न्यूटन vs आइंस्टाइन: दोनों में से बड़ा जीनियस आखिर कौन था?
दुनिया के सबसे महान वैज्ञानिक कौन हैं — यह सवाल पूछो तो ज्यादातर लोग दो नाम लेते हैं। आइजैक न्यूटन और अल्बर्ट आइंस्टाइन। एक ने ग्रेविटी की खोज की और दुनिया को बताया कि चीजें नीचे क्यों गिरती हैं। दूसरे ने कहा कि ग्रेविटी असल में एक फोर्स है ही नहीं — यह तो बस एक छलावा है। एक ने कैलकुलस जैसा गणित खुद इजाद किया। दूसरे ने स्पेस और टाइम को एक ही कपड़े का हिस्सा बता दिया। न्यूटन और आइंस्टाइन दोनों ने विज्ञान की दुनिया को इस तरह बदला जैसे पहले कभी नहीं हुआ था। लेकिन सवाल यह है कि न्यूटन और आइंस्टाइन में से बड़ा जीनियस कौन था? इस सवाल का जवाब ढूंढने के लिए हमें दोनों की जिंदगी, उनकी सोच और उनकी थ्यरीज को एकदम करीब से देखना होगा।
न्यूटन और आइंस्टाइन की तुलना से पहले — विज्ञान की शुरुआत कहाँ से हुई
न्यूटन और आइंस्टाइन की कहानी समझने से पहले उस दौर को समझना जरूरी है जिसमें न्यूटन पैदा हुए। साल 1633 में रोमन चर्च ने एक महान वैज्ञानिक गैलीलियो गैलीलाई को यह धमकी दी कि अगर उन्होंने अपने वैज्ञानिक विचारों को फैलाना बंद नहीं किया तो उन्हें फांसी दे दी जाएगी। गैलीलियो की खोजें बाइबल में लिखी बातों को गलत साबित कर रही थीं।
उस दौर में लोग मानते थे कि पृथ्वी सौरमंडल का केंद्र है और सूरज तथा बाकी ग्रह पृथ्वी के चक्कर लगाते हैं। इसे जियोसेंट्रिज्म कहते हैं। लेकिन गैलीलियो ने अपने टेलिस्कोप से खुद बृहस्पति के चार चांद देखे जो बृहस्पति के चक्कर लगा रहे थे। इसका सीधा मतलब था कि सब कुछ पृथ्वी के इर्द-गिर्द नहीं घूमता। यह कोपर्निकस के हीलियोसेंट्रिक मॉडल की पुष्टि थी और चर्च के झूठ का पर्दाफाश। इसी सच्चाई की कीमत गैलीलियो को आजीवन कारावास से चुकानी पड़ी और 1642 में उनकी मौत हो गई।
लेकिन संयोग देखिए। उसी साल 1642 में क्रिसमस के दिन इंग्लैंड के लिंकनशायर में एक बच्चे का जन्म हुआ — जो इस दबी हुई सच्चाई को दुनिया के सामने लाने वाला था। वह बच्चा था आइजैक न्यूटन।
न्यूटन का बचपन — संघर्ष से शुरू हुई एक महान यात्रा
न्यूटन और आइंस्टाइन दोनों की जिंदगी संघर्ष से शुरू हुई। न्यूटन के जन्म से तीन महीने पहले ही उनके अनपढ़ किसान पिता की मृत्यु हो गई थी। जब वो तीन साल के थे तब उनकी माँ ने एक अमीर आदमी से शादी कर ली जो न्यूटन को अपनाना ही नहीं चाहता था। न्यूटन का पूरा बचपन अपने दादा-दादी के साथ बीता और माँ की गैरमौजूदगी ने उनके स्वभाव पर गहरी छाप छोड़ी।
न्यूटन एकदम अकेले रहने वाले, किसी पर भरोसा न करने वाले और बेहद जिद्दी स्वभाव के बन गए। 15 साल की उम्र में उनकी माँ ने उनकी पढ़ाई छुड़वाकर खेती में लगाना चाहा। लेकिन न्यूटन कुछ और ही मिट्टी के बने थे। खेत में काम करते हुए भी वो पेड़ के नीचे बैठकर गणित के सवाल हल किया करते थे।
