से निकलकर यूथ कल्चर, एडवेंचर, एक्सट्रीम स्पोर्ट्स और परफॉर्मेंस का सिंबल बन गई।

इंडिया में एनर्जी ड्रिंक मार्केट की शुरुआत और शुरुआती नाकामियाँ

ज्यादातर लोग यह मानते हैं कि इंडिया में एनर्जी ड्रिंक का कांसेप्ट सबसे पहले रेडबुल लेकर आया था। लेकिन सच्चाई यह है कि 2001 के आसपास रेडबुल से भी पहले कोका-कोला ने इंडिया में एक कार्बोनेटेड एनर्जी ड्रिंक लॉन्च की थी जिसका नाम था “शॉक।” कोका-कोला को लग रहा था कि जैसे उसकी सॉफ्ट ड्रिंक इंडिया में चली वैसे ही यह एनर्जी ड्रिंक भी चल जाएगी।

लेकिन यहीं पर सबसे बड़ी गलती हुई। उस वक्त इंडियन कंज्यूमर का माइंडसेट बिल्कुल अलग था। लोग यह नहीं समझ पा रहे थे कि यह एनर्जी ड्रिंक आखिर है क्या और इसे कब पीना चाहिए। यह एनर्जी ड्रिंक न तो पूरी तरह सॉफ्ट ड्रिंक जैसी थी और न ही लोगों को इसका पर्पस समझ आ रहा था। ऊपर से कंपनी ने लोगों को एजुकेट करने की बजाय सिर्फ ब्रांडिंग पर फोकस किया। नतीजा यह हुआ कि जब पर्पस ही साफ नहीं था तो कोई ₹5 की कोक की जगह ₹25 की शॉक क्यों खरीदता? और देखते ही देखते यह एनर्जी ड्रिंक मार्केट से गायब हो गई।

शॉक के फेल होने के बाद भी बाकी कंपनियों ने कोई सबक नहीं लिया। 2008 के आसपास क्लाउड 9, पेप्सी की सोबे और कोका-कोला की बर्न जैसी एनर्जी ड्रिंक्स मार्केट में आईं। लेकिन इन सभी का अंजाम भी वही हुआ जो शॉक का हुआ था। यह एनर्जी ड्रिंक्स भी एक के बाद एक मार्केट से गायब होती चली गईं।

रेडबुल की एंट्री और एनर्जी ड्रिंक मार्केट में उसका दबदबा

जब कोक और पेप्सी अपने-अपने एनर्जी ड्रिंक एक्सपेरिमेंट्स में उलझे हुए थे तब रेडबुल चुपचाप सब कुछ ऑब्जर्व कर रहा था और सही मौके का इंतजार कर रहा था। 2009 में जब एनर्जी ड्रिंक मार्केट मेंटली तैयार हुई तब रेडबुल ने इंडिया में धमाकेदार एंट्री की। लेकिन उसने सिर्फ एक नया प्रोडक्ट लॉन्च नहीं किया। उसने पूरी एक नई कैटेगरी बनाई।

रेडबुल ने सैंपलिंग कैंपेन, टीवी एड्स और कॉलेज कैंपसेस पर जाकर पहली बार लोगों को यह समझाया कि एनर्जी ड्रिंक होती क्या है और इसका असली काम क्या है। यही वह बेसिक एजुकेशन थी जो कोक और पेप्सी दोनों मिस कर चुके थे। और इसी एजुकेशन का नतीजा यह निकला कि लॉन्च के कुछ ही सालों में रेडबुल इंडिया की एनर्जी ड्रिंक मार्केट का नंबर वन ब्रांड बन गया।

रेडबुल की असली ताकत प्रोडक्ट नहीं बल्कि परसेप्शन था। उसने 250 ml के कैन की कीमत जानबूझकर करीब ₹100 रखी। यह साफ मैसेज था कि यह एनर्जी ड्रिंक क्वांटिटी का खेल नहीं बल्कि वैल्यू और स्टेटस की बात है। एक्सट्रीम स्पोर्ट्स और एडवेंचर इवेंट्स की मदद से रेडबुल ने यह छवि बनाई कि रेडबुल पीना मतलब अपनी लिमिट को पुश करना है। यही वजह थी कि रेडबुल युवाओं के बीच एक हाई एनर्जी लाइफस्टाइल का सिंबल बन गया। धीरे-धीरे एनर्जी ड्रिंक मार्केट में रेडबुल का शेयर 70 प्रतिशत से भी ऊपर चला गया।

