सच जानो: क्यों जापान चुपचाप इंडियन कंपनियां खरीद रहा है?
जापान चुपचाप इंडियन कंपनियों में पैसा लगाता जा रहा है। एक के बाद एक। बिना किसी हेडलाइन के, बिना किसी शोर के। और हम इसे तरक्की कह रहे हैं, विकास कह रहे हैं। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या जापान का यह इंडिया में इन्वेस्टमेंट वाकई में ग्रोथ है? या यह कंट्रोल की एक साइलेंट शुरुआत है?
यह सवाल सुनने में थोड़ा अजीब लग सकता है। लेकिन इतिहास एक चीज बार-बार दोहराता रहा है। पहले कैपिटल आता है, फिर इन्फ्लुएंस आता है और फिर कंट्रोल। ब्रिटिशर्स भी पहले इंडिया में ट्रेड करने ही आए थे। ईस्ट इंडिया कंपनी के पास कोई आर्मी नहीं थी, कोई टेरिटरी नहीं थी। बस कैपिटल था और ढेर सारा वक्त था। और फिर हुआ क्या, आप जानते हैं।
तो फिर जापान का इंडिया में बढ़ता इन्वेस्टमेंट क्या इसी पैटर्न की शुरुआत है? या यह जापान और इंडिया दोनों के लिए एक स्ट्रक्चरली इनेविटेबल और फायदेमंद पार्टनरशिप है? इस आर्टिकल में हम इसी सवाल का पूरा जवाब खोजेंगे।
सच जानो: क्यों जापान चुपचाप इंडियन कंपनियां खरीद रहा है?
सच जानो: जापान का इंडिया में इन्वेस्टमेंट: आंकड़े जो चौंका देंगे
29 जून 2020 को इंडिया ने 300 से ज्यादा चाइनीस ऐप्स और कंपनियों को बैन कर दिया। TikTok से लेकर दर्जनों चाइनीस प्लेटफॉर्म्स। पूरे इंडिया में खुशी थी। लगा कि चाइनीस इन्फ्लुएंस रुक गया।
लेकिन उसी महीने, एक और देश था जो क्वाइटली इंडियन कंपनियों में स्टेक्स खरीद रहा था। बिना किसी हेडलाइन के। वो था जापान।
जापान का इंडिया में इन्वेस्टमेंट इंडिया के सबसे क्रूशियल सेक्टर्स में एग्रेसिवली फ्लो हो रहा है। बैंकिंग, आईटी, लॉजिस्टिक इंफ्रास्ट्रक्चर और मैन्युफैक्चरिंग, हर जगह जापान का पैसा पहुंच रहा है। Nis इंडिया इक्विटी फंड, Nippon इंडिया ETF जैसे कई म्यूच्यूल फंड्स जापान की फाइनेंशियल फर्म्स ने सिर्फ इंडियन मार्केट में इन्वेस्ट करने के लिए ही बनाए हैं।
जापान आज इंडिया का फोर्थ लार्जेस्ट FDI कंट्रीब्यूटर है। और पिछले कुछ सालों में यह शेयर 11 गुना बढ़ चुका है। यह कोई छोटा नंबर नहीं है।
Flipkart, Swiggy, Meesho, Unacademy, Ola Electric। आप सोचते हैं कि आप इंडियन ऐप्स यूज कर रहे हैं। लेकिन इनका एक अच्छा खासा हिस्सा जापान तक पहुंच रहा है। इन सभी इंडियन स्टार्टअप्स में जापानीज कंपनियों ने हैवी इन्वेस्टमेंट किए हैं। जापान का इंडिया में इन्वेस्टमेंट इंडिया के सबसे स्ट्रेटेजिक सेक्टर्स में दाखिल हो चुका है।
कुछ फाइनेंशियल एक्सपर्ट्स का मानना है कि जापान का यह इंडिया में इन्वेस्टमेंट इंडिया की इकोनॉमिक फ्रीडम के लिए एक सीरियस थ्रेट हो सकता है। लेकिन क्या यह डर जायज है? इसे समझने के लिए पहले एक डरावनी हिस्ट्री देखते हैं।
सच जानो: क्यों जापान चुपचाप इंडियन कंपनियां खरीद रहा है?
