कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर एक ही विषय की धूम मची है — ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट। कोई इसे पेड़ों का कत्ल बता रहा है, कोई आदिवासियों के अधिकारों की दुहाई दे रहा है, और कोई इसे सरकार का राजनीतिक हथकंडा बता रहा है। लेकिन जब पूरा इंटरनेट एक ही सुर में बोलने लगे, तो थोड़ा रुककर सोचना ज़रूरी हो जाता है। यह भीड़ इतनी एक्टिव क्यों है? क्या सच में यह प्रोजेक्ट भारत के लिए हानिकारक है, या फिर यह उन लोगों का एजेंडा है जो नहीं चाहते कि भारत एक समुद्री महाशक्ति बने?
इस लेख में हम ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को पूरी तरह समझने की कोशिश करेंगे — बिना किसी पूर्वाग्रह के, सिर्फ तथ्यों और तर्क के आधार पर।
ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट आखिर है क्या?
ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट एक विशाल “इंटीग्रेटेड टाउनशिप” योजना है जो 149 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैली होगी। पूरे ग्रेट निकोबार द्वीप का कुल क्षेत्रफल लगभग 900 वर्ग किलोमीटर है, यानी इस प्रोजेक्ट के लिए द्वीप का सिर्फ एक छोटा हिस्सा ही इस्तेमाल होगा। इसमें रिहायशी, व्यावसायिक और रक्षा से जुड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर शामिल होगा।
इस प्रोजेक्ट में एक ट्रांस-शिपमेंट हार्बर (ICTP) होगा जो गैलाथिया खाड़ी में बनेगा। साथ ही एक दोहरे इस्तेमाल वाला अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा होगा जहाँ से नागरिक और सैन्य दोनों प्रकार के ऑपरेशन किए जा सकेंगे। ऊर्जा के लिए गैस और सोलर पावर का उपयोग होगा ताकि बाहर पर निर्भरता कम हो। इस प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत 81,000 करोड़ रुपये है। यह हवाई अड्डा इंडोनेशिया से मात्र 148 किलोमीटर की दूरी पर होगा, जिससे भारत की “एक्ट-ईस्ट” नीति को एक ठोस ज़मीनी आधार मिलेगा।
आर्थिक आत्मनिर्भरता की सबसे बड़ी ज़रूरत
शायद आपको यह जानकर हैरानी हो, लेकिन आज भी भारत का 75 प्रतिशत ट्रांस-शिप कार्गो कोलंबो (श्रीलंका) या सिंगापुर के रास्ते आता-जाता है। इसका मतलब यह है कि हमारे व्यापारी हर साल लगभग 1.5 अरब करोड़ रुपये श्रीलंका और सिंगापुर को अतिरिक्त शुल्क के रूप में देते हैं।
यह पैसा हमारे देश का है, हमारे व्यापारियों की मेहनत का है — और यह दूसरे देशों की जेब में जा रहा है। गैलाथिया खाड़ी में बनने वाला ट्रांस-शिपमेंट हार्बर इस निर्भरता को खत्म करेगा। यह बंदरगाह भारत को आत्मनिर्भर बनाएगा और व्यापार की लागत भी घटाएगा।
इसके अलावा, दुनिया का 30 से 40 प्रतिशत कंटेनर ट्रैफिक इसी छोटे से समुद्री इलाके से होकर गुज़रता है। अगर हम यहाँ एक मज़बूत बंदरगाह बना लें, तो भारत सिर्फ एक उपभोक्ता नहीं, बल्कि एक रणनीतिक व्यापारिक केंद्र बन जाएगा।
चीन की “मोतियों की माला” — भारत की घेराबंदी
अगर आप नक्शा उठाकर देखें, तो आपको एहसास होगा कि पिछले 20 सालों में चीन ने भारत को चारों ओर से घेरने की एक सुनियोजित रणनीति अपनाई है। इसे “स्ट्रिंग ऑफ़ पर्ल्स” यानी “मोतियों की माला” कहते हैं।
अफ्रीका में जिबूती, पाकिस्तान में ग्वादर, श्रीलंका में हंबनटोटा और म्यांमार में क्याकफू — इन सभी जगहों पर चीन ने अपनी नौसैनिक उपस्थिति बना ली है। यह महज संयोग नहीं है। यह एक बड़ी रणनीति का हिस्सा है, जिसका मकसद हिंद महासागर में भारत को कमज़ोर करना है।
