आईओ चंद्रमा: जुपिटर के इस ज्वालामुखी चांद का सच जानकर चौंक जाएंगे

आईओ चंद्रमा: जुपिटर के इस ज्वालामुखी चांद का सच जानकर चौंक जाएंगे

आईओ चंद्रमा: जुपिटर के इस ज्वालामुखी चांद का सच जानकर चौंक जाएंगे

दिसंबर 2023 का महीना। NASA का जूनो स्पेसक्राफ्ट पिछले 7 सालों से जुपिटर का चक्कर लगा रहा था। मिशन लगभग खत्म होने वाला था, फ्यूल बहुत कम बचा था। कुछ ही महीनों में यह प्रोब हमेशा के लिए बंद हो जाता। लेकिन बंद होने से पहले NASA ने एक आखिरी बड़ा फैसला किया — जूनो को जुपिटर के सबसे करीब वाले आईओ चंद्रमा की तरफ भेज दो।

जूनो सिर्फ 1500 किलोमीटर की दूरी से आईओ चंद्रमा के ऊपर से गुजरा। यह दूरी इतनी कम है जितना दिल्ली से बोर तक का रास्ता। इतने करीब से पहले कभी किसी स्पेसक्राफ्ट ने आईओ चंद्रमा को नहीं देखा था। लेकिन जब जूनो ने आईओ चंद्रमा की फोटो और डेटा धरती पर भेजना शुरू किया, तो NASA की पूरी टीम हैरान रह गई। जो वहाँ हो रहा था, वो किसी ने एक्सपेक्ट नहीं किया था।

यह सिर्फ एक बार की बात नहीं थी। जूनो ने फरवरी 2024 में एक बार फिर आईओ चंद्रमा के पास से उड़ान भरी, फिर दिसंबर 2024 में एक और फ्लाईबाय किया। और हर बार डेटा और ज्यादा अजीब और हैरान करने वाला आता गया। हर बार वैज्ञानिकों के सवाल और बड़े और डरावने होते गए।

तो आखिरकार NASA ने आईओ चंद्रमा पर ऐसा क्या देख लिया जो वहाँ होना ही नहीं चाहिए था? आज हम स्टेप बाय स्टेप जानेंगे कि जूनो ने आईओ चंद्रमा पर क्या-क्या देखा और क्यों हर बार नए डेटा ने पुराने सवालों को और भी उलझा दिया।

आईओ चंद्रमा को समझने से पहले — जुपिटर के 115 चांद

आईओ चंद्रमा की कहानी समझने के लिए पहले जुपिटर को समझना जरूरी है। जुपिटर हमारे सोलर सिस्टम का सबसे बड़ा ग्रह है और अप्रैल 2026 तक जुपिटर के आसपास 115 चांद घूम रहे हैं। इनमें से चार चांद बहुत बड़े हैं जिन्हें गैलीलियन मून्स कहा जाता है। यह नाम इसलिए पड़ा क्योंकि 1610 में इटैलियन वैज्ञानिक गैलीलियो ने अपने छोटे टेलिस्कोप से इन्हें सबसे पहले देखा था।

इन चार में सबसे बाहर वाला है कैलिस्टो। उसके बाद है गनीमेड जो पूरे सोलर सिस्टम का सबसे बड़ा चांद है। फिर है यूरोपा जिसकी बर्फीली सतह के नीचे पानी का पूरा समुद्र छुपा हो सकता है और जहाँ एलियन लाइफ की सबसे ज्यादा संभावना मानी जाती है। और फिर सबसे अंदर, जुपिटर से सिर्फ 3500 किलोमीटर दूर है आईओ चंद्रमा।

आईओ चंद्रमा साइज में हमारी धरती के चांद से थोड़ा ही बड़ा है। लेकिन एक चीज है जो आईओ चंद्रमा को पूरे सोलर सिस्टम में सबसे अलग बनाती है।

आईओ चंद्रमा — पानी नहीं, लेकिन 400 से ज्यादा ज्वालामुखी

आईओ चंद्रमा पर पानी नहीं है। मतलब बिल्कुल भी नहीं। वैज्ञानिक कहते हैं कि यह सोलर सिस्टम की सबसे सूखी जगह है। मर्करी से भी ज्यादा सूखी जो सूरज के सबसे पास है।