इंडोनेशिया का सबक: जब फॉरेन कैपिटल ने देश को तोड़ दिया
1998। इंडोनेशियन रुपैया 80% से कोलैप्स हो गया। सिर्फ कुछ ही महीनों में पूरा देश घुटनों पर आ गया। जकार्ता की सड़कों पर हजारों दुकानें जलाई गईं। लाखों लोग मारे गए। यह कोई रैंडम रायट्स नहीं थे। यह एक इकोनॉमिक नेग्लिजेंस का सीधा नतीजा था।
इमेजिन करो। आज आपकी जेब में ₹100 हैं। कल सुबह उठते हो और उसी नोट की वैल्यू ₹15 रह जाती है। आपकी जिंदगी भर की सेविंग्स एक ही रात में गायब। इंडोनेशिया का यही हाल था।
1990 का दौर था। इंडोनेशिया एक परफेक्ट ग्रोथ स्टोरी लग रही थी। चीप लेबर, फास्ट ग्रोथ, यंग पॉपुलेशन। जापान, अमेरिका और यूरोप सब पैसे डाल रहे थे। लेकिन एक स्ट्रक्चरल फ्लॉ था। यह सारी ग्रोथ बाहर के कैपिटल और फॉरेन लोन्स पर चल रही थी। देश का अपना कोई मजबूत आधार नहीं था।
1997 में एशियन फाइनेंशियल क्राइसिस आई। जैसे ही इन्वेस्टर्स को रिस्क दिखा, सबने पैसे निकालने शुरू कर दिए। कुछ ही बिलियन डॉलर्स निकले और देश की इकॉनमी 13% से गिर गई। इंडोनेशियन रुपैया की वैल्यू 80% से नीचे आ गई।
डोमिनो इफेक्ट शुरू हुआ। बैंक बंद हो गए, हजारों कंपनियां बर्बाद हुईं, लाखों लोग बेरोजगार हो गए और महंगाई यानी इन्फ्लेशन 65% को क्रॉस कर गई। फ्यूल, मेडिसिन और इंपोर्टेड सामान का दाम तीन गुना बढ़ गया। इंडोनेशिया का यह कोलैप्स फॉरेन कैपिटल पर ओवरडिपेंडेंस का एक एक्सट्रीम उदाहरण था।
अब इसी पैटर्न को देखकर एक सवाल उठता है। क्या जापान से आने वाला कैपिटल भी सिर्फ ग्रोथ ला रहा है? या धीरे-धीरे इंडिया में एक इनविजिबल वल्नरेबिलिटी बिल्ड हो रही है?
सच जानो: क्यों जापान चुपचाप इंडियन कंपनियां खरीद रहा है?
जापान की इकॉनमी क्यों बाहर पैसा लगा रही है? असली कारण
जापान का इंडिया में इन्वेस्टमेंट समझने के लिए पहले जापान की खुद की इकॉनमी समझनी होगी। जापान आज एकदम अजीब तरीके से बिहेव कर रही है। कई एरियाज में घर कारों से भी सस्ते में बिक रहे हैं। जहां पूरी दुनिया महंगाई से लड़ रही है, जापान में चीजें सस्ती हो रही हैं।
यह सब सरफेस लेवल सिम्टम है। असली प्रॉब्लम बहुत गहरी है। और इसकी शुरुआत 1989 में हुई थी।
1980 का दौर था। जापान अनस्टॉपेबल था। दुनिया की सेकंड लार्जेस्ट इकॉनमी। फास्ट ग्रोथ से हैवी फंडिंग आई। लैंड प्राइसेस और स्टॉक मार्केट स्काई हाई हो गए। बैंक्स ने लोन देना बढ़ा दिया और इकॉनमी की ग्रोथ और तेज हुई। एक पावरफुल फ्लाई व्हील था।
लेकिन 1990 में यह बबल अचानक फूट गया। लैंड और प्रॉपर्टी प्राइसेस गिरने लगे। लोग लोन नहीं चुका पा रहे थे। बैंक्स के पैसे फंसने लगे। और पूरी इकॉनमी एक झटके में गिर गई। इसे जापान का लॉस्ट डेकेड कहते हैं। जो धीरे-धीरे लॉस्ट थ्री डेकेड्स बन गया।
