ओल्ड मॉक रम की कहानी: 150 साल पुरानी विरासत और वापसी
कुछ चीजें होती हैं जो सिर्फ प्रोडक्ट नहीं रहतीं — वो इमोशन बन जाती हैं। ओल्ड मॉक रम ऐसी ही एक चीज है। आर्मी के जवानों ने इसे ठंड से बचने और देश की सेवा करते हुए पिया। दोस्तों ने इसे जिंदगी के सबसे खूबसूरत पलों में पिया। और कुछ लोगों ने इसे पुरानी यादों को भुलाने के लिए पिया। लेकिन जिसने भी एक बार ओल्ड मॉक रम पी, वो इसका दीवाना हो गया। यही वजह है कि बिना एक रुपये विज्ञापन खर्च किए ओल्ड मॉक रम इंडिया का सबसे ज्यादा पसंद किया जाने वाला रम ब्रांड बन गया।
लेकिन इतनी वफादारी के बावजूद 2017 में ओल्ड मॉक रम लगभग खत्म होने की कगार पर आ गई थी। और फिर जो हुआ वो किसी ने नहीं सोचा था। ओल्ड मॉक रम की यह कहानी 150 साल से भी ज्यादा पुरानी है। इसमें जलियांवाला बाग भी है, जवाहरलाल नेहरू भी हैं और है वो इंसान जिसने अपने ही मालिक की कंपनी खरीदकर खड़ी कर दी इंडिया की वो रम ब्रांड जो ब्रांड कम और विरासत ज्यादा बन गई।
ओल्ड मॉक रम की जड़ें — 1855 से शुरू हुई एक अंग्रेज की कहानी
ओल्ड मॉक रम की कहानी शुरू होती है 1855 से। उस समय इंडिया में ब्रिटिश राज था और ब्रिटिश सैनिकों को बियर पीने की आदत थी। लेकिन बियर उस दौर में इंडिया तो क्या पूरे एशिया में कहीं नहीं बनती थी। इसे इंग्लैंड से मंगवाना पड़ता था जो महंगा भी था और समय लेने वाला भी।
तभी इस कहानी में एंट्री होती है एडवर्ड डायर नाम के एक अंग्रेज की। एडवर्ड ने इंजीनियरिंग पढ़ी थी और सेना में करियर बनाने का सपना देखा था लेकिन किसी वजह से सेना नहीं जा पाए। तब उनके भाई जॉन ने सुझाया कि इंडिया में बियर की जबरदस्त मांग है — क्यों न वहाँ ब्रेवरी शुरू की जाए? एडवर्ड को यह आइडिया पसंद आया।
इंग्लैंड में अपना घर गिरवी रखकर एडवर्ड इंडिया आए। 1840 में उन्होंने पहली बार ब्रेवरी चलाने की कोशिश की लेकिन गर्म और मैदानी इलाकों में यह कोशिश नाकाम रही क्योंकि बियर बनाने के लिए ठंडा और नम मौसम जरूरी होता है। एक बार असफल होने के बाद एडवर्ड ने हिमाचल के कसौली में नई ब्रेवरी शुरू की जहाँ का मौसम बिल्कुल स्कॉटलैंड जैसा था। यहाँ सफलता मिली और एडवर्ड पूरे इंडिया में ब्रिटिश सैनिकों को बियर सप्लाई करने लगे।
डायर और मैकेन का मिलन — एशिया की पहली बियर ब्रांड
जब एडवर्ड डायर अपना बिजनेस और आगे बढ़ाना चाहते थे तब उन्होंने कसौली की ब्रेवरी एच जी मैकेन नाम के एक व्यापारी को बेच दी और खुद रावलपिंडी, लखनऊ और मांडले जैसी जगहों पर नई ब्रेवरीज शुरू कर दीं। उधर मैकेन ने भी कसौली के बाद सोलन और शिमला में विस्तार किया।
