जब दो पड़ोसी आपस में लड़ते हैं, तो तीसरा पड़ोसी खामोश रहकर भी बहुत कुछ हासिल कर सकता है — यही आज की सबसे बड़ी भू-राजनीतिक वास्तविकता है।
🔥 जब बॉर्डर पर तोपें बोलने लगीं
दक्षिण एशिया के नक्शे पर इन दिनों एक ऐसी लड़ाई चल रही है, जो सिर्फ दो देशों के बीच की सरहदी जंग नहीं है। पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच जो हिंसक टकराव देखने को मिल रहा है, उसकी जड़ें इतिहास के उस अंधेरे कमरे में छुपी हैं, जहाँ दशकों पुराने फैसलों के नतीजे आज सड़कों पर बह रहे हैं।
ताज़ा स्थिति यह है कि दोनों देशों के बीच सरहद पर गोलाबारी, हवाई हमले और जमीनी झड़पें लगातार बढ़ रही हैं। दोनों तरफ से भारी नुकसान की खबरें आ रही हैं। अफगानिस्तान ने दावा किया है कि उनके लड़ाकों ने डूरंड लाइन के करीब पाकिस्तानी फौज को पीछे धकेला है, कई चौकियाँ अपने कब्जे में ली हैं और बड़े पैमाने पर सैनिक सामग्री हाथ लगाई है। उधर पाकिस्तान ने भी ऑपरेशन चलाकर जवाब देने की कोशिश की है।
ज़रूरी सवाल इस पूरे संघर्ष में एक तीसरा नाम बार-बार सामने आ रहा है — भारत। पाकिस्तान का आरोप है कि यह लड़ाई सिर्फ अफगान-पाक सीमा विवाद नहीं, बल्कि भारत की परोक्ष रणनीति का हिस्सा है। लेकिन सच्चाई क्या है, इसे समझने के लिए हमें इतिहास की परतें उघाड़नी होंगी।
🗺️ डूरंड लाइन: एक लकीर जिसने नफरत को जन्म दिया
साल 1893 में ब्रिटिश डिप्लोमेट सर मोर्टिमर डूरंड ने अफगान शासक के साथ एक समझौता किया और नक्शे पर एक लाइन खींच दी। यह करीब 2,600 किलोमीटर लंबी सीमा रेखा थी जो ब्रिटिश भारत और अफगानिस्तान को अलग करती थी। मकसद था — रूसी साम्राज्य के बढ़ते कदमों से ब्रिटिश भारत को बचाना।
लेकिन इस लाइन ने एक बड़ी त्रासदी को जन्म दिया। पश्तून कबीले, जो सदियों से एक ही भूमि पर रहते आए थे, अचानक दो हिस्सों में बंट गए। एक हिस्सा अफगानिस्तान में रहा, दूसरा ब्रिटिश भारत में — जो बाद में पाकिस्तान बना।
1947 में जब पाकिस्तान आजाद हुआ, तो पश्तूनों को सिर्फ दो विकल्प दिए गए — पाकिस्तान में शामिल हों या भारत में। एक स्वतंत्र पश्तूनिस्तान का कोई रास्ता नहीं था। यही वह घाव था जो आज तक ताज़ा है।
1947 : पूरी दुनिया में अकेला अफगानिस्तान था जिसने पाकिस्तान की संयुक्त राष्ट्र सदस्यता के विरुद्ध मतदान किया
2,600 km K डूरंड लाइन की लंबाई — जो आज भी दोनों देशों के बीच विवाद की सबसे बड़ी जड़ बनी हुई है
85% : पाकिस्तान की हिंसा की घटनाएँ मुख्यतः खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान में केंद्रित हैं
50 लाख+ : अफगान शरणार्थी जो पाकिस्तान में रह रहे हैं — और इस युद्ध में एक बड़ी आंतरिक चुनौती बन सकते हैं
⚙️ पाकिस्तान का वह खेल जो उलटा पड़ गया
1979 में सोवियत संघ ने अफगानिस्तान पर हमला किया। अमेरिका के लिए यह एक बड़ा खतरा था लेकिन सीधी जंग में उतरना जोखिम भरा था। इसलिए शुरू हुआ ऑपरेशन साइक्लोन — जिसमें अमेरिकी खुफिया एजेंसी ने पाकिस्तान को एक माध्यम के रूप में इस्तेमाल किया।
पाकिस्तान के लिए यह एक सुनहरा मौका था। एक तरफ अमेरिकी डॉलर और हथियार मिल रहे थे, दूसरी तरफ अफगानिस्तान के भीतर अपने वफादार गुट खड़े करने का अवसर था। पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ने अफगान सीमा के करीब अपनी जमीन पर प्रशिक्षण केंद्र खोले। वहाँ कई उग्रवादी संगठनों को तैयार किया गया — जिनका इस्तेमाल सोवियत सेना के खिलाफ और भविष्य में भारत के विरुद्ध करने की योजना थी।