जापान की सरकार ने इंटरेस्ट रेट्स जीरो किए। पैसों की प्रिंटिंग शुरू हुई। सोचा था कि लोन सस्ता होगा तो स्पेंडिंग बढ़ेगी। लेकिन हुआ उल्टा। लोगों और कंपनियों ने बोरो करना ही बंद कर दिया क्योंकि मार्केट पर कॉन्फिडेंस टूट चुका था। इन्वेस्टर्स ने पैसे निकालकर US जैसे हाई रिटर्न मार्केट्स में लगाना शुरू किया। इसे येन कैरी ट्रेड कहते हैं।
रिजल्ट येन गिरता गया। 2024 तक येन लगभग 160 प्रति डॉलर तक पहुंच गया। इंपोर्ट्स महंगे हुए। आम जापानी कंज्यूमर पर प्रेशर बढ़ा। लोगों ने खर्च करना बंद किया। जब लोग सोचते हैं कि कल चीजें और सस्ती होंगी, तो आज खर्च नहीं करते। इससे डिमांड गिरती है। कंपनियां प्राइसेस और गिराती हैं। प्रॉफिट स्क्वीज होते हैं। जॉब्स और सैलरी स्टैगनेट होती है। यह एक सेल्फ-रीइन्फोर्सिंग लूप है जिसे लॉन्ग टर्म डिफ्लेशन कहते हैं।
जापान का स्टॉक मार्केट निक्केई इसी कहानी का सबूत है। अगर आपने 1989 के पीक पर ₹1 लाख इन्वेस्ट किए होते, तो सिर्फ अपना पैसा वापस पाने के लिए 30 साल इंतजार करना पड़ता। प्रॉफिट तो दूर की बात है।
सच जानो: क्यों जापान चुपचाप इंडियन कंपनियां खरीद रहा है?
जापान की एजिंग पॉपुलेशन: इंडिया की ओर धकेलने वाला असली कारण
जापान की डिफ्लेशनरी इकॉनमी की प्रॉब्लम को और गहरा करती है वहां की रैपिडली एजिंग पॉपुलेशन। 2024 का डाटा देखें तो हर एक बच्चे के जन्म पर जापान में दो से ज्यादा लोगों की मौत हो रही है। पॉपुलेशन नेचुरली श्रिंक हो रही है। जापान की लगभग 30% पॉपुलेशन 65 प्लस एज की है। हर सात में से एक एम्प्लॉई रिटायरमेंट एज का है।
जापान ने फॉरेन इमिग्रेशन को इंसेंटिवाइज करने की कोशिश की। लेकिन इमिग्रेशन डाटा में एक अननेचुरल पैटर्न दिखता है। 1980 और 2020 के बीच जितने फॉरेनर्स जापान आए, उतने ही या उससे ज्यादा वापस लौट गए। जापान में टिकना आसान नहीं है।
तो जापान की इकॉनमी का फ्लाई व्हील आज कैसा दिखता है? मैसिव साइज, वर्ल्ड क्लास इंफ्रास्ट्रक्चर, डेकेड्स से बने एसेट्स, कटिंग एज टेक्नोलॉजी। लेकिन अंदर से क्रैक्स और कोरोजन उसकी स्पीड स्लो कर रहे हैं। इकॉनमी में पोटेंशियल है लेकिन डिमांड नहीं है। और फ्लाई व्हील घुमाने वाली यंग वर्कफोर्स श्रिंक हो रही है।
जापान का सेविंग्स रेट दुनिया के सबसे ऊंचे में से एक है। लगभग 25 से 30%। हर ₹100 जो इकॉनमी जनरेट करती है, ₹25 सेव हो रहे हैं। लेकिन जापान के अंदर इतने प्रॉफिटेबल इन्वेस्टमेंट ऑपोर्चुनिटीज ही नहीं हैं। सेविंग्स है, रिटर्न्स नहीं हैं। और इसीलिए जापानीज इन्वेस्टर्स के लिए कैपिटल को बाहर ले जाने का एक नेचुरल पुश क्रिएट होता है।
यहीं से जापान का इंडिया में इन्वेस्टमेंट का लॉजिक साफ होता है। जापान के पास पैसा है, इन्वेस्टमेंट ऑपोर्चुनिटी नहीं है। इंडिया के पास ऑपोर्चुनिटी है, कैपिटल कम है।
सच जानो: क्यों जापान चुपचाप इंडियन कंपनियां खरीद रहा है?