पहले विश्वयुद्ध के दौरान सैनिकों के लिए बियर की माँग बहुत बढ़ गई। इसी दौर में दोनों कंपनियाँ एक साथ आईं और बनी डायर मैकेन कंपनीज लिमिटेड। यह कंपनी इतनी बड़ी हो गई कि 1937 में लंदन स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्ट हुई।
इस कंपनी का सबसे बड़ा प्रोडक्ट था लायन बियर — एशिया की पहली बियर ब्रांड। यह बियर इतनी मशहूर हुई कि न्यूजीलैंड और दक्षिण अफ्रीका में भी इससे प्रेरित होकर लायन बियर ब्रांड शुरू किए गए। आज भी श्रीलंका में लायन बियर नंबर एक ब्रांड है।
यहाँ एक दिलचस्प बात यह है कि जनरल रेनॉल्ड डायर — जिसने जलियांवाला बाग में निहत्थे लोगों पर गोलियाँ चलाने का हुक्म दिया था — वो एडवर्ड डायर के ही बेटे थे।
आजादी के बाद — एक भारतीय ने खरीदी अंग्रेजों की कंपनी
1947 में देश आजाद हुआ। सभी ब्रिटिश मालिक कंपनियाँ बेचकर वापस जाने लगे। डायर मैकेन के ब्रिटिश मालिकों ने भी कई भारतीय व्यापारियों को प्रस्ताव दिया लेकिन इतनी बड़ी कंपनी जल्दी कोई खरीदने को तैयार नहीं था।
तभी आगे आए नरेंद्रनाथ मोहन। वो कोई बड़े व्यापारी नहीं थे। विभाजन में सब कुछ पीछे छोड़कर आए उन करोड़ों लोगों में से एक थे। कसौली में उन्होंने नए सिरे से काम शुरू किया था और एच जी मैकेन ब्रेवरी को सामान सप्लाई करते थे। आजादी के दो साल बाद उन्होंने पैसे जोड़े और लंदन जाकर डायर मैकेन को उसके मालिक से खरीद लिया।
यह सिर्फ एक व्यापारिक सौदा नहीं था। यह एक बयान था — कंपनी अब भारतीयों के हाथ में है।
शुरू में उन्होंने नाम नहीं बदला क्योंकि व्यापारिक दुनिया में डायर मैकेन का नाम बड़ा था। लेकिन 1960 के आसपास एक घटना ने उन्हें नाम बदलने पर मजबूर कर दिया।
नेहरू और वो ऐतिहासिक इनकार जिसने नाम बदल दिया
ओल्ड मॉक रम की कहानी में यह मोड़ बड़ा दिलचस्प है। 1960 तक बिजनेस अच्छा चल रहा था। एनएन मोहन को जब पता चला कि प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू शिमला आ रहे हैं तो उन्होंने उन्हें ब्रेवरी देखने का न्योता दिया। लेकिन नेहरू ने साफ मना कर दिया।
वजह थी कंपनी का नाम — डायर मैकेन। वही डायर जिसके बेटे ने जलियांवाला बाग में निहत्थे लोगों पर गोलियाँ चलवाई थीं। एक प्रधानमंत्री उस नाम से जुड़ी किसी भी जगह पर नहीं जा सकते थे।
एनएन मोहन को बात समझ आई। और 1966 में डायर मैकेन ब्रेवरीज का नाम बदलकर हो गया मोहन मैकेन ब्रेवरीज। यही वो कंपनी है जिसने ओल्ड मॉक रम को दुनिया के सामने रखा।
ओल्ड मॉक रम का जन्म — सात साल की तपस्या से बनी एक किंवदंती
ओल्ड मॉक रम को बनाया था एनएन मोहन के बड़े बेटे कर्नल वेद रतन मोहन ने। आर्मी से रिटायर होने के बाद वो यूरोप गए जहाँ उन्होंने फ्रांस और बेल्जियम में बेनेडिक्टाइन भिक्षुओं को देखा जो 500 सालों से एक गुप्त रेसिपी से लिकर बनाते आ रहे थे — 27 जड़ी-बूटियों और मसालों को मिलाकर।
