रात का घना अंधेरा छाया हुआ है। अफ्रीका की खुली और सुनसान जमीन पर एक छोटा सा इंसानों का झुंड सोया पड़ा है। सात या आठ इंसान एक दूसरे से इस तरह चिपके हुए हैं जैसे डरे हुए बच्चे आपस में चिपकते हैं। इन सबमें से एक की आँखें खुली हुई हैं। वो सबसे छोटा है। उसकी उम्र शायद 10 या 11 साल की होगी। उसके हाथ में एक पत्थर का नुकीला टुकड़ा है जिसे उसने अपनी मुट्ठी में इतनी कसकर दबाया हुआ है कि उंगलियों में खून रुक गया है। वो बिल्कुल नहीं हिल रहा। सांस भी बेहद धीमी ले रहा है क्योंकि लगभग 40 मीटर दूर घास में कुछ हिल रहा है। कुछ बड़ा, कुछ बहुत भारी और उसकी आँखें अंधेरे में चमक रही हैं।
वो खतरनाक जानवर घास में छुपा है और एक गलती का इंतज़ार कर रहा है। एक करवट बदली और पूरा झुंड उस भयानक जीव का शिकार बन सकता है। सिवाय एक के, जो उस कबीले का सबसे अनुभवी और सतर्क जीव था। और वो था वही 10 साल का बच्चा। उसी रात वो छोटा सा बच्चा अपने पूरे झुंड का सबसे बड़ा और सबसे बूढ़ा सदस्य बन जाएगा, क्योंकि बाकी सब खत्म हो जाएंगे।
यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं है। यह हमारी अपनी कहानी है। यह होमो हेबिलिस की कहानी है, जो आज से 18 लाख साल पहले इस धरती पर जीती थी।
होमो हेबिलिस कौन थे और वो क्यों खास थे?
आज से 18 लाख साल पहले की इस धरती पर एक ऐसी प्रजाति जीती थी जिसे प्रकृति ने हर तरफ से घेरा हुआ था। होमो हेबिलिस की औसत उम्र सिर्फ 12.8 साल थी। उनके लिए 13 साल का होना उतना ही असाधारण था जितना आज किसी इंसान का 90 साल तक जीना। और यही होमो हेबिलिस हमारी सीधी पूर्वज प्रजाति थी। अगर होमो हेबिलिस उस नर्क में जीवित नहीं रहते, तो आज हम यहाँ नहीं होते।
होमो हेबिलिस को पहली बार साल 1960 में खोजा गया था। तंजानिया के ओल्डुवाई जॉर्ज नामक स्थान पर, अफ्रीका की उस तपती दोपहर में, एक 20 साल का लड़का जॉनाथन लीकी अपने वैज्ञानिक माता-पिता लुई और मैरी लीकी के साथ जमीन खोद रहा था। यह जगह पहले से ही पुरानी हड्डियाँ मिलने के लिए जानी जाती थी। लेकिन उस दिन जो मिला, वो सबसे अलग था।
जॉनाथन की खुरपी किसी चीज़ से टकराई। मिट्टी हटाने पर नीचे से एक जॉ बोन नज़र आई, जिसमें 13 दाँत थे। उसके बाद खोपड़ी के दो टुकड़े मिले। फिर हाथों और उंगलियों की 21 छोटी-छोटी हड्डियाँ। जब यह सब लैब में पहुँचा और वैज्ञानिकों ने इन टुकड़ों को जोड़कर एक पूरा कंकाल बनाया, तो उनके सामने एक अजीब जीव खड़ा था। यह इंसान जैसा था लेकिन इंसान नहीं था। पोटेशियम-आर्गन डेटिंग ने बताया कि यह हड्डी 18 लाख साल पुरानी है।