1996 में यह मेहनत रंग लाई। काबुल में तालिबान ने सत्ता पर कब्जा कर लिया और पाकिस्तान ने सोचा — चेकमेट। लेकिन भू-राजनीति में कोई भी मोहरा हमेशा के लिए आज्ञाकारी नहीं रहता।
1979 : सोवियत संघ का अफगानिस्तान पर आक्रमण। पाकिस्तान ने अमेरिकी सहयोग से उग्रवादी प्रशिक्षण शुरू किया।
1996 : तालिबान ने काबुल पर कब्जा किया। पाकिस्तान को लगा उसकी रणनीति सफल हुई।
2001 : 9/11 के बाद अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमला किया। तालिबान सरकार गिरी, नेता पाकिस्तान भागे।
2007 : तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) का उदय — जो अब खुद पाकिस्तान के खिलाफ लड़ रही है।
2021 : अमेरिका अफगानिस्तान से निकला। तालिबान ने फिर से काबुल पर नियंत्रण किया।
2022–2026 : पाकिस्तान-अफगानिस्तान तनाव चरम पर। भारत-तालिबान संपर्क बढ़े। पाकिस्तान में बहुआयामी संकट।
जिन संगठनों को पाकिस्तान ने अपने हितों के लिए तैयार किया था, वे धीरे-धीरे उसके नियंत्रण से बाहर निकल गए। TTP यानी तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान ने पाकिस्तान के भीतर ही जिहाद छेड़ दिया। स्कूलों, बाजारों, सरकारी दफ्तरों पर हमले होने लगे। पाकिस्तान के फौजी और आम नागरिक दोनों निशाने पर आ गए। यह वही फ्रेंकेंस्टाइन था जिसे पाकिस्तान ने खुद बनाया था।
“रणनीति और राक्षस में एक ही फर्क होता है — रणनीति काबू में रहती है, राक्षस नहीं।”
पाकिस्तान के अफगान प्रयोग की सबसे बड़ी सीख
भारत की चुप्पी: कमज़ोरी नहीं, कूटनीति
2021 में तालिबान के दोबारा काबुल पर काबिज होने के बाद शुरुआत में भारत ने एक सतर्क दूरी बनाए रखी। तालिबान को आधिकारिक मान्यता नहीं दी। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उनकी आलोचना भी की। लेकिन महज एक साल के भीतर तस्वीर बदल गई।
2022 से भारत ने अफगानिस्तान को गेहूँ की बड़ी खेप भेजी। लाखों कोविड वैक्सीन और करोड़ों पोलियो वैक्सीन की डोज भेजी गई। जरूरी दवाइयाँ पहुँचाई गईं। बजट में अफगानिस्तान के लिए करोड़ों रुपए की अलग राशि का प्रावधान किया गया। मुंबई और हैदराबाद में अफगान वाणिज्य दूतावास खोलने की अनुमति दी गई।
यह सब तब हुआ जब पाकिस्तान खुद इतने गंभीर आर्थिक संकट में था कि वह अफगानिस्तान को कोई उल्लेखनीय मदद देने की स्थिति में नहीं था। विदेशी मुद्रा भंडार खतरनाक स्तर पर था, महंगाई 20-30 प्रतिशत की रेंज में पहुँच गई थी और देश IMF की मदद पर जिंदा था।
भारत की स्मार्ट पोजिशनिंग भारत ने न तो तालिबान की विचारधारा का समर्थन किया और न ही उनसे पूरी तरह कटा रहा। जब अफगानिस्तान को मदद की सबसे ज्यादा जरूरत थी, भारत वहाँ पहुँचा — और इसी ने अफगान जनमानस में भारत की छवि को और मजबूत किया। यह “soft power” का सबसे प्रभावी प्रयोग था।
🎭 तालिबान का अचानक पलटवार: कारण क्या हैं?
यह सवाल हर किसी के मन में है — वही तालिबान जिसे पाकिस्तान ने जन्म दिया, पाला-पोसा, जिसने दशकों तक पाकिस्तान की मुट्ठी में काम किया — वही तालिबान अब पाकिस्तान से क्यों भिड़ रहा है?