इंडिया ही क्यों? जापान और इंडिया की स्ट्रक्चरल पार्टनरशिप
जापान का इंडिया में इन्वेस्टमेंट एक्सीडेंटल नहीं है। यह स्ट्रक्चरली इनेविटेबल है।
जापान एक रिच ओल्ड मर्चेंट की तरह है जिसके पास सब कुछ है। पैसा, एसेट, सिक्योरिटी। लेकिन ग्रोथ नहीं है। दूसरी तरफ इंडिया एक यंग एंटरप्रेन्योर की तरह है। वेल्थ उतनी नहीं, लेकिन एनर्जी हाई है, पोटेंशियल हाई है और रिस्क लेने की भूख है।
इंडिया की 65% पॉपुलेशन 35 साल से कम एज की है। यंग वर्कफोर्स और बढ़ता कंजम्पशन मार्केट। यह किसी भी देश पर लॉन्ग टर्म बेट लगाने का सबसे इंपॉर्टेंट स्ट्रक्चरल रीजन है।
पिछले 10 सालों में इंडिया की ग्रोथ डबल हो चुकी है। हम टॉप 10 से टॉप 5 इकॉनमीज में जंप कर चुके हैं। इंडिया का रियल एस्टेट सेक्टर 6 से 7.5% एप्रिशिएशन के साथ ग्रो हो रहा है। कई केसेस में तो US और सिंगापुर जैसे डेवलप मार्केट्स से भी ज्यादा रिटर्न्स दे रहा है।
लेकिन इंडिया की रियल पावर राइजिंग GDP नहीं बल्कि एक्सप्लोडिंग मिडिल क्लास पॉपुलेशन है। आज हर तीसरा इंडियन मिडिल क्लास में है। एस्टिमेट्स के हिसाब से 2030 तक करीब 10 करोड़ लोग और ऐड होंगे जिसके बाद इंडिया की आधी पॉपुलेशन मिडिल क्लास में होगी।
जब मिडिल क्लास बढ़ता है तो सिर्फ लोग नहीं बढ़ते, कंजम्पशन एक्सप्लोड होता है। कार्स, घर, गैजेट्स, बेहतर लाइफस्टाइल, हर चीज पर स्पेंडिंग मल्टीप्लाई होती है। यह जापान जैसे इंडस्ट्रियल नेशंस के लिए गोल्ड माइन है।
तो समझो। कैपिटल सरप्लस जापान मिलता है कैपिटल हंग्री इंडिया से। डेमोग्राफिकली कोलैप्स होती जापान मिलती है डेमोग्राफिकली एक्सप्लोडिंग इंडिया से। डिफ्लेशन ट्रैप्ड जापान मिलता है इन्फ्लेटिंग ग्रोथ वाले इंडिया से। जापान का इंडिया में इन्वेस्टमेंट इसीलिए स्ट्रक्चरली इनेविटेबल है।
सच जानो: क्यों जापान चुपचाप इंडियन कंपनियां खरीद रहा है?
जियोपॉलिटिक्स: चाइना का प्रेशर और इंडिया का फायदा
जापान का इंडिया में इन्वेस्टमेंट का एक और बड़ा कारण है और वो है जियोपॉलिटिक्स।
जापान पर चाइना का प्रेशर पिछले कुछ सालों में काफी बढ़ा है। सेनकाको आइलैंड्स, जो ईस्ट चाइना सी का एक छोटा आइलैंड ग्रुप है, एक मैसिव फ्रिक्शन पॉइंट है। कंट्रोल जापान के पास है लेकिन क्लेम चाइना करता है। चाइनीस कोस्ट गार्ड शिप्स बार-बार जापानीज वाटर में घुसते हैं। 2024 में एक साल में 40 से भी ज्यादा बार दिखे। चाइना और रशिया मिलकर जापान के आसपास मिलिट्री ड्रिल्स कर रहे हैं। एक तरह से जापान को नजरबंद रखा हुआ है।
पैराडॉक्स यह है कि वही चाइना जापान का बिगेस्ट ट्रेडिंग पार्टनर भी है। थ्रेट भी है और डिपेंडेंसी भी है। हजारों जापानीज कंपनियां चाइना में ऑपरेट करती हैं। पिछले तीन सालों में जापान का चाइनीस इंपोर्ट्स पर रिलायंस डबल हो चुका है।
लेकिन चाइना के साथ इकोनॉमिक पार्टनरशिप एक डबल एज्ड स्वोर्ड है। रिलेशंस खराब होते ही चाइना इकोनॉमिक प्रेशर यूज करता है। कभी जापानीज सीफूड इंपोर्ट्स बैन, कभी रेयर अर्थ एक्सपोर्ट्स पर रेस्ट्रिक्शन।
इसीलिए जापान क्वाइटली अपनी स्ट्रेटजी शिफ्ट कर रहा है। सरकार ने 2.2 बिलियन डॉलर का रिलोकेशन फंड लॉन्च किया है ताकि जापानीज कंपनियां चाइना से प्रोडक्शन इंडिया और साउथ ईस्ट एशिया में शिफ्ट करें। जियोपॉलिटिकली देखें तो चाइना जापान के लिए रिस्क है और इंडिया एक सेफर ऑपोर्चुनिटी।
सच जानो: क्यों जापान चुपचाप इंडियन कंपनियां खरीद रहा है?