जॉ बोन से पता चला कि अकल दाढ़ अभी तक निकली नहीं थी। कलाई की हड्डियों में ग्रोथ प्लेट अभी हड्डी में नहीं बदली थी। मतलब होमो हेबिलिस जब मरा था, तब वो सिर्फ 11 या 12 साल का था। एक बच्चा। लेकिन उसके हाथों की बनावट बता रही थी कि वो अपने अंगूठे को बाकी उंगलियों की पोरों से छू सकता था। यह क्षमता सिर्फ इंसानों में होती है, जो औज़ार बनाने के लिए ज़रूरी है।
होमो हेबिलिस का ब्रेन साइज़ 600 से 710 क्यूबिक सेंटीमीटर का था, जो चिंपांजी से 200 क्यूबिक सेंटीमीटर ज़्यादा था। उसी रिसर्च के दौरान लीकी परिवार को एक और कंकाल मिला जिसे OH8 नाम दिया गया। इसमें एक पूरा पैर था जिसने यह साबित कर दिया कि होमो हेबिलिस इंसानों की पूर्वज प्रजाति है। इस दूसरे कंकाल की मृत्यु उम्र भी सिर्फ 10 से 14 साल निकली। दो अलग-अलग कंकाल, दो अलग-अलग जगह, दोनों बच्चे और दोनों मृत।
होमो हेबिलिस की उम्र की वैज्ञानिक जाँच
साल 2000 के शुरुआत तक दुनियाभर से 26 से ज़्यादा होमो हेबिलिस के कंकाल के अवशेष इकट्ठे हो चुके थे। तब पैलियोएंथ्रोपोलॉजिस्ट लोरा मोनिका मार्टिनस ने पूर्वी अफ्रीका से 20 होमो हेबिलिस व्यक्तियों के 116 स्थायी दाँत मँगवाए और बार्सिलोना विश्वविद्यालय में उनका विस्तृत विश्लेषण शुरू किया।
होमो हेबिलिस की उम्र जानने के लिए तीन तरीके इस्तेमाल किए गए। पहला था इनेमल इरोज़न, यानी दाँत की ऊपरी सफेद परत वक्त के साथ घिसती है और अंदर का पीला दाँत दिखने लगता है। इंसानों में यह घिसाव दर नुकीले दाँतों के लिए 2.21 मिलीमीटर प्रति वर्ष और बाकी दाँतों के लिए 0.61 मिलीमीटर प्रति वर्ष मापी गई है। दूसरा तरीका था डेंटल माइक्रोवियर, यानी जब कोई जीव खाना चबाता है तो दाँत की सतह पर सूक्ष्म खरोंचें बनती हैं जो शक्तिशाली माइक्रोस्कोप से दिखती हैं। जितनी ज़्यादा खरोंचें, उतना बड़ा जीव। तीसरा, यह पूरा डेटा दूसरे होमिनिन्स के दाँतों के रिकॉर्ड, उस युग के जलवायु डेटा और खान-पान की आदतों से मिलाकर कंप्यूटर से सत्यापित किया गया।
नतीजा चौंकाने वाला था। इन सभी 20 होमो हेबिलिस व्यक्तियों की औसत उम्र थी सिर्फ 12.8 साल। ज़्यादातर होमो हेबिलिस 10 से 14 साल के बीच मारे गए थे। पूरी रिसर्च में सिर्फ एक कंकाल मिला जिसकी उम्र 25 साल के आसपास थी। और यह भी ध्यान रखो कि पाँच शिशुओं के दूध के दाँत इस रिसर्च में शामिल ही नहीं किए गए थे क्योंकि वो बहुत छोटे थे। अगर उन्हें भी गिना जाता तो होमो हेबिलिस की औसत उम्र और भी कम निकलती।
एक ऐसी प्रजाति जहाँ 13 साल का बच्चा बुज़ुर्ग माना जाता हो, यह सोचकर ही रूह काँप जाती है।
होमो हेबिलिस की दुनिया: एक जीती-जागती हॉरर