इसके कई कारण हैं। पहला, पश्तून जनजातीय पहचान। तालिबान के नेतृत्व में पश्तून बहुसंख्यक हैं। डूरंड लाइन के दोनों तरफ के पश्तून उनके अपने लोग हैं। जब पाकिस्तान इन इलाकों में सैन्य कार्रवाई करता है, तो यह तालिबान के लिए सिर्फ सरहदी विवाद नहीं — यह अपने कबीले पर हमला है।
दूसरा कारण, TTP यानी तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान के साथ तालिबान की सहानुभूति। तालिबान ने कभी भी TTP को आतंकी संगठन नहीं माना। जब पाकिस्तान ने TTP के खिलाफ कार्रवाई की माँग की और अफगानिस्तान पर उन्हें पनाह देने का आरोप लगाया, तो यह दरार और चौड़ी हो गई।
तीसरा कारण आर्थिक संप्रभुता की चाहत। सत्ता में आने के बाद तालिबान ने महसूस किया कि सिर्फ एक देश पर निर्भर रहना खतरनाक है। उन्होंने भारत, चीन, ईरान और खाड़ी देशों — सभी से संपर्क बढ़ाया। यह एक व्यावहारिक राजनीति थी, न कि वैचारिक बदलाव।
| पहलू | पाकिस्तान की स्थिति | तालिबान का रुख |
|---|---|---|
| डूरंड लाइन | वैध अंतरराष्ट्रीय सीमा मानता है | इसे कभी स्वीकार नहीं किया |
| TTP | आतंकी संगठन, कार्रवाई चाहता है | पश्तून भाई, सहानुभूति है |
| भारत से संबंध | दुश्मन राष्ट्र | संपर्क बढ़ाया, सहायता ली |
| आर्थिक निर्भरता | अफगानिस्तान पर दबाव बनाना चाहता है | विविध साझेदारी की नीति |
💥 पाकिस्तान का बहुआयामी संकट: एक साथ कई मोर्चे
आज पाकिस्तान जिस स्थिति में है, वह किसी एक संकट का नतीजा नहीं। यह दशकों की गलत नीतियों का संचित परिणाम है। बाहर से अफगानिस्तान का दबाव है, अंदर से कई मोर्चों पर आग लगी है।
बलूचिस्तान में बलोच लिबरेशन आर्मी (BLA) हर साल सैकड़ों हमले करती है। जनवरी 2026 में बीएलए ने एक ही दिन में पाकिस्तान के 48 इलाकों पर हमला किया — जिसे पाकिस्तान के इतिहास के सबसे बड़े समन्वित हमलों में से एक माना जा रहा है। बलूचिस्तान में अलगाव की माँग तब तक नहीं रुकेगी जब तक वहाँ के लोग खुद को पाकिस्तानी राज्य व्यवस्था का हिस्सा नहीं मानेंगे।
आर्थिक मोर्चे पर पाकिस्तान की हालत किसी से छुपी नहीं है। बिजली के बिल आसमान छू रहे हैं, महंगाई आम आदमी की कमर तोड़ रही है, और देश का नेतृत्व खुद स्वीकार करता है कि उन्हें दुनिया भर में हाथ फैलाने पड़ते हैं। IMF से बार-बार कर्ज लेना पाकिस्तान की नीयत नहीं, मजबूरी बन गई है।
इसके अलावा पीओके में भी असंतोष है। खैबर पख्तूनख्वा में TTP के हमले थमने का नाम नहीं ले रहे। यानी पाकिस्तान एक साथ कई मोर्चों पर उलझा हुआ है — और यह सब तब हो रहा है जब उसकी अफगानिस्तान से भी जंग छिड़ी हुई है।
🔍 भारत का कथित छुपा रोल: आरोप और वास्तविकता
पाकिस्तान और उसकी खुफिया एजेंसी का दावा है कि भारत तालिबान का इस्तेमाल एक अप्रत्यक्ष हथियार के रूप में कर रहा है। यह भी कहा जाता है कि अफगानिस्तान कथित रूप से पाकिस्तान में सक्रिय उन कश्मीरी उग्रवादियों के खिलाफ कार्रवाई का माध्यम बना हुआ है जो पाकिस्तान की शरण में हैं।
अमेरिकी खुफिया सूत्रों के हवाले से भी ऐसी रिपोर्टें सामने आई हैं जिनमें भारत पर तालिबान नेटवर्क के जरिए ऑपरेशन चलाने के आरोप हैं। हकानी गुट — जो कभी पाकिस्तान का सबसे भरोसेमंद अफगान साझेदार था — के अचानक तटस्थ हो जाने से पाकिस्तान में खलबली मच गई है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ने खुलकर कहा है कि हकानी गुट ने पाकिस्तान को धोखा दिया है।