क्या जापान का इंडिया में इन्वेस्टमेंट सॉवरेंटी के लिए खतरा है?
अब सबसे बड़ा सवाल। क्या जापान का यह इंडिया में इन्वेस्टमेंट इंडिया की नेशनल सॉवरेंटी के लिए खतरा है?
पहली बात, सॉवरेंटी का मतलब सिर्फ ओनरशिप नहीं होता, कंट्रोल होता है। क्रिटिकल सेक्टर्स जैसे डिफेंस, टेलीकॉम इंफ्रास्ट्रक्चर, एनर्जी ग्रिड्स और डेटा इंफ्रास्ट्रक्चर पर कंट्रोल। अगर इन सेक्टर्स में नजर डालें तो जापानीज कंपनियों का डोमिनेशन फिलहाल काफी वीक है।
दूसरी बात, हर फॉरेन इन्वेस्टमेंट एक जैसा रिस्क नहीं बनाता। किसी दूसरे देश पर इन्फ्लुएंस सबसे ज्यादा तब आता है जब कैपिटल डायरेक्टली स्टेट के कंट्रोल में हो। जैसे चाइना जहां प्राइवेट कंपनियां स्टेट के स्ट्रेटेजिक डायरेक्शन के साथ टोटली एलाइन होती हैं। जापान का मॉडल कैपिटलिस्टिक है। इन्वेस्टमेंट्स लार्जली प्राइवेट कॉरपोरेशंस ड्राइव करते हैं। इसलिए इंडायरेक्ट इन्फ्लुएंस हो सकता है लेकिन डायरेक्ट कंट्रोल का रिस्क बहुत कम है।
तीसरी बात, इंडिया में FDI का पोर्टफोलियो काफी डायवर्सिफाइड है। US, EU, मिडिल ईस्ट और इंडिया का डोमेस्टिक कैपिटल शेयर भी अच्छा है। किसी एक देश के सडन एग्जिट से इकोनॉमिक कोलैप्स का रिस्क काफी कम है।
सच जानो: क्यों जापान चुपचाप इंडियन कंपनियां खरीद रहा है?
जापान ने इंडिया को क्या दिया? टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की कहानी
जापान का इंडिया में इन्वेस्टमेंट सिर्फ पैसे का खेल नहीं है। जापान का रोल इन्वेस्टर का नहीं, बल्कि टेक्नोलॉजी एक्सेलरेटर का भी रहा है।
जापानीज कैपिटल के साथ जापानीज टेक्नोलॉजी भी ट्रांसफर हुई है। HMT और जापानीज कोलैबोरेशन से इंडिया में वॉच मैन्युफैक्चरिंग और प्रिसीजन असेंबली कैपेबिलिटीज आईं। Suzuki मोटर कॉरपोरेशन के इंडिया आने से एफिशिएंट इंजन और मॉडर्न ऑटो मैन्युफैक्चरिंग इंडिया में पॉपुलर हुई। JICA ने मेट्रो रेल की टेक्नोलॉजी दी। Central Japan Railway Company ने बुलेट ट्रेन की टेक्नोलॉजी लाई।
एक 1982 की रिसर्च के हिसाब से सिर्फ एक साल में जापान ने इंडिया को 67 टेक्नोलॉजीज ट्रांसफर कीं। और 1991 के बाद 2007 तक इंडिया को टोटल 861 टेक्नोलॉजी ट्रांसफर्स मिले।
इंडिया के कुछ आइकॉनिक प्रोजेक्ट्स जापानीज फंडिंग से ही बने हैं। मुंबई ट्रांस हार्बर लिंक, इंडिया का सबसे लंबा सी ब्रिज। कोलकाता मेट्रो, इंडिया का पहला अंडर-रिवर मेट्रो टनल। IIT हैदराबाद कैंपस। यह सब जापान के पैसे से बना है।
जापान ने 1958 में इंडिया को पहला डेवलपमेंटल लोन दिया था। इंडिया दुनिया का पहला जापानीज सॉफ्ट लोन रिसिपिएंट था। तब से लेकर आज तक ₹8339 बिलियन येन यानी 4.6 ट्रिलियन के लोन इंडिया को मिल चुके हैं। इन लोन्स का इंटरेस्ट रेट बहुत कम और रीपेमेंट टाइम काफी लंबा है। अभी भी लगभग 96 मेजर इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स जापानीज फंडिंग से चल रहे हैं।
सच जानो: क्यों जापान चुपचाप इंडियन कंपनियां खरीद रहा है?