स्कूल के हेडमास्टर ने न्यूटन में असाधारण प्रतिभा देखी और उनकी माँ को कैम्ब्रिज भेजने के लिए राजी किया। यहीं से न्यूटन की महानता की असली यात्रा शुरू हुई। न्यूटन और आइंस्टाइन दोनों में एक बात समान थी — स्कूल में जो पढ़ाया जाता था वो उन्हें पुराना और अधूरा लगता था।
कैम्ब्रिज में न्यूटन की क्रांतिकारी सोच
कैम्ब्रिज पहुंचते ही न्यूटन को समझ में आ गया कि यहाँ तो एरिस्टोटल के जमाने की पुरानी फिजिक्स पढ़ाई जा रही है। एरिस्टोटेलियन फिजिक्स के अनुसार ग्रेविटी जैसी कोई चीज होती ही नहीं। हर वस्तु की एक नेचुरल टेंडेंसी होती है — आराम की अवस्था में आने की। बड़ी वस्तु पहले गिरेगी, छोटी बाद में।
लेकिन न्यूटन को यह बात हजम नहीं हो रही थी क्योंकि उन्होंने गैलीलियो के उस मशहूर प्रयोग के बारे में पढ़ा था जो उन्होंने 1589 में पीसा की मीनार से किया था। गैलीलियो ने दो अलग-अलग वजन की गेंदें एक साथ गिराईं और दोनों एक साथ जमीन पर पहुंचीं। यानी वस्तु का वजन उसके गिरने की रफ्तार को प्रभावित नहीं करता।
न्यूटन और आइंस्टाइन दोनों ने अपने-अपने समय की मान्यताओं को चुनौती दी। न्यूटन ने गैलीलियो, कोपर्निकस, डेकार्ट्स जैसे आधुनिक विचारकों की किताबें खुद पढ़ीं। उन्होंने एक नोटबुक बनाई जिसका नाम था “Questiones Quaedam Philosophiae” यानी कुछ दार्शनिक प्रश्न। उसमें उन्होंने लिखा — “एरिस्टोटल मेरे दोस्त हैं, प्लेटो मेरे दोस्त हैं, लेकिन मेरी सबसे बड़ी दोस्त है सच्चाई।”
न्यूटन की ग्रेविटी की खोज — एक सेब से यूनिवर्स तक
न्यूटन और आइंस्टाइन की ग्रेविटी की अवधारणाएं आमने-सामने रखें तो पहले न्यूटन को समझना जरूरी है। जब न्यूटन ने चीजों को नीचे गिरते हुए देखा तो उनके दिमाग में दो बड़े सवाल उठे।
पहला — क्या यह नीचे गिरने की प्रवृत्ति किसी बल यानी फोर्स की वजह से है? और क्या यही बल हमारे चांद को पृथ्वी की कक्षा में बनाए रखता है? उस समय केप्लर के ग्रहों की गति के नियम आ चुके थे। यह पता था कि चांद पृथ्वी के चारों ओर अंडाकार कक्षा में घूमता है। लेकिन क्यों — यह कोई नहीं जानता था।
न्यूटन ने अपने प्रसिद्ध थॉट एक्सपेरिमेंट “न्यूटंस कैनन बॉल” से इसे समझाया। अगर एक तोप के गोले को कम ताकत से दागो तो पृथ्वी उसे नीचे खींच लेगी। बहुत ज्यादा ताकत से दागो तो वो अंतरिक्ष में उड़ जाएगा। लेकिन बिल्कुल सही ताकत से दागो तो वो हमेशा नीचे गिरता रहेगा — पर पृथ्वी की सतह को कभी नहीं छुएगा। इसी को कक्षा कहते हैं। यही बल जो सेब को नीचे गिराता है वही चांद को पृथ्वी के चारों ओर घुमाता है।
दूसरा बड़ा सवाल था — किसी गिरती हुई वस्तु की किसी खास पल की स्पीड कैसे मापें? इस सवाल का जवाब देने के लिए न्यूटन ने एक नया गणित ही इजाद कर लिया — कैलकुलस। आज की 80 फीसदी फिजिक्स इसी कैलकुलस पर टिकी है।