सामान्य सोच से तो यह लगता है कि कोई जगह इतनी सूखी हो, सूरज से इतनी दूर हो, तो वहाँ सब कुछ जमा हुआ, बंजर और पहाड़ी होगा। कोई हलचल नहीं। लेकिन आईओ चंद्रमा पर बिल्कुल उल्टा है। आईओ चंद्रमा के ऊपर 400 से ज्यादा ज्वालामुखी हैं — और ये सब एक्टिव हैं। यही बात आईओ चंद्रमा को पूरे सोलर सिस्टम का सबसे ज्यादा ज्वालामुखी सक्रिय चांद बनाती है।

सवाल यह उठता है कि सूरज से इतनी दूर, इतनी सूखी जगह पर यह ज्वालामुखी ऊर्जा आती कहाँ से है? धरती पर तो ज्वालामुखी टेक्टोनिक प्लेट्स की हलचल से बनते हैं। क्या वहाँ भी ऐसा कुछ है? जवाब है नहीं।

जुपिटर की ग्रेविटी — आईओ चंद्रमा को पिघलाने वाली ताकत

आईओ चंद्रमा के ज्वालामुखी बनते और फटते हैं जुपिटर की गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण। यह हिस्सा बेहद दिलचस्प है।

जुपिटर इतना बड़ा ग्रह है कि उसकी ग्रेविटी बहुत ही ताकतवर है। यह ग्रेविटी आईओ चंद्रमा को खींचती है। लेकिन सिर्फ जुपिटर नहीं — दूसरी तरफ से यूरोपा और गनीमेड भी अपनी ग्रेविटी से आईओ चंद्रमा को खींच रहे हैं। एक तरफ जुपिटर खींच रहा है, दूसरी तरफ दूसरे बड़े चांद खींच रहे हैं।

इस वजह से आईओ चंद्रमा का जुपिटर के चारों ओर कक्षा गोल नहीं रहती। थोड़ा अंडे जैसी बन जाती है। यानी आईओ चंद्रमा कभी जुपिटर के बहुत करीब आता है, कभी थोड़ा दूर चला जाता है। और यह चक्र हर 42 घंटे में दोहराता रहता है।

इसका असर आईओ चंद्रमा पर बेहद डरावना है। जब आईओ चंद्रमा जुपिटर के करीब आता है तो जुपिटर की ग्रेविटी आईओ की जमीन को 100 मीटर ऊपर खींच लेती है। और जब आईओ दूर जाता है तो वो जमीन वापस 100 मीटर नीचे चली जाती है।

यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि यह पानी नहीं है जो ऊपर-नीचे हो रहा है। यह ठोस पत्थर की जमीन है — और वो 100 मीटर ऊपर उठ रही है। वह भी हर कुछ घंटों के बाद, बार-बार, लगातार अरबों सालों से। जैसे समुद्र में ज्वार-भाटा आता है, वैसे ही आईओ चंद्रमा पर पत्थर में ज्वार आती है हर 42 घंटे में। इस उठने-गिरने में इतनी ऊर्जा बनती है कि आईओ चंद्रमा के अंदर का पत्थर पिघल जाता है और यही पिघला हुआ पत्थर ज्वालामुखियों से बाहर निकलता है।

वॉयेजर वन — जब इंसानों ने पहली बार देखा आईओ चंद्रमा के ज्वालामुखी

यह सब सिर्फ थ्योरी नहीं है। इंसानों ने यह अपनी आँखों से देखा है। साल 1979 में NASA का वॉयेजर वन स्पेसक्राफ्ट जुपिटर सिस्टम से गुजर रहा था। जब उसने आईओ चंद्रमा की तरफ कैमरा किया तो एक हैरान करने वाली चीज दिखी। वॉयेजर ने एक साथ नौ ज्वालामुखी फटते हुए देखे।

यह पहली बार था जब इंसानों ने धरती के अलावा किसी और जगह पर ज्वालामुखी को फटते हुए देखा। उससे पहले सबको लगता था कि इतनी दूर की जगह तो जमी हुई और मृत होगी। आईओ चंद्रमा ने यह सोच तोड़ दी।

वॉयेजर के बाद आईओ चंद्रमा को करीब से देखने का मौका बहुत कम मिला। NASA का गैलीलियो स्पेसक्राफ्ट 1995 से 2003 तक जुपिटर सिस्टम में था और उसने कुछ डेटा भेजा। लेकिन ठीक से क्लोज-अप फोटोज के लिए वैज्ञानिकों को 20 साल और इंतजार करना पड़ा। और यह इंतजार दिसंबर 2023 में खत्म हुआ।

