5 अगस्त 2019 की सुबह भारत के संविधान से जुड़ा एक ऐसा अध्याय बंद हुआ जो करीब सात दशकों से बहस, राजनीति और संघर्ष के केंद्र में रहा था। अनुच्छेद 370 और अनुच्छेद 35(A) को हटाकर जम्मू-कश्मीर की विशेष संवैधानिक स्थिति खत्म कर दी गई। यह फैसला रातों-रात नहीं लिया गया था। इसके पीछे सालों की योजना, कानूनी बारीकियां और राजनीतिक कदम छिपे थे। इस लेख में हम समझेंगे कि अनुच्छेद 370 आया कैसे था, इसका मतलब क्या था, और आखिरकार इसे किस प्रक्रिया के तहत हटाया गया।
यह ध्यान रखना जरूरी है कि इस विषय पर अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं के लोगों की राय बहुत अलग है। कुछ लोग इसे राष्ट्रीय एकता की दिशा में जरूरी कदम मानते हैं, तो कुछ इसे संवैधानिक प्रक्रिया और जम्मू-कश्मीर की जनता की सहमति को नजरअंदाज करने वाला फैसला बताते हैं। इस लेख में हम दोनों पक्षों की बात को समझने की कोशिश करेंगे, न कि किसी एक नजरिए को सही या गलत ठहराने की।
आजादी से पहले: रियासतों की व्यवस्था
आजादी से पहले भारत का नक्शा आज जैसा नहीं था। अंग्रेज इस पूरे क्षेत्र पर दो तरीकों से शासन करते थे। एक हिस्से पर अंग्रेजों का सीधा शासन था, जिसे ब्रिटिश इंडिया कहा जाता था। दूसरा हिस्सा रियासतों का था, जहां स्थानीय राजा या निजाम शासन करते थे, लेकिन रक्षा, विदेश मामले और संचार जैसे विषय अंग्रेजों के अधीन रहते थे। जम्मू-कश्मीर, हैदराबाद और जोधपुर जैसी करीब 565 रियासतें उस वक्त मौजूद थीं।
2 जून 1947 को अंग्रेजों ने माउंटबेटन प्लान पेश किया, जिसके तहत ब्रिटिश इंडिया का बंटवारा धार्मिक जनसंख्या के आधार पर भारत और पाकिस्तान में होना था। इस प्लान में रियासतों को यह आजादी दी गई कि वे भारत या पाकिस्तान में से किसी एक के साथ जुड़ें, या चाहें तो स्वतंत्र रहें। 18 जुलाई 1947 को यह प्लान “इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट” के नाम से पारित हुआ, और 14-15 अगस्त 1947 को भारत और पाकिस्तान आजाद हुए।
ज्यादातर रियासतें सरदार वल्लभभाई पटेल और मोहम्मद अली जिन्ना की कोशिशों से किसी न किसी देश में मिल गईं, लेकिन तीन रियासतें, जूनागढ़, हैदराबाद और जम्मू-कश्मीर, एक अलग तरह की उलझन में फंसी थीं। जूनागढ़ और हैदराबाद में मुस्लिम शासक थे लेकिन बहुसंख्यक आबादी हिंदू थी, जबकि जम्मू-कश्मीर में हिंदू शासक था लेकिन बहुसंख्यक आबादी मुस्लिम थी।
जूनागढ़ के नवाब ने शुरू में पाकिस्तान के साथ विलय की घोषणा की, लेकिन भारत ने सैन्य दबाव बनाया और आखिरकार फरवरी 1948 में जनमत संग्रह कराया गया, जिसमें 99% से ज्यादा लोगों ने भारत के साथ जुड़ने का समर्थन किया। हैदराबाद के निज़ाम स्वतंत्र रहना चाहते थे, लेकिन उनकी निजी सेना रजाकार के अत्याचारों के बाद भारत ने सितंबर 1948 में “ऑपरेशन पोलो” के तहत सैन्य कार्रवाई की, और दो दिनों में हैदराबाद भारत में मिल गया।
जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय
जम्मू-कश्मीर की करीब 77% आबादी मुस्लिम थी, जबकि वहां के महाराजा हरि सिंह हिंदू थे। राज्य के अंदर लंबे समय से असंतोष भी था, 1931 में शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व में महाराजा के खिलाफ बड़ा आंदोलन हुआ था, जिसमें लोकतंत्र की मांग उठी। शेख अब्दुल्ला ने आगे चलकर नेशनल कॉन्फ्रेंस पार्टी बनाई, और जवाहरलाल नेहरू के साथ उनकी करीबी दोस्ती भी विकसित हुई।