न्यूटन ने अंततः ग्रेविटी का यूनिवर्सल नियम दिया जिसे इनवर्स स्क्वायर लॉ भी कहते हैं। उन्होंने गिरती वस्तुओं, चांद की गति और केप्लर के नियमों को एक साथ जोड़कर यह साबित किया कि ग्रेविटी एक सार्वभौमिक बल है जो पूरे ब्रह्मांड में एक जैसा काम करता है। इसके बाद न्यूटन ने गति के तीन नियम दिए जो आज भी हर स्कूल और कॉलेज में पढ़ाए जाते हैं।
न्यूटन की यह किताब “Principia Mathematica” विज्ञान की बाइबल बन गई और 200 साल तक इसे पत्थर की लकीर माना गया।
जहाँ न्यूटन की थ्यरी में दरारें आईं
न्यूटन और आइंस्टाइन की असली बहस तब शुरू हुई जब न्यूटन के नियमों में खामियां दिखने लगीं। न्यूटन के जाने के बाद वैज्ञानिक उनके मॉडल से ग्रहों की कक्षाएं अच्छे से प्रेडिक्ट कर पा रहे थे। लेकिन एक छोटे से ग्रह — बुध ने न्यूटन के कायदे-कानूनों को मानने से इनकार कर दिया।
बुध की कक्षा को न्यूटोनियन मॉडल से प्रेडिक्ट करने में हर बार करीब 43 आर्क सेकंड प्रति शताब्दी की गड़बड़ी आ रही थी। 1846 में वैज्ञानिक अर्बेन लेवेरियर ने सोचा शायद कोई छुपा हुआ ग्रह “विल्कन” है जिसकी ग्रेविटी बुध के साथ दखल दे रही है। लेकिन यह ग्रह कभी नहीं दिखा। और इस एक छोटी सी गणना की गलती ने न्यूटन की थ्यरी पर सवालिया निशान खड़े कर दिए।
आइंस्टाइन का बचपन — एक अलग ही दुनिया में खोया हुआ बच्चा
न्यूटन और आइंस्टाइन दोनों की शुरुआत अजीब थी। आइंस्टाइन चार साल की उम्र तक बोलना नहीं सीखे थे। उनके माता-पिता को डर था कहीं इन्हें कोई बोलने की बीमारी तो नहीं। बचपन में आइंस्टाइन एकदम शांत और अपनी ही दुनिया में खोए रहने वाले बच्चे थे। पढ़ाई में वो औसत थे लेकिन स्कूल की रटने वाली पढ़ाई और बेकार नियम उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं थे। वो स्कूल को एक जेल की तरह देखते थे।
लेकिन जिज्ञासु सवाल पूछना, थॉट एक्सपेरिमेंट करना और गणित सीखना — इसमें उनकी गजब की दिलचस्पी थी। 12 साल की उम्र तक उन्होंने खुद कैलकुलस और ज्योमेट्री सीख ली थी। 14 साल की उम्र से उन्होंने असली प्रयोग करने शुरू कर दिए थे।
उसी दौरान एक सवाल उन्हें बेहद परेशान करता था — अगर वो खुद एक प्रकाश की किरण बन जाएं और पूरे ब्रह्मांड में घूमें तो उन्हें अपने नजरिए से यह यूनिवर्स कैसा दिखेगा? न्यूटन और आइंस्टाइन दोनों में एक खूबी समान थी — दोनों असाधारण कल्पनाशक्ति के मालिक थे।
मैक्सवेल के नियम और वो भटकाव जिसने आइंस्टाइन को जन्म दिया
आइंस्टाइन के समय में दो बड़ी थ्यरीज विज्ञान की रीड की हड्डी थीं — न्यूटन के गति के नियम और जेम्स क्लर्क मैक्सवेल के इलेक्ट्रोमैग्नेटिज्म के नियम। मैक्सवेल के नियम बताते थे कि प्रकाश एक इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरंग है और इसकी गति हर देखने वाले के लिए हमेशा एक जैसी रहनी चाहिए — लगभग 3 लाख किलोमीटर प्रति सेकंड।