2015 का वो झटका जिसने पूरी एनर्जी ड्रिंक मार्केट बदल दी

2015 में एक ऐसी घटना हुई जिसने पूरी एनर्जी ड्रिंक मार्केट के नियम एक झटके में बदल दिए। FSSAI यानी भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण ने एनर्जी ड्रिंक पर कुछ कड़े नए नियम लागू कर दिए। यह नियम इसलिए लाए गए क्योंकि एनर्जी ड्रिंक का सेवन तेजी से बढ़ रहा था और इससे बेचैनी, दिल की धड़कन तेज होना और नींद खराब होने जैसी समस्याएं सामने आ रही थीं।

FSSAI ने साफ कहा कि एनर्जी ड्रिंक में कैफीन की मात्रा अब 300 मिलीग्राम प्रति लीटर से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। साथ ही टॉरिन, जिनसेंग और कुछ हर्बल इंग्रेडिएंट्स को एक साथ मिक्स करने पर रोक लगा दी गई। अथॉरिटी का तर्क था कि कैफीन शरीर को अलर्ट करता है जबकि जिनसेंग आराम देने वाला इंग्रेडिएंट है। दोनों का असर एक-दूसरे के बिल्कुल विपरीत है इसलिए इन्हें एक एनर्जी ड्रिंक में मिलाना सही नहीं होगा।

इसके अलावा पैकेजिंग पर यह साफ लिखना अनिवार्य हो गया कि यह एनर्जी ड्रिंक बच्चों, गर्भवती महिलाओं और कैफीन के प्रति संवेदनशील लोगों के लिए नहीं है। नए ब्रांड के लिए अप्रूवल प्रोसेस भी बहुत सख्त हो गई। अब कोई भी एनर्जी ड्रिंक बिना FSSAI की मंजूरी के मार्केट में नहीं आ सकती थी।

इन नए नियमों के आने के बाद एनर्जी ड्रिंक मार्केट का पूरा बैलेंस बिगड़ गया। मॉन्स्टर, क्लाउड 9, जिंगा जैसे ब्रांड्स को या तो अपने प्रोडक्ट्स बाजार से हटाने पड़े या फिर नए फार्मूले के साथ अप्रूवल का लंबा इंतजार करना पड़ा। किसी भी एनर्जी ड्रिंक कंपनी के लिए फार्मूला बदलना सिर्फ रेसिपी बदलना नहीं होता। इसके लिए कच्चा माल बदलना पड़ता है, टेस्ट पर दोबारा रिसर्च करनी पड़ती है, नई सप्लाई चेन बनानी होती है और नए नियमों के हिसाब से कंप्लायंस दिखानी पड़ती है। यह सब करने में सालों लग सकते हैं।

स्टिंग एनर्जी ड्रिंक की धमाकेदार एंट्री

जब बाकी एनर्जी ड्रिंक ब्रांड्स इसी कंफ्यूजन में फंसे हुए थे तब पेप्सी ने मौका भांपा और स्टिंग एनर्जी ड्रिंक के साथ मार्केट में धमाकेदार एंट्री कर दी। स्टिंग एनर्जी ड्रिंक का फार्मूला शुरू से ही FSSAI के नए नियमों के हिसाब से बना था। और सबसे बड़ी बात यह थी कि पेप्सी प्रीमियम गेम खेलने नहीं आया था। उसे ₹20 और ₹50 के मास मार्केट में उतरना था।

यह जानना दिलचस्प है कि स्टिंग एनर्जी ड्रिंक खासतौर से इंडिया के लिए नहीं बनाई गई थी। यह पहले से ही पेप्सी के ग्लोबल पोर्टफोलियो का हिस्सा थी और साउथईस्ट एशिया के कई देशों में एक किफायती एनर्जी ड्रिंक के तौर पर बिक रही थी। पेप्सी ने इंडिया में स्टिंग एनर्जी ड्रिंक के कैन को ₹50 में और प्लास्टिक बोतल को सिर्फ ₹20 में बेचना शुरू किया। रेडबुल के ₹100 के मुकाबले यह एनर्जी ड्रिंक बेहद सस्ती थी। और जैसे ही यह प्राइस बैरियर टूटी लोग बिना ज्यादा सोचे इसे ट्राई करने लगे। किसी को टेस्ट पसंद आया तो किसी को मिलने वाली एनर्जी। और देखते ही देखते स्टिंग एनर्जी ड्रिंक ने उस रेडबुल को हिला दिया जो दस साल से मार्केट में राज कर रहा था।