आजादी के वक्त महाराजा हरि सिंह न तो भारत के साथ जाना चाहते थे, न पाकिस्तान के साथ, वे स्वतंत्र रहना चाहते थे। उन्होंने दोनों देशों को स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट का प्रस्ताव दिया, जिसे पाकिस्तान ने स्वीकार किया लेकिन भारत ने नहीं। कुछ ही समय बाद पाकिस्तान ने कश्मीर की तरफ आपूर्ति रोक दी और कबायली हमलावरों को श्रीनगर की तरफ भेज दिया। जब महाराजा को लगा कि स्थिति उनके नियंत्रण से बाहर हो रही है, तो उन्होंने भारत से मदद मांगी। भारत ने कहा कि बिना विलय पत्र (इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन) पर हस्ताक्षर के मदद संभव नहीं। 26 अक्टूबर 1947 को महाराजा हरि सिंह ने इस पर हस्ताक्षर किए, और जम्मू-कश्मीर भारत का हिस्सा बन गया। इसके साथ ही नेहरू जी ने महाराजा से शेख अब्दुल्ला को रिहा कर उन्हें प्रधानमंत्री नियुक्त करने का आग्रह भी किया।
अगले दिन भारतीय सेना कश्मीर में उतारी गई और घुसपैठियों को खदेड़ना शुरू किया। यह लड़ाई आगे चलकर भारत-पाकिस्तान युद्ध में बदल गई, और भारत सरकार ने यह मामला संयुक्त राष्ट्र (UN) के सामने रखा। जनवरी 1949 में युद्धविराम हुआ और जहां दोनों सेनाएं रुकीं, वहीं नियंत्रण रेखा (LoC) बन गई। UN ने प्रस्ताव दिया कि पाकिस्तान पहले अपनी सेना हटाए, फिर भारत, और उसके बाद जनमत संग्रह से तय हो कि जम्मू-कश्मीर किसके साथ रहेगा। लेकिन पाकिस्तान ने कभी अपनी सेना नहीं हटाई, इसलिए जनमत संग्रह की शर्त कभी पूरी नहीं हुई। भारत के इस फैसले पर, कि मामला UN में क्यों ले जाया गया, आज भी इतिहासकारों के बीच बहस होती है। कुछ इसे नेहरू जी की एक बड़ी रणनीतिक चूक मानते हैं, तो कुछ का तर्क है कि सैन्य ताकत से किया गया विलय स्थायी समाधान नहीं होता और जूनागढ़-हैदराबाद जैसे मामलों में पाकिस्तान के दावे को मजबूती मिल सकती थी।
अनुच्छेद 370 क्यों और कैसे बना
जिस वक्त जम्मू-कश्मीर का दर्जा तय करने पर चर्चा चल रही थी, भारत का संविधान भी साथ-साथ बन रहा था। संविधान सभा में जम्मू-कश्मीर के प्रतिनिधियों को भी शामिल किया गया, लेकिन जम्मू-कश्मीर की अपनी संविधान सभा या संविधान अभी तैयार नहीं हुआ था। विलय पत्र में यह साफ लिखा था कि रक्षा, विदेश मामले और संचार को छोड़कर भारत का संविधान जम्मू-कश्मीर पर थोपा नहीं जाएगा।
इसी उलझन को सुलझाने के लिए गोपालस्वामी अयंगर ने एक अस्थायी प्रावधान का सुझाव दिया, जिसे अनुच्छेद 370 का रूप दिया गया। इसके तहत भारतीय संविधान के सिर्फ दो अनुच्छेद, अनुच्छेद 1 (जो जम्मू-कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बताता है) और अनुच्छेद 370 खुद, जम्मू-कश्मीर पर लागू होते थे। बाकी विषयों पर कानून बनाने के लिए भारत सरकार को जम्मू-कश्मीर सरकार की सहमति के बाद राष्ट्रपति के आदेश की जरूरत होती थी। अनुच्छेद 370 में यह भी लिखा था कि इसे हटाने के लिए जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा की सिफारिश जरूरी होगी। लेकिन आगे चलकर जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा ने अपना काम पूरा करने के बाद खुद को भंग कर दिया, जिससे यह सवाल उठा कि अगर भविष्य में इसे हटाना हो, तो सिफारिश कौन देगा।
यह प्रावधान भारत के संविधान के भाग 21 में रखा गया, जहां अस्थायी और संक्रमणकालीन प्रावधान होते हैं। यह इसलिए भी अस्थायी माना गया क्योंकि उस वक्त यह उम्मीद थी कि जनमत संग्रह के बाद स्थिति साफ हो जाएगी।