एक फौजी इंसान जिसने पूरी जिंदगी अनुशासन और धैर्य में बिताई, उसे इन भिक्षुओं में अपना अक्स दिखा। वो भारत लौटे और उसी तरह एक शानदार रम बनाने में जुट गए।
ओल्ड मॉक रम को सात साल तक ओक के बैरल में रखा गया। कोई जल्दबाजी नहीं, कोई शॉर्टकट नहीं। रम धीरे-धीरे लकड़ी से वेनिला और कैरेमल के फ्लेवर सोखती रही। जितना ज्यादा समय बैरल में — उतना गहरा स्वाद और उतनी प्रीमियम क्वालिटी। उसमें मसाले डाले गए और एक भिक्षु का चेहरा बोतल पर लगाकर ओल्ड मॉक रम को पैक किया गया।
ओल्ड मॉक रम की बोतल की भी एक दिलचस्प कहानी है। कर्नल वेद रतन को ओल्ड पार व्हिस्की की झुर्रीदार बोतल बहुत पसंद थी। उन्होंने ओल्ड मॉक के लिए भी वैसी ही बोतल बनाई। लेकिन ओल्ड पार ने कोर्ट में केस कर दिया। समझौते में ओल्ड पार को मिली गहरी बोतल और ओल्ड मॉक रम को मिली पारदर्शी स्कॉट बोतल — जो आज भी वैसी ही है।
19 दिसंबर 1954 को एनएन मोहन की देखरेख में ओल्ड मॉक रम आधिकारिक रूप से लॉन्च हुई।
ओल्ड मॉक रम और आर्मी — एक अटूट रिश्ता
ओल्ड मॉक रम जब बाजार में आई तो सबसे पहले दो जगहों पर बिकी — आर्मी कैंटीन और फाइव स्टार होटल। उस समय रम को गरीबों की शराब माना जाता था। इसी छवि को बदलने के लिए ओल्ड मॉक रम को पहले इन्हीं दो जगहों पर उतारा गया।
उस दौर में आर्मी कैंटीन में हर्कुलस रम का बोलबाला था। ओल्ड मॉक रम को उसी से मुकाबला करना था। लेकिन ओल्ड मॉक रम के स्वाद ने कमाल किया। सैनिकों ने ओल्ड मॉक रम को चुना और यहाँ से यह रम हर किसी तक फैलती चली गई।
ओल्ड मॉक रम हर दोस्तों की महफिल में जगह बनाने लगी। सर्दियों में, पहाड़ों पर, यारों के साथ। ओल्ड मॉक रम सिर्फ एक पेय नहीं रही — यह एक इमोशन बन गई। और 2003 तक ओल्ड मॉक रम इंडिया का सबसे ज्यादा बिकने वाला लिकर ब्रांड बन गई। सालाना 80 लाख बोतलें। दुनिया के टॉप तीन डार्क रम में शामिल। और यह सब हुआ बिना एक रुपये विज्ञापन खर्च किए।
उस जीनियस की कहानी जिसने ओल्ड मॉक रम बनाई — और जल्दी चला गया
ओल्ड मॉक रम की कहानी में एक दुखद मोड़ भी है जो बहुत कम लोग जानते हैं। जब जनवरी 2018 में ब्रिगेडियर कपिल मोहन का निधन हुआ तो सभी अखबारों और टीवी चैनलों ने लिखा — ओल्ड मॉक रम के निर्माता चले गए।
लेकिन यह सच नहीं था। ओल्ड मॉक रम को बनाया था कर्नल वेद रतन मोहन ने — कपिल के बड़े भाई ने। कपिल तो उस समय कंपनी के वितरण विभाग को संभाल रहे थे। दुर्भाग्य से वेद रतन जी महज 48 साल की उम्र में 1973 में ही इस दुनिया से चले गए। उनकी जल्दी विदाई ओल्ड मॉक रम की कहानी का सबसे दुखद अध्याय है।
ओल्ड मॉक रम का पतन — जब प्रतिस्पर्धा ने घेर लिया