होमो हेबिलिस इतनी कम उम्र में क्यों मर जाते थे, इसका जवाब जानने के लिए हमें उस दुनिया को समझना होगा जिसमें वो जीते थे। आज से 25 लाख साल पहले अफ्रीका का 70 प्रतिशत हिस्सा घने जंगलों से बदलकर सूखे घास के मैदानों में तब्दील हो चुका था। टेक्टोनिक प्लेटों के खिसकने से धरती का मौसम बदल गया था। बारिश कम हो गई थी, जंगल सूख गए थे और वो पेड़ों की दुनिया जहाँ होमो हेबिलिस के पूर्वज सुरक्षित थे, समाप्त हो चुकी थी।
अब होमो हेबिलिस को जमीन पर उतरना था। खुले मैदान में, जहाँ दूर-दूर तक छुपने की कोई जगह नहीं थी और हर तरफ भूखे शिकारी घूमते थे। प्लाइस्टोसीन एपॉक शुरू हो चुका था। हिम युग आ चुका था और इसी बीच होमो हेबिलिस का जन्म हुआ।
होमो हेबिलिस को प्रकृति ने सर्वाइवल के लिए क्या दिया था? आइए देखते हैं। उनकी ऊँचाई थी सिर्फ 4 फुट, अपने पूर्वज ऑस्ट्रेलोपिथेकस से भी छोटे। उनका दिमाग बढ़कर 600 क्यूबिक सेंटीमीटर तो हो गया था लेकिन यह उन्नत योजना या सामूहिक शिकार के लिए काफी नहीं था। उनके पास न तेज़ पंजे थे, न बड़े-बड़े नुकीले दाँत थे।
और भागने की बात करें तो और भी बुरा हाल था। हमारे जैसा स्प्रिंग फुट आर्च भी होमो हेबिलिस के पास नहीं था। हम इंसान इसीलिए लंबी दूरी तक कुशलता से भाग सकते हैं क्योंकि हमारा पैर का आर्च जोड़ से दबाव सोखता है। होमो हेबिलिस यह नहीं कर सकते थे। इसलिए वो अधिकतम 1 से 2 किलोमीटर ही भाग पाते थे। उनकी अधिकतम गति 20 से 25 किलोमीटर प्रति घंटा थी।
और इस कमज़ोर शरीर के साथ उन्हें उन भयानक शिकारियों से बचना था जो उनके 10 किलोमीटर के दायरे में रहते थे।
होमो हेबिलिस के खतरनाक दुश्मन
होमो हेबिलिस की दुनिया में कम से कम छह-सात शीर्ष शिकारी थे जो सब उनसे दोगुनी या तिगुनी गति से दौड़ सकते थे।
पहला और सबसे डरावना नाम था जायंट हाइनास का। आज की हाइनास को भूल जाओ। 18 लाख साल पहले की हाइनास आज से कई गुना बड़ी थीं। उनकी जबड़े की शक्ति इतनी थी कि वो मैमथ और गैंडे की हड्डियाँ बिस्किट की तरह तोड़ देती थीं। यह समूह में शिकार करती थीं। पहले शिकार को ट्रैक करती थीं, धीरे-धीरे घेर लेती थीं, थका देती थीं और फिर एक संकेत पर सब एक साथ टूट पड़ती थीं। और सबसे डरावनी बात यह थी कि ये मरे हुए जानवर नहीं बल्कि जिंदा शिकार को चबाना शुरू कर देती थीं।
दूसरा खतरनाक जीव था डाइनोफेलिस, एक सेबर-टूथ बिल्ली। यह तेंदुए से डेढ़ गुना बड़ी थी और विशेष रूप से प्राइमेट्स को मारने के लिए अनुकूलित थी। इसके लंबे नुकीले दाँत गले पकड़ने के लिए नहीं बने थे बल्कि सीधे खोपड़ी में घुसने के लिए डिज़ाइन किए गए थे। हमारी चचेरी प्रजाति पैरेंथ्रोपस की खोपड़ी पर दो गहरे छेद मिले हैं जो एग्जैक्टली डाइनोफेलिस के दाँतों से मेल खाते हैं। यह जीव पेड़ों पर भी चढ़ सकता था, मतलब न जमीन पर सुरक्षा थी न पेड़ पर।