लेकिन यहाँ एक बड़ा सवाल है — क्या इन दावों का कोई ठोस सार्वजनिक प्रमाण है? जवाब है — अभी तक नहीं। और शायद कभी होगा भी नहीं, क्योंकि इस तरह के गुप्त अभियान दशकों बाद सामने आते हैं।
महत्वपूर्ण तथ्य भारत आज भी आधिकारिक रूप से तालिबान को एक वैध सरकार के रूप में मान्यता नहीं देता। लेकिन इसके साथ ही उसने व्यावहारिक स्तर पर संपर्क और सहायता जारी रखी है। यह वही “strategic ambiguity” है जो बड़ी शक्तियाँ अक्सर अपनाती हैं।
भू-राजनीति में हर कदम के पीछे एक इरादा होता है। अगर हम प्रेरणाओं की पड़ताल करें — यानी इस पूरे संघर्ष से सबसे ज्यादा किसका फायदा है — तो जवाब स्पष्ट है। जब पाकिस्तान अपने पश्चिमी और उत्तरी मोर्चों पर उलझा है, तो उसके पूर्वी मोर्चे पर उसकी ऊर्जा और संसाधन कम हो जाते हैं। चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) पर बार-बार हो रहे हमले भी इसी बड़ी तस्वीर का हिस्सा हैं — एक परियोजना जिसे भारत हमेशा से अपनी संप्रभुता के लिए चुनौती मानता रहा है।
🌐 अफगान जनता का भारत-प्रेम: संयोग नहीं, इतिहास
अफगानिस्तान की आम जनता के बीच भारत के प्रति जो सहानुभूति है, वह कोई अचानक पैदा हुई भावना नहीं। इसकी जड़ें गहरी हैं। 1950 से लेकर 2021 तक, जब भी अफगानिस्तान में कोई लोकतांत्रिक या नागरिक सरकार रही, वह भारत के करीब रही। दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक, व्यापारिक और राजनयिक संबंध लंबे समय से रहे हैं।
भारत ने अफगानिस्तान में स्कूल, सड़कें, अस्पताल और बाँध बनाए। सलमा बाँध — जिसे “भारत-अफगानिस्तान मित्रता बाँध” भी कहा जाता है — उसकी एक मिसाल है। अफगान छात्र भारतीय विश्वविद्यालयों में पढ़ते रहे हैं। भारतीय टेलीविजन, संगीत और सिनेमा का अफगानिस्तान में व्यापक प्रभाव रहा है।
इसके विपरीत, पाकिस्तान के प्रति अफगान जनभावना ऐतिहासिक रूप से नकारात्मक रही है। डूरंड लाइन विवाद, पश्तूनिस्तान का सवाल, और दशकों की आपसी अविश्वास की राजनीति ने इस खाई को और गहरा किया है।
इसीलिए जब भारत ने मुश्किल वक्त में अफगानिस्तान को मदद दी, तो वह किसी खाली जमीन पर नहीं बल्कि पहले से तैयार उर्वर भूमि पर बोई गई फसल थी।
निष्कर्ष: संरचनात्मक लाभ बनाम छिपे हाथ
पाकिस्तान-अफगानिस्तान संघर्ष की इस पूरी तस्वीर में एक बात बिल्कुल स्पष्ट है — पाकिस्तान के 30 साल पुराने प्रयोग का नतीजा अब उसी के सामने आ खड़ा हुआ है। जिन शक्तियों को उसने औजार की तरह इस्तेमाल किया, वे अब उसके लिए बोझ बन गई हैं।
भारत के बारे में यह कहना कि उसने इस संघर्ष को “डिजाइन” किया — यह एक बड़ा दावा है जिसके लिए अभी तक कोई ठोस प्रमाण सार्वजनिक नहीं हुआ है। लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि भारत ने जो व्यावहारिक नीति अपनाई — मदद करना, संपर्क बनाए रखना, और किसी एक खेमे में खुलकर न जाना — उसने उसे एक बेहतर स्थिति में ला खड़ा किया है।
भू-राजनीति में “structural advantage” वह होता है जो आपको परिस्थितियाँ देती हैं — चाहे आपने उन्हें बनाया हो या नहीं। और आज पाकिस्तान के संकट से भारत को जो रणनीतिक राहत मिल रही है, वह चाहे संयोग हो या कूटनीति — उसके नतीजे बहुत वास्तविक हैं।