2003 तक सब ठीक था। लेकिन उसके बाद ओल्ड मॉक रम धीरे-धीरे नीचे जाने लगी। वजह थी उदारीकरण। विदेशी ब्रांड्स भारत में आने लगे। यूनाइटेड स्पिरिट्स, रेडिको खैतान और मैक्डॉवेल्स जैसे ब्रांड्स ने वो किया जो मोहन मैकेन ने कभी नहीं किया था — आक्रामक मार्केटिंग।
मैक्डॉवेल्स सेलिब्रेशन रम ने करोड़ों रुपये खर्च किए। मशहूर हस्तियाँ लाईं। युवा दर्शकों को निशाना बनाया। 2005 में पहली बार ऐसा हुआ कि मैक्डॉवेल्स सेलिब्रेशन ओल्ड मॉक रम से आगे निकल गई।
ओल्ड मॉक रम के सामने अब एक साफ चुनाव था — या तो विज्ञापन करो या पीछे रह जाओ। लेकिन कपिल मोहन चुपचाप बैठे रहे। उनकी सोच एकदम साफ थी — क्वालिटी खुद बोलती है, विज्ञापन पर एक पैसा नहीं।
ओल्ड मॉक रम पर मुसीबतों का पहाड़
ओल्ड मॉक रम पर एक साथ कई मुसीबतें आईं। यूपी और उत्तराखंड में लिकर वितरण का ठेका मिला पोंटी चड्ढा को — जो राजनीतिक रूप से बहुत ताकतवर थे और मोहन मैकेन से पुरानी दुश्मनी रखते थे। उन्होंने अपनी राजनीतिक शक्ति का इस्तेमाल किया और 2009 में मोहन मैकेन की लखनऊ फैक्ट्री रातोंरात बंद करा दी।
नतीजा — ओल्ड मॉक रम यूपी और उत्तराखंड की हर शराब की दुकान से गायब हो गई। यह बहुत बड़ा झटका था क्योंकि यही दोनों राज्य ओल्ड मॉक रम का सबसे बड़ा बाजार थे।
उसी दौरान भारतीय सेना — जो दशकों से ओल्ड मॉक रम की सबसे वफादार ग्राहक थी — उसने भी 2008 में रेडिको खैतान की कॉन्टेसा रम को प्राथमिकता देना शुरू कर दिया। जिस सेना के साथ ओल्ड मॉक रम ने अपनी पूरी शुरुआती वृद्धि की थी उसी ने मुंह फेर लिया।
दक्षिण भारत में भी तमिलनाडु में सप्लाई चेन बुरी तरह बिगड़ गई और ओल्ड मॉक रम वहाँ से भी धीरे-धीरे गायब होने लगी। ओल्ड मॉक रम चारों तरफ से घिर चुकी थी।
कपिल मोहन — वो इंसान जो कभी नहीं झुका
ओल्ड मॉक रम की कहानी में कपिल मोहन एक अनूठी शख्सियत हैं। 42 साल तक उन्होंने कंपनी चलाई। जिंदगी में कभी एक घूंट भी नहीं पिया लेकिन इंडिया का सबसे बड़ा लिकर ब्रांड उन्हीं के हाथों में था।
लोग कहते थे — विज्ञापन करो, नया प्रोडक्ट लाओ, युवाओं को टारगेट करो। लेकिन कपिल मोहन ने किसी की नहीं सुनी। उनका मानना था कि जो ओल्ड मॉक रम को पसंद करते हैं वो खुद ही हमारे पास आएंगे।
यह सोच 1954 में सही थी। लेकिन 2000 के बाद यही सोच ब्रांड की सबसे बड़ी दुश्मन बन गई।
एक दिलचस्प किस्सा और। 1993 में जब कपिल मोहन इंडियन एयरलाइंस की फ्लाइट IC436 में लखनऊ से दिल्ली जा रहे थे तो चार छात्रों ने परीक्षा स्थगित कराने के लिए उसे हाईजैक कर लिया। उस संकट में भी कपिल मोहन ने हाईजैकरों को काबू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बिजनेस में जो जिद थी वही जिंदगी में भी थी।