इंडोनेशिया vs इंडिया: क्या हम उसी रास्ते पर हैं?
अब सवाल आता है। क्या जापान का इंडिया में इन्वेस्टमेंट इंडोनेशिया जैसा ट्रैप बन सकता है?
ऊपर से देखने पर कुछ सिमिलरिटीज जरूर हैं। दोनों डेवलपिंग इकॉनमीज हैं और फॉरेन कैपिटल पर डिपेंडेंट हैं। लेकिन असली डिफरेंस डेट के स्ट्रक्चर में है।
इंडोनेशिया का सबसे बड़ा ट्रैप था डॉलर में लोन। अर्निंग रुपैया में लेकिन रीपेमेंट डॉलर में। रुपैया गिरते ही लोन रीपेमेंट का बर्डन बढ़ गया और सिस्टम टूट गया।
इंडिया का मॉडल अलग है। जापान से जो लोन आए वो येन में हैं। और जापान की इकॉनमी डिफ्लेशनरी है। हम रुपये में कमा रहे हैं और लोन येन में चुका रहे हैं। येन की कमजोरी ने रीपेमेंट प्रेशर को कुछ हद तक आसान जरूर बनाया है। हां, करेंसी रिस्क हमेशा एक्जिस्ट करता है, लेकिन फिलहाल सिचुएशन इंडोनेशिया के बिल्कुल उल्टी है।
दूसरा क्रिटिकल डिफरेंस। इंडोनेशिया ने पैसे टेक्सटाइल्स, प्लांटेशंस और लो वैल्यू फैक्ट्रियों में लगाए। शॉर्ट टर्म ग्रोथ के लिए। इंडिया में जापानीज फाइनेंसिंग का बड़ा हिस्सा लॉन्ग टर्म इंफ्रास्ट्रक्चर एसेट्स में जा रहा है। मेट्रो स्टेशंस, सी ब्रिजेस, फ्रेट और लॉजिस्टिक्स, ट्रांसपोर्ट कनेक्टिविटी। यह सिर्फ शॉर्ट टर्म प्रोडक्शन एक्सपेंशन नहीं है। यह सिस्टम कैपेसिटी बनाने वाले एसेट्स हैं।
अगर यह प्लान एफिशिएंटली एग्जीक्यूट होता है, तो कल को मान लो जापान का मनी फ्लो स्लो हो जाता है, तो भी इंडिया के पास दूसरे कैपिटल सोर्सेस को अट्रैक्ट करने की कैपेसिटी होगी। हाई इंफ्रास्ट्रक्चर वाले देश में हर कोई पैसे लगाना चाहता है।
सच जानो: क्यों जापान चुपचाप इंडियन कंपनियां खरीद रहा है?
