युवराज सिंह की कहानी: कैंसर को हराकर वर्ल्ड कप जीतने वाला योद्धा

भारतीय क्रिकेट के इतिहास में अगर किसी एक नाम को “जिद और जज्बे” का दूसरा रूप कहा जाए, तो वो नाम है युवराज सिंह एक ऐसा खिलाड़ी जिसने मैदान पर छह गेंदों पर छह छक्के मारकर इतिहास रचा, और मैदान के बाहर कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी को भी मात दी। युवराज सिंह की कहानी सिर्फ एक क्रिकेटर की सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि यह एक ऐसे इंसान की कहानी है जिसने हर मुश्किल को अपनी ताकत बनाया। आइए विस्तार से जानते हैं युवराज सिंह के संघर्ष, उनकी उपलब्धियों और उनकी जिंदगी की उस जंग के बारे में जिसने उन्हें असली “चैंपियन” बना दिया।

योगराज सिंह: वो पिता जिसने बेटे में जिद भर दी

युवराज सिंह की कहानी को समझने के लिए सबसे पहले उनके पिता योगराज सिंह को समझना जरूरी है। पंजाब के एक जाट सिख परिवार में जन्मे योगराज सिंह के लिए इज्जत और प्राइड ही सबसे बड़ी चीज थी। महज 13-14 साल की उम्र में स्कूल में एक शानदार बाउंसर डालने पर कोच डीपी आजाद उनसे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने योगराज की क्रिकेट ट्रेनिंग शुरू करवा दी।

योगराज सिंह ने पंजाब के डोमेस्टिक क्रिकेट सर्किट में जल्दी ही अपनी पहचान बना ली और साल 1977 में सिर्फ 19 साल की उम्र में भारत की अंडर-19 टीम में जगह बना ली — यह कपिल देव से भी दो साल पहले की बात है। बोर्ड प्रेसिडेंट्स इलेवन बनाम पाकिस्तान मैच में जावेद मियांदाद और वसीम राजा जैसे बड़े नामों को आउट करने के बाद उन्हें “शेर” का खिताब मिल गया। आखिरकार दिसंबर 1980 में उनका चयन भारतीय टीम में हुआ। अगले दो महीनों में उन्होंने छह वनडे और एक टेस्ट मैच खेला, जिसमें न्यूजीलैंड के जॉन राइट का विकेट उनके करियर का इकलौता टेस्ट विकेट रहा।

लेकिन किस्मत ने योगराज का साथ नहीं दिया। उनके पिता गंभीर रूप से बीमार पड़ गए, चोटों ने शरीर को जकड़ लिया और घरेलू क्रिकेट में प्रदर्शन गिरने लगा। नतीजा यह हुआ कि उन्हें पंजाब और नॉर्थ जोन की टीम से बाहर कर दिया गया। उसी दौर में कपिल देव नॉर्थ जोन के कप्तान थे और 1982 में भारतीय टीम के कप्तान बन गए। योगराज ने अपनी असफलता का पूरा दोष कपिल देव और सिलेक्टर बिशन सिंह बेदी पर मढ़ दिया। यह नफरत इतनी गहरी हो गई कि साल 1981 में वे लोडेड पिस्तौल लेकर कपिल देव के घर पहुंच गए और सिर्फ इसलिए रुक गए क्योंकि वहां कपिल की मां मौजूद थीं।

क्रिकेट से दूर हो चुके योगराज ने तय कर लिया कि जो सपना वे पूरा नहीं कर पाए, वह उनका बेटा पूरा करेगा।

बचपन से शुरू हुआ संघर्ष

युवराज सिंह का जन्म 12 दिसंबर 1981 को हुआ। बचपन से ही उन्हें खेल-कूद और आउटडोर एक्टिविटी पसंद थी, पढ़ाई में मन बिल्कुल नहीं लगता था। छठी कक्षा में उनके सिर्फ 37% अंक आए। मां ने कई स्कूल बदले लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ा। आखिरकार योगराज ने उन्हें पटियाला के यादवेंद्र पब्लिक स्कूल में दाखिला दिलाया, जो अपनी एथलेटिक्स संस्कृति के लिए मशहूर था। यहां युवराज को क्रिकेट नहीं बल्कि टेनिस से प्यार हो गया। वे घंटों प्रैक्टिस करते और टेनिस लीजेंड बोरिस बेकर की तरह बनना चाहते थे। एक मैच में बेकर की नकल करते हुए उन्होंने गुस्से में अपना 2100 रुपये का रैकेट तोड़ दिया। यही गलती उनकी टेनिस ट्रेनिंग का अंत बन गई — पिता ने उसी दिन उनकी टेनिस ट्रेनिंग हमेशा के लिए बंद करवा दी।