तीसरा खतरा था पानी के पास। क्रोकोडाइलस थार्बिटोनेसिस, आठ मीटर लंबा एक विशाल मगरमच्छ। जब भी कोई जीव पानी पीने आता, यह पानी की सतह के नीचे से एक झटके में मुँह खोलता था। 16,000 न्यूटन की काटने की शक्ति के साथ एक बार जबड़े में आ गया तो निकलना नामुमकिन था। होमो हेबिलिस के पैरों की हड्डियों पर मगरमच्छ के दाँतों के गहरे निशान मिले हैं जो दिखाते हैं कि उस दौर में पानी पीना भी मौत का निमंत्रण था।
चौथा खतरा था मेगेंटेरॉन व्हाइटी, एक जीव जो जगुआर और सेबर-टूथ टाइगर का मिश्रण लगता था। चार से पाँच इंच लंबे खंजर जैसे दाँत। यह झाड़ियों में छुपकर घंटों तक इंतज़ार करता था। एक पल की लापरवाही और एक सर्जिकल झटके में कैरोटिड आर्टरी और विंड पाइप एक साथ कट जाते थे।
पाँचवाँ था पैंथेरा लियो फॉसिलिस, यानी मॉसबैक लायन। 500 किलो वज़न, आज के शेर से दोगुना आकार, अत्यंत मांसपेशीय और यह अकेला नहीं आता था बल्कि पूरे झुंड के साथ आता था, संगठित, समन्वित और अनुशासित। इनकी गति होमो हेबिलिस की गति से तीन गुना ज़्यादा थी। एक बार नज़र में आ गए तो भागकर बचना लगभग नामुमकिन था।
और आसमान से भी कोई राहत नहीं थी। अफ्रीकन क्राउन ईगल का पंख-फैलाव 6.5 फुट के इंसान जितना था। यह छोटे प्राइमेट्स और होमो हेबिलिस के बच्चों को उठाकर ले जाती थी। एक तीन साल के ऑस्ट्रेलोपिथेकस बच्चे की खोपड़ी में इस ईगल के पंजे के निशान आज भी मौजूद हैं।
जमीन पर खतरा, पेड़ पर खतरा, पानी के पास खतरा, आसमान से खतरा। चारों तरफ मौत और बीच में खड़ा एक चार फुट का कमज़ोर जीव जिसके पास सिर्फ एक पत्थर का टुकड़ा था।
प्रकृति का अधूरा जीव: होमो हेबिलिस का आनुवंशिक अभिशाप
प्रकृति ने होमो हेबिलिस के साथ एक अजीब मज़ाक किया था जिसे आनुवंशिक अभिशाप कहा जा सकता है। इसे न पूरी तरह जमीन के लिए बनाया गया था, न पूरी तरह पेड़ों के लिए।
होमो हेबिलिस की उंगलियों की हड्डियाँ न पेड़ पर चढ़ने वाले जीवों जितनी मुड़ी हुई थीं, न जमीन पर चलने वाले जीवों जितनी सपाट, बल्कि बीच में अटकी हुई थीं। कंधे की हड्डियाँ न चढ़ाई के लिए ऊपर की ओर झुकी थीं, न दौड़ने के लिए बगल में। ऊपरी शरीर और निचले शरीर का अनुपात दूसरे एप्स से उलटा था।
होमो हेबिलिस एक ऐसा जीव था जिसे प्रकृति ने अधूरा छोड़ दिया था। न पेड़ पर ठीक से चढ़ सकता था, न जमीन पर ठीक से भाग सकता था। और इस अधूरे शरीर के साथ उसे उन हज़ारों जानवरों से मुकाबला करना था जो अपने परफेक्ट शरीर के साथ सीमित संसाधनों के लिए लड़ रहे थे।
होमो हेबिलिस का रहस्यमय हथियार: सहयोग की शक्ति
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर होमो हेबिलिस इतना कमज़ोर था, इतना छोटा था, इतना असहाय था, तो फिर वो विलुप्त क्यों नहीं हुआ? उसकी वंशावली आगे कैसे बढ़ी? हम यहाँ आज कैसे हैं?