स्टिंग एनर्जी ड्रिंक की सफलता के तीन बड़े पिलर्स

स्टिंग एनर्जी ड्रिंक की इस जीत के पीछे तीन बड़े पिलर्स थे जिन्हें समझे बिना यह कहानी अधूरी रहेगी।

पहला पिलर था कॉस्ट यूटिलाइजेशन। पेप्सी ने स्टिंग एनर्जी ड्रिंक को शुरू से ही एक मास प्रोडक्ट की तरह पेश किया। मतलब यह एनर्जी ड्रिंक लाखों नहीं बल्कि करोड़ों लोगों तक पहुंचनी थी। स्टिंग एनर्जी ड्रिंक को इंडिया में ही बड़े पैमाने पर बनाया गया। इसके लिए पेप्सी ने उन्हीं प्लांट्स और बॉटलिंग लाइन्स का इस्तेमाल किया जहाँ पेप्सी और मिरिंडा जैसी दूसरी सॉफ्ट ड्रिंक्स बनती थीं। अलग से कोई सेटअप नहीं लगाना पड़ा। इसका सीधा फायदा यह हुआ कि प्रोडक्शन कॉस्ट काफी कम हो गई। दूसरी तरफ रेडबुल काफी लंबे वक्त तक इम्पोर्टेड या लिमिटेड मैन्युफैक्चरिंग मॉडल पर टिका रहा जिसकी वजह से उसकी लागत हमेशा ज्यादा रही।

पैकेजिंग ने भी इस एनर्जी ड्रिंक की कॉस्ट को कम करने में बड़ा रोल निभाया। पेप्सी को पता था कि एलुमिनियम कैन देखने में प्रीमियम लगती है लेकिन होती महंगी है। इसीलिए उसने कैन के साथ-साथ प्लास्टिक की PET बोतलें भी चुनीं। यह बोतलें कैन के मुकाबले सस्ती और हल्की थीं। हल्की होने से ट्रांसपोर्टेशन भी सस्ता पड़ा और स्टोरेज भी आसान हुई। यही सारी छोटी-छोटी बचतें मिलकर स्टिंग एनर्जी ड्रिंक के फाइनल प्राइस को और नीचे ले आईं।

दूसरा पिलर था डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क। पेप्सी का डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क पहले से ही देश के कोने-कोने तक फैला हुआ था। जिन रूट्स से पेप्सी के दूसरे प्रोडक्ट्स जाते थे उन्हीं के साथ स्टिंग एनर्जी ड्रिंक भी जाने लगी। अलग से कोई लॉजिस्टिक सेटअप बनाने की जरूरत नहीं पड़ी। मतलब छोटे से छोटे गाँव की दुकान तक भी स्टिंग एनर्जी ड्रिंक आसानी से पहुँच गई जहाँ रेडबुल शायद कभी न पहुँची हो।

तीसरा पिलर था मार्केटिंग की समझ। स्टिंग एनर्जी ड्रिंक ने रेडबुल की तरह एक्सट्रीम स्पोर्ट्स और एलीट इमेज कॉपी करने की कोशिश नहीं की। बल्कि उसने इंडिया के छोटे शहरों और गाँव-कस्बों में रहने वाले युवाओं की भावनाओं को समझा। “एनर्जी बोले तो स्टिंग” जैसे स्लोगन सीधे लोगों के दिमाग में बैठ गए। अक्षय कुमार जैसे हाई एनर्जी पर्सनालिटी को ब्रांड एंबेसडर बनाया गया जो फिटनेस आइकॉन होने के साथ-साथ आम युवाओं से कनेक्ट भी करते हैं।

स्टिंग एनर्जी ड्रिंक बनाम रेडबुल: नंबर्स में फर्क

आज अगर नंबर्स में देखें तो वॉल्यूम के हिसाब से स्टिंग एनर्जी ड्रिंक इंडिया की एनर्जी ड्रिंक मार्केट का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा कंट्रोल करती है। रेडबुल जो कभी 70 प्रतिशत से ज्यादा एनर्जी ड्रिंक मार्केट पर राज करता था आज उसका शेयर सिमटकर सिर्फ 7 से 8 प्रतिशत के बीच रह गया है। यह स्टिंग एनर्जी ड्रिंक की जीत नहीं बल्कि एक पूरी बिजनेस स्ट्रेटजी की जीत है।

लेकिन इतनी बड़ी कामयाबी के बावजूद एक बड़ा सवाल बाकी रहता है।

छपरी ड्रिंक का टैग क्यों मिला स्टिंग एनर्जी ड्रिंक को

स्टिंग एनर्जी ड्रिंक को “गरीबों का रेडबुल” और “छपरियों की ड्रिंक” कहना असल में एनर्जी ड्रिंक की कमजोरी के बारे में नहीं बल्कि लोगों की सोच के बारे में बताता है।

