क्या आपने कभी सोचा है कि दुनिया के सबसे इंटेलिजेंट लोग कभी-कभी इतनी बड़ी और स्टूपिड हरकतें क्यों करते हैं? क्यों इंटेलिजेंट लोग ऐसे फैसले लेते हैं जो किसी आम इंसान को भी अजीब लगें? यह सवाल सिर्फ एक जिज्ञासा नहीं है, बल्कि यह सवाल आपकी अपनी जिंदगी से सीधे जुड़ा हुआ है। इंटेलिजेंट लोग स्टूपिड हरकतें करते हैं, यह कोई इत्तेफाक नहीं है। इसके पीछे छुपा है दिमाग का एक गहरा राज, जिसे समझना हर इंसान के लिए जरूरी है।
दिमाग का सच: क्यों इंटेलिजेंट लोग स्टूपिड हरकतें करते हैं?
विटालिक ब्यूटेरिन ने सिर्फ 19 साल की उम्र में दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा क्रिप्टो नेटवर्क, इथेरियम, बना दिया। उनका IQ कुछ अनवेरिफाइड सोर्सेस के अनुसार 257 बताया जाता है। लेकिन जब वो लोगों के बीच होते हैं, तो सोशली काफी अजीब और ऑकवर्ड दिखते हैं। इसी तरह एलन मस्क को बड़े-बड़े फंक्शन में अपना सॉफ्टवेयर अपडेट करते देखा गया है। मार्क जुकरबर्ग को लोग अक्सर रोबोट क्यों बुलाते हैं? यह सब देखकर यही सवाल उठता है कि क्यों इंटेलिजेंट लोग स्टूपिड हरकतें करते हैं।
इस आर्टिकल में हम इसी सवाल का जवाब खोजेंगे। दिमाग की वायरिंग, कॉग्निटिव ट्रेड ऑफ, ब्लाइंड स्पॉट और न्यूरो डायवर्जेंस को समझेंगे। और सबसे जरूरी, आप अपने खुद के दिमाग का कॉग्निटिव टाइप पहचानना सीखेंगे।
दिमाग का सच: क्यों इंटेलिजेंट लोग स्टूपिड हरकतें करते हैं?
इंटेलिजेंस एक दो धारी तलवार है
इंटेलिजेंट लोग स्टूपिड हरकतें करते हैं क्योंकि इंटेलिजेंस कोई सीधा-सादा तोहफा नहीं है। यह एक दो धारी तलवार है जो एक तरफ से आपको ऊपर उठाती है और दूसरी तरफ से आप पर ही पलट सकती है। इतिहास में इसके कई उदाहरण हैं जो इंटेलिजेंट लोगों की स्टूपिड हरकतों को साबित करते हैं।
स्टीव जॉब्स को ही देखिए। आर्टिस्टिक जीनियस, सोशल मोज़ार्ड, जिनकी वजह से आज हर किसी के हाथ में Apple का मास्टरपीस है। लेकिन जब उन्हें कैंसर हुआ, तब यह इंटेलिजेंट इंसान क्या कर रहे थे? डॉक्टरों की चेतावनियों को नजरअंदाज करके एक्यूपंक्चर और फ्रूट डाइट से कैंसर ठीक करने की कोशिश कर रहे थे। जब तक उन्हें अपनी गलती रियलाइज हुई, कैंसर आखिरी स्टेज तक पहुंच चुका था। एक इतने जीनियस इंसान की मौत इतने बड़े पछतावे के साथ हुई।
दूसरा उदाहरण जैक पार्संस का है। नासा के सबसे काबिल इंजीनियर, जिनके बिना नासा चांद तक नहीं जा सकती थी। उन्होंने जेट प्रोपल्शन लैब फाउंड किया था। लेकिन रात को वही इंसान थलीमा धर्म के रिचुअल्स में डूबा रहता था, पाप की देवी बैबलोन को बुलाने की कोशिश करता था। 17 जून 1952 को उनकी लैब में एक धमाका हुआ और वो राख हो गए। एक हाई IQ इंसान ऐसे पैटर्न देखने लगा था जो असलियत में थे ही नहीं।
यही है वो सवाल जो इंटेलिजेंट लोगों की स्टूपिड हरकतों को समझाता है। क्या एक हाई IQ, पैटर्न-ऑब्सेस्ड दिमाग कभी-कभी ऐसे कनेक्शन भी देख लेता है जो असलियत में मौजूद ही नहीं होते?