इसके बाद युवराज ने स्केटिंग शुरू की और चंडीगढ़ के सेक्टर 10 रिंक में हफ्ते में छह दिन अभ्यास करने लगे। सिर्फ 11 साल की उम्र में वे अंडर-14 नेशनल्स के लिए क्वालीफाई कर गए और 50 लैप्स की रेस में गोल्ड मेडल जीता। लेकिन जब उन्होंने गाड़ी में बैठे पिता को अपने मेडल दिखाए, तो योगराज ने मेडल और स्केट्स दोनों गाड़ी से बाहर फेंक दिए और कहा कि आज से तुम सिर्फ क्रिकेट खेलोगे। इसी दौर में युवराज ने कुछ समय बाल कलाकार के रूप में पंजाबी फिल्मों में भी काम किया, लेकिन सोनीपत में एक शूट के दौरान चलती ट्रेन के पास उनका पैर फिसल गया और वे बाल-बाल बच गए। उसी दिन उनका एक्टिंग करियर भी खत्म हो गया।

धीरे-धीरे युवराज की पसंद की हर चीज उनसे छीन ली गई, क्योंकि पिता के मन में बेटे के लिए सिर्फ एक मंजिल थी — क्रिकेट।

महारानी क्लब से शुरू हुई असली क्रिकेट यात्रा

साल 1992 में 11 साल के युवराज को पटियाला के महारानी क्लब में भर्ती कराया गया, जो शहर की क्रिकेट प्रतिभाओं का गढ़ माना जाता था। यहीं इंडियन ओपनर नवजोत सिंह सिद्धू भी नियमित रूप से अभ्यास करते थे। योगराज ने सिद्धू से युवराज की बैटिंग देखने को कहा। थोड़ी देर बाद सिद्धू ने साफ कह दिया कि यह लड़का क्रिकेट के लिए नहीं बना है। यह सुनकर योगराज इतने नाराज हुए कि उन्होंने युवराज को घर वापस ले जाकर खुद ट्रेनिंग देने का फैसला किया।

चंडीगढ़ की कड़कड़ाती ठंड में भी युवराज को सुबह चार बजे उठना पड़ता था। देर होने पर उनके ऊपर बर्फ जैसा ठंडा पानी डाल दिया जाता था। पिता ने घर के खूबसूरत बगीचे को उजाड़कर उसे मार्बल फ्लोर वाली प्रैक्टिस जगह में बदल दिया और रात में भी अभ्यास जारी रहे, इसके लिए फ्लड लाइट्स तक लगवा दीं। स्कूल और प्रैक्टिस के बीच दोस्तों से मिलने के लिए सिर्फ आधा घंटा मिलता था। हर बातचीत में सिर्फ क्रिकेट और कपिल देव का जिक्र होता। छोटे युवराज के लिए यह सब बेहद कठिन था, लेकिन उन्हें समझ आ गया था कि पिता के सामने टिके रहने का एक ही रास्ता है — क्रिकेट में बेहतर बनना।

करीब एक साल की कड़ी ट्रेनिंग के बाद 12 साल के युवराज को बिशन सिंह बेदी के क्रिकेट कैंप में दाखिला मिला। बेदी ने जल्द ही उन्हें फास्ट बॉलिंग से हटाकर बैटिंग पर फोकस करवाया और स्पिन बॉलिंग भी सिखाई। साल 1997 में सिर्फ 15 साल की उम्र में युवराज ने पंजाब के लिए फर्स्ट क्लास क्रिकेट में डेब्यू किया, लेकिन यह डेब्यू निराशाजनक रहा — शून्य पर आउट और एक कैच भी छूटा। इस वजह से उन्हें दो साल तक घरेलू क्रिकेट से बाहर रहना पड़ा।