रेडबुल ने एनर्जी ड्रिंक की एक ऐसी एक्सक्लूसिव इमेज बना रखी थी जिसे हर कोई अफोर्ड नहीं कर सकता था। इसलिए एनर्जी ड्रिंक का मतलब सिर्फ एनर्जी नहीं बल्कि स्टेटस भी बन गया था। फिर स्टिंग एनर्जी ड्रिंक ने आकर यह सोच बदल दी। अचानक एनर्जी ड्रिंक एक आम प्रोडक्ट बन गई। और यह इंसान की फितरत है कि जैसे ही कोई चीज कॉमन हो जाती है सोसाइटी उसकी वैल्यू को कम करने लगती है। फिर प्रॉब्लम उस प्रोडक्ट में नहीं बल्कि उसे खरीदने वाले लोगों में ढूंढी जाने लगती है।

यही चीज KTM बाइक के साथ भी हुई थी। जबरदस्त परफॉर्मेंस बाइक होने के बावजूद उसे “छपरी बाइक” का टैग मिल गया क्योंकि वो ज्यादा लोगों की पहुँच में आ गई। ठीक वैसे ही स्टिंग एनर्जी ड्रिंक के साथ हुआ।

पैकेजिंग और ब्रांडिंग ने भी इस परसेप्शन को बढ़ाया। रेडबुल की स्लिम मेटेलिक कैन प्रीमियम फील देती थी लेकिन स्टिंग एनर्जी ड्रिंक की चमकीली लाल बोतल दिखने में उतनी प्रीमियम नहीं लगती।

लेकिन कमाल की बात यह है कि जो चीज स्टिंग एनर्जी ड्रिंक के लिए मजाक का विषय बनी वही आज उसकी सबसे बड़ी ताकत भी है। “गरीबों का रेडबुल” का टैग असल में स्टिंग एनर्जी ड्रिंक को वह काम कर गया जो खुद रेडबुल कभी नहीं कर सका। रेडबुल एक खास वर्ग के लोगों की एनर्जी ड्रिंक बना रहा जबकि स्टिंग एनर्जी ड्रिंक पूरे भारत की एनर्जी ड्रिंक बन गई। और संख्याएं यही साबित करती हैं कि 90 प्रतिशत मार्केट शेयर किसी प्रीमियम एनर्जी ड्रिंक के बस की बात नहीं।

स्टिंग एनर्जी ड्रिंक की असली सीख

स्टिंग एनर्जी ड्रिंक की यह कहानी सिर्फ एक एनर्जी ड्रिंक की कहानी नहीं है। यह एक बिजनेस स्ट्रेटजी की कहानी है जो हमें बताती है कि किसी भी मार्केट में जीतने के लिए जरूरी नहीं कि आपका प्रोडक्ट सबसे महंगा हो या सबसे प्रीमियम हो। जरूरी यह है कि आप अपने टार्गेट कस्टमर को सही तरह से समझें और उन्हें सही कीमत पर सही प्रोडक्ट दें।

रेडबुल ने एनर्जी ड्रिंक को एलीट बनाया। स्टिंग एनर्जी ड्रिंक ने उसे आम लोगों तक पहुँचाया। रेडबुल ने स्टेटस बेचा। स्टिंग एनर्जी ड्रिंक ने असली एनर्जी बेची। और इंडिया जैसे देश में जहाँ ज्यादातर आबादी मध्यम वर्ग और निम्न-मध्यम वर्ग की है वहाँ यह स्ट्रेटजी काम करना तय था।

पेप्सी ने स्टिंग एनर्जी ड्रिंक के साथ जो किया वह बिजनेस की दुनिया में एक मास्टरक्लास है। सही टाइमिंग, सही कीमत, सही डिस्ट्रीब्यूशन और सही मार्केटिंग। इन चारों चीजों को एक साथ मिलाकर पेप्सी ने एनर्जी ड्रिंक मार्केट में वह कर दिखाया जो किसी ने सोचा भी नहीं था।

और आज जब कोई भी स्टिंग एनर्जी ड्रिंक को “गरीबों का रेडबुल” कहता है तो असल में वो बस यह बता रहा होता है कि इस एनर्जी ड्रिंक ने वह करोड़ों लोगों तक एनर्जी पहुँचाई जिन तक रेडबुल कभी नहीं पहुँच सकता था। और बिजनेस की भाषा में इसे ही असली जीत कहते हैं।

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