यह न्यूटन के साधारण बोध से टकराता था। न्यूटन के हिसाब से दो वेग जुड़ने चाहिए। अगर एक अंतरिक्ष यान 2 लाख किमी प्रति सेकंड की रफ्तार से जा रहा हो और उसमें से प्रकाश छोड़ा जाए तो किसी स्थिर दर्शक को प्रकाश की गति 5 लाख किमी प्रति सेकंड दिखनी चाहिए। लेकिन प्रकाश के साथ ऐसा नहीं होता। प्रकाश की गति हमेशा 3 लाख किमी प्रति सेकंड ही रहती है।
1887 में माइकलसन और मोरले ने एक प्रयोग किया। वो “ईथर” नामक माध्यम का अस्तित्व साबित करने निकले थे जिससे होकर प्रकाश यात्रा करता माना जाता था। लेकिन उनके प्रयोग ने उल्टा साबित कर दिया — ईथर नाम का कोई माध्यम है ही नहीं और प्रकाश की गति सच में हर दर्शक के लिए एक जैसी रहती है।
इस पहेली ने पूरी विज्ञान की दुनिया को हिला दिया। न्यूटन और आइंस्टाइन के बीच की यह असली टकराहट यहीं से शुरू हुई।
आइंस्टाइन की स्पेशल थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी — न्यूटन को पहली चुनौती
1905 में आइंस्टाइन ने एक वैज्ञानिक पेपर प्रकाशित किया जिसका नाम था “Electrodynamics of Moving Bodies”। इस पेपर में उन्होंने ईथर के पूरे कांसेप्ट को ही नकार दिया। साथ ही न्यूटन के नियमों की कई बड़ी खामियों पर उंगली उठाई।
आइंस्टाइन ने ईथर की जगह एक बिल्कुल नया और चौंकाने वाला कांसेप्ट दिया — स्पेस-टाइम। उन्होंने कहा कि हम जो खाली अंतरिक्ष देखते हैं वो सिर्फ स्पेस नहीं है। वो स्पेस-टाइम है — तीन दिशाओं वाला स्पेस और एक दिशा वाला टाइम मिलकर एक ही कपड़ा बनाते हैं। स्पेस और टाइम एक-दूसरे से अलग नहीं किए जा सकते।
न्यूटन और आइंस्टाइन के मॉडल का यह पहला बड़ा फर्क था। न्यूटन के लिए समय एक अलग और स्वतंत्र चीज थी जो सब जगह एक जैसी बहती है। आइंस्टाइन के लिए समय स्पेस से जुड़ा हुआ है और यह जुड़ाव बदलता रहता है।
टाइम डिलेशन — वो कांसेप्ट जो न्यूटन की दुनिया से परे था
स्पेस-टाइम को समझने से एक और कांसेप्ट निकलता है जो न्यूटन और आइंस्टाइन के फर्क को और गहरा करता है। आइंस्टाइन के अनुसार हर वस्तु हमेशा स्पेस-टाइम में प्रकाश की गति से यात्रा करती है। जब कोई वस्तु स्पेस में तेज चलती है तो उसकी समय में चलने की गति धीमी हो जाती है। इसे टाइम डिलेशन कहते हैं।
मान लो एक अंतरिक्ष यान में आप बैठे हैं। जब तक यान चल नहीं रहा आप बिल्कुल वजनहीन महसूस करते हैं। जैसे ही यान 9.8 मीटर प्रति सेकंड स्क्वायर की रफ्तार से तेज होने लगे आपको बिल्कुल वैसा ही एहसास होगा जैसा पृथ्वी पर होता है। आइंस्टाइन ने अपने इक्विवेलेंस प्रिंसिपल से यह साबित किया कि त्वरण और ग्रेविटी दोनों एक जैसे महसूस होते हैं।
आइंस्टाइन की ग्रेविटी — न्यूटन की ग्रेविटी से कितनी अलग
न्यूटन और आइंस्टाइन के बीच ग्रेविटी को लेकर सबसे बड़ा फर्क यहीं है। न्यूटन के लिए ग्रेविटी एक बल था जो दो वस्तुओं को आपस में खींचता है। लेकिन आइंस्टाइन कहते हैं कि ग्रेविटी कोई बल नहीं है — यह स्पेस-टाइम का मुड़ाव यानी कर्वेचर है।