दिमाग का सच: क्यों इंटेलिजेंट लोग स्टूपिड हरकतें करते हैं?
दिमाग का ब्लाइंड स्पॉट नंबर वन: कॉग्निटिव ट्रेड ऑफ
इंटेलिजेंट लोग स्टूपिड हरकतें करते हैं क्योंकि उनके दिमाग में एक ब्लाइंड स्पॉट होता है। यह ब्लाइंड स्पॉट कोई थ्योरी नहीं, बल्कि हार्डकोर न्यूरोबायोलॉजी है।
2 मिलियन से 2 लाख साल पहले, जंगल की लंबी रातों में, हमारे पूर्वजों का एक छोटा सा कबीला था। चारों तरफ मौत का खौफ था। दिमाग में सिर्फ एक मकसद था, जिंदा रहना। इसी मकसद को हासिल करने के लिए प्रकृति ने दिमाग में एक पावरफुल सॉफ्टवेयर भरा, और वो था डर।
डर प्रकृति का वो प्रेशर कुकर था जिसने हमारे पूर्वजों के दिमाग को मजबूर किया कि वो अलग-अलग रोल्स और बिहेवियर्स अपनाएं। इसी डर के दबाव में दिमाग चार अलग तरीकों से विकसित हुआ।
पहली कैटेगरी: टेक्निकल ब्रेन्स। ये वो पूर्वज थे जो चौकन्ने ऑब्जर्वर बन गए। नदी किनारे पैर के निशान दिखे तो खतरा समझ लिया, नुकीली चीज दिखी तो हथियार बना लिया। यह लॉजिक, पैटर्न रिकॉग्निशन और टेक्निकल बारीकी देखने वाले दिमाग थे। यही आगे चलकर न्यूटन, टेस्ला और रामानुजन बने।
दूसरी कैटेगरी: सोशल ब्रेन्स। ये वो पूर्वज थे जिन्होंने साथी बनाना सीखा। इमोशंस पढ़ना, जज्बात महसूस करना, अलायंसेस बनाना। यह फ्यूचर के पॉलिटिशियंस, एक्टर्स और लीडर्स बने।
तीसरी कैटेगरी: एक्सप्लोरर्स। ये वो पूर्वज थे जो डर को लांघकर नए रास्ते खोजने निकल पड़ते थे। अक्सर भटक जाते थे, लेकिन इन्हीं की वजह से पूरा कबीला सुरक्षा तक पहुंच पाता था। ये रिस्क टेकर्स और नोवेल्टी चेजर्स थे।
चौथी कैटेगरी: स्टेबलाइजर्स। ये वो पूर्वज थे जिनके लिए नए रास्ते खोजने से ज्यादा जरूरी था मौजूदा जिम्मेदारियों को निभाना। ड्यूटी और डिसिप्लिन इनकी भाषा थी। आग जलती रहे, हथियार धारधार रहें, सबका खाना-पानी हो। यह कबीले को ग्लू की तरह जोड़कर रखते थे।