वियतनाम और सिंगापुर: इंडिया के लिए असली रोल मॉडल
जापान का इंडिया में इन्वेस्टमेंट को सही दिशा देने के लिए दो देशों से सीखना होगा।
वियतनाम ने सिर्फ FDI अट्रैक्ट नहीं किया, FDI को डायरेक्शन दिया। इंडस्ट्रियल पार्क्स, लॉजिस्टिक नेटवर्क्स, एक्सपोर्ट इकोसिस्टम्स। उन्होंने सिर्फ फैक्ट्रियां नहीं लगाईं, पूरा मैन्युफैक्चरिंग इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा किया। फिर Samsung और Intel जैसे ग्लोबल जायंट्स की एंट्री हुई। एक्सपोर्ट्स $300 बिलियन डॉलर तक पहुंच गए। आज वियतनाम मॉडर्न ग्लोबल सप्लाई चेन का लीडर है।
सिंगापुर तो वियतनाम से भी बेहतर एग्जांपल है। सिंगापुर ने कैपिटल को डायरेक्शन देकर अपना पूरा सिस्टम ही इन्वेस्टेबल बना दिया। इंफ्रास्ट्रक्चर बनाए, इंस्टिट्यूशंस बनाए, ट्रस्ट बनाया। और फिर वो सिर्फ एक कंट्री पर डिपेंडेंट नहीं रहा, बल्कि खुद कैपिटल का हब बन गया।
सच जानो: क्यों जापान चुपचाप इंडियन कंपनियां खरीद रहा है?
इंडिया के असली चैलेंजेस: जो तरक्की को रोक रहे हैं
जापान का इंडिया में इन्वेस्टमेंट तभी पूरी तरह काम आएगा जब इंडिया अपने इन्टर्नल चैलेंजेस सॉल्व करे।
पहला चैलेंज है रेगुलेटरी फ्रिक्शन। रूल्स ज्यादा हैं और अप्रूवल्स बेहद स्लो हैं। ग्रोथ भी इसी वजह से स्लो रहती है।
दूसरा चैलेंज है लैंड और लीगल डिलेज। लैंड डिस्प्यूट्स और कॉन्ट्रैक्ट एग्जीक्यूशन प्रोजेक्ट्स को चोक कर देते हैं। Tata Motors का नैनो प्रोजेक्ट वेस्ट बंगाल से गुजरात शिफ्ट करना इसका सबसे मशहूर उदाहरण है।
तीसरा चैलेंज है स्किल मिसमैच। यंग पॉपुलेशन तो है लेकिन जॉब-रेडी टैलेंट उतना नहीं है।
चौथा चैलेंज है लॉजिस्टिक्स इनएफिशिएंसी। इंफ्रा इम्प्रूव हो रही है लेकिन स्लोली। पुराने सिस्टम्स का ड्रैग बना हुआ है।
पांचवां चैलेंज है वीक क्रेडिट डेप्थ। MSMEs और प्राइवेट बिजनेसेस को कैपिटल स्मूथली नहीं मिलता। सिस्टम डिमांड क्रिएट करता है लेकिन फाइनेंसिंग उसे स्केल नहीं कर पाती।
छठा चैलेंज है पॉलिसी अनप्रेडिक्टेबिलिटी। इन्वेस्टर को सिर्फ ऑपोर्चुनिटी नहीं बल्कि पॉलिसी स्टेबिलिटी भी चाहिए। कन्फ्यूजन और रिवर्सल्स ट्रस्ट को वीक करते हैं।
सच जानो: क्यों जापान चुपचाप इंडियन कंपनियां खरीद रहा है?
निष्कर्ष: जापान का इंडिया में इन्वेस्टमेंट, खतरा नहीं, मौका है
तो अंत में सवाल का जवाब क्या है? क्या जापान का इंडिया में इन्वेस्टमेंट ग्रोथ है या कंट्रोल की शुरुआत?
जवाब है, यह एक स्ट्रक्चरली इनेविटेबल पार्टनरशिप है। न डायरेक्ट थ्रेट, न अंधा भरोसा। जापान के पास कैपिटल है, इंडिया के पास ग्रोथ पोटेंशियल है। जापान की पॉपुलेशन श्रिंक हो रही है, इंडिया की बढ़ रही है। जापान में डिमांड नहीं, इंडिया में डिमांड एक्सप्लोड हो रही है।
इंडिया की असली ताकत तब सामने आएगी जब फॉरेन कैपिटल, खासकर जापान का इंडिया में इन्वेस्टमेंट, किसी एक प्रोजेक्ट को नहीं बल्कि पूरे इंडिया को एक इन्वेस्टेबल इंफ्रास्ट्रक्चर बना दे। जब इंडिया सिर्फ एक मार्केट नहीं बल्कि एक प्रोडक्शन पावरहाउस बने। और तभी इंडिया सिर्फ एक इमर्जिंग इकॉनमी नहीं बल्कि एक सच्ची ग्लोबल सुपरपावर बन पाएगा।
सच जानो: क्यों जापान चुपचाप इंडियन कंपनियां खरीद रहा है?