जनवरी 2018 में 88 साल की उम्र में कपिल मोहन ने इस दुनिया को विदा किया। एक युग खत्म हुआ।
ओल्ड मॉक रम की वापसी — गिरावट में बोया बीज बना किंवदंती
लेकिन ओल्ड मॉक रम की कहानी यहाँ खत्म नहीं हुई। मोहन परिवार की तीसरी पीढ़ी ने कमान संभाली। उन्होंने देखा कि ब्रांड गिर रही है लेकिन लोगों के दिलों में ओल्ड मॉक रम की जगह अभी भी है। एक भावनात्मक जुड़ाव था जिसे कोई प्रतिस्पर्धी नहीं तोड़ पाया था।
बिना किसी प्रेस रिलीज के, बिना किसी घोषणा के, 2013 में ओल्ड मॉक रम की एक नई बोतल बाजार में उतारी गई — ओल्ड मॉक द लीजेंड। इसकी योजना तभी बन गई थी जब यूपी में फैक्ट्रियाँ बंद हो रही थीं, सेना ने साथ छोड़ दिया था और प्रतिस्पर्धी आगे निकल रहे थे। उसी दौर में परिवार के एक सदस्य ने चुपचाप रम को सिल्वर ओक बैरल में बंद कर दिया था।
गिरावट के समय बोया गया वो बीज ओल्ड मॉक द लीजेंड बनकर निकला। नए फ्लेवर लाए गए, प्रीमियम बोतलें पेश की गईं — लेकिन तरीका वही रहा, बिना शोरशराबे के।
ओल्ड मॉक रम के नंबर — एक चौंकाने वाली वापसी
ओल्ड मॉक रम के नंबर देखें तो हैरत होती है। 2015 में पूरे साल का मुनाफा था सिर्फ तीन करोड़ रुपये। बिक्री जो कभी 80 लाख बोतल थी वो गिरकर 30 लाख रह गई थी। ऐसा लग रहा था कि 2017 में ओल्ड मॉक रम हमेशा के लिए बंद हो जाएगी।
लेकिन वित्त वर्ष 2024 में ओल्ड मॉक रम का राजस्व बढ़कर 1930 करोड़ रुपये हो गया। 21 देशों में एक्सपोर्ट हो रही है। 2025 में 12 करोड़ से भी ज्यादा बोतलें बिकीं। और कंपनी अपने खुद के 100 करोड़ रुपये से नई डिस्टिलरी लगा रही है — कोई कर्ज नहीं, कोई निवेशक नहीं।
ओल्ड मॉक रम आज भी उसी तरह काम कर रही है जैसे हमेशा करती आई है।
ओल्ड मॉक रम की कहानी से एक बड़ा सबक
ओल्ड मॉक रम की कहानी में एक बड़ा सबक छुपा है। जिस चीज ने ओल्ड मॉक रम को नंबर एक बनाया — क्वालिटी पर भरोसा — वही उसे गिराने की वजह भी बनी। क्वालिटी पर भरोसा करना गलत नहीं था। लेकिन दुनिया के हिसाब से बदलना भी जरूरी होता है।
किंगफिशर ने विज्ञापन किया। मैक्डॉवेल्स ने करोड़ों खर्च किए। लेकिन ओल्ड मॉक रम खड़ी रही उसी पुरानी बोतल, उसी लेबल और उसी सोच के साथ। इसी जिद ने ब्रांड को गिराया भी और शायद बचाया भी।
क्योंकि आज भी जब कोई पुराना दोस्त मिलता है तो ओल्ड मॉक रम की बात होती है। जब कोई पहाड़ों पर जाता है तो ओल्ड मॉक रम याद आती है। बिना किसी विज्ञापन के। और शायद यही इसकी सबसे बड़ी जीत है।
150 साल। एक सेब से एक किंवदंती तक। एक अंग्रेज की ब्रेवरी से एक भारतीय इमोशन तक। ओल्ड मॉक रम की कहानी सिर्फ रम की कहानी नहीं है — यह उस भारत की कहानी है जो अपनी जड़ें नहीं भूलता।