चीन की नौसेना, जिसे PLAN कहते हैं, आज दुनिया की सबसे बड़ी नौसैनिक शक्ति है। उनके पास तीन विमानवाहक पोत, 50 से ज़्यादा डिस्ट्रॉयर, 150 फ्रिगेट, 68 पनडुब्बियाँ जिनमें से 12 परमाणु हैं, और 80 से अधिक एम्फीबियस मशीनें हैं। उनकी पनडुब्बियाँ नियमित रूप से हिंद महासागर में गश्त करती हैं।
और सिर्फ यही नहीं — चीन के रिसर्च जहाज़ श्रीलंका के हंबनटोटा बंदरगाह में लगातार मौजूद रहते हैं। जब भारत कोई मिसाइल परीक्षण करता है और “नो-फ्लाई ज़ोन” घोषित होता है, तो ये जहाज़ डेटा इकट्ठा करने के लिए हिंद महासागर में मंडराने लगते हैं।
कोको द्वीप — भारत की नाक के नीचे चीन की आँख
म्यांमार के पास स्थित कोको द्वीप समूह अंडमान द्वीप से केवल 150-200 किलोमीटर की दूरी पर है। 1990 के दशक में म्यांमार ने चीन के साथ एक समझौता किया जिसके तहत चीन को इन द्वीपों पर गतिविधियाँ चलाने की अनुमति मिली।
उपग्रह तस्वीरों से पता चलता है कि चीन ने वहाँ एक हवाई पट्टी बनाई है, रडार और संचार उपकरण लगाए हैं। भारत ने इस पर आपत्ति जताई है, लेकिन चीन म्यांमार की सेना का आर्थिक और कूटनीतिक समर्थन करता है, इसलिए भारत के विरोध का कोई खास असर नहीं हुआ।
हाल ही में इंडोनेशिया की लोम्बोक जलसंधि में चीन का एक पानी के नीचे काम करने वाला जासूसी सेंसर मिला था, जो टॉरपीडो जैसा दिखता था। यह सेंसर समुद्र के नीचे की गतिविधियों की जानकारी चीन को भेजता था। कोई नहीं जानता कि हिंद महासागर में ऐसे कितने सेंसर बिछे हुए हैं।
मलक्का जलडमरूमध्य — चीन की सबसे बड़ी कमज़ोरी
यहाँ एक दिलचस्प मोड़ आता है। चीन दुनिया का सबसे बड़ा तेल आयातक देश है और अपनी ज़रूरत का 80 प्रतिशत तेल मलक्का जलडमरूमध्य के रास्ते मँगाता है। चीन के पूर्व राष्ट्रपति हू जिंताओ ने खुद इसे “मलक्का दुविधा” का नाम दिया था। उनका कहना था कि किसी भी समय उनकी नौसेना की घेराबंदी हो सकती है।
यह बात आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज है। अब सोचिए — जब खुद चीन अपनी इस कमज़ोरी को मानता है, तो क्या भारत को इस रणनीतिक स्थान का लाभ नहीं उठाना चाहिए? और ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट ठीक इसी उद्देश्य को पूरा करता है।
भारतीय नौसेना ने साल 2016 में ही पहचाना था कि मलक्का जलडमरूमध्य एक वैश्विक रणनीतिक “चोकपॉइंट” है। नौसेना ने इस प्रोजेक्ट की ज़रूरत के 46 से ज़्यादा कारण गिनाए हैं, जिनमें क्षेत्रीय अखंडता, EEZ की सुरक्षा, पनडुब्बी-रोधी अभियान और आतंकवाद-विरोधी ऑपरेशन शामिल हैं।
डिएगो गार्सिया — एक चेतावनी जो हमें सुननी चाहिए
डिएगो गार्सिया, चागोस द्वीपसमूह का सबसे बड़ा द्वीप है, जो पहले मॉरीशस का हिस्सा था। जब मॉरीशस को आज़ादी मिली, तो ब्रिटेन ने चागोस द्वीप अपने पास रखे और बाद में अमेरिका को सैन्य अड्डे के लिए दे दिए।
1965 से 1973 के बीच, वहाँ रहने वाले 1,500-2,000 निवासियों को जबरन निकाला गया। आपूर्ति जहाज़ रोके गए, लोगों के पालतू जानवर उनके सामने मारे गए, और आखिर में उन्हें मॉरीशस और सेशेल्स भेज दिया गया — बिना एक पैसे के मुआवज़े के।
आज वहाँ अमेरिका का एक विशाल सैन्य अड्डा है जहाँ से वह खाड़ी देशों, अफ्रीका, चीन और भारत — सभी पर नज़र रखता है।
यह उदाहरण इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि निकोबार द्वीप भारत की संप्रभुता के अधीन हैं। वहाँ रहने वाले शोम्पेन आदिवासी भारतीय नागरिक हैं। इस प्रोजेक्ट में किसी को जबरन निकाला नहीं जा रहा। लेकिन अगर हम इस द्वीप पर मज़बूत इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं बनाते और युद्ध की स्थिति में कोई बड़ी शक्ति इस पर दावा करती है, तो हमारे पास कोई जवाब नहीं होगा।