घरेलू क्रिकेट में संघर्ष और टूटने का डर

1999 में हैदराबाद के खिलाफ वापसी की लेकिन फिर सिर्फ 20 रन बना पाए। इसी दौरान एक रणजी प्रैक्टिस मैच में 39 रन पर आउट होने के बाद घर पर एक डरावना वाकया हुआ। नाश्ते के दौरान पिता ने गुस्से में दूध का गिलास उन पर फेंक दिया और कहा कि उन्होंने उनकी इज्जत मिट्टी में मिला दी है। ऐसा लगने लगा था कि करियर शायद कहीं नहीं पहुंच पाएगा।

लेकिन 18वें जन्मदिन से पहले सब कुछ बदल गया। हरियाणा के खिलाफ उन्होंने अपनी पहली फर्स्ट क्लास सेंचुरी जड़ी — 291 गेंदों पर 149 रन। इसके बाद आया कूच बिहार ट्रॉफी का फाइनल, जहां बिहार की टीम (जिसमें युवा महेंद्र सिंह धोनी भी थे) ने कुल 357 रन बनाए, और युवराज ने अकेले 358 रन ठोक डाले — पूरी टीम से एक रन ज्यादा। इस पारी ने क्रिकेट जगत में उनका नाम गूंजा दिया और उन्हें भारत की अंडर-19 वर्ल्ड कप टीम में जगह मिल गई।

श्रीलंका में हुए अंडर-19 वर्ल्ड कप में युवराज का फॉर्म लाजवाब रहा। ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ सेमीफाइनल में सिर्फ 25 गेंदों पर 58 रन बनाकर टीम को फाइनल में पहुंचाया। फाइनल में श्रीलंका को महज 178 रन पर ऑल आउट करते हुए भारत ने खिताब जीता, और टूर्नामेंट के सबसे बेहतरीन खिलाड़ी बने युवराज सिंह — 203 रन और 12 विकेट के साथ।

अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में दमदार एंट्री

उसी दौर में भारतीय क्रिकेट मैच फिक्सिंग के विवादों से जूझ रहा था और एक बड़े बदलाव की जरूरत महसूस हो रही थी। BCCI ने नई प्रतिभाओं को तराशने के लिए नेशनल क्रिकेट एकेडमी की शुरुआत की, जिसके पहले बैच में जहीर खान, गौतम गंभीर, मोहम्मद कैफ और हरभजन सिंह जैसे खिलाड़ियों के साथ युवराज सिंह को भी चुना गया। इसी समय सौरव गांगुली को भारतीय टीम की कमान सौंपी गई, जिन्होंने निडर युवा खिलाड़ियों के साथ नई टीम बनाने की दिशा अपनाई। सितंबर 2000 में सिर्फ 18 साल की उम्र में युवराज को नैरोबी में होने वाली ICC नॉकआउट ट्रॉफी के लिए भारतीय टीम में बुलावा आया।

अपने दूसरे ही अंतरराष्ट्रीय मैच में, ऑस्ट्रेलिया जैसी मजबूत टीम के खिलाफ, युवराज ने मैकग्रा और ब्रेट ली जैसे दिग्गज गेंदबाजों का सामना करते हुए 84 रन बनाए, एक शानदार डाइविंग कैच लिया और एक डायरेक्ट हिट से रन आउट भी किया। भारत ने यह मैच जीत लिया और रातों-रात युवराज का नाम पूरे देश में गूंजने लगा। अपनी पहली बड़ी कमाई से उन्होंने मां शबनम के लिए घर खरीदा।

साल 2002 में इंग्लैंड के खिलाफ लॉर्ड्स में मोहम्मद कैफ के साथ खेली गई उनकी यादगार पारी आज भी याद की जाती है, जब 146 रन पर पांच विकेट गिरने के बाद भी टीम इंडिया ने वो मैच जीत लिया था। 2003 तक युवराज भारतीय मिडिल ऑर्डर के भरोसेमंद स्तंभ बन चुके थे और उसी साल के वर्ल्ड कप में अपनी निरंतरता से टीम को फाइनल तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई। 2004 में उन्होंने अपना पहला टेस्ट शतक भी जड़ा।

