कल्पना कीजिए एक ऐसी देवी की, जो स्वर्गलोक में निवास करती थी, जहां कल्पवृक्ष था, अमृत था, देवताओं का संपूर्ण वैभव था। जिनके जल की एक बूंद बड़े से बड़े पाप को धो देती थी। जिनके स्पर्श मात्र से मृत आत्माएं मुक्ति पा जाती थीं। जिनके विषय में स्वयं भगवान शिव ने कहा था, “यह मेरी जटाओं की शोभा है।” उनका नाम था गंगा, स्वर्ग की देवी, जो विष्णु के चरणों से जन्मीं और शिव की जटाओं में समाईं।
इसी देवी ने एक दिन अपने ही अहंकार में यह सोच लिया कि वे स्वयं शिव को भी बहा ले जाएंगी। इसी देवी के लिए एक राजवंश ने तीन पीढ़ियों तक, हजारों वर्षों तक तपस्या की। इसी देवी ने एक ही क्षण में साठ हजार भटकती आत्माओं को मुक्ति प्रदान की। और इसी देवी को एक दिन स्वर्ग की सभा में एक श्राप मिला, जिसने उन्हें धरती पर उतारा, एक राजा की पत्नी बनाया, और एक ऐसे पुत्र की माता बनाया जिसे संसार भीष्म के नाम से जानता है। आइए, गंगा देवी की इस अद्भुत गाथा को विस्तार से समझते हैं, उन प्रसंगों के साथ जो ग्रंथों में तो सुरक्षित हैं, परंतु प्रायः लोकचर्चा में उतने सुने नहीं जाते।
गंगा देवी की अमर गाथा: स्वर्ग से धरती तक की सच्ची पौराणिक कथा
गंगा देवी कौन थीं
विष्णु पुराण, भागवत पुराण, रामायण, महाभारत और स्कंद पुराण जैसे प्रमुख ग्रंथों में गंगा का उल्लेख बार-बार मिलता है। ऋग्वेद में भी गंगा का नाम नदियों में सर्वप्रथम लिया गया है। परंतु गंगा केवल एक नदी नहीं हैं, वे एक देवी हैं जिन्होंने नदी का रूप धारण कर हमारे बीच अवतरण किया।
पुराणों के अनुसार गंगा का जन्म भगवान विष्णु के चरणों से हुआ। जब वामन अवतार में विष्णु ने तीन पगों में संपूर्ण ब्रह्मांड नाप लिया, तब उनके बाएं पैर के अंगूठे से जो दिव्य जल प्रवाहित हुआ, वह इतना पवित्र था कि स्वयं ब्रह्मा जी ने उसे अपने कमंडल में संचित किया। वही दिव्य जल आगे चलकर गंगा के रूप में जाना गया। जिस जल ने साक्षात भगवान विष्णु के चरणों का स्पर्श किया हो, उसकी पवित्रता की कल्पना ही की जा सकती है।
गंगा देवी का स्वरूप अत्यंत दिव्य वर्णित है, श्वेत वस्त्र, मस्तक पर जल का मुकुट, हाथ में कमंडल, और उनका वाहन है मकर, एक विशाल जलीय प्राणी। उनकी दृष्टि में करुणा का अथाह सागर समाया माना जाता है। गंगा के अनेक नाम प्रचलित हैं, प्रत्येक नाम के पीछे एक विशेष कथा है, भागीरथी (भगीरथ के प्रयास से धरती पर आने के कारण), जाह्नवी (जह्नु मुनि की पुत्री के रूप में), त्रिपथगा (तीनों लोकों में प्रवाहित होने वाली), विष्णुपदी (विष्णु के चरणों से जन्मीं), और सुरसरी (देवताओं की नदी)।
एक रोचक तथ्य यह भी है कि स्वर्गलोक में गंगा केवल एक नदी न होकर एक स्वतंत्र, तेजस्वी देवी थीं। उनका स्वभाव निर्भीक, सत्यवादी और कभी-कभी कुछ उद्दंड भी माना जाता है। देवताओं के मध्य उनका आदर था, परंतु वे किसी के अधीन न थीं। कहा जाता है कि माता पार्वती कभी-कभी उनसे ईर्ष्या भी करती थीं, क्योंकि शिव ने गंगा को अपनी जटाओं में स्थान दिया था। यह संबंध अत्यंत गहन और जटिल था, और इसी में छिपा था वह अहंकार जो आगे चलकर गंगा को एक बड़ा जीवन-सत्य सिखाने वाला था।