जूनो का पहला फ्लाईबाय — आईओ चंद्रमा ने उड़ाए होश

जब जूनो पहली बार आईओ चंद्रमा से 1500 किलोमीटर ऊपर से गुजरा और जो उसने देखा उसने NASA के वैज्ञानिकों के होश उड़ा दिए।

सबसे पहले जूनो ने आईओ चंद्रमा का नॉर्थ पोल और साउथ पोल कैप्चर किया। पहले के मिशन सिर्फ बीच का हिस्सा देख पाए थे। लेकिन जूनो ने दिखाया कि आईओ चंद्रमा पर ज्वालामुखी सिर्फ बीच में नहीं हैं, बल्कि हर तरफ फैले हुए हैं — ऊपर भी, नीचे भी, हर जगह आग ही आग है।

फिर जूनो ने एक ऐसी चीज कैप्चर की जिसे देखकर पूरी दुनिया हैरान हो गई।

स्टीपल माउंटेन — आईओ चंद्रमा का अनोखा पहाड़

NASA की टीम ने एक पहाड़ को निकनेम दिया “स्टीपल माउंटेन।” यह नीचे से ऊपर को जाता एक नुकीला पहाड़ है जो 5 से 7 किलोमीटर ऊंचा है। NASA ने इसका एक 3D मॉडल भी बनाया जो देखने में किसी एलियन प्लैनेट का दृश्य जैसा लगता है।

दिलचस्प बात यह है कि यह पहाड़ ज्वालामुखी से नहीं बना। और यह सिर्फ एक पहाड़ नहीं है। आईओ चंद्रमा पर 100 से 150 ऐसे पहाड़ हैं जिनकी औसत ऊंचाई 6 किलोमीटर है। इनमें सबसे ऊंचा है बुजोल माउंटेन जो लगभग 17.5 किलोमीटर ऊंचा है। यानी यह माउंट एवरेस्ट से दो गुने से भी ज्यादा ऊंचा है।

ये पहाड़ धरती जैसे नहीं बने। ये असल में जमीन के अंदर से उखड़े हुए पत्थर के बड़े-बड़े टुकड़े हैं।

यह कैसे होता है? आईओ चंद्रमा की सतह पर हर वक्त ज्वालामुखियों से नया लावा जमा होता रहता है। यह नया लावा जम जाता है और पुरानी जमीन को नीचे धकेलता है। जब पुरानी जमीन नीचे जाती है तो वहाँ दबाव बहुत बढ़ जाता है और उस दबाव में पत्थर के बड़े-बड़े टुकड़े जमीन फोड़कर ऊपर आ जाते हैं। जैसे कोई चीज नीचे दबाओ तो पास से कुछ ऊपर उछल जाए।

और ये पहाड़ अकेले खड़े होते हैं। धरती पर जैसे पर्वत श्रृंखलाएं होती हैं वैसा यहाँ कुछ नहीं। बस एक अकेला बड़ा पहाड़ खड़ा हुआ है। कोई पैटर्न नहीं, कोई चेन नहीं। यह आईओ चंद्रमा का अपना सिस्टम है — नया लावा ऊपर, पुरानी जमीन नीचे, और बीच में पहाड़ उखड़कर बाहर।

लोकी पेटेरा — आईओ चंद्रमा का लावा का समुद्र

जूनो ने आईओ चंद्रमा पर एक और चीज देखी जो शायद इस पूरी कहानी की सबसे डरावनी चीज है। आईओ चंद्रमा पर एक झील है, लेकिन पानी की नहीं बल्कि पिघले हुए लावा की। इसका नाम है लोकी पेटेरा।

लोकी पेटेरा 200 किलोमीटर बड़ी है। इतनी बड़ी कि अगर यह भारत में होती तो दिल्ली से जयपुर तक का क्षेत्र ढक लेती। इसके बीच में एक द्वीप है जमे हुए पत्थर का। और उस द्वीप के चारों तरफ गर्म पिघला हुआ लावा घूम रहा है।

जूनो के डेटा से पता चला कि इस लावा लेक की सतह कुछ जगह इतनी स्मूद है कि वो शीशे की तरह चमकती है। जरा सोचो — एक ऐसी जगह पर जहाँ सब कुछ जल रहा है, वहाँ लावा का एक झील शीशे की तरह प्रकाश को रिफ्लेक्ट कर रहा है।