2007 T20 वर्ल्ड कप: छह गेंदों पर छह छक्के

2007 का T20 वर्ल्ड कप युवराज सिंह को क्रिकेट इतिहास में हमेशा के लिए अमर बना देने वाला था। लेकिन टूर्नामेंट से ठीक पहले उन्हें एक झटका लगा — वे उस समय वनडे टीम के उपकप्तान थे, इसलिए सबको लगा कि T20 की कप्तानी भी उन्हें मिलेगी, लेकिन यह जिम्मेदारी एमएस धोनी को सौंपी गई। बाद में एक इंटरव्यू में युवराज ने बताया कि कोच ग्रेग चैपल और सीनियर खिलाड़ियों के विवाद में उन्होंने सीनियर्स का साथ दिया था, जो कुछ BCCI अधिकारियों को पसंद नहीं आया।

टूर्नामेंट की शुरुआत में भारत-पाकिस्तान का मैच टाई होने के बाद बॉल आउट के जरिए भारत जीता। सुपर-8 में न्यूजीलैंड से हार के बाद टीम के लिए बाकी मैच जीतना जरूरी हो गया था। 19 सितंबर 2007 को इंग्लैंड के खिलाफ खेले गए मैच में युवराज 17वें ओवर में बैटिंग करने उतरे। एंड्रयू फ्लिंटॉफ से उनकी तीखी बहस हुई, जिसमें फ्लिंटॉफ ने धमकी भरे शब्द कहे। गुस्से में आए युवराज ने तय कर लिया कि अब हर गेंद को स्टेडियम से बाहर भेजेंगे।

19वें ओवर की गेंदबाजी कर रहे थे युवा गेंदबाज स्टुअर्ट ब्रॉड। उस एक ओवर में युवराज ने लगातार छह गेंदों पर छह छक्के जड़ दिए — यह कारनामा क्रिकेट इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ था। साथ ही उन्होंने सिर्फ 12 गेंदों पर अर्धशतक बनाकर सबसे तेज T20 फिफ्टी का रिकॉर्ड भी बनाया। भारत यह मैच जीता और इस जीत ने पूरी टीम का मनोबल बदल दिया। आखिरकार भारत ने पाकिस्तान को हराकर पहला T20 वर्ल्ड कप अपने नाम किया।

चोटों का दौर और टीम से बाहर होना

इस शानदार दौर के बाद युवराज सिंह की किस्मत ने फिर करवट ली। 2009 की चैंपियंस ट्रॉफी से पहले उनकी उंगली में फ्रैक्चर हो गया और टूर्नामेंट छूट गया। इससे उबरते ही दूसरे हाथ में भी फ्रैक्चर हुआ। 2010 में उन्हें दो बार डेंगू हुआ और बाद में सर्वाइकल डिस्क की समस्या से गर्दन जकड़ गई। एक चोट से उबरते ही दूसरी चोट आ घेरती। आईपीएल में किंग्स इलेवन पंजाब के कप्तान रहते हुए खराब प्रदर्शन के चलते उनसे कप्तानी छीन ली गई।

2010 के T20 वर्ल्ड कप में खराब फॉर्म के चलते उनकी आलोचना खुलकर होने लगी और जल्द ही उन्हें वनडे टीम से बाहर कर दिया गया। लोग सवाल उठाने लगे कि क्या 28 साल की उम्र में ही युवराज सिंह का करियर खत्म हो गया है। लेकिन हार मानना युवराज के स्वभाव में नहीं था। 2010 के अंत में उन्होंने रणजी ट्रॉफी और चैलेंजर ट्रॉफी जैसे घरेलू टूर्नामेंट्स में शानदार प्रदर्शन कर साबित कर दिया कि उनकी कहानी अभी खत्म नहीं हुई है। आखिरकार उन्हें फिर से भारतीय वनडे टीम में जगह मिल गई।

2011 वर्ल्ड कप: जीत के पीछे छुपी एक खामोश जंग

अब युवराज के सामने उनके करियर का सबसे बड़ा टूर्नामेंट था — 2011 का वनडे वर्ल्ड कप। बाहर से देखने पर यह टूर्नामेंट उनके लिए शानदार जा रहा था। इंग्लैंड के खिलाफ 58 रन बनाकर मैच टाई करवाया, आयरलैंड के खिलाफ अर्धशतक के साथ-साथ एक मैच में पांच विकेट लेने वाले वर्ल्ड कप इतिहास के पहले खिलाड़ी बने, और नीदरलैंड्स के खिलाफ भी अर्धशतक जड़ते हुए लगातार तीन अर्धशतकों की हैट्रिक पूरी की।