महाराज सगर और साठ हजार पुत्रों की करुण गाथा
गंगा के धरती पर अवतरण की कथा आरंभ होती है एक दुःखद घटना से। अयोध्या में सूर्यवंश के एक महान राजा हुए, महाराज सगर, स्वयं भगवान राम के पूर्वज। उनकी सेना का नाम सुनकर ही शत्रु कांप उठते थे। महाराज सगर ने अश्वमेध यज्ञ करने का संकल्प लिया, जिसमें एक पवित्र अश्व को स्वतंत्र विचरण के लिए छोड़ा जाता है, और जिस राज्य से वह अश्व गुजरता, वह राज्य विजित माना जाता। यदि कोई इस अश्व को रोके, तो युद्ध निश्चित होता।
सगर की इस बढ़ती शक्ति से देवलोक में हलचल मच गई। इंद्रदेव को भय हुआ कि यदि सगर इतने प्रबल हो गए, तो स्वर्ग का सिंहासन भी संकट में पड़ सकता है। इंद्र ने एक युक्ति रची, उस यज्ञाश्व का अपहरण कर उसे महर्षि कपिल के आश्रम में छिपा दिया, जो गहन तपस्या में इतने लीन थे कि उन्हें बाह्य जगत की कोई सुधि न थी।
राजा सगर के साठ हजार पुत्र थे। यह विशाल सेना अश्व की खोज में निकली, संपूर्ण पृथ्वी छान डाली, पर्वत, वन, सागर, सभी स्थान खंगाले, और अंततः कपिल मुनि के आश्रम पहुंचे। वहां अश्व तो मिला, परंतु समीप ध्यानमग्न एक ऋषि भी थे। साठ हजार पुत्रों ने उन्हें ही चोर समझ लिया और तपस्यारत महर्षि का अपमान करने लगे, अपशब्द कहे, जगाने का प्रयास किया। तब कपिल मुनि के नेत्र खुले, वे नेत्र जो वर्षों से बंद थे, जिनमें सहस्रों वर्षों की तपस्या की अग्नि संचित थी। उन्होंने उन साठ हजार पुत्रों को एक दृष्टि से देखा, और अगले ही क्षण वे समस्त पुत्र भस्म हो गए, बिना किसी शस्त्र के, बिना किसी युद्ध के।
पौराणिक मान्यता के अनुसार जो व्यक्ति उचित अंतिम संस्कार के बिना देह त्यागता है, उसकी आत्मा को मुक्ति नहीं मिलती, वह युगों तक भटकती रहती है। सगर के वे साठ हजार पुत्र भी न स्वर्ग में स्थान पा सके, न मोक्ष। उनकी मुक्ति का एकमात्र उपाय था गंगाजल का स्पर्श, परंतु गंगा तब स्वर्गलोक में थीं, और उन्हें धरती पर लाना असंभव प्रतीत होता था। यहीं से आरंभ हुई तीन पीढ़ियों की वह अथक यात्रा, जो सहस्रों वर्षों तक चली।
तीन पीढ़ियों की तपस्या और भगीरथ का अटूट संकल्प
सगर के पश्चात उनके वंशजों ने एक के बाद एक प्रयास किया। सगर के पौत्र अंशुमान ने वर्षों तपस्या की, परंतु सफलता न मिली। अंशुमान के पुत्र दिलीप ने भी अपना संपूर्ण जीवन इस प्रयास में लगा दिया, फिर भी गंगा धरती पर न उतरीं। दो पीढ़ियां व्यतीत हो गईं, और तब जन्म हुआ दिलीप के पुत्र भगीरथ का। जब भगीरथ को ज्ञात हुआ कि उनके साठ हजार पूर्वज अभी भी मुक्ति की प्रतीक्षा में भटक रहे हैं, उनके मन में एक अटल संकल्प जागा, चाहे कुछ भी हो, इन आत्माओं को मोक्ष दिलाना ही है, और इसके लिए गंगा को धरती पर लाना अनिवार्य है।