दिसंबर 2024 — आईओ चंद्रमा के इतिहास का सबसे बड़ा विस्फोट

आईओ चंद्रमा की असली कहानी तो दिसंबर 2024 में शुरू हुई जब जूनो ने एक और फ्लाईबाय किया। इस बार थोड़ा दूर से, लगभग 74,000 किलोमीटर दूर से। लेकिन उसका इंफ्रारेड कैमरा आईओ चंद्रमा के साउथ पोल की तरफ था।

जब डेटा आया तो NASA के वैज्ञानिकों के होश उड़ गए। आईओ चंद्रमा के साउथ पोल के पास एक बेहद बड़ा विस्फोट रिकॉर्ड किया गया। जिस ज्वालामुखी हॉटस्पॉट ने यह बनाया वो लगभग 1 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ था। सीधे शब्दों में — 400 किलोमीटर लंबा और 200 किलोमीटर चौड़ा।

अगर यह भारत में होता तो दिल्ली से जयपुर तक लंबा और दिल्ली से आगरा तक चौड़ा होता।

और यह इतना गर्म और ताकतवर था कि जूनो का इंस्ट्रूमेंट ओवरलोड हो गया। इंस्ट्रूमेंट की लिमिट ही खत्म हो गई इतनी ऊर्जा रिकॉर्ड करते-करते। NASA ने इसे आईओ चंद्रमा की पूरी इतिहास का सबसे बड़ा ज्वालामुखी इवेंट घोषित किया।

यह कितनी ऊर्जा थी? धरती के सारे पावर प्लांट मिलकर जितनी बिजली बनाते हैं, उसे छह से गुणा करो — उतनी ऊर्जा यह एक विस्फोट रिलीज कर रहा था। एक छोटे से चांद पर, सूरज से इतनी दूर।

यह एक अकेला ज्वालामुखी नहीं था। डेटा से पता चला कि यह कई ज्वालामुखी थे जो एक साथ एक ही समय पर फट रहे थे और ये सब एक-दूसरे से जमीन के नीचे जुड़े हुए थे। यानी आईओ चंद्रमा के नीचे एक ऐसा सिस्टम है जहाँ गर्म पिघला हुआ लावा एक जगह से दूसरी जगह अंडरग्राउंड रास्ते से फ्लो करता है।

सबसे बड़ा सवाल — क्या आईओ चंद्रमा के नीचे मैग्मा का महासागर है?

यहाँ एक बहुत बड़ा सवाल खड़ा हुआ। क्या इसका मतलब यह है कि आईओ चंद्रमा के नीचे पूरा मैग्मा ओशियन है? यानी पूरी सतह के नीचे पिघला हुआ पत्थर ही पत्थर है — जैसे पानी का समुद्र, लेकिन पत्थर का?

यह विचार तार्किक भी लगता था। इतने सारे ज्वालामुखी हैं तो नीचे सब पिघला हुआ ही होगा। लेकिन दिसंबर 2024 में नेचर जर्नल में एक रिसर्च पेपर प्रकाशित हुआ जिसने इस धारणा को पलट दिया।

जब वैज्ञानिकों ने जूनो के डेटा से मापा कि जुपिटर की ग्रेविटी आईओ चंद्रमा को कितना खींचती है और उसे कितना मोड़ती है, तो एक सीधी बात सामने आई। अगर नीचे पिघला हुआ समुद्र है तो आईओ चंद्रमा बहुत ज्यादा लचीला होगा। जैसे पानी भरे गुब्बारे को दबाओ तो वो आसानी से शेप बदल लेता है। लेकिन अगर अंदर ठोस है तो उतना लचीला नहीं होगा।

और डेटा ने बताया कि आईओ चंद्रमा उम्मीद से ज्यादा सख्त है। अंदर का हिस्सा ज्यादातर ठोस है। कोई अंडरग्राउंड मैग्मा ओशियन नहीं है।

जूनो मिशन के हेड साइंटिस्ट स्कॉट बोल्टन ने दिसंबर 2024 की प्रेस कॉन्फ्रेंस में सीधे कहा कि यह सवाल हम बहुत समय से पूछ रहे थे कि क्या आईओ चंद्रमा के नीचे मैग्मा ओशियन है, और अब हमें इसका जवाब मिल गया है और जवाब है नहीं।

नई मिस्ट्री — फिर 400 से ज्यादा ज्वालामुखी क्यों?