पृथ्वी का द्रव्यमान अपने आसपास के स्पेस-टाइम को तीनों दिशाओं से मोड़ देता है। जो भी वस्तु इस मुड़े हुए क्षेत्र में आती है उसका रास्ता पृथ्वी की ओर मुड़ जाता है — बिना किसी बल के।
एक सरल प्रयोग से यह समझें। एक बोतल लो जिसमें चारों तरफ छेद हों और उसमें पानी भरो। पानी नीचे गिर रहा होगा। अब उस बोतल को ऊपर से छोड़ दो। जब बोतल गिर रही होगी तो पानी बाहर आना बंद हो जाएगा। क्योंकि अब बोतल पर कोई बल नहीं है — वो इनर्शिया में है। यही आइंस्टाइन का फ्री फॉल है।
न्यूटन vs आइंस्टाइन: गेंद नीचे गिरती है या जमीन ऊपर आती है
न्यूटन और आइंस्टाइन के नजरिए का सबसे बड़ा टकराव यहाँ है। न्यूटन कहते हैं — गेंद नीचे गिरती है क्योंकि ग्रेविटी की फोर्स उसे पृथ्वी की ओर खींचती है। आइंस्टाइन कहते हैं — गेंद नीचे गिरती ही नहीं। गेंद तो अपनी जगह है। जमीन ऊपर आ रही है।
यह सुनने में बेतुका लगता है। लेकिन यह सच है। पृथ्वी का द्रव्यमान स्पेस-टाइम को अपनी ओर संकुचित करने की कोशिश करता है — जैसे एक ब्लैक होल अपने चारों ओर के स्पेस को खींचता है। लेकिन पृथ्वी का जो पदार्थ है उसके बीच विद्युत-चुंबकीय प्रतिकर्षण बल होता है जो इस संकुचन को रोकता है। इसलिए पृथ्वी बाहर की ओर त्वरित होती है। और यही हमें नीचे की ओर खिंचाव जैसा महसूस कराता है।
अगर आप एक्सेलेरोमीटर जमीन पर रखें तो वो सच में 9.8 मीटर प्रति सेकंड स्क्वायर का त्वरण दिखाएगा। यानी जमीन वाकई तेज हो रही है।
असली ग्रेविटी और नकली ग्रेविटी — फर्क जानना जरूरी है
न्यूटन और आइंस्टाइन के मॉडल को पूरी तरह समझने के लिए असली ग्रेविटी और नकली ग्रेविटी का फर्क समझना बेहद जरूरी है।
आइंस्टाइन के लिए असली ग्रेविटी वो है जो स्पेस-टाइम के कर्वेचर की वजह से लंबी दूरी पर रास्तों में बदलाव लाती है। एक कर्व्ड सतह पर दो समांतर रेखाएं अंततः आपस में मिल जाती हैं या एक-दूसरे से दूर हो जाती हैं। यही असली ग्रेविटी है।
वहीं जो हम रोज महसूस करते हैं — वो ज्यादातर नकली ग्रेविटी है। यह पृथ्वी के त्वरण की वजह से हमें फोर्स जैसी फीलिंग होती है। जब आप पुश-अप्स मार रहे हों या कुर्सी पर बैठे हों तो आप जो वजन महसूस करते हो वो असल में स्पेस-टाइम कर्वेचर की असली ग्रेविटी नहीं है बल्कि त्वरण से पैदा हुआ भ्रम है।
लंबी दूरी पर — जैसे किसी वस्तु को करोड़ों फीट ऊपर से गिराएं — तब स्पेस-टाइम कर्वेचर की असली ग्रेविटी सामने आती है और उस वक्त न्यूटन का मॉडल गलत होने लगता है जबकि आइंस्टाइन का एकदम सटीक।
न्यूटन के नियम गलत हैं तो फिर भी स्कूलों में क्यों पढ़ाए जाते हैं
यह सवाल हर किसी के मन में उठता है। अगर न्यूटन और आइंस्टाइन की तुलना में आइंस्टाइन का मॉडल ज्यादा सही है तो न्यूटन के नियम अभी भी क्यों पढ़ाए जाते हैं?