पर्यावरण और विकास का संतुलन
यह सच है कि ग्रेट निकोबार द्वीप पारिस्थितिक रूप से बेहद संवेदनशील है। यहाँ दुर्लभ वनस्पतियाँ और जीव-जंतु हैं। लेकिन प्रश्न यह नहीं है कि यह प्रोजेक्ट होना चाहिए या नहीं — प्रश्न यह है कि इसे इस तरह कैसे किया जाए कि पर्यावरण को कम से कम नुकसान हो।
900 वर्ग किलोमीटर के द्वीप में से केवल 149 वर्ग किलोमीटर का उपयोग हो रहा है। पूरे द्वीप को समतल नहीं किया जा रहा। अगर सख्त पर्यावरणीय नियमों के साथ यह प्रोजेक्ट आगे बढ़े, तो विकास और प्रकृति का संतुलन बनाया जा सकता है।
“विकास की आड़ में विनाश” जैसे नारों से भावनाएँ तो भड़कती हैं, लेकिन देश का भला नहीं होता। ऐसे नारे दुश्मनों के एजेंडे को आगे बढ़ाते हैं, भारत के हितों को नहीं।
विश्वसनीय प्रतिरोधक क्षमता — युद्ध से बचने का सबसे बढ़िया तरीका
“क्रेडिबल डिटरेंस” यानी विश्वसनीय प्रतिरोधक क्षमता का मतलब है — सामने वाले को यह पता हो कि अगर उसने कोई गलत कदम उठाया, तो आप वहाँ पहुँचकर उसे रोकने में सक्षम हैं। यह क्षमता जितनी ज़्यादा होगी, उतनी ही कम संभावना होगी कि कोई दुस्साहस करे।
लेफ्टिनेंट जनरल KJS ढिल्लों ने कहा है कि ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट हिंद महासागर के भू-रणनीतिक समुद्री क्षेत्र में एक “गेम चेंजर” साबित होगा। यह प्रोजेक्ट लंबी दूरी की गश्त करने वाले विमानों को आधार देगा और पूरे हिंद महासागर में भारत की निगाह बनाएगा।
पाकिस्तान के संदर्भ में भी यह प्रासंगिक है। पाकिस्तानी सेना प्रमुख ने खुलेआम कहा है कि अगली बार भारत पर हमला पूरब की तरफ से होगा जहाँ भारत के सबसे कीमती संसाधन हैं। ऐसे में हिंद महासागर में हमारी मज़बूत मौजूदगी एक ज़रूरी ढाल बन जाती है।
भारत का भौगोलिक लाभ — इसे गँवाना नहीं चाहिए
भारत के पास 7,500 किलोमीटर लंबी तटरेखा है। अंडमान-निकोबार द्वीप हिंद महासागर में रणनीतिक रूप से इतने महत्वपूर्ण हैं जितना कोई सोच भी नहीं सकता। मध्य-पूर्व अपने तेल का इस्तेमाल एक हथियार की तरह करता है। अमेरिका अपनी सैन्य और आर्थिक शक्ति को हथियार बनाता है। चीन व्यापार और शिपिंग पर नियंत्रण रखता है।
भारत के पास भी यह भौगोलिक लाभ है — और ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट इस लाभ को असली ताकत में बदलने की कोशिश है। इसे “भावनात्मक ब्लैकमेल” से रोकना भारत के हितों के साथ धोखा होगा।
निष्कर्ष: यह सिर्फ एक प्रोजेक्ट नहीं, एक सवाल है
ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट का सवाल असल में यह है कि भारत अपनी समुद्री सुरक्षा को कितनी गंभीरता से लेना चाहता है। सरकारें बदलती रहती हैं, लेकिन देश की सुरक्षा ज़रूरतें नहीं बदलतीं। यह प्रोजेक्ट किसी एक पार्टी का नहीं, बल्कि भारतीय नौसेना की ज़रूरत है। यह देश की आर्थिक आत्मनिर्भरता की माँग है।
जो लोग हर विकास को रोकने के लिए एक नया बहाना ढूँढते हैं, उनसे न तो भारतीय नौसेना का तर्क बदलेगा और न ही भारत की रणनीतिक ज़रूरत। ज़रूरत है कि हम पर्यावरण संरक्षण के ठोस उपायों की माँग करें, आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करें — लेकिन यह सब करते हुए ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को तेज़ी से आगे बढ़ाएँ।
क्योंकि जिस दिन यह प्रोजेक्ट पूरा होगा, उस दिन हिंद महासागर में भारत की आवाज़ और भी बुलंद होगी।
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