लेकिन असल में उनके अंदर एक खामोश जंग चल रही थी। उन्हें लगातार उल्टी जैसा महसूस होता, सीढ़ियां चढ़ने में भी सांस फूल जाती और महीनों से बिना नींद की दवा के सो नहीं पाते थे। किसी को अंदाजा नहीं था कि उनकी छाती में एक ट्यूमर लगातार बढ़ रहा है, जो उनके फेफड़े और दिल को धीरे-धीरे दबा रहा था। वेस्टइंडीज के खिलाफ बैटिंग करते हुए वे मैदान पर ही खून की उल्टियां करने लगे। मैच दो बार रोकना पड़ा। जब अंपायर साइमन टफेल ने उनसे पूछा कि क्या वे पवेलियन लौटना चाहेंगे, तो युवराज ने जवाब दिया कि अगर वे बेहोश हो जाएं तभी उन्हें मैदान से बाहर ले जाया जाए। उस दिन उन्होंने 113 रन बनाए और टीम को सेमीफाइनल तक पहुंचाया।

क्वार्टर फाइनल में ऑस्ट्रेलिया और सेमीफाइनल में पाकिस्तान को हराकर भारत फाइनल में पहुंचा। फाइनल से एक रात पहले भी उन्हें खून की उल्टियां हुईं, फिर भी उन्होंने प्रार्थना की कि चाहे बाद में जो हो, बस एक बार भारत वर्ल्ड कप जीत जाए। 2 अप्रैल 2011 को मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में जब धोनी ने वह ऐतिहासिक विनिंग सिक्स मारा, युवराज नॉन-स्ट्राइकर एंड पर खड़े थे। टीम इंडिया वर्ल्ड चैंपियन बन चुकी थी और 362 रन व 15 विकेट के दम पर युवराज सिंह को टूर्नामेंट का सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी चुना गया। दुनिया को लग रहा था कि वे अपने करियर की सबसे ऊंची उड़ान पर हैं, लेकिन असल में वे अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी लड़ाई की दहलीज पर खड़े थे।

कैंसर का खुलासा: मैदान के बाहर की सबसे बड़ी जंग

वर्ल्ड कप के सिर्फ आठ दिन बाद आईपीएल शुरू हुआ और युवराज ने महसूस किया कि ज्यादा ट्रेनिंग करने पर भी वे कमजोर पड़ रहे हैं और अच्छा खाना खाने के बावजूद उनका वजन घट रहा है। आईपीएल खत्म होने के बाद उनके दोस्त जतिन चौधरी ने उनकी लगातार खांसी पर ध्यान दिया और डॉक्टर पीडीएस कोहली से जांच करवाने को कहा। छाती का एक्स-रे आने पर पता चला कि उनका सिर्फ एक फेफड़ा ही नजर आ रहा है, क्योंकि दूसरे फेफड़े पर 15×13×11 सेंटीमीटर का एक बड़ा ट्यूमर दबाव बना रहा था, जिसके कैंसरस होने की आशंका जताई गई। यह सुनकर पूरा परिवार सन्न रह गया।

डॉक्टरों ने तुरंत क्रिकेट से दूरी बनाने को कहा, लेकिन युवराज ने सलाह को नजरअंदाज करते हुए वेस्टइंडीज टेस्ट सीरीज खेली। आखिरकार तबीयत इतनी बिगड़ गई कि उन्होंने क्रिकेट से ब्रेक लेकर सार्वजनिक रूप से बताया कि उन्हें एक असामान्य ट्यूमर है जिसका इलाज जरूरी है। उन्होंने तय किया कि अमेरिका के डॉक्टर लॉरेंस आइनहॉर्न से इलाज करवाएंगे, जिन्होंने कीमोथेरेपी की तकनीक में क्रांतिकारी बदलाव लाते हुए सर्वाइवल रेट को 5% से बढ़ाकर 95% तक पहुंचाया था। जांच में पता चला कि युवराज को मीडियास्टिनल सेमिनोमा नाम का एक दुर्लभ कैंसर हुआ था।