भगीरथ ने राजपाट त्याग दिया, महल छोड़ा, समस्त सुख-सुविधाएं त्याग दीं, और हिमालय की ओर प्रस्थान किया। वहां उन्होंने ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या आरंभ की, वर्षों तक एक पांव पर खड़े रहकर, शीत हो या ग्रीष्म, आंधी हो या तूफान, बिना भोजन, बिना विश्राम, मन में केवल एक ही लक्ष्य, गंगा को धरती पर लाना। अंततः ब्रह्मा जी प्रसन्न होकर प्रकट हुए और वरदान दिया कि गंगा धरती पर भेजी जाएंगी। परंतु उन्होंने एक गंभीर समस्या भी बताई, गंगा का वेग इतना प्रचंड है कि यदि वे सीधे धरती पर गिरें, तो पृथ्वी विदीर्ण होकर पाताल तक चली जाए। इसलिए इस वेग को थामने के लिए भगवान शिव की तपस्या आवश्यक थी, क्योंकि केवल वे ही इतने प्रचंड प्रवाह को धारण करने में समर्थ थे।
भगीरथ बिना विचलित हुए कैलाश पर्वत की ओर बढ़े और शिव की आराधना में लीन हो गए। जब भक्ति सच्ची हो, तो महादेव को द्रवित होने में विलंब नहीं लगता। शीघ्र ही भगवान शिव प्रकट हुए और भगीरथ के अटूट संकल्प से प्रसन्न होकर गंगा को अपनी जटाओं में धारण करने की स्वीकृति दी।
गंगा का अहंकार और शिव की जटाओं में उलझन
अब आती है इस गाथा का सबसे रोचक प्रसंग। जब स्वर्गलोक में यह समाचार पहुंचा कि गंगा को शिव की जटाओं से होकर धरती पर उतरना होगा, तो गंगा के मन में एक विचार उठा, “मेरा वेग तो इतना प्रबल है कि मैं शिव को ही बहा ले जाऊंगी, देखते हैं वे क्या करते हैं।” यही था गंगा का अहंकार, एक देवी का दर्प, और यही अहंकार उन्हें एक गहन जीवन-शिक्षा देने वाला था।
भगीरथ ने संकेत दिया, ब्रह्मा जी ने कमंडल से गंगा को मुक्त किया, और आकाश में एक विशाल, गर्जनशील जलधारा प्रकट हुई, जो संपूर्ण ब्रह्मांड को कंपित करती हुई नीचे की ओर वेग से आई, अपने ही अहंकार में डूबी हुई। परंतु जब गंगा शिव की जटाओं में पहुंचीं, वे वहीं उलझ गईं। शिव की उन जटाओं में इतने मार्ग, इतनी उलझनें थीं, जैसे कोई भूल-भुलैया हो, कि गंगा जिस मार्ग से निकलने का प्रयास करतीं, उसी में और गहराई से फंसती चली जातीं। वर्षों तक वे उन जटाओं से बाहर न निकल सकीं। अहंकार का यही परिणाम होता है।
धरती पर भगीरथ प्रतीक्षारत थे, गंगा का आगमन न होते देख वे समझ गए कि कुछ अप्रत्याशित घटित हुआ है। वे पुनः शिव के समक्ष नतमस्तक हुए, “प्रभु, गंगा मां को मुक्त करें, मेरे पूर्वज प्रतीक्षा कर रहे हैं, उन्हें मोक्ष चाहिए।” शिव ने मंद मुस्कान के साथ अपनी जटाएं धीरे-धीरे शिथिल कीं, और गंगा बाहर निकलीं, इस बार अहंकार रहित, विनम्रता सहित। शिव की जटाओं ने उन्हें सात धाराओं में विभक्त कर दिया, तीन स्वर्ग की ओर, तीन पाताल की ओर, और एक सीधे भगीरथ के पीछे धरती की ओर।
जह्नु मुनि का क्रोध और गंगा का नया नाम जाह्नवी
भगीरथ आगे-आगे रथ पर सवार चले, और पीछे-पीछे प्रवाहित होती रहीं गंगा, पर्वतों से होकर, घाटियों को पार करती हुई, वनों को स्पर्श करती हुई। जहां-जहां गंगा का प्रवाह पहुंचा, वहां जीवन का संचार हो गया, सूखी धरती हरितिमा से भर गई, पशु-पक्षी प्रफुल्लित हो उठे, लोग दौड़ पड़े गंगाजल के दर्शन और स्पर्श के लिए।
