टैरिफ की शुरुआत कहाँ से हुई?
टैरिफ का पूरा सच:
आज से हजारों साल पहले जब दुनिया में कोई सरहद नहीं थी, कोई टैक्स नहीं था, कोई टैरिफ नहीं था — तब भी व्यापार होता था। जहाँ गेहूं ज्यादा था, वहाँ से लोग गेहूं लेते थे। जहाँ मछली ज्यादा थी, वहाँ से मछली लेते थे। और बदले में अपनी चीजें देते थे। यह बार्टर सिस्टम सदियों तक चलता रहा।
लेकिन जब 17वीं-18वीं सदी ईसा पूर्व की बात आती है, तब आज के इराक से कुछ व्यापारी अपना सामान गधों पर लादकर आज के तुर्की तक पहुंचे। वहाँ के स्थानीय शासकों ने कहा — तुम हमारे रास्ते इस्तेमाल करते हो, हमारी सुरक्षा लेते हो, हमारे इलाके में मुनाफा कमाते हो — तो हमें भी हिस्सा चाहिए। इस परमिशन फीस को निशातुम कहा गया। यह दुनिया का सबसे पुराना लिखित ट्रेड टैक्स माना जाता है।
इसके बाद यही कॉन्सेप्ट पूरी दुनिया में फैला। ग्रीक लोग इसे पेंटेकोस्टे कहते थे। रोमन एम्पायर इसे पोर्टोरिया कहता था। और भारत में इसे शुल्का कहा जाता था।
जब लंबी दूरी का व्यापार शुरू हुआ, तो व्यापारी जब किसी देश की सीमा पर पहुंचते थे, तो उन्हें अपने सामान की पूरी लिस्ट, उसकी कीमत और उस पर लगने वाला टैक्स एक कागज पर लिखकर देना होता था। अरब व्यापारी इस लिस्ट को “तर-इफ” कहते थे जिसका मतलब अरबी में है — जानकारी या नोटिफिकेशन। यही तर-इफ यूरोप पहुंचकर “तारिफा” बना और अंग्रेजी में आकर बन गया “टैरिफ।”
जब टैरिफ हथियार बना — ब्रिटेन की रणनीति
18वीं सदी तक टैरिफ सिर्फ राजस्व का जरिया था। लेकिन 1721 में एक बड़ा बदलाव आया। भारत और चीन ब्रिटेन को बहुत सस्ते और अच्छी क्वालिटी के कपड़े भेज रहे थे। नतीजा यह हुआ कि ब्रिटेन के लोकल टेक्सटाइल उद्योग की कमर टूट गई। रोजगार का संकट खड़ा हो गया।
तब ब्रिटिश सरकार को एहसास हुआ कि आयात से राजस्व तो मिलता है, लेकिन स्थानीय उद्योग बर्बाद होते हैं और दूसरे देशों पर निर्भरता बढ़ती है। इससे बचने के लिए ब्रिटेन ने 1700 और 1721 में कैलिको एक्ट लाया। भारत और चीन के कपड़ों पर लगभग बैन लगा दिया गया।
लेकिन नतीजा उलटा निकला। दूसरे देशों ने भी अपनी नीतियां कड़ी कर लीं। ब्रिटेन जो पूरी दुनिया में अपना सामान बेचना चाहता था, उसे झटका लगा। अंततः ब्रिटेन ने एक स्मार्ट टैरिफ शेड्यूल बनाया — जरूरी चीजों पर कोई टैक्स नहीं, और जो चीजें लोकल मार्केट के लिए खतरा हों उन पर भारी टैरिफ। इससे बैन लगाने की जरूरत नहीं पड़ती थी — महंगी होने की वजह से चीजें खुद-ब-खुद कम बिकती थीं।
यही कॉन्सेप्ट इतना सफल हुआ कि 4 जुलाई 1789 को अमेरिका ने भी अपना पहला टैरिफ एक्ट लागू किया। भारत में ब्रिटिश शासन ने 1878 में सी कस्टम्स एक्ट और 1894 में इंडियन टैरिफ एक्ट लागू किया।
महामंदी और स्मूट-हॉली का कहर
29 अक्टूबर 1929 को अमेरिका का वॉल स्ट्रीट क्रैश हो गया। पूरे बाजार धड़ाम हो गए। बेरोजगारी बढ़ने लगी। अमेरिकी राष्ट्रपति हर्बर्ट ने अपने देश की इंडस्ट्री और किसानों को बचाने के लिए 17 जून 1930 को स्मूट-हॉली टैरिफ एक्ट लागू किया। इसके तहत 20,000 से ज्यादा चीजों पर 40 से 60 प्रतिशत तक टैरिफ लगा दिया गया। कुछ पर तो 100 प्रतिशत तक।
यह वही काम था जो आज ट्रंप कर रहे हैं।
नतीजा? 25 देशों ने अमेरिका पर जवाबी टैरिफ लगा दिए। सब एक-दूसरे पर टैरिफ लगाने लगे। वैश्विक व्यापार 66 प्रतिशत तक गिर गया। बेरोजगारी 24.9 प्रतिशत तक पहुंच गई। और राष्ट्रपति हर्बर्ट चुनाव हार गए। यह दुनिया की महामंदी यानी ग्रेट डिप्रेशन थी। और इसके बाद सितंबर 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध भी शुरू हो गया।
इस पूरे दौर से दुनिया ने एक सबक सीखा — बिना किसी रणनीति के अंधाधुंध टैरिफ लगाने में फायदे से ज्यादा नुकसान है।
GATT और WTO की नींव
युद्ध के बाद, भारत और अमेरिका सहित 23 देश एक साथ आए। अमेरिका उस वक्त एक बड़ी महाशक्ति बन चुका था और इन देशों की अगुवाई कर रहा था। 30 अक्टूबर 1947 को — भारत की आजादी के सिर्फ ढाई महीने बाद — इन देशों ने मिलकर GATT बनाया। यानी जनरल एग्रीमेंट ऑन टैरिफ्स एंड ट्रेड।
GATT का मूल सिद्धांत था — कोई भेदभाव नहीं, कोई फेवरेट देश नहीं। इसके आर्टिकल 1 में MFN यानी मोस्ट फेवर्ड नेशन क्लॉज था — अगर तुमने एक देश को कम टैरिफ दिया, तो सभी मेंबर देशों को वही दर देनी होगी।
लेकिन अमेरिका को दिक्कत थी — वह कनाडा के साथ कम टैरिफ पर व्यापार करता था, यूरोपियन यूनियन के देश आपस में कम टैरिफ पर काम करते थे। तो GATT में आर्टिकल 24 और 21 जोड़े गए जिसमें दो देश आपस में अलग FTA यानी फ्री ट्रेड एग्रीमेंट कर सकते थे।
1995 में GATT बदलकर WTO यानी वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गनाइजेशन बन गया। इसमें कुछ और सेवाएं जोड़ी गईं लेकिन मूल नियम वही रहे।
PL 480 — जब अमेरिका ने भारत को सस्ता लेकिन घटिया गेहूं खिलाया
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका ने क्वालिटी से ज्यादा क्वांटिटी पर ध्यान दिया। गेहूं, मक्का और सोयाबीन का बंपर उत्पादन हुआ। लेकिन युद्ध खत्म होने के बाद भी उत्पादन जारी रहा। मांग कम, उत्पादन ज्यादा — और यह अनाज स्टोर करना भी महंगा था।
उधर भारत में सूखे और भुखमरी के हालात थे। 1954 में अमेरिकी राष्ट्रपति आइजनहावर PL 480 यानी पब्लिक लॉ 480 लाए। अमेरिका ने भारत से कहा — डॉलर नहीं है तो रुपये दो, हम अपना अनाज दे देंगे।
29 अगस्त 1956 को भारत ने PL 480 एग्रीमेंट पर साइन किया। लेकिन कई रिपोर्ट्स में यह सामने आया कि अमेरिका जो गेहूं भेज रहा था, वह इंसानों के लायक नहीं, बल्कि सूअरों के खाने लायक था।
और क्योंकि यह गेहूं सस्ता था, भारत के लोकल किसान उसके मुकाबले में नहीं टिक सके। उन्होंने उत्पादन कम कर दिया। नतीजा — भारत अपनी 40 प्रतिशत जरूरत का गेहूं अमेरिका से लेने लगा।
1965 में जब भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ लड़ाई लड़ी और अमेरिका के वियतनाम हमले की आलोचना की, तो अमेरिका ने अनाज की सप्लाई रोक दी। इंदिरा गांधी को घंटों फोन पर अमेरिकी राष्ट्रपति से गुहार लगानी पड़ी। और एक वक्त ऐसा भी आया जब इंदिरा गांधी ने फोन रख दिया और तय कर लिया — चाहे कुछ भी हो, भारत किसी दूसरे देश से खाना नहीं मांगेगा।
यही वह मोड़ था जिसने भारत की आत्मनिर्भरता की नींव रखी।
GSP और भारत का बढ़ता व्यापार
1974 में अमेरिका ट्रेड एक्ट लाया जिसमें GSP यानी जनरलाइज्ड सिस्टम ऑफ प्रेफरेंस शुरू किया गया। इसके तहत विकासशील देशों को अमेरिका में अपना सामान बेचने पर जीरो या बहुत कम टैरिफ देना पड़ता था। इसके पीछे अमेरिका की रणनीति थी — सोवियत यूनियन यानी रूस का इन देशों पर असर कम करना, और खुद के लिए सस्ती मजदूरी वाला काम इन देशों को देकर हाई-टेक काम पर फोकस करना।
1 जनवरी 1976 को भारत सहित 100 से ज्यादा देश GSP में शामिल हो गए। भारत अमेरिका को 2000 प्रोडक्ट ड्यूटी-फ्री एक्सपोर्ट कर सकता था।
लेकिन भारत ने अपना लोकल मार्केट बचाने के लिए सबसे ज्यादा टैरिफ बनाए रखा। 1980 में भारत दुनिया का सबसे ज्यादा टैरिफ लगाने वाला देश था — टेक्सटाइल पर 350 प्रतिशत, इंडस्ट्रियल सामान पर 100 प्रतिशत।
1991 के आर्थिक संकट में जब भारत को IMF और वर्ल्ड बैंक से मदद मांगनी पड़ी, तो शर्त थी — बाजार खोलो। भारत को LPG यानी लिबरलाइजेशन, प्राइवेटाइजेशन, ग्लोबलाइजेशन की राह पर चलना पड़ा। अधिकतम टैरिफ 355 प्रतिशत से घटकर 50 और फिर 20 प्रतिशत तक आ गया।
एग्रीकल्चर मार्केट — वह दरवाजा जो भारत ने कभी नहीं खोला
2003 में अमेरिकी कंपनियां — मोनसेंटो, कारगिल, टायसन फूड्स — भारत पर दबाव बनाने लगीं कि वह अपना कृषि और डेयरी बाजार खोले। लेकिन भारत ने मना कर दिया। 1997 में WTO में भिड़ंत हुई। 2007 में बॉर्डर टैक्स पर लड़ाई हुई। 2012 में भारत ने अमेरिका की पोल्ट्री पर बैन लगा दिया। अमेरिका WTO गया, केस हुआ।
लेकिन भारत टस से मस नहीं हुआ।
उस वक्त अमेरिका को ज्यादा परवाह नहीं थी क्योंकि उसके किसान चीनी बाजार में अच्छा-खासा बेच रहे थे।
ट्रंप का पहला दौर — चीन बना दुश्मन
28 जनवरी 2017 को डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका के राष्ट्रपति बने। उनकी सोच सीधी थी — अगर अमेरिका किसी देश से ज्यादा खरीदता है और कम बेचता है, तो यह अमेरिका का नुकसान है।
2017 में अमेरिका का ट्रेड डेफिसिट 800 बिलियन डॉलर से ज्यादा था। इसमें अकेले चीन का हिस्सा 375 बिलियन डॉलर था। ट्रंप की नजर में चीन सबसे बड़ा विलेन था।
22 मार्च 2018 को ट्रंप ने ट्रेड एक्ट 1974 के सेक्शन 301 के तहत चीन के 50 बिलियन डॉलर के निर्यात पर टैरिफ लगा दिया।
चीन ने पलटवार किया — और यह पलटवार बहुत स्मार्ट था। ट्रंप के वोटर ज्यादातर ग्रामीण किसान थे। प्यू रिसर्च के मुताबिक ट्रंप के 35 प्रतिशत से ज्यादा वोटर गांव के इलाकों से आते हैं। चीन ने 128 अमेरिकी उत्पादों पर 25 से 50 प्रतिशत तक जवाबी टैरिफ लगाया, जिसमें 94 कृषि उत्पाद थे।
नतीजा यह हुआ कि 2017 में अमेरिका से 32.9 मिलियन टन कृषि उत्पाद चीन गए थे — 2018 तक यह घटकर 8.2 मिलियन टन रह गया। चीन ने ब्राजील से सामान खरीदना शुरू कर दिया।
ट्रंप को अमेरिकी किसानों को 28 बिलियन डॉलर का मुआवजा देना पड़ा। अमेरिकी जीडीपी 0.04 प्रतिशत गिरी। और नागरिकों को 51 बिलियन डॉलर का अतिरिक्त बोझ उठाना पड़ा।
भारत — चीन का एकमात्र विकल्प
जब चीन का बाजार हाथ से निकल गया, तो ट्रंप को एक नया बड़ा बाजार चाहिए था। और इतना बड़ा बाजार सिर्फ एक ही देश दे सकता था — भारत।
अगर भारत अपना कृषि बाजार खोल दे, तो अमेरिकी किसानों की समस्या हल हो जाए।
ट्रंप ने भारत को GSP से बाहर कर दिया। और एग्रीकल्चर मार्केट खोलने के लिए बैक-टू-बैक नेगोशिएशन शुरू कर दी।
लेकिन भारत ने कृषि बाजार खोलने से मना कर दिया। उल्टे 1 अप्रैल 2020 से डिजिटल सर्विस टैक्स लागू कर दिया — Amazon, Google, Netflix, Apple, Facebook जैसी अमेरिकी कंपनियों पर 2 प्रतिशत टैक्स।
इससे पहले कि ट्रंप कुछ कर पाते, वह चुनाव हार गए। 2021 में बाइडेन आए, माहौल थोड़ा ठीक हुआ।
ट्रंप का दूसरा दौर — और भी आक्रामक
2025 में ट्रंप फिर सत्ता में आए। इस बार अमेरिका का ट्रेड डेफिसिट 1.2 ट्रिलियन डॉलर था। चीन के साथ अकेले 295 बिलियन डॉलर।
ट्रंप ने फिर वही किया। चीन पर टैरिफ। चीन ने जवाब में अमेरिका के 21 बिलियन डॉलर के कृषि और खाद्य उत्पादों पर टैरिफ लगाया और रेयर अर्थ्स पर भी रोक लगाई।
कारगिल का राजस्व 10 प्रतिशत कम हुआ। ADM का 8.9 प्रतिशत। बुंगे का 10.8 प्रतिशत।
और फिर ट्रंप भारत की तरफ मुड़े।
ट्रंप ने एग्जीक्यूटिव ऑर्डर 14257 के तहत एक फॉर्मूले का इस्तेमाल करके दुनिया के सभी देशों पर टैरिफ लगाए। उस लिस्ट में भारत पर 26 प्रतिशत टैरिफ था। यहाँ तक कि हर्ड और मैकडोनाल्ड आइलैंड — जहाँ सिर्फ पेंगुइन रहते हैं, इंसान नहीं — वहाँ भी 10 प्रतिशत टैरिफ लगाया गया।
भारत ने एग्रीकल्चर में फिर मना किया। ट्रंप ने रूसी तेल आयात का हवाला देकर 25 प्रतिशत और जोड़ा। यानी भारत पर कुल 50 प्रतिशत टैरिफ।
पहलगाम हमले के बाद, ऑपरेशन सिंदूर के बाद — भारत और अमेरिका के बीच के हालात स्टेमेट जैसे हो गए।
GM बीज — वह जाल जिसमें कई देश फंस चुके हैं
1974 के आसपास अमेरिका में मोनसेंटो कंपनी ने राउंडअप नाम का एक हर्बिसाइड केमिकल बनाया जो खरपतवार मारता था लेकिन साथ में फसलें भी खराब करता था।
तब मोनसेंटो ने सोयाबीन के बीजों को जेनेटिकली मॉडिफाई किया — ऐसा बनाया कि राउंडअप स्प्रे करने पर खरपतवार तो मरे, फसल ठीक रहे। यह प्रयोग सफल हुआ। उत्पादन बढ़ा। और इसी तकनीक से दूसरी फसलों के GM बीज बनाए गए।
मोनसेंटो ने किसानों को बीज के साथ एक कॉन्ट्रैक्ट दिया — अगले सीजन के लिए बीज स्टोर नहीं कर सकते, और सिर्फ राउंडअप केमिकल ही इस्तेमाल करना होगा।
समय के साथ अमेरिकी किसान इन GM बीजों पर निर्भर होते गए। नॉर्मल बीज बाजार से गायब होने लगे।
भारत में BT कॉटन के बीज आए। कपास का उत्पादन तीन गुना बढ़ा। लेकिन 450 ग्राम BT कॉटन बीज की कीमत 1600-1800 रुपये थी, जिसमें से 1250 रुपये मोनसेंटो रॉयल्टी ले जाता था। हर साल पेस्टिसाइड की जरूरत भी बढ़ती जाती थी। बीज स्टोर नहीं कर सकते थे — हर साल नए खरीदने पड़ते थे।
किसानों और यूनियनों ने दबाव डाला। कोर्ट ने मोनसेंटो को 70 प्रतिशत रॉयल्टी कम करने का आदेश दिया। और मोनसेंटो भारत छोड़कर चला गया।
लेकिन GM बीजों की समस्या सिर्फ रॉयल्टी नहीं है।
जिस इलाके में GM बीज इस्तेमाल होते हैं, वहाँ मधुमक्खियाँ और कीड़े क्रॉस-पॉलिनेशन करते हैं। इससे GM बीजों का DNA नॉर्मल बीजों में मिल जाता है। धीरे-धीरे नॉर्मल फसलें भी अपनी ओरिजिनैलिटी खो देती हैं।
और इससे भी बड़ी मुसीबत यह है कि GM फसलें यूरोपियन यूनियन, रूस, सर्बिया, अल्जीरिया समेत कई देशों में बैन हैं। अगर भारत GM फसलें ज्यादा उगाएगा तो उन देशों को एक्सपोर्ट करना मुश्किल हो जाएगा। और एक बार GM और नॉर्मल फसलें मिल गईं, तो वापस आना लगभग नामुमकिन है।
डेयरी सेक्टर — 40 करोड़ लोगों की रोजी
भारत में 8 करोड़ से ज्यादा किसान परिवार यानी करीब 40 करोड़ लोग सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से दूध उत्पादन से जुड़े हैं।
भारत में दूध की औसत कीमत 50 रुपये प्रति लीटर है। अमेरिका में सरकार किसानों को अरबों डॉलर की सब्सिडी देती है, इसलिए वहाँ दूध सस्ता है। अगर भारत डेयरी सेक्टर में टैरिफ कम करे तो अमेरिका का दूध भारत में 30-35 रुपये में बिकेगा।
भारतीय डेयरी सेक्टर पहले से ही 3-5 प्रतिशत के मामूली मार्जिन पर चल रहा है। इतने सस्ते विदेशी दूध के सामने छोटे डेयरी किसान टिक नहीं पाएंगे।
इसके अलावा अमेरिका में गाय-मवेशियों को ज्यादा दूध देने के लिए उनके चारे में ब्लड मील और मीट की हड्डियाँ मिलाई जाती हैं। RBST हार्मोन इंजेक्ट किए जाते हैं। भारत में यह बिल्कुल मंजूर नहीं। और धार्मिक दृष्टि से भी यह बड़ा विवाद खड़ा करेगा।
मेक्सिको, हैती, नाइजीरिया — जब दरवाजा खुला तो तबाही आई
90 के दशक में NAFTA के तहत मेक्सिको और कनाडा ने GM बीजों पर टैरिफ कम किया। अमेरिका ने मेक्सिको का बाजार अपने GM मक्के से भर दिया। 20 लाख से ज्यादा मेक्सिकन किसान खेती छोड़कर शहर चले गए।
हैती अपने कृषि बाजार पर 35 प्रतिशत टैरिफ लगाता था। IMF और वर्ल्ड बैंक से लोन की मजबूरी में उसे टैरिफ 35 से घटाकर 3 प्रतिशत करना पड़ा। अमेरिकी किसानों के सामान ने हैती का बाजार तबाह कर दिया। चावल की खेती पूरी तरह खत्म हो गई। और हैती को अपनी चावल जरूरत का 80 प्रतिशत अमेरिका से मंगाना पड़ा।
नाइजीरिया के पोल्ट्री किसानों के साथ भी यही हुआ।
भारत क्यों नहीं खोल सकता यह बाजार
भारत की कुल आबादी में से 45-48 प्रतिशत लोग खेती पर निर्भर हैं। देश की GDP में कृषि का योगदान 17-18 प्रतिशत है।
अमेरिका के मक्के की कीमत 1700 रुपये प्रति क्विंटल है, जबकि भारत में मक्के का MSP 2400 रुपये प्रति क्विंटल है। अगर अमेरिकी मक्का खुलकर आया तो भारतीय किसान मुकाबला नहीं कर पाएंगे।
PL 480 का सबक याद है? जब भारत खुद उगाना बंद कर अमेरिका पर निर्भर हो गया — तो अमेरिका ने युद्ध के वक्त अनाज रोककर भारत को झुकाने की कोशिश की।
अगर कृषि बाजार खुला और भारतीय किसान खेती छोड़ गए, तो युद्ध जैसे हालात में अनाज रोकना फिर से परमाणु हथियार से कम नहीं होगा।
इसीलिए नेताओं की स्पीच में किसान का जिक्र हमेशा होता है, लेकिन असली एजेंडे में नहीं।
50% टैरिफ का असर — आगे क्या?
भारत दुनिया को 820 बिलियन डॉलर का सामान और सेवाएं निर्यात करता है। सिर्फ सामान की बात करें तो 437 बिलियन डॉलर। इसमें से अमेरिका को 87.3 बिलियन डॉलर का सामान जाता है।
ट्रंप ने भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाया है, लेकिन यह सिर्फ सामान पर है, सेवाओं पर नहीं। और सामान में भी जेनेरिक दवाइयाँ, फार्मास्यूटिकल्स, स्मार्टफोन को टैरिफ