कीमोथेरेपी की पीड़ा और वापसी का संकल्प

डॉक्टरों ने इलाज तीन साइकिल में करने का फैसला किया, हर साइकिल 21 दिन की, जिसमें हर हफ्ते लगातार पांच दिनों तक शरीर में दवाएं दी जातीं ताकि तेजी से बढ़ने वाली कैंसर कोशिकाओं को खत्म किया जा सके। कीमोथेरेपी शुरू होते ही दवाओं ने सिर्फ ट्यूमर पर नहीं, बल्कि शरीर के हर तेजी से बढ़ने वाले हिस्से पर असर डाला — पेट की लाइनिंग, बोन मैरो और बाल। हर इन्फ्यूजन के बाद उन्हें तेज मतली होती, खाने की महक से ही उल्टियां शुरू हो जातीं, नींद पूरी तरह गायब हो गई थी और बाल झड़ने लगे थे। उन्हें ऐसा महसूस होता मानो त्वचा के अंदर कुछ नुकीला चुभ रहा हो। इसके बावजूद हर दिन हिम्मत जुटाकर वे इलाज के लिए जाते।

धीरे-धीरे एक के बाद एक तीनों साइकिल पूरी हुईं और जब आखिरी स्कैन आया तो पता चला कि ट्यूमर पूरी तरह गायब हो चुका है। इलाज के दौरान शरीर में सूजन के चलते उनका वजन 103 किलोग्राम तक पहुंच गया था और जो खिलाड़ी कभी जोरदार छक्के लगाता था, वही अब अपने पैरों पर खड़ा होने में संघर्ष कर रहा था। लेकिन सबसे जरूरी बात यह थी कि वे जिंदा थे और कैंसर को मात दे चुके थे।

मैदान पर वापसी और नए रिकॉर्ड

महीनों की कठिन फिजियोथेरेपी और रिहैबिलिटेशन के बाद युवराज सिंह ने आखिरकार क्रिकेट में वापसी की। 2013 में 14 करोड़ रुपये की कीमत के साथ वे आईपीएल इतिहास के सबसे महंगे खिलाड़ी बने, फिर 2015 में 16 करोड़ रुपये के साथ नया रिकॉर्ड बना डाला। 2017 में उन्होंने इंग्लैंड के खिलाफ 150 रन बनाकर अपना सर्वश्रेष्ठ वनडे स्कोर भी दर्ज किया। आखिरकार 10 जून 2019 को युवराज सिंह ने क्रिकेट से संन्यास का ऐलान किया — पीछे छोड़ गए 11,778 अंतरराष्ट्रीय रन, 148 विकेट और दो वर्ल्ड कप खिताब।

क्रिकेट के बाद की पारी और प्रेरणा

संन्यास के बाद युवराज सिंह अपनी संस्था यूवीकैन फाउंडेशन के जरिए हजारों कैंसर मरीजों की मदद कर रहे हैं। वे कई बिजनेस से जुड़े हैं और युवा क्रिकेटरों को मेंटर भी करते हैं। अपनी किताब में युवराज सिंह लिखते हैं कि जब आप युवा होते हैं और देश के लिए खेलना चाहते हैं, तब छोटी-सी चोट या असफलता भी बहुत बड़ी लगने लगती है, लेकिन एक बार मौत को इतने करीब से देख लेने के बाद जिंदगी की असली कीमत समझ आती है — सांस लेना, खाना खाना, जैसी छोटी-छोटी चीजें जिन्हें हम आमतौर पर नजरअंदाज कर देते हैं, वही सबसे कीमती लगने लगती हैं।

निष्कर्ष

युवराज सिंह की कहानी सिर्फ क्रिकेट के रिकॉर्ड्स की कहानी नहीं है, यह हार न मानने की कहानी है। एक सख्त पिता की कठोर ट्रेनिंग से लेकर वर्ल्ड कप जीतने तक, और फिर कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से जूझते हुए मैदान पर वापसी करने तक — युवराज सिंह ने हर बार साबित किया कि असली चैंपियन वह नहीं होता जो कभी हारता नहीं, बल्कि वह होता है जो हर हार के बाद फिर खड़ा होना जानता है। युवराज सिंह की यह यात्रा आज भी लाखों लोगों को प्रेरित करती है कि जिंदगी की सबसे बड़ी जंग में भी हार मानना कोई विकल्प नहीं है।

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