परंतु मार्ग में एक और बाधा आई, जिसने गंगा को एक नया नाम प्रदान किया। महर्षि जह्नु अपने आश्रम में यज्ञ कर रहे थे, तभी गंगा का प्रबल प्रवाह उनके यज्ञ मंडप की ओर बढ़ आया, जल फैल गया, यज्ञ सामग्री बह गई, ऋषि का ध्यान भंग हुआ। क्रोधित होकर उन्होंने वह किया जो अकल्पनीय था, उन्होंने एक ही घूंट में संपूर्ण गंगा को पी लिया। भगीरथ यह देखकर स्तब्ध रह गए, वे तुरंत महर्षि जह्नु के समक्ष पहुंचे, हाथ जोड़कर क्षमा-याचना की और गंगा को मुक्त करने का अनुरोध किया, क्योंकि लाखों आत्माएं उनकी प्रतीक्षा कर रही थीं। भगीरथ के अटूट संकल्प को देखकर ऋषि का क्रोध शांत हुआ, उन्होंने अपने दाहिने कर्ण को स्पर्श किया और गंगा पुनः प्रवाहित हो निकलीं। उसी दिन से गंगा का एक नाम जाह्नवी पड़ा, अर्थात जह्नु मुनि की पुत्री, क्योंकि ऋषि ने मानो उन्हें पुनर्जन्म दिया था।
साठ हजार आत्माओं की मुक्ति और भागीरथी नाम
अंततः वह क्षण आया जिसके लिए तीन पीढ़ियों ने अथक तपस्या की थी। गंगा उस स्थान पर पहुंचीं जहां कपिल मुनि के आश्रम में साठ हजार आत्माओं की भस्म युगों से बिखरी पड़ी थी, जहां वर्षों से कोई नहीं गया था, जो स्थान सुनसान और अंधकारमय हो चुका था। गंगा की प्रथम लहर उस भस्म तक पहुंची, जल ने स्पर्श किया, और एक के बाद एक साठ हजार प्रकाश-बिंदु उठने लगे, वे आत्माएं जो युगों से भटक रही थीं, अब मुक्त हो रही थीं, उनके मुखमंडल पर शांति विराजमान थी। वे आकाश की ओर, स्वर्ग की ओर उठ गईं। भगीरथ, जो समीप खड़े थे, उनकी आंखों से अश्रुधारा बह निकली, वे धरती पर बैठ गए और हाथ जोड़कर बस इतना ही कह सके, “मां, तुम आ गईं।” उसी दिन से गंगा का सबसे प्रसिद्ध नाम भागीरथी पड़ा, क्योंकि भगीरथ के संकल्प ने ही उन्हें धरती पर लाया था, और इसी घटना से “भगीरथ प्रयास” जैसा शब्द भी लोकप्रचलन में आया।
महाभिष का श्राप: गंगा और भीष्म की कथा का आरंभ
गंगा की गाथा में एक और महत्वपूर्ण मोड़ आता है, जो आगे चलकर महाभारत की संपूर्ण कथा की नींव बना। इक्ष्वाकु वंश में महाभिष नामक एक राजा हुए, जिन्होंने जीवनभर धर्म का पालन करते हुए इतना पुण्य अर्जित किया कि मृत्युपरांत सीधे स्वर्गलोक पहुंचे और ब्रह्मा जी की दिव्य सभा में स्थान पाया।
एक दिन उस सभा में, जहां देवता, ऋषि और गंधर्व उपस्थित थे, और एक ओर स्वयं गंगा देवी विराजमान थीं, अकस्मात वायु का एक झोंका आया जिसने गंगा के वस्त्र को क्षणभर के लिए हिला दिया। समस्त सभा ने मर्यादावश तत्काल दृष्टि नीची कर ली, परंतु महाभिष उस क्षण मर्यादा की रेखा पार कर बैठे। यह देख ब्रह्मा जी गंभीर हो उठे और महाभिष को श्राप दिया कि वे पुनः मृत्युलोक में जन्म लेंगे। साथ ही उन्होंने गंगा से भी कहा कि वे भी धरती पर जाएंगी और महाभिष से उनका संबंध स्थापित होगा। गंगा ने बिना किसी प्रश्न के इसे स्वीकार किया, क्योंकि ब्रह्मा जी का वचन अटल था।
महाभिष अगले जन्म में हस्तिनापुर के राजा शांतनु बने, धर्मपरायण और प्रजा में अत्यंत प्रिय। एक दिन गंगा तट पर शिकार हेतु निकले शांतनु की दृष्टि एक अलौकिक सुंदरी पर पड़ी, वे स्त्री कोई और नहीं, स्वयं गंगा थीं। शांतनु ने विवाह का प्रस्ताव रखा, गंगा ने एक शर्त पर स्वीकृति दी, “राजन, मैं जो भी करूं, आप कभी प्रश्न नहीं करेंगे, कभी रोकेंगे नहीं, कभी टोकेंगे नहीं। जिस दिन आपने ऐसा किया, मैं सदा के लिए चली जाऊंगी।” शांतनु, गंगा का साथ पाने की इच्छा में, इस असामान्य शर्त को स्वीकार कर बैठे।