जवाब सरल है। रोजमर्रा की जिंदगी में, छोटी दूरियों में और कम गति पर न्यूटन का मॉडल बेहद कारगर है। इंजीनियरिंग, निर्माण, कार-मोटर, पुल — यह सब न्यूटन के नियमों पर ही टिके हैं। न्यूटन का मॉडल एक बेहतरीन सरलीकरण है जो रोजाना के काम के लिए पर्याप्त है।
आइंस्टाइन का मॉडल तभी जरूरी होता है जब अत्यधिक गति, बहुत भारी पिंड या बड़ी दूरियां शामिल हों — जैसे ब्लैक होल, जीपीएस सैटेलाइट और ब्रह्मांड की बनावट को समझना। जीपीएस सिस्टम को बिना आइंस्टाइन की थ्यरी के सटीक नहीं बनाया जा सकता।
न्यूटन और आइंस्टाइन दोनों की थ्यरीज अलग-अलग परिस्थितियों में काम में आती हैं।
न्यूटन vs आइंस्टाइन — आखिर बड़ा जीनियस कौन
न्यूटन और आइंस्टाइन दोनों की तुलना करना लगभग असंभव है क्योंकि दोनों अलग-अलग दौर में अलग-अलग चुनौतियों से लड़े।
न्यूटन ने उस दौर में काम किया जब विज्ञान की एबीसी भी नहीं बनी थी। उन्होंने ग्रेविटी की खोज की, कैलकुलस इजाद किया और गति के तीन नियम दिए। उन्होंने एक ऐसा ढांचा खड़ा किया जो अगले 200 साल तक अटूट रहा। यह काम उन्होंने एक ऐसे समय में किया जब न उनके पास कोई रोल मॉडल था, न संसाधन थे।
आइंस्टाइन ने उस ढांचे को आगे बढ़ाया और उसकी सीमाओं को उजागर किया। लेकिन आइंस्टाइन खुद मानते थे कि न्यूटन के बिना वो कुछ भी न होते। आइंस्टाइन ने अपनी आत्मकथा में लिखा था कि न्यूटन उच्चतम कोटि के रचनात्मक प्रतिभाशाली थे।
जैसे दुनिया के सर्वश्रेष्ठ शतरंज खिलाड़ी मैग्नस कार्लसन से पूछा गया कि सबसे बड़ा खिलाड़ी कौन है तो उन्होंने अपना खुद का नाम छोड़कर अपनी प्रेरणा गैरी कास्पारोव का नाम लिया। ठीक उसी तरह आइंस्टाइन ने न्यूटन को अपना आदर्श माना।
न्यूटन ने हमें धरती पर चलना सिखाया। आइंस्टाइन ने बताया कि धरती खुद दौड़ रही है। एक ने पूछा — सेब को नीचे कौन खींचता है? दूसरे ने पूछा — सेब के चारों ओर का स्पेस कौन मोड़ता है? एक ने ब्रह्मांड को एक परफेक्ट घड़ी की तरह देखा। दूसरे ने इसे खिंचने-सिकुड़ने वाले एक कपड़े की तरह।
न्यूटन और आइंस्टाइन — दोनों ही अपने-अपने तरीके से अतुलनीय थे।
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