पिछले 25 सालों से Google का सर्च इंजन इंटरनेट की दुनिया का बेताज बादशाह बना हुआ है। वैश्विक बाज़ार में 90 प्रतिशत हिस्सेदारी और रोज़ 16 बिलियन से ज़्यादा खोजें। पिछले दो दशकों में Yahoo, DuckDuckGo और Ask.com जैसे न जाने कितने सर्च इंजन आए और चले गए। Microsoft ने Bing पर अरबों डॉलर खर्च किए। लेकिन Google के राज को कोई हिला भी नहीं पाया।
फिर 2022 में कुछ ऐसा हुआ जो किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था। चेन्नई के एक मिडिल क्लास परिवार का लड़का अरविंद श्रीनिवास एक ऐसा स्टार्टअप लेकर आया जो न केवल Google से मुकाबला करता है बल्कि आज Google के लिए एक बड़ा खतरा बन चुका है।
जी हाँ, बात हो रही है Perplexity AI की, जो सिर्फ एक AI चैटबॉट नहीं बल्कि एक रियल-टाइम AI सर्च इंजन है। लॉन्च के समय Perplexity AI पर सिर्फ 3000 क्वेरी प्रतिदिन आती थीं। आज यह संख्या 30 मिलियन प्रतिदिन को पार कर चुकी है। कंपनी की वैल्यूएशन 20 बिलियन डॉलर तक पहुँच चुकी है और AI सर्च में इसकी बाज़ार हिस्सेदारी लगभग 7 प्रतिशत है।
Google का राज और एक बड़ा खालीपन
नवंबर 2022 तक इंटरनेट का एक ही मतलब था, Google। कुछ भी समझना हो, ढूंढना हो या सीखना हो, दिमाग में पहला नाम बस Google ही आता था।
तभी ChatGPT लॉन्च हुआ और इंटरनेट की हवा ही बदल गई। ChatGPT ने लोगों को पहली बार यह एहसास कराया कि कंप्यूटर सिर्फ जवाब नहीं देता बल्कि आपकी भाषा, आपकी टोन और आपके मूड को भी समझ सकता है। सिर्फ दो महीने में ChatGPT ने 10 करोड़ यूज़र्स पार कर लिए। इतनी तेज़ वृद्धि उस वक्त तक किसी प्लेटफॉर्म ने नहीं देखी थी, न Instagram ने और न TikTok ने।
लेकिन ChatGPT के आने के बाद भी सर्च की दुनिया में एक बड़ा खालीपन था। ChatGPT इंटरनेट से जुड़ा नहीं था। अगर कोई ताज़ा खबर पूछे तो जवाब मिलता था कि मेरे पास 2021 के बाद की जानकारी नहीं है। स्रोत भी नहीं मिलते थे। यूज़र को पता नहीं चलता था कि जानकारी कहाँ से आई, क्या यह तथ्य है या AI का अनुमान।
एक तरफ था Google जहाँ नीले लिंक खोलकर ढूंढना पड़ता था और दूसरी तरफ ChatGPT जो रियल-टाइम डेटा नहीं दे सकता था। इस बड़े खालीपन को एक भारतीय लड़के ने बहुत पहले भाँप लिया था।
अरविंद श्रीनिवास: एक मिडिल क्लास सपने की कहानी
अरविंद श्रीनिवास चेन्नई के एक मिडिल क्लास परिवार से हैं। स्कूल के बाद वो IIT JEE की तैयारी में लग गए। पहली पसंद थी कंप्यूटर साइंस लेकिन कट-ऑफ मिस हुआ और उन्हें इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग मिली। पहले बुरा लगा लेकिन धीरे-धीरे समझ आया कि यह कोई गलत विकल्प नहीं था। इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग ने उन्हें चीज़ों को अलग नज़र से देखना सिखाया, मशीनें कैसे सोचती हैं, सिस्टम काम कैसे करते हैं और हार्डवेयर के अंदर क्या होता है।
IIT मद्रास में पढ़ाई के दौरान एक दोस्त ने उन्हें मशीन लर्निंग प्रतियोगिता के बारे में बताया। तब तक अरविंद को ML का अर्थ तक नहीं पता था। फिर भी उन्होंने कोशिश की और वो प्रतियोगिता जीत गए। यही वो पल था जिसने उनकी दिशा तय कर दी।
2017 में उच्च अध्ययन के लिए वो UC Berkeley पहुँचे और वहाँ कंप्यूटर साइंस में PhD शुरू की। पीएचडी के दौरान OpenAI में 4 महीने की इंटर्नशिप की। IIT और PhD में अरविंद को हमेशा लगता था कि वो काफी आगे हैं। लेकिन OpenAI में समझ आया कि यहाँ लोग बिल्कुल अलग स्तर पर सोच रहे हैं।
OpenAI के बाद उन्होंने Google Brain और DeepMind जैसी प्रतिष्ठित संस्थाओं में भी काम किया। इसी दौरान एक रात Berkeley की लाइब्रेरी में उनके हाथ एक किताब लगी, “How Google Works”। उसमें Google के सह-संस्थापक लैरी पेज लिखते हैं कि परफेक्ट सर्च इंजन वो होगा जो इंसान के पूछे गए संदर्भ को समझे, न कि सिर्फ शब्दों को।