आठ वसुओं का रहस्य और भीष्म का जन्म
गंगा और शांतनु के विवाह के पश्चात एक के बाद एक सात पुत्रों का जन्म हुआ, और प्रत्येक बार जन्म के तुरंत बाद गंगा उस नवजात को लेकर नदी की ओर चल पड़तीं और उसे जल में समर्पित कर देतीं। शांतनु, शर्त के बंधन में बंधे, मूक साक्षी बने रहते, भीतर से टूटते हुए, बाहर से मौन। सात बार यह हृदयविदारक दृश्य दोहराया गया।
इस रहस्य के पीछे एक गहन कथा छिपी थी। ये आठों पुत्र वास्तव में साधारण मनुष्य नहीं, अपितु अष्टवसु थे, देवताओं का एक विशेष वर्ग। इन वसुओं ने एक बार महर्षि वशिष्ठ की कामधेनु गाय का अपहरण कर लिया था, जिससे क्रुद्ध होकर ऋषि ने उन्हें मनुष्य योनि में जन्म लेने का श्राप दिया। वसुओं की क्षमा-याचना पर ऋषि का क्रोध कुछ शांत हुआ, उन्होंने कहा कि सात वसु जन्म लेते ही मुक्त हो जाएंगे, परंतु जिस वसु ने यह अपराध करने का विचार सर्वप्रथम रखा था, उसे दीर्घकाल तक मनुष्य रूप में रहना होगा। गंगा ने वसुओं को वचन दिया था कि वे उनकी माता बनेंगी और जन्म लेते ही उन्हें मुक्त कर देंगी, इसीलिए सात पुत्रों को उन्होंने तुरंत नदी में विसर्जित कर श्राप से मुक्ति दिलाई।
जब आठवें पुत्र का जन्म हुआ और गंगा उसे भी नदी की ओर ले चलीं, तब शांतनु का धैर्य टूट गया। सात पुत्रों की पीड़ा उनके हृदय में संचित हो चुकी थी, वे आगे बढ़े और बोल पड़े, “गंगा, रुको! इसे नहीं, बस इसे नहीं।” गंगा रुक गईं, धीरे से मुड़ीं, उनकी आंखों में दुख तो था, परंतु आश्चर्य नहीं, मानो वे इस क्षण को पहले से जानती थीं। गंगा ने कहा, “राजन, आपने शर्त तोड़ दी, अब मैं यहां नहीं रह सकती।” शांतनु के आग्रह पर गंगा ने संपूर्ण सत्य कह सुनाया, वसुओं की कथा, श्राप और अपना वचन। फिर बोलीं, “इस पुत्र का नाम देवव्रत होगा, यह महान योद्धा बनेगा। मैं इसे स्वयं पालकर बड़ा करूंगी, और समय आने पर आपको लौटा दूंगी।” इतना कहकर गंगा नदी में विलीन हो गईं।
गंगा ने देवव्रत का पालन-पोषण किया, उन्हें परशुराम जी से अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा दिलाई, ऋषियों से ज्ञान प्रदान करवाया, और यथासमय अपने वचन के अनुसार उन्हें शांतनु को सौंप दिया। बड़े होकर देवव्रत ने वह भीषण प्रतिज्ञा ली, जिसने उन्हें अमर बना दिया, “मैं कभी विवाह नहीं करूंगा, कभी सिंहासन ग्रहण नहीं करूंगा।” इसी भीषण प्रतिज्ञा के कारण वे भीष्म कहलाए, और उनकी माता थीं वही गंगा, जो स्वर्ग से उतरीं, एक राजा से विवाह किया, सात दिव्य आत्माओं को मुक्ति दिलाई, और महाभारत के सबसे प्रतिष्ठित पात्रों में से एक को जन्म दिया।
गंगा की गाथा से मिलने वाली जीवन-शिक्षा