अनुच्छेद 35(A) और दिल्ली समझौता
जम्मू-कश्मीर पर भारत के बाकी संवैधानिक प्रावधान, जैसे सुप्रीम कोर्ट, चुनाव आयोग, बैंकिंग व्यवस्था लागू करने के लिए नेहरू जी और शेख अब्दुल्ला के बीच कई दौर की बातचीत हुई, जिसे “दिल्ली समझौता” कहा गया। इस दौरान शेख अब्दुल्ला ने अलग झंडा, अलग प्रधानमंत्री पद (सद्र-ए-रियासत) और 1927 के “स्टेट सब्जेक्ट लॉ” को बनाए रखने की मांग रखी। यह कानून महाराजा हरि सिंह ने 1927 में लागू किया था, ताकि बाहर से आने वाले लोग जम्मू-कश्मीर में जमीन न खरीद सकें और सरकारी नौकरी न पा सकें, जिससे राज्य की स्थानीय पहचान बनी रहे।
नेहरू जी ने इन मांगों को मान लिया, हालांकि इसे लेकर आलोचना भी हुई कि यह भारत के बाकी नागरिकों के साथ एक तरह का भेदभाव है, क्योंकि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 सभी नागरिकों के लिए समानता की बात करते हैं। बहरहाल, इसी समझौते के आधार पर अनुच्छेद 370 के तहत अनुच्छेद 35(A) जोड़ा गया, जो जम्मू-कश्मीर के “स्थायी निवासी” से जुड़े विशेष अधिकारों को सुरक्षा देता था। 1954 में तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने एक राष्ट्रपति आदेश जारी कर, जम्मू-कश्मीर सरकार की सहमति से, इसे लागू किया।
यहां एक दिलचस्प राजनीतिक मोड़ भी आया। जिस वक्त अनुच्छेद 35(A) पर बातचीत चल रही थी, शेख अब्दुल्ला का रुख बदलने लगा था। खुफिया रिपोर्टों के हवाले से कहा जाता है कि वे पाकिस्तान से भी बातचीत करने लगे थे। इसी दौरान उन पर तथाकथित “कश्मीर षड्यंत्र मामले” के तहत आरोप लगे और उन्हें पद से हटा दिया गया। उनके बाद बख्शी गुलाम मोहम्मद मुख्यमंत्री बने, और उन्हीं के कार्यकाल में अनुच्छेद 35(A) को अंतिम रूप दिया गया।
आगे के दशकों में 1954 के राष्ट्रपति आदेश में कई बार संशोधन किए गए, जिनके जरिए भारत के संविधान के ज्यादातर प्रावधान धीरे-धीरे जम्मू-कश्मीर पर लागू होते गए। भारत के संविधान की संघ सूची में मौजूद 97 में से 94 विषय अलग-अलग संशोधनों के जरिए जम्मू-कश्मीर पर लागू कर दिए गए थे। यही वजह है कि जब भी इस विषय पर बहस होती है, तो अक्सर यह कहा जाता है कि 1954 के राष्ट्रपति आदेश से पहले और बाद की स्थिति में जमीन-आसमान का फर्क आ चुका था।
दशकों का संघर्ष
आगे के वर्षों में जम्मू-कश्मीर कई बड़ी घटनाओं का गवाह बना, भारत-चीन युद्ध, भारत-पाकिस्तान युद्ध, और पाकिस्तान समर्थित उग्रवाद और छद्म युद्ध। इन घटनाओं में हजारों लोगों की जान गई, जिनमें आम नागरिक और भारतीय सेना के जवान दोनों शामिल थे। इसी दौर में जम्मू-कश्मीर की जनसांख्यिकी और राजनीतिक हालात में भी बड़े बदलाव आए, जिनका जिक्र किए बिना अनुच्छेद 370 की पूरी कहानी अधूरी रहेगी।
इसी दौर की एक बेहद अहम और दर्दनाक घटना 1989-90 के आसपास कश्मीरी पंडितों का घाटी से पलायन है। बढ़ते उग्रवाद और हिंसा की धमकियों के बीच लाखों कश्मीरी पंडित परिवारों को अपना घर-बार छोड़कर जम्मू, दिल्ली और देश के दूसरे हिस्सों में शरण लेनी पड़ी। यह घटना आज भी जम्मू-कश्मीर से जुड़ी नीतियों और अनुच्छेद 370 पर होने वाली बहस में बार-बार सामने आती है, क्योंकि कई लोग मानते हैं कि विशेष दर्जे से जुड़े कानूनों ने विस्थापित पंडितों की वापसी और पुनर्वास को और मुश्किल बना दिया।
2014 से 2018: राजनीतिक जमीन तैयार होना