यह पढ़कर अरविंद के दिमाग में एक बात स्पष्ट हो गई कि परफेक्ट सर्च का मतलब बेसिकली परफेक्ट AI था।
Perplexity AI का जन्म: एक चतुर रणनीति
अरविंद ने एक ऐसे टूल पर काम शुरू किया जो इंटरनेट से रियल-टाइम डेटा लाए, AI उसे सारांशित करे और साथ में स्रोत भी दे। यूज़र को अलग-अलग वेबसाइटों पर भटकना ही न पड़े।
आइडिया मज़बूत था लेकिन सबसे बड़ी चुनौती थी पैसे की। AI की दुनिया में Large Language Model बनाना सबसे महंगे कामों में से एक है। OpenAI, Meta और Google जैसी कंपनियाँ इस क्षेत्र में पहले ही करोड़ों अरबों डॉलर खर्च कर चुकी हैं।
अरविंद ने एक शानदार तरकीब निकाली। उन्होंने खुद का LLM ट्रेन करने की बजाय एग्रीगेटर मॉडल पर काम करने का फैसला किया। यानी वो उन बेहतरीन मॉडल्स का इस्तेमाल करेंगे जो दुनिया की शीर्ष कंपनियाँ पहले ही बना चुकी हैं। चाहे OpenAI का GPT हो, Meta का Llama हो या Google का Gemini।
यह इसलिए संभव था क्योंकि OpenAI अपने मॉडल का एक्सेस API के ज़रिए दूसरे डेवलपर्स को देता है और Meta ने Llama को ओपन-सोर्स कर दिया है।
इस रणनीति के तीन बड़े फायदे थे। पहला, अरबों डॉलर खर्च करने की ज़रूरत नहीं। दूसरा, किसी एक मॉडल पर निर्भरता नहीं, हमेशा बेहतर तकनीक का इस्तेमाल। तीसरा, पक्षपात की समस्या नहीं क्योंकि Perplexity AI हर बार इंटरनेट से ताज़ा डेटा लाकर स्रोत सहित जवाब देता है।
जब भी कोई यूज़र सवाल पूछता तो Perplexity AI का सिस्टम पहले इंटरनेट से रियल-टाइम जानकारी निकालकर AI मॉडल को भेजता। फिर AI उस ताज़ा डेटा को समझकर एक संक्षिप्त, स्पष्ट जवाब देता जिसके नीचे स्रोत भी जुड़े होते ताकि यूज़र चाहे तो हर बात जाँच सके।
बिना शोर के लॉन्च, फिर भी धमाका
7 दिसंबर 2022 को अरविंद ने चुपचाप Hacker News पर एक छोटी सी पोस्ट डाली। उन्होंने बताया कि उन्होंने एक ऐसा सर्च इंटरफेस बनाया है जो OpenAI के ChatGPT और Microsoft Bing दोनों की ताकत को मिलाता है। और बस इसी सादे पोस्ट के साथ Perplexity AI लाइव हो गया।
न कोई बड़ा इवेंट, न कोई मार्केटिंग बजट। बस एक सरल लिंक जहाँ Perplexity AI की सार्वजनिक यात्रा शुरू हुई।
शुरुआती यूज़र वो लोग थे जो ChatGPT को एक्सप्लोर कर रहे थे। Perplexity AI की क्षमता देखकर वो इसे सोशल मीडिया पर खुद ही साझा करने लगे। शोधकर्ता, छात्र, पत्रकार और वो लोग जिन्हें सटीक जानकारी की ज़रूरत होती है, उन्हें Perplexity AI बहुत पसंद आया।
दिसंबर 2022 में जहाँ Perplexity AI के सिर्फ 22 लाख मासिक विज़िट थे, वो दिसंबर 2023 में 4.5 करोड़ पर पहुँच गए। क्वेरी 3000 प्रतिदिन से उछलकर 40 लाख प्रतिदिन पर पहुँच गईं। अरविंद के मुताबिक सिर्फ एक साल में Perplexity AI का इस्तेमाल 1000 गुना बढ़ गया था। Perplexity AI पर औसत यूज़र सेशन 23 मिनट का था, जो Google से कहीं ज़्यादा था।
NVIDIA और Jeff Bezos का भरोसा
2023 के मध्य तक निवेशक समझ चुके थे कि यह छोटा स्टार्टअप बिना खुद का मॉडल बनाए Google के मुख्य व्यवसाय को चुनौती देने की क्षमता रखता है।
Perplexity AI ने अपने Series A राउंड में लगभग 2.5 करोड़ डॉलर जुटाए। लेकिन असली धमाका तब हुआ जब NVIDIA और Jeff Bezos ने इसमें निवेश किया। NVIDIA के Jensen Huang का निवेश यह साफ संदेश था कि Perplexity AI की तकनीक में सच में दम है और Bezos के जुड़ने से यह वैश्विक सुर्खियों में आ गया।
सितंबर 2025 में Perplexity AI की वैल्यूएशन 20 बिलियन डॉलर को पार कर गई। कंपनी 78 करोड़ सर्च प्रति माह यानी 3 करोड़ क्वेरी प्रतिदिन संभाल रही है। ट्रैफिक के हिसाब से यह दुनिया की शीर्ष 300 वेबसाइटों में शामिल हो चुकी है।
Perplexity AI, ChatGPT और DeepSeek में क्या फर्क है?
