DS ग्रुप की कहानी: पान की दुकान से 10000 करोड़ की एंपायर तक का सफर

DS ग्रुप की कहानी शुरू होती है उस वक्त से जब भारत अंग्रेजों की जंजीरों में जकड़ा था और आम आदमी महंगाई, बेरोजगारी और अत्याचार की तिहरी मार झेल रहा था। उसी मुश्किल दौर में दिल्ली के चांदनी चौक में दो लोग एक छोटी सी पान मिश्री की दुकान पर बैठे थे और अपने सपनों को आकार दे रहे थे।

DS ग्रुप की कहानी यह है कि उन्हीं दो लोगों ने, धर्मपाल और उनके बेटे सतपाल ने, एक ऐसी कंपनी खड़ी कर दी जिसे आज 10,000 करोड़ की एंपायर कहा जाता है। पल्स कैंडी, पासपास, रजनीगंधा, बाबा इलायची और कैच मसाले जैसे 200 से ज्यादा प्रोडक्ट इसी DS ग्रुप के हैं।

लेकिन DS ग्रुप की कहानी सिर्फ सफलता की नहीं है। यह उन तूफानों की भी कहानी है जो रास्ते में आए, उन फैसलों की जो समय पर लिए गए और उस बदलाव की जो बिना शोर के हुआ।

DS ग्रुप की कहानी की शुरुआत: 1929 का चांदनी चौक

DS ग्रुप की कहानी 1929 में शुरू होती है। चांदनी चौक की वो छोटी सी दुकान जहां धर्मपाल और सतपाल पान मसाला बेचते थे, वो सिर्फ एक दुकान नहीं थी। वो एक प्रयोगशाला थी।

दोनों बाप-बेटे ग्राहकों को ध्यान से देखते। उनकी पसंद पूछते। घंटों बैठकर अलग-अलग मसालों के साथ प्रयोग करते। सौंफ, मिश्री और तंबाकू के ऐसे मिश्रण की तलाश जो बाकी सबसे अलग हो, जो प्रीमियम लगे।

DS ग्रुप की कहानी में यह दौर उनकी सबसे बड़ी ताकत था क्योंकि जब बाकी दुकानदार सिर्फ बेचने में लगे थे, ये दोनों समझने में लगे थे कि आखिर लोग चाहते क्या हैं।

धीरे-धीरे वर्ड ऑफ माउथ से उनकी दुकान की लोकप्रियता बढ़ी। चांदनी चौक से निकलकर उनका नाम दिल्ली के बाहर तक जाने लगा।

DS ग्रुप की कहानी का पहला संकट: द्वितीय विश्व युद्ध

DS ग्रुप की कहानी में पहला बड़ा संकट 1940 में आया जब द्वितीय विश्व युद्ध का असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ा। बाजार में कच्चे माल की भारी कमी हो गई। उस दौर की छोटी दुकानें एक-एक करके हमेशा के लिए बंद होती जा रही थीं।

धर्मपाल और सतपाल के सामने भी यही चुनौती थी। दुकान का स्टॉक खत्म हो रहा था। आपूर्ति लगभग रुक चुकी थी। ग्राहक खाली हाथ लौट रहे थे।

DS ग्रुप की कहानी में यही वो मोड़ था जब दोनों ने एक अहम फैसला लिया। उन्होंने तय किया कि वो आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भर नहीं रहेंगे। सीधे किसानों से संपर्क किया। बिचौलियों को हटाकर कच्चे माल की सोर्सिंग खुद करने लगे।

नतीजा यह हुआ कि जब प्रतिस्पर्धियों का कारोबार ठप था, उनके पान, तंबाकू, मसाला मिश्रण और सौंफ-मिश्री की बिक्री काफी बढ़ गई।

DS ग्रुप की कहानी का निर्णायक कदम: मैन्युफैक्चरिंग यूनिट

DS ग्रुप की कहानी का सबसे क्रांतिकारी कदम तब आया जब धर्मपाल और सतपाल को समझ आया कि हाथ से हर मसाला बराबर मिलाते रहना बढ़ती मांग के साथ संभव नहीं।

उस वक्त पान मसाला का पूरा बाजार असंगठित था। सब कुछ खुले पाउच में बिकता था। कोई स्वच्छता मानक नहीं, कोई ब्रांडिंग नहीं। ऐसे में मैन्युफैक्चरिंग यूनिट लगाने का विचार काफी अजीब लगता था।

DS ग्रुप की कहानी में यह वो दौर था जब रोडमैप कोई नहीं था। पैकेजिंग कैसी हो, कौन सी मशीन लगे, वितरण कैसे होगा, कुछ भी पता नहीं था। लेकिन किसी को तो शुरुआत करनी थी।

दुकान के पीछे एक छोटी सी जगह साफ की गई। कुछ पुराने डिब्बे हटाए गए और वहीं उनका छोटा सा प्रायोगिक मैन्युफैक्चरिंग यूनिट शुरू हुआ जिसे लोग धर्मपाल सतपाल सुगंधी फैक्ट्री कहने लगे। और आगे चलकर यही नाम DS ग्रुप के रूप में पूरे देश में जाना गया।

DS ग्रुप की कहानी: गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं

DS ग्रुप की कहानी में एक बात जो सबसे अलग है वो है गुणवत्ता के प्रति जिद। फैक्ट्री शुरू होने के बाद असली चुनौती सामने आई। कभी मिश्रण बिल्कुल सही बनता तो कभी अगले ही दिन स्वाद थोड़ा बदल जाता।

कई बार घंटों मेहनत करके पूरा बैच तैयार होता लेकिन धर्मपाल सिर्फ सूंघकर बोल देते कि इसमें वो बात नहीं है। यह बाजार में नहीं जाएगा। और फिर पूरा बैच फेंक दिया जाता।

लोग हैरान थे। लेकिन धर्मपाल जानते थे कि एक बार स्वाद बिगड़ गया तो सालों का बनाया भरोसा चला जाएगा।

DS ग्रुप की कहानी में यही वो जिद थी जिसने आखिरकार 1946 में कंपनी का पहला मानकीकृत प्रोडक्ट तैयार किया, जाफरानी पत्ती, जो आगे चलकर जाफरानी पत्ती 120 के नाम से प्रसिद्ध हुई।

DS ग्रुप की कहानी: वितरण की चुनौती

DS ग्रुप की कहानी में प्रोडक्ट तैयार हो जाने के बाद असली लड़ाई शुरू हुई, वितरण की। वितरकों ने साफ मना कर दिया। उनका कहना था कि पान मसाला पैकेट में कौन खरीदेगा, लोग तो खुला ही पसंद करते हैं।

इसके जवाब में DS ग्रुप की कहानी का एक चतुर कदम सामने आया। वितरकों को मनाने की बजाय दोनों ने सीधे खुदरा दुकानों को लक्ष्य बनाया। चांदनी चौक, सदर बाजार, कश्मीरी गेट जैसे बाजारों में खुद जाकर दुकानदारों से मिलने लगे।

दुकानदार भी हिचकिचा रहे थे। तब सतपाल ने एक सरल सा प्रस्ताव दिया, बस कुछ पैकेट अपने काउंटर पर रख लीजिए, अगर नहीं बिके तो हम वापस ले जाएंगे।

इस आश्वासन पर दुकानदार मान गए। और जब ग्राहकों ने जाफरानी पत्ती की खुशबू और साफ-सुथरी पैकेजिंग देखी तो वो तुरंत आकर्षित हुए। एक बार टेस्ट किया तो इसका अरोमा और फ्लेवर दिलों में उतर गया।

DS ग्रुप की कहानी में यह पहली बड़ी सफलता थी।

DS ग्रुप की कहानी: बाबा का जन्म

DS ग्रुप की कहानी में 1958 एक महत्वपूर्ण साल था। पहली सफलता के बाद आत्मविश्वास से लबरेज सतपाल ने भारत का पहला ब्रांडेड चबाने वाला तंबाकू लॉन्च किया, बाबा।

DS ग्रुप की कहानी में यह प्रोडक्ट उद्योग के लिए गेम चेंजर साबित हुआ। इसका परिष्कृत स्वाद और तेज खुशबू लोगों को इतना पसंद आई कि बहुत जल्द यह पूरे देश का स्टार प्रोडक्ट बन गया।

1960 के दशक के अंत तक चांदनी चौक की वो छोटी सी दुकान अब एक तेजी से बढ़ती कंपनी बन चुकी थी।

DS ग्रुप की कहानी: रजनीगंधा और लाइफस्टाइल की छवि

DS ग्रुप की कहानी का अगला बड़ा अध्याय 1970-80 के दशक में लिखा गया जब पान मसाला उद्योग तेजी से उभर रहा था।

पारंपरिक पत्ते वाला पान युवाओं और ऑफिस जाने वालों में कम लोकप्रिय हो रहा था। समय लगता था, गंदगी होती थी। पान मसाला एक आधुनिक विकल्प बनकर उभरा।

DS ग्रुप की कहानी में यहां एक महत्वपूर्ण सवाल उठा। जब सब पान मसाला बना रहे हैं तो कुछ अलग क्यों न दिया जाए? कुछ प्रीमियम, कुछ ऐसा जो यह एहसास दिलाए कि पान मसाला भी क्लासी हो सकता है।

इसी सोच के साथ 1983 में DS ग्रुप ने अपना आइकॉनिक प्रोडक्ट लॉन्च किया, रजनीगंधा पान मसाला।

लेकिन DS ग्रुप की कहानी में लॉन्च के बाद उन्हें तुरंत समझ आया कि बाकी पान मसाला से अलग दिखाना है तो विज्ञापन पर जोर देना होगा। उस समय पान मसाला की दुनिया में ग्लैमर विज्ञापन लगभग नहीं था।

फिर भी DS ग्रुप ने जोखिम उठाया। बॉलीवुड कलाकारों के साथ पहला बड़ा अभियान शुरू किया। नारा था ‘स्वाद रजनीगंधा का सबसे निराला।’

यह अभियान इतना लोकप्रिय हुआ कि पूरी श्रेणी की छवि ही बदल गई। विज्ञापनों में रजनीगंधा को खुले पार्क में टहलते, ड्राइव पर जाते, जिंदगी का आनंद लेते लोगों के साथ दिखाया गया। हर दृश्य यह एहसास दिलाता था कि रजनीगंधा सिर्फ स्वाद नहीं, जीवन में ताजगी और खुशी भी देता है।

DS ग्रुप की कहानी में यह मार्केटिंग मास्टरस्ट्रोक था। रजनीगंधा एक जीवनशैली का प्रतीक बन गया।

DS ग्रुप की कहानी: वो तूफान जिसने सोचने पर मजबूर किया

DS ग्रुप की कहानी में 1990 के मध्य में एक ऐसा तूफान आया जिसने कंपनी को अपना पूरा भविष्य फिर से सोचने पर मजबूर कर दिया।

स्वास्थ्य संबंधी बहसें तेज होने लगीं। चबाने वाले तंबाकू को उच्च जोखिम वाली श्रेणी में रखा जाने लगा। चिकित्सा अनुसंधान, NGO और मीडिया सब एक सुर में बोल रहे थे।

DS ग्रुप की कहानी में यह मुश्किल इसलिए और बड़ी थी क्योंकि कंपनी की आमदनी का बड़ा हिस्सा इसी तंबाकू कारोबार से आता था। रजनीगंधा पूरी तरह तंबाकू मुक्त था लेकिन जन मानस में उसे भी तंबाकू उत्पाद से जोड़कर देखा जाने लगा। इस भ्रम ने ब्रांड की छवि को नुकसान पहुंचाया।

धीरे-धीरे कई राज्यों ने गुटखा और तंबाकू मिश्रित पान मसाला पर पाबंदियां लगाना शुरू कर दीं। पैकेजिंग पर बड़े चेतावनी लेबल जरूरी हुए। विज्ञापन पर सीमाएं लगने लगीं।

DS ग्रुप की कहानी में यहां नई पीढ़ी के नेताओं रवींद्र कुमार और राजीव कुमार ने एक बड़ा और साहसी फैसला लिया। उन्होंने तय किया कि कंपनी धीरे-धीरे तंबाकू पर अपनी निर्भरता कम करेगी और इसे 10 प्रतिशत से भी नीचे लाएगी।

DS ग्रुप की कहानी: FMCG की दुनिया में कदम

DS ग्रुप की कहानी का सबसे दूरदर्शी अध्याय यहां शुरू होता है। तंबाकू कारोबार घटाने का फैसला तो हो गया, लेकिन उसकी जगह क्या लेगा?

FMCG यानी रोज इस्तेमाल होने वाले उत्पाद। ऐसे उत्पाद जिनकी मांग कभी नहीं रुकती, लोग बार-बार खरीदते हैं और भारत की बढ़ती जनसंख्या के साथ यह बाजार और बड़ा होता जा रहा था।

DS ग्रुप की कहानी में दिलचस्प बात यह है कि FMCG में कदम 1987 में ही रख दिया गया था जब कैच ब्रांड के तहत पहला FMCG प्रोडक्ट लॉन्च हुआ था। लेकिन तब इसे बहुत गंभीरता से नहीं लिया गया था।

1999 DS ग्रुप की कहानी में बड़ा मोड़ साबित हुआ। कंपनी ने बड़े पैमाने पर तंबाकू से हटकर नए क्षेत्रों में विविधता लाना शुरू किया।

कैच नेचुरल स्प्रिंग वाटर लॉन्च हुआ। पासपास जैसा क्रांतिकारी प्रोडक्ट आया। नैनीताल में मनु महारानी लक्जरी होटल खुला। स्विट्जरलैंड की एक कंपनी के साथ साझेदारी में DS कैन पैक पैकेजिंग यूनिट शुरू की जहां खाद्य और नाश्ते के उत्पादों के लिए आधुनिक बेलनाकार डिब्बे बनते हैं।

DS ग्रुप की कहानी में 2000 के बाद कंपनी ने और तेजी दिखाई। कैच मसाले को पेय पदार्थों तक बढ़ाया। चंदन की खेती और आधुनिक कृषि जैसे क्षेत्रों में भी कदम रखा।

2011 के बाद FMCG में विविधता और तेज हुई। राजस्थान में डेयरी यूनिट खरीदी। चिंग्ल्स चिंगम लॉन्च किया। कैच ब्रांड को साधारण मसालों से लेकर मिश्रित मसाला और टेबल टॉप स्प्रिंकल तक विस्तार दिया।

DS ग्रुप की कहानी: पल्स ने मचाई धूम

DS ग्रुप की कहानी में 2015 एक ऐसे प्रोडक्ट का जन्म हुआ जिसने पूरे देश को एक बार फिर चौंका दिया। पल्स कैंडी।

इसका अनोखा फ्लेवर और अचानक आने वाला चटपटा स्वाद लोगों को इतना पसंद आया कि कैंडी बाजार जो सालों से एक ही स्वाद पर चल रहा था, पल्स ने आकर उसे पूरी तरह बदल दिया।

DS ग्रुप की कहानी में यह उपलब्धि इसलिए भी खास थी क्योंकि लॉन्च के सिर्फ 8 महीनों में, बिना किसी बड़े विज्ञापन के, पल्स कैंडी ने 100 करोड़ रुपये की बिक्री पार कर ली। वह भी सिर्फ 1 रुपये की कैंडी।

2017 तक पल्स भारत की नंबर एक कैंडी बन चुकी थी। उस साल 326 करोड़ रुपये का राजस्व। सिर्फ दो सालों में कैंडी बाजार का एक तिहाई हिस्सा उसके पास।

DS ग्रुप की कहानी: 10,000 करोड़ की एंपायर

DS ग्रुप की कहानी 2025 में कहां पहुंची है यह देखना जरूरी है।

2014 तक कंपनी का राजस्व करीब 4,800 करोड़ था जिसमें तंबाकू का हिस्सा घटकर 25 प्रतिशत रह गया था। आज DS ग्रुप 10,000 करोड़ का राजस्व पार कर चुका है और 2030 तक इसे और बड़ा करने का लक्ष्य है।

DS ग्रुप की कहानी में आज के राजस्व का ढांचा कुछ इस प्रकार है। खाद्य और पेय पदार्थों का योगदान 42 प्रतिशत है। माउथ फ्रेशनर का 38 प्रतिशत। आतिथ्य क्षेत्र का 3 प्रतिशत। और तंबाकू जो कभी 80 से 90 प्रतिशत आमदनी देता था, वो घटकर सिर्फ 10 प्रतिशत रह गया है।

DS ग्रुप की कहानी की असली ताकत: वितरण नेटवर्क

DS ग्रुप की कहानी में सबसे कम चर्चित लेकिन सबसे मजबूत पहलू है इसका वितरण नेटवर्क। 150 सुपर स्टॉकिस्ट, 5000 से ज्यादा वितरक और 15 लाख खुदरा आउटलेट। यह नेटवर्क कंपनी की असली रीढ़ है।

DS ग्रुप की कहानी में यही नेटवर्क इसे बाजार की हर गली तक पहुंचाता है। चाहे छोटे शहर हों या बड़े, पल्स हो या कैच मसाला, यह नेटवर्क हर जगह काम करता है।

DS ग्रुप की कहानी: भारत का साइलेंट जायंट

DS ग्रुप की कहानी में सबसे दिलचस्प बात यह है कि इतनी बड़ी कंपनी होने के बावजूद यह कभी सुर्खियों में नहीं रही।

DS ग्रुप को भारत का साइलेंट जायंट कहा जाता है। एक ऐसी कंपनी जो शांति से, बिना स्पॉटलाइट की चाहत के, अलग-अलग क्षेत्रों में मजबूती से अपना कारोबार खड़ा करती रही।

DS ग्रुप की कहानी यह सिखाती है कि बदलाव तब सबसे मजबूत होता है जब वो शोरगुल में नहीं होता। जब उसके नतीजे खुद बोलते हैं।

1929 में चांदनी चौक की उस छोटी सी पान की दुकान से शुरू होकर 10,000 करोड़ की FMCG एंपायर तक का यह सफर इसी खामोश जिद, इस्तेमाल के प्रति ईमानदारी और समय के साथ बदलने की हिम्मत का परिणाम है।

DS ग्रुप की कहानी अभी खत्म नहीं हुई है। 2030 का लक्ष्य सामने है और उस साइलेंट जायंट की आवाज बाजार में अब पहले से कहीं ज्यादा सुनाई देती है।

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