भारतीय जनता पार्टी लंबे समय से अनुच्छेद 370 को हटाने की वकालत करती रही थी। 2014 के जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 25 सीटें मिलीं, जो पीडीपी की 28 सीटों से सिर्फ तीन कम थीं। किसी भी पार्टी के लिए बीजेपी के समर्थन के बिना सरकार बनाना मुश्किल था। इसके बाद बीजेपी और पीडीपी, जो विचारधारा में एक-दूसरे के उलट मानी जाती थीं, साथ आईं और मार्च 2015 में मुफ्ती मोहम्मद सईद के नेतृत्व में साझा सरकार बनी।
जून 2018 में बीजेपी ने अचानक पीडीपी से समर्थन वापस ले लिया, जिससे राज्य में सरकार गिर गई। जम्मू-कश्मीर के संविधान के मुताबिक ऐसी स्थिति में पहले छह महीने के लिए राज्यपाल शासन लागू होता है, राष्ट्रपति शासन सीधे नहीं। अगस्त 2018 में सत्यपाल मलिक को राज्यपाल नियुक्त किया गया। नवंबर 2018 में पीडीपी, कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस ने मिलकर सरकार बनाने की कोशिश की, लेकिन राज्यपाल तक उनका प्रस्ताव औपचारिक रूप से नहीं पहुंच पाया, और राज्यपाल ने यह कहते हुए इसे खारिज कर दिया कि विधायकों की खरीद-फरोख्त की आशंका है। दिसंबर 2018 में छह महीने पूरे होने पर जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रपति शासन लागू हो गया, जिसके बाद राज्यपाल को राष्ट्रपति के प्रतिनिधि के तौर पर व्यापक अधिकार मिल गए, और राज्य विधानसभा की जगह भारतीय संसद ने ले ली।
यहां एक बात साफ कर देना जरूरी है: इस पूरे घटनाक्रम को लेकर कुछ विश्लेषकों और किताबों में यह दावा किया गया है कि यह सब अनुच्छेद 370 हटाने की दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा था। लेकिन खुद इन दावों को पेश करने वालों ने भी स्वीकार किया है कि इसका कोई ठोस प्रमाण नहीं है, यह सिर्फ घटनाओं के समय और क्रम को देखकर लगाया गया एक अनुमान है।
अगस्त 2019: अनुच्छेद 370 हटाने की प्रक्रिया
अगस्त 2019 की शुरुआत में जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा व्यवस्था अचानक बढ़ा दी गई। 2 अगस्त को एक एडवाइजरी जारी हुई जिसमें अमरनाथ यात्रियों और पर्यटकों को घाटी छोड़ने को कहा गया। 4 अगस्त को कश्मीर घाटी के प्रमुख राजनीतिक नेताओं को नजरबंद कर दिया गया और मोबाइल व इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी गईं। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स और किताबों में यह भी दावा किया गया है कि इसी रात प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रपति भवन जाकर बैठक की, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं है।
5 अगस्त 2019 की सुबह राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने एक अधिसूचना जारी की। इसमें कहा गया कि जम्मू-कश्मीर सरकार (जो उस वक्त राज्यपाल शासन के तहत थी) की सहमति से, राज्य की विधानसभा को अब “संविधान सभा” माना जाएगा। यह एक अहम कानूनी कदम था, क्योंकि अनुच्छेद 370 हटाने के लिए संविधान सभा की सिफारिश जरूरी थी, और असली संविधान सभा तो दशकों पहले ही भंग हो चुकी थी। इसी अधिसूचना के जरिए 1954 का राष्ट्रपति आदेश हटाकर एक नया आदेश लागू किया गया, जिसके तहत भारत के सभी कानून बिना किसी अपवाद के जम्मू-कश्मीर पर लागू हो गए। इसी के साथ अनुच्छेद 35(A) भी स्वतः समाप्त हो गया।