अब आपको लगेगा कि मिस्ट्री सॉल्व हो गई। लेकिन असल में इस खोज से मिस्ट्री और बड़ी हो गई।

अगर नीचे मैग्मा ओशियन है ही नहीं तो आईओ चंद्रमा पर 400 से ज्यादा ज्वालामुखी क्यों हैं? रिकॉर्ड तोड़ विस्फोट क्यों हो रहे हैं? जिसके बारे में वैज्ञानिकों का कहना है कि आईओ चंद्रमा का अंदरूनी हिस्सा स्पंज जैसे स्ट्रक्चर वाला है।

जहाँ अलग-अलग जगह पर अलग-अलग पॉकेट्स हैं जिनमें पिघला हुआ लावा भरा हुआ है। यह कोई महासागर नहीं है बल्कि छोटे-छोटे लावा पॉकेट्स हैं। हर ज्वालामुखी का अपना अलग लावा पॉकेट सोर्स है। जुपिटर की ग्रेविटी आईओ चंद्रमा के स्ट्रक्चर में अलग-अलग जगह पत्थर को पिघलाती है, जिससे ये लावा पॉकेट्स बनती हैं और जब ये भर जाती हैं तो वहाँ से विस्फोट होता है।

और वह दिसंबर 2024 का बड़ा विस्फोट? वैज्ञानिकों का कहना है कि वह साल 2026 में अभी भी जारी है और महीनों से लगातार लावा और राख बाहर निकाल रहा है।

आईओ चंद्रमा के लिए कोई नया मिशन नहीं

आईओ चंद्रमा इतनी दिलचस्प जगह है तो NASA जरूर कोई नया मिशन भेजेगा। लेकिन यहाँ एक बुरी खबर है।

जूनो के बाद जो दो नए मिशन जुपिटर सिस्टम के लिए जा रहे हैं, उनमें से किसी का भी टारगेट आईओ चंद्रमा नहीं है। पहला मिशन है JUICE, जो यूरोपियन स्पेस एजेंसी ने 2023 में लॉन्च किया और 2031 में जुपिटर पहुंचेगा। लेकिन इसका काम है बर्फीली दुनियाएं यानी गनीमेड, कैलिस्टो और यूरोपा को स्टडी करना।

दूसरा मिशन है NASA का यूरोपा क्लिपर, जो 2024 में लॉन्च हुआ और 2030 में यूरोपा पहुंचेगा। इसका काम है यह देखना कि यूरोपा पर जीवन के लिए सही परिस्थितियाँ हैं या नहीं। वैज्ञानिकों को इससे बड़ी उम्मीदें हैं क्योंकि शायद यूरोपा के छुपे हुए समुद्र में एलियन लाइफ मिल जाए।

लेकिन आईओ चंद्रमा के लिए दोनों मिशन में नाम तक नहीं है। इसकी वजह सीधी है — आईओ चंद्रमा पर पानी नहीं है, जिससे वहाँ जीवन के आसार लगभग शून्य हैं। और स्पेस एजेंसियाँ पहले उन जगहों पर जाना चाहती हैं जहाँ जीवन के सबसे ज्यादा आसार हों।

शायद भविष्य में यूरोपा के बाद कोई स्पेस एजेंसी आईओ चंद्रमा को समझने के लिए कोई मिशन प्लान करे। क्योंकि संभव है कि इस ज्वालामुखियों से भरी दुनिया ने हमसे अभी भी कई रहस्य छुपाए हुए हैं।

आईओ चंद्रमा — एक अजूबी दुनिया का सारांश

आईओ चंद्रमा वो जगह है जहाँ ठोस जमीन समुद्र की तरह ऊपर-नीचे होती है। जहाँ 400 से ज्यादा ज्वालामुखी हर वक्त फट रहे हैं। जहाँ पहाड़ रातों-रात जमीन फोड़कर बाहर आ जाते हैं। जहाँ 200 किलोमीटर का लावा लेक शीशे की तरह चमकता है। जहाँ एक विस्फोट पूरी दुनिया के सारे पावर प्लांट से छह गुना ज्यादा ऊर्जा रिलीज करता है।

आईओ चंद्रमा हमें याद दिलाता है कि सोलर सिस्टम में अभी भी बहुत कुछ है जो हम नहीं जानते। हर नया डेटा नए सवाल लेकर आता है। और यही बात स्पेस साइंस को इतना रोमांचक बनाती है।

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