बहुत से लोगों के मन में यह सवाल है कि आखिर Perplexity AI, ChatGPT और DeepSeek से अलग कैसे है?
ChatGPT और DeepSeek लेखन और बातचीत के टूल हैं। आप उन्हें कोई भी संदर्भ दें, वो उस पर आधारित कहानियाँ, स्क्रिप्ट, ईमेल, कोडिंग सब कुछ तैयार कर देते हैं। उनका मुख्य उद्देश्य रचनात्मक कार्य और सामान्य बातचीत है।
दूसरी तरफ Perplexity AI आपका इंटरनेट शोधकर्ता है। वो खुद से कुछ कल्पना नहीं करता। वो रियल-टाइम में वेब से जानकारी लाता है, उसे सारांशित करता है और हर बात का स्रोत देता है।
कुछ लोगों को यह भी लगता है कि Perplexity AI और Fasta AI एक जैसे हैं। लेकिन ऐसा नहीं है। Fasta में जब यूज़र सवाल पूछता है तो यह खुद जवाब नहीं देता बल्कि वही प्रश्न अलग-अलग AI मॉडल जैसे ChatGPT, DeepSeek, Perplexity को भेज देता है और फिर सबके जवाब एक साथ दिखाता है। यानी Fasta का काम है अलग-अलग AI के आउटपुट की तुलना करना।
Google Perplexity AI को कॉपी क्यों नहीं करता?
एक बड़ा सवाल यह है कि अगर Perplexity AI का मॉडल इतना प्रभावी है तो Google, OpenAI या Microsoft इसे एक रात में कॉपी करके अपना Perplexity AI क्यों नहीं बना देते?
इसका पहला जवाब है Google का अपना बिज़नेस मॉडल। Google इंटरनेट की सबसे बड़ी विज्ञापन कंपनी है और Google सर्च से हर साल अरबों डॉलर की कमाई होती है। अगर Google एक ऐसा सिस्टम बना दे जो एक साफ सीधा जवाब दे दे तो यूज़र को लिंक खोलने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी और उन्हें विज्ञापन भी नहीं दिखेगा। इससे Google के अरबों डॉलर के व्यवसाय की नींव हिल जाएगी।
दूसरा कारण है प्रतिष्ठा का जोखिम। Google, OpenAI और Microsoft जैसी दिग्गज कंपनियाँ खुद को पूरे AI इकोसिस्टम की रीढ़ की तरह प्रस्तुत करती हैं। अगर ये कंपनियाँ खुद Perplexity AI जैसा न्यूट्रल स्रोत-आधारित जवाब इंजन बनाएँ तो उनकी प्रतिष्ठा पर दोहरा दबाव आ जाएगा। हर गलत, पक्षपाती या विवादास्पद जवाब की पूरी जिम्मेदारी उन्हीं की होगी।
इसके अलावा जैसे ही वो Perplexity AI जैसा उत्पाद बनाएँगे, उनका अपने ही API ग्राहकों के साथ प्रतिस्पर्धा शुरू हो जाएगी। इसलिए ये दिग्गज कंपनियाँ AI को अपने उत्पादों में एकीकृत तो कर रही हैं, लेकिन Perplexity AI जैसा शुद्ध जवाब इंजन सामने लाना उनके लिए तकनीकी के साथ-साथ प्रतिष्ठा और नियामकीय जोखिम भी है।
भविष्य की राह और अरविंद का विज़न
Perplexity AI अब शिक्षा क्षेत्र में भी विस्तार कर रहा है। अरविंद का विज़न है कि भविष्य की कक्षाओं में यह टूल एक शोध सहायक की भूमिका निभाए।
अरविंद का मानना है कि AI जवाब इंजन ही भविष्य का डिफॉल्ट इंटरफेस बनने वाला है। यूज़र जब भी कुछ सोचना, समझना, तुलना करना या विश्लेषण करना चाहेंगे तो वो सीधे Perplexity AI जैसे टूल पर आएँगे, न कि Google जैसे लिंक-आधारित सिस्टम पर।
Perplexity AI की कहानी यह साबित करती है कि अगर सोच साफ हो, दिशा सही हो और मेहनत लगातार हो तो एक मिडिल क्लास भारतीय लड़का भी Google जैसी दिग्गज कंपनी से टकरा सकता है। और न केवल टकरा सकता है बल्कि उसे उसकी ही ज़मीन पर चुनौती दे सकता है।
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