यहाँ सबसे इंटरेस्टिंग बात यह है कि प्रकृति ने ये सारे ट्रेड्स एक साथ एक ही दिमाग में नहीं डाले। बल्कि ट्रेड-ऑफ्स में डाले। एक ट्रेड ज्यादा मिला तो दूसरा ऑटोमेटिकली कम हो गया। यही है कॉग्निटिव ट्रेड ऑफ। यही वो ब्लाइंड स्पॉट है जो इंटेलिजेंट लोगों को स्टूपिड हरकतें करवाता है।
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कॉम्पिटिटिव न्यूरल एलोकेशन: दिमाग की असली वायरिंग
कॉग्निटिव ट्रेड ऑफ सिर्फ पर्सनालिटी का मामला नहीं है। यह दिमाग में एक्चुअल स्ट्रक्चरल डिफरेंस पैदा करता है। न्यूरॉन्स जितने ज्यादा एक काम के लिए ऑप्टिमाइज्ड होते हैं, उतने ही दूसरे पाथवेज के न्यूरॉन्स ट्रिम और प्रून हो जाते हैं। इसे कॉम्पिटिटिव न्यूरल एलोकेशन कहते हैं।
इसी वजह से दिमाग दो बड़े स्पेक्ट्रम्स में विकसित हुआ।
पहला स्पेक्ट्रम: टेक्निकल ब्रेन vs सोशल ब्रेन। जितना ज्यादा दिमाग लॉजिकल रीजनिंग और टेक्निकल पैटर्न समझने में अच्छा होगा, उतना ज्यादा वो नेचुरली सोशल स्मार्टनेस में वीक होगा। और इसका उल्टा भी उतना ही सच है। इसे आज साइंस में सिस्टमाइजिंग ब्रेन vs मेंटलाइजिंग ब्रेन कहते हैं। एक चीजों के बीच के रिलेशंस पकड़ता है, दूसरा लोगों के इंटेंशंस पकड़ता है।
दूसरा स्पेक्ट्रम: एक्सप्लोरर ब्रेन vs स्टेबलाइजर ब्रेन। एक तरफ है डोपामिन-हैवी एक्सप्लोरर ब्रेन, जिसे नयापन चाहिए, रिस्क चाहिए। दूसरी तरफ है सेरोटोनिन-हैवी स्टेबलाइजर ब्रेन, जिसे सिक्योरिटी और कंसिस्टेंसी चाहिए। जितना ज्यादा एक्सप्लोरेशन का इंस्टिंक्ट, उतना कम स्टेबिलिटी पसंद।
यह एक जरूरी बात है। यह स्पेक्ट्रम्स दिमाग के बॉक्स नहीं हैं बल्कि डायरेक्शंस और डायमेंशंस हैं। इसका मतलब यह नहीं कि अगर टेक्निकल पैटर्न हंटिंग 80% है तो सोशल इंटेलिजेंस ऑटोमेटिकली 20% हो जाएगी। लेकिन मोस्टली वो सिग्निफिकेंटली कम डोमिनेंट होगी।
दिमाग का सच: क्यों इंटेलिजेंट लोग स्टूपिड हरकतें करते हैं?