इसके बाद गृहमंत्री अमित शाह ने राज्यसभा में एक प्रस्ताव पेश किया, जिसमें अनुच्छेद 370 के लगभग सभी प्रावधानों को खत्म करने और भारत के संविधान को जम्मू-कश्मीर पर पूरी तरह लागू करने की सिफारिश की गई। राज्यसभा और लोकसभा दोनों में यह प्रस्ताव बहुमत से पारित हुआ, और राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद अनुच्छेद 370 प्रभावी रूप से समाप्त हो गया। इसके साथ ही जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम भी पारित किया गया, जिसके तहत राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में बांट दिया गया।
इसके बाद क्या हुआ
अनुच्छेद 370 हटाने के इस फैसले को लेकर कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गईं, जिनमें कहा गया कि यह प्रक्रिया संवैधानिक रूप से सही नहीं थी, खासकर इसलिए क्योंकि विधानसभा की जगह संसद ने जम्मू-कश्मीर सरकार की सहमति दी थी, जबकि उस वक्त राज्य में कोई निर्वाचित सरकार ही नहीं थी। दिसंबर 2023 में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने अपने फैसले में अनुच्छेद 370 हटाने के केंद्र सरकार के फैसले को संवैधानिक रूप से वैध ठहराया, और साथ ही जम्मू-कश्मीर को जल्द राज्य का दर्जा बहाल करने का निर्देश भी दिया।
इस फैसले के समर्थकों का कहना है कि इससे जम्मू-कश्मीर देश की मुख्यधारा से पूरी तरह जुड़ गया, बाहरी निवेश आया और कुछ हद तक शांति भी बहाल हुई। वहीं आलोचकों, खासकर जम्मू-कश्मीर के स्थानीय राजनीतिक दलों का कहना है कि यह फैसला बिना जनता की सहमति के, लोकतांत्रिक प्रक्रिया को दरकिनार करते हुए लिया गया, और राज्य को केंद्र शासित प्रदेश बनाना जम्मू-कश्मीर की स्वायत्तता के खिलाफ था।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने दिसंबर 2023 के फैसले में यह भी निर्देश दिया था कि सितंबर 2024 तक जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव कराए जाएं और राज्य का दर्जा जल्द से जल्द बहाल किया जाए। अक्टूबर 2024 में जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव हुए, जिसमें नेशनल कॉन्फ्रेंस की जीत के बाद उमर अब्दुल्ला मुख्यमंत्री बने। लेकिन जुलाई 2026 तक भी जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा वापस नहीं मिला है, और यह अभी भी केंद्र शासित प्रदेश ही बना हुआ है। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला लगातार केंद्र सरकार से राज्य का दर्जा जल्द बहाल करने की मांग कर रहे हैं, और हाल ही में उनकी पार्टी ने दिल्ली में इस मुद्दे पर प्रदर्शन भी किया। उनका कहना है कि जब तक पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं मिलता, तब तक विशेष दर्जे से जुड़ी किसी भी चर्चा का व्यावहारिक मतलब नहीं है, क्योंकि केंद्र शासित प्रदेश के पास वह शक्तियां ही नहीं होतीं जो एक पूर्ण राज्य के पास होती हैं।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया
अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद पाकिस्तान ने इसे कड़ा विरोध करते हुए भारत के साथ राजनयिक संबंध कम किए और यह मामला संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भी उठाया, हालांकि इस पर परिषद की तरफ से कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। भारत सरकार का रुख शुरू से यही रहा है कि यह पूरी तरह उसका आंतरिक संवैधानिक मामला है। अमेरिका, यूरोपीय संघ और ज्यादातर बड़े देशों ने इसे भारत का आंतरिक मामला बताते हुए सीधी टिप्पणी करने से परहेज किया, हालांकि कुछ अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने घाटी में लगे लंबे संचार प्रतिबंधों और नेताओं की नजरबंदी पर चिंता जताई।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