जवाब छुपा है एक अजीब सी आदत में जो होमो हेबिलिस ने मजबूरी में सीखी थी, और वो था स्कैवेंजिंग यानी दूसरे शिकारियों का छोड़ा हुआ माँस खाना। और यह अकेले करना संभव नहीं था। तुम्हें शव ढूँढना पड़ता था, दूसरे शिकारियों को भटकाना पड़ता था, उनकी आँखों के सामने माँस चुराना पड़ता था और फिर बिना मारे जाए भाग जाना पड़ता था।
यह काम एक व्यक्ति का नहीं था। यह छोटे संगठित समूहों का काम था। ज़्यादा आँखें खतरा भाँपने के लिए, ज़्यादा हाथ माँस उठाने के लिए, ज़्यादा शरीर एक दूसरे की रक्षा करने के लिए। इस मजबूरी ने होमो हेबिलिस को वो चीज़ दी जो दुनिया का कोई भी तेज़ पंजा या नुकीला दाँत नहीं दे सकता था, और वो था सहयोग यानी मिलकर काम करने की क्षमता।
खोपड़ी के कास्ट से पता चलता है कि होमो हेबिलिस के दिमाग का ब्रोका एरिया, जो बोलने और संवाद के लिए ज़िम्मेदार होता है, पहले से ही काफी विकसित था। मतलब ये आदिम ध्वनियों, इशारों और संकेतों से एक दूसरे से बात कर सकते थे।
प्रकृति ने होमो हेबिलिस को कमज़ोर ज़रूर बनाया, लेकिन उन्होंने उस कमज़ोरी को अपनी सबसे बड़ी ताकत में बदल दिया।
होमो हेबिलिस से होमो इरेक्टस तक का सफर
होमो हेबिलिस की एक शाखा ने इस विकासवादी दबाव के तहत होमो इरेक्टस में विकास किया। 19 लाख से 15 लाख साल पहले दोनों प्रजातियाँ एक ही इलाके में रहती थीं। लेकिन होमो इरेक्टस हर चीज़ में होमो हेबिलिस से आगे निकल गया। पाँच से छह फुट लंबा, 900 क्यूबिक सेंटीमीटर से बड़ा दिमाग, बिना रुके 45 किलोमीटर भागने की सहनशक्ति और सबसे बड़ी उपलब्धि, आग की खोज।
होमो इरेक्टस ने अफ्रीका से बाहर जाकर मानव वंश को दुनियाभर में फैलाया। और वहाँ से लाखों साल के विकास के बाद हम यहाँ पहुँचे।
होमो हेबिलिस की विरासत और हमारी पहचान
18 लाख साल पहले एक चार फुट का जीव था जिसकी जिंदगी सिर्फ 12.8 साल की थी। जिसकी दुनिया चारों तरफ से मौत से घिरी थी। जिसे प्रकृति ने अधूरा बनाया था। जिसके पास न तेज़ पैर थे, न तेज़ दाँत थे, न मज़बूत पंजे थे। लेकिन उसके पास एक चीज़ थी जो इस धरती के किसी भी भयानक जीव के पास नहीं थी और वो था दूसरों के साथ मिलकर सोचने की क्षमता।
होमो हेबिलिस हर रात सोते वक्त नहीं जानते थे कि सुबह उनकी आँखें खुलेंगी या नहीं। लेकिन फिर भी वो हर सुबह उठते थे। पत्थर उठाते थे। अपने झुंड के साथ निकलते थे और एक और दिन जीवित रहते थे।
हमारी हर एक साँस उस जीव की मेहनत का नतीजा है। हमारा आज उस वक्त की सबसे कमज़ोर प्रजाति की जीत है। होमो हेबिलिस ने हमें यह सिखाया कि सबसे कमज़ोर जीव भी सबसे मज़बूत दुश्मनों को मात दे सकता है, बशर्ते उसके पास साथ मिलकर सोचने और काम करने की ताकत हो।
और शायद यही बात इंसान होने का असली मतलब है।
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