न्यूरो डायवर्जेंस: डिफेक्ट नहीं, डिजाइन है
इंटेलिजेंट लोग स्टूपिड हरकतें करते हैं, यह समझने के लिए न्यूरो डायवर्जेंस को समझना जरूरी है। न्यूरो डायवर्जेंस वो है जब किसी का दिमाग न्यूरोटिपिकल स्टैंडर्ड से अलग तरीके से काम करता है।
प्रकृति ने न्यूरो डायवर्जेंस को एक डिजाइन की तरह विकसित किया, डिफेक्ट की तरह नहीं। जितने भी दिमाग हैं, वो सही एनवायरमेंट के लिए हथियार हैं और गलत एनवायरमेंट के लिए लायबिलिटी। लेकिन आज की सोसाइटी इस डिजाइन को डिफेक्ट की तरह देखती है। जो दिमाग सोसाइटी के करंट सिस्टम में फिट नहीं होता, उसे स्टूपिड कह दिया जाता है।
डिस्लेक्सिया को लर्निंग डिसेबिलिटी कहा जाता है। लेकिन टॉप 35% कंपनियों के CEOs में डिस्लेक्सिया है। ये लोग बड़ी-बड़ी कंपनियां चला सकते हैं लेकिन ठीक से पढ़ नहीं सकते। कितने तो एग्जाम्स में फेल होते थे।
ऑटिज्म को अक्सर डिसेबिलिटी कहा जाता है। लेकिन ऑटिज्म फंडामेंटली हेल्दी न्यूरो डायवर्जेंस की वजह से क्रिएट एक स्पेक्ट्रम है। हाई फंक्शनिंग ऑटिज्म परफेक्टली एडाप्टिव है। एलन मस्क, बिल गेट्स, मार्क जुकरबर्ग जैसे लोग इसी स्पेक्ट्रम पर हैं। बस एनवायरमेंट इनकी वायरिंग के खिलाफ नहीं होनी चाहिए।
ADHD को भी अक्सर गलत समझा जाता है। ये लोग एक्सप्लोरर ब्रेन के एक्सट्रीम पर होते हैं। इन्हें बस सही एनवायरमेंट चाहिए।
आइंस्टाइन की वो बात याद है? अगर आप किसी मछली को पेड़ चढ़ने की क्षमता से जज करोगे, तो वो मछली पूरी जिंदगी यह सोचती रहेगी कि वो स्टूपिड है। हम भी इंटेलिजेंट लोगों को गलत स्केल पर जज करते हैं और फिर सोचते हैं कि ये इंटेलिजेंट लोग स्टूपिड हरकतें क्यों करते हैं।
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विटालिक ब्यूटेरिन और दूसरे जीनियसेस: कहाँ फॉल करते हैं?
विटालिक ब्यूटेरिन ने 19 साल की उम्र में दूसरा सबसे बड़ा क्रिप्टो नेटवर्क बना दिया। ऑब्वियसली वो हेवीली टेक्निकल साइड पर हैं। इतना इंटेंस टेक्निकल दिमाग कॉग्निटिव ट्रेड ऑफ की वजह से सोशल स्पेक्ट्रम में कॉम्प्रोमाइज हो ही जाएगा, जब तक कि किसी स्पेशल तरीके से कंपेंसेट न किया जाए।
एलन मस्क ने खुद कंफर्म किया है कि उन्हें Asperger’s Syndrome है। इस कंडीशन में बंदा हेवीली टेक्निकल फोकस्ड होता है और सोशल स्किल्स बचपन से कॉम्प्रोमाइज हो जाती हैं। मस्क सैटर्डे नाइट लाइव होस्ट करने वाले पहले Asperger’s वाले इंसान बने।
बिल गेट्स की बेटी ने भी कंफर्म किया है कि उन्हें भी Asperger’s है। इसीलिए वो घंटों नहीं, बल्कि दिनों तक टेक्निकल काम कर सकते हैं। लेकिन सोशली वो उतने सहज नहीं।
रामानुजन को भी मैथ्स के पैटर्न दुनिया में इंट्यूटिवली दिखते थे। लेकिन लाइफ में वो काफी अकेले थे। न्यूटन और टेस्ला भी पैटर्न-ऑब्सेस्ड थे, और दोनों सोशली अकेले रहे।
यहीं पर एक पैराडॉक्स सामने आता है। सोशली इंटेलिजेंट लोग अपनी कैपेसिटी से कई ज्यादा इंटेलिजेंट लग सकते हैं। और टेक्निकल पैटर्न हंटर्स अपनी कैपेसिटी से कई ज्यादा बेवकूफ लग सकते हैं। एवोल्यूशन ने हमें ऐसा बनाया है कि हम कॉन्फिडेंस को सच्चाई से ज्यादा तवज्जो देते हैं। तभी तो पॉलिटिशियंस जनता को गोल-गोल घुमाकर चुनकर आ जाते हैं।
दिमाग का सच: क्यों इंटेलिजेंट लोग स्टूपिड हरकतें करते हैं?
प्रकृति ने जनरलाइजेशन क्यों नहीं चुना?
यहाँ एक बड़ा सवाल उठता है। प्रकृति ने सारे ट्रेड्स हमारे दिमाग में एक साथ क्यों नहीं भर दिए? हमें पॉलीमैथिक जीनियस क्यों नहीं बनाया?
इसके दो बड़े कारण हैं।
पहला कारण: एनर्जी कंजर्वेशन लॉ। दिमाग शरीर का सिर्फ 2% मास होने के बावजूद शरीर की 20% एनर्जी यूज करता है। यह एक हार्डवेयर लिमिटेशन है। दिमाग एक ही खूबी में मास्टर हासिल कर सकता था, सब में नहीं। इसीलिए ट्रेड ऑफ जरूरी था। “यूज इट ऑर लूज इट” वाला लॉजिक यहाँ काम करता है।
दूसरा कारण: एवोल्यूशन का वेरिएशन लॉ। सर्वाइव करने के लिए इंसान को वैरायटी चाहिए थी। एक कबीला जिसमें सब एक्सप्लोरर हों, भटककर मर जाएगा। सब स्टेबलाइजर हों तो सर्दियों में जम जाएंगे। सब सोशल हों तो शिकारी खा जाएंगे। सब टेक्निकल हों तो मिलकर काम नहीं कर पाएंगे।
न्यूरो डायवर्जेंस से इंसानों में कोऑपरेशन पॉसिबल हुआ। बिजनेस पार्टनरशिप्स में आज भी यही देखते हैं। स्टीव जॉब्स प्लस स्टीव वोजनिएक। बिल गेट्स प्लस स्टीव बॉलमर। एक टेक्निकल कोफाउंडर, एक सोशल/मार्केटिंग कोफाउंडर। न्यूरो डायवर्जेंस एक कोऑपरेशन का डिजाइन है।
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इंटेलिजेंस का असली कंट्रोल बटन
इंटेलिजेंट लोग स्टूपिड हरकतें करते हैं इसलिए भी क्योंकि वो अपने इंटेलिजेंस के ऊपर एक और लेयर को नहीं पहचानते। बचपन से यह नैरेटिव हमारे दिमाग में डाला गया है कि इंटेलिजेंस यानी कामयाबी। इंटेलिजेंस यानी पैसा, फेम और खुशी।
लेकिन सच यह है कि आपके इंटेलिजेंस के ऊपर एक अपस्ट्रीम कंट्रोल बटन है। यह कंट्रोल बटन डिसाइड करता है कि आप अपनी बुद्धि की वजह से दुनिया जीतोगे या बर्बाद होगे। इंटेलिजेंस बस एक मैग्नीफायर है। असली कंट्रोलर कोई और है।
यह इनविजिबल कंट्रोल बटन सबसे बड़ा ब्लाइंड स्पॉट है। इसीलिए स्टीव जॉब्स की एक गलती ने उन्हें कैंसर से जकड़ लिया। जैक पार्संस की एक गलती ने उन्हें राख कर दिया। इंटेलिजेंस ने इन्हें बचाया नहीं, बल्कि इनकी गलतियों को और बड़ा कर दिया।
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आप कौन हो? अपने दिमाग का कोड डिकोड करो
अब सबसे जरूरी सवाल। आप कौन हो? टेक्निकल ब्रेन या सोशल ब्रेन? एक्सप्लोरर या स्टेबलाइजर? या एक रेयर हाइब्रिड जो इतिहास बना सकता है?
अपने दिमाग का बेस कोड न समझने की वजह से ही इंटेलिजेंट लोग स्टूपिड हरकतें करते हैं। वो उस मछली की तरह हो जाते हैं जो जिंदगी भर पेड़ चढ़ने की कोशिश करती रहती है।
इस आर्टिकल के लेखक ने जब खुद अपनी कॉग्निटिव वायरिंग को समझा कि उनकी वायरिंग Asperger’s Syndrome से काफी मेल खाती है, तब अचानक उनकी पूरी जिंदगी समझ में आ गई। सिस्टमाइजिंग कोशेंट में उनका स्कोर 90 था जबकि एवरेज 40 होता है। ऑटिज्म स्पेक्ट्रम टेस्ट में 32, बॉर्डरलाइन पर, जबकि न्यूरोटिपिकल्स का 18 होता है।
एक कॉमर्स स्टूडेंट होकर भी साइंस के क्रेजी वीडियोस बनाना, साइंस को अपनी लाइफ में ऑब्सेसिवली यूज करना, चीजों की गहराइयों में घुसना, इन सबका एक ही कारण था। लॉजिक उनके लिए ऑक्सीजन था। साइंटिफिक सोच उनका ऑपरेटिंग सिस्टम था।
लेकिन स्कूल के मेमोराइजेशन-बेस्ड एग्जाम्स में वो बुरे थे। सोशल स्किल्स, स्टोरीटेलिंग एबिलिटी, लोगों में इमोशंस क्रिएट करना, यह सब उन्होंने समय के साथ डेवलप किया। यही साइको माइंडसेट है।
नसीब था कि उन्होंने अपनी वायरिंग के हिसाब से सही करियर चुना। इसीलिए उन्हें डीसेंट लेवल का सक्सेस मिला। उन्हें समझने में सालों लगे कि वो गलत नहीं थे, गलत जगह थे।
Asperger’s उनके काम में डिसऑर्डर नहीं बल्कि एडवांटेज बन गया।
दिमाग का सच: क्यों इंटेलिजेंट लोग स्टूपिड हरकतें करते हैं?
इंटेलिजेंट लोग स्टूपिड हरकतें करते हैं: असली कारण सारांश में
अब इस पूरे विश्लेषण को एक जगह जोड़ते हैं।
इंटेलिजेंट लोग स्टूपिड हरकतें करते हैं क्योंकि उनके दिमाग में कॉग्निटिव ट्रेड ऑफ की वजह से एक ब्लाइंड स्पॉट होता है। वो एक डायमेंशन में बेहद मजबूत होते हैं और दूसरे डायमेंशन में कमजोर। जब उन्हें उस कमजोर डायमेंशन में डिसीजन लेना पड़ता है, तो उनकी इंटेलिजेंस काम नहीं करती।
जैसे स्टीव जॉब्स टेक्निकल और क्रिएटिव जीनियस थे, लेकिन मेडिकल डिसीजन में उन्होंने इमोशनल ब्रेन से काम लिया। पैसों के डिसीजंस में कई लोग इमोशनल ब्रेन को स्विच ऑफ नहीं कर पाते। रिजल्ट यह होता है कि इन्वेस्टमेंट लॉजिक से नहीं, बल्कि इंस्टिंक्ट से हो जाती है।
इंटेलिजेंस ऑब्जेक्टिव नहीं होती, एनवायरमेंटल होती है। एग्जाम पेपर्स और IQ टेस्ट आपकी इंटेलिजेंस के जज नहीं हैं। प्रकृति और रियलिटी आपकी इंटेलिजेंस की जज है।
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लाओत्से का सबक और एनलाइटनमेंट
लाओत्से का वो फेमस कोट है, “जो दूसरों को जानता है वो बुद्धिमान है। लेकिन जो खुद को जानता है वो एनलाइटेंड है।”
दिमाग सबके पास है। लेकिन जो इसे समझदारी से यूज करता है, इतिहास उसका नाम चिल्लाता है। और जो नहीं करता, वो खामोशी में ही खुद खत्म हो जाता है।
इंटेलिजेंट लोग स्टूपिड हरकतें करते हैं क्योंकि वो खुद को नहीं जानते। वो अपनी वायरिंग नहीं समझते। वो सोचते हैं कि उनका इंटेलिजेंस उन्हें हर सिचुएशन में सही गाइड करेगा। लेकिन इंटेलिजेंस सिर्फ एक मैग्नीफायर है। अगर कंट्रोल बटन सही दिशा में नहीं है, तो इंटेलिजेंस गलतियों को भी मैग्नीफाई कर देती है।
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अपने इंटेलिजेंस टाइप को पहचानो
अपने दिमाग का इंटेलिजेंस टाइप डिकोड करना बेहद जरूरी है। इसके लिए एक बेसिक स्क्रीनिंग टेस्ट का रास्ता अपनाएं। साइंटिफिक ग्रेड क्वेश्चंस का जवाब दें जो आपके थिंकिंग स्टाइल एलाइनमेंट को समझने में मदद करें।
दो बातें याद रखें। एक, क्वेश्चंस को ईमानदारी से आंसर करें। दो, वो ऑप्शन चुनें जो आप नेचुरली हैं, अनफिल्टर्ड। वो नहीं जो आप बनना चाहते हैं या जो आप खुद पर फोर्स करते हैं।
टेस्ट को कम से कम तीन बार, अलग-अलग समय पर दें ताकि बायसेस कम हो सके। अगर हाई न्यूरो डायवर्जेंस आए, जैसे ADHD, ऑटिज्म, डिस्लेक्सिया, तो एक प्रॉपर साइंटिफिक ग्रेड टेस्ट भी करवाएं। अगर 100% कन्फर्मेशन चाहिए, तो फिजिकली एक क्लीनिकल असेसमेंट भी करवा सकते हैं।
इन दो सिंपल स्टेप्स में आप अपने इंटेलिजेंस टाइप को समझ जाएंगे। और इससे आपके लाइफ के डिसीजंस 10 गुना बेहतर हो जाएंगे।
दिमाग का सच: क्यों इंटेलिजेंट लोग स्टूपिड हरकतें करते हैं?
निष्कर्ष: इंटेलिजेंट लोग स्टूपिड हरकतें क्यों करते हैं?
तो अब आप जानते हैं कि क्यों इंटेलिजेंट लोग स्टूपिड हरकतें करते हैं। इसका जवाब है कॉग्निटिव ट्रेड ऑफ, जो प्रकृति ने खुद डिजाइन किया। हर दिमाग किसी एक डायमेंशन में मजबूत है और दूसरे में कमजोर। यह कमजोरी उनका ब्लाइंड स्पॉट बन जाती है।
इंटेलिजेंट लोग स्टूपिड हरकतें करते हैं जब वो अपने ब्लाइंड स्पॉट को नहीं पहचानते। जब उन्हें लगता है कि उनकी एक डायमेंशन की इंटेलिजेंस हर जगह काम करेगी। लेकिन इंटेलिजेंस एनवायरमेंटल होती है। सही एनवायरमेंट में वो जीनियस हैं, गलत एनवायरमेंट में वो लायबिलिटी।
न्यूरो डायवर्जेंस डिफेक्ट नहीं, डिजाइन है। Asperger’s, ADHD, Dyslexia, ये सब कमजोरियां नहीं, बल्कि किसी खास एनवायरमेंट के लिए हथियार हैं।
और सबसे बड़ा सबक यह है कि जो इंसान खुद को जानता है, वो ही असल में एनलाइटेंड है। अपनी वायरिंग को समझो। अपने ब्लाइंड स्पॉट को पहचानो। और अपने दिमाग के इस ग्लिच को रिवर्स करो। तभी इंटेलिजेंट लोग स्टूपिड हरकतें करना बंद करते हैं, और दुनिया बदलना शुरू करते हैं।
दिमाग का सच: क्यों इंटेलिजेंट लोग स्टूपिड हरकतें करते हैं?