अनुच्छेद 370 क्या था? यह भारतीय संविधान का एक अस्थायी प्रावधान था, जिसके तहत जम्मू-कश्मीर को कुछ विशेष स्वायत्तता प्राप्त थी। इसके तहत रक्षा, विदेश मामले और संचार को छोड़कर बाकी विषयों पर भारतीय कानून लागू करने के लिए राज्य सरकार की सहमति जरूरी होती थी।
अनुच्छेद 35(A) अनुच्छेद 370 से कैसे अलग था? अनुच्छेद 35(A), अनुच्छेद 370 के तहत ही 1954 में जोड़ा गया एक प्रावधान था, जो जम्मू-कश्मीर के “स्थायी निवासियों” को जमीन खरीदने और सरकारी नौकरी जैसे विशेष अधिकार देता था, और बाहरी लोगों को इनसे रोकता था।
अनुच्छेद 370 किस तारीख को हटाया गया? इसे हटाने की प्रक्रिया 5 अगस्त 2019 को राष्ट्रपति की अधिसूचना और संसद में पारित प्रस्ताव के जरिए पूरी की गई।
क्या अनुच्छेद 370 हटाना कानूनी रूप से वैध माना गया है? हां, दिसंबर 2023 में भारत की सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में केंद्र सरकार के इस कदम को संवैधानिक रूप से वैध ठहराया, साथ ही जम्मू-कश्मीर को जल्द राज्य का दर्जा वापस देने का निर्देश भी दिया।
जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम क्या है? यह वह कानून है जिसके तहत अगस्त 2019 में जम्मू-कश्मीर राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में विभाजित किया गया।
जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा कब वापस मिलेगा? सुप्रीम कोर्ट ने दिसंबर 2023 के फैसले में केंद्र सरकार को जल्द से जल्द राज्य का दर्जा बहाल करने का निर्देश दिया था। अक्टूबर 2024 में विधानसभा चुनाव हो चुके हैं और उमर अब्दुल्ला मुख्यमंत्री बने हैं, लेकिन जुलाई 2026 तक भी जम्मू-कश्मीर एक केंद्र शासित प्रदेश ही बना हुआ है, और इसे पूर्ण राज्य का दर्जा वापस नहीं मिला है।
निष्कर्ष
अनुच्छेद 370 और 35(A) की पूरी कहानी सिर्फ एक कानूनी प्रावधान की नहीं, बल्कि भारत के विभाजन, रियासतों के विलय, दशकों के राजनीतिक समझौतों और आखिर में एक बड़े संवैधानिक बदलाव की कहानी है। यह विषय आज भी भारतीय राजनीति में सबसे ज्यादा बहस वाले मुद्दों में से एक है, और इस पर अलग-अलग विचारधारा के लोगों की राय आज भी काफी अलग है। इतिहास की इस जटिल कड़ी को समझने के लिए जरूरी है कि हम तथ्यों और अनुमानों में फर्क करें, और दोनों पक्षों के नजरिए को समझने की कोशिश करें।
आज भी जम्मू-कश्मीर में राजनीतिक स्थिति पूरी तरह स्थिर नहीं मानी जा सकती। राज्य का दर्जा बहाल होना, स्थानीय राजनीतिक दलों की मांगें, और घाटी की सुरक्षा स्थिति, ये सभी विषय आने वाले सालों में भी चर्चा में बने रहेंगे। इसलिए इस विषय पर कोई भी अंतिम राय बनाने से पहले ताज़ा घटनाक्रम पर नजर रखना जरूरी है।
(यह लेख ऐतिहासिक रिकॉर्ड, संसदीय दस्तावेज़ों और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर आधारित है। कुछ घटनाक्रम, जैसे विशिष्ट बैठकों का विवरण, जिनकी आधिकारिक पुष्टि नहीं है, उन्हें स्पष्ट रूप से “दावा” या “रिपोर्ट” के तौर पर बताया गया है, तथ्य के तौर पर नहीं।)
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