गंगा देवी की यह अमर गाथा हमें कई गहन सत्य सिखाती है। अहंकार, चाहे वह किसी देवी का हो या साधारण मनुष्य का, सदैव मार्ग अवरुद्ध करता है, जैसा गंगा को शिव की जटाओं में उलझकर सीखना पड़ा। संकल्प की शक्ति असीम होती है, भगीरथ ने यह सिद्ध किया कि सच्चे दृढ़ निश्चय के समक्ष असंभव भी संभव हो जाता है। और सेवा तथा त्याग की भावना सर्वोच्च होती है, गंगा ने स्वर्ग का वैभव त्याग दिया, केवल इसलिए कि दूसरों को मुक्ति मिल सके।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
गंगा देवी का जन्म कैसे हुआ? पौराणिक मान्यता के अनुसार गंगा का जन्म भगवान विष्णु के चरणों से हुआ, जब वामन अवतार में उन्होंने तीन पगों में ब्रह्मांड नापा था, तब उनके चरण से निकले दिव्य जल को ब्रह्मा जी ने अपने कमंडल में संचित किया, वही आगे गंगा कहलाईं।
भगीरथ ने गंगा को धरती पर क्यों लाया? महाराज सगर के साठ हजार पुत्र कपिल मुनि के क्रोध से भस्म हो गए थे और उनकी आत्माएं बिना अंतिम संस्कार के मुक्ति की प्रतीक्षा में भटक रही थीं। केवल गंगाजल का स्पर्श ही उन्हें मोक्ष दिला सकता था, इसीलिए भगीरथ ने तीन पीढ़ियों के अथक प्रयास के बाद गंगा को धरती पर लाने का संकल्प पूरा किया।
गंगा को शिव की जटाओं से होकर क्यों गुजरना पड़ा? ब्रह्मा जी ने बताया था कि गंगा का वेग इतना प्रबल है कि यदि वे सीधे धरती पर उतरें तो पृथ्वी विदीर्ण हो जाएगी। इसलिए इस वेग को नियंत्रित करने के लिए भगवान शिव ने उन्हें अपनी जटाओं में धारण किया।
जाह्नवी नाम गंगा को कैसे मिला? जब गंगा का प्रवाह महर्षि जह्नु के यज्ञ में बाधा बना, तो क्रोधित ऋषि ने संपूर्ण गंगाजल पी लिया। भगीरथ की क्षमा-याचना पर ऋषि ने उन्हें अपने कान से मुक्त किया, इसीलिए गंगा का नाम जाह्नवी (जह्नु की पुत्री) पड़ा।
गंगा और भीष्म का क्या संबंध है? गंगा, राजा शांतनु से विवाह के पश्चात भीष्म (देवव्रत) की माता बनीं। आठ वसुओं में से सात को उन्होंने जन्म लेते ही नदी में विसर्जित कर मुक्ति दिलाई, जबकि आठवें वसु को धरती पर रहना था, जो आगे चलकर भीष्म के नाम से प्रसिद्ध हुए।
निष्कर्ष
गंगा देवी की यह अमर गाथा केवल एक पौराणिक कथा नहीं, अपितु त्याग, संकल्प और आत्म-शुद्धि का एक कालातीत दर्शन है। स्वर्ग से धरती तक की उनकी यात्रा, उनका अहंकार, उसका पश्चाताप, साठ हजार आत्माओं की मुक्ति, और अंततः भीष्म जैसे महान चरित्र की माता बनना, यह सभी प्रसंग हमें यह सिखाते हैं कि दैवीय होते हुए भी विनम्रता और सेवा-भाव ही वास्तविक महानता की कसौटी हैं। आज भी जब हम गंगा में स्नान करते हैं, दीप प्रवाहित करते हैं, या केवल दूर से उनकी धारा को निहारते हैं, हम उसी देवी को नमन करते हैं जिन्होंने स्वर्ग त्यागकर धरती को अपनाया, ताकि असंख्य आत्माओं को मुक्ति और असंख्य जीवन को नवजीवन मिल सके।
(यह लेख पौराणिक ग्रंथों, विशेषकर रामायण, महाभारत, विष्णु पुराण, भागवत पुराण और स्कंद पुराण में वर्णित कथाओं पर आधारित है। पौराणिक कथाएं आस्था और परंपरा का विषय हैं, और इन्हें उसी श्रद्धा भाव से प्रस्तुत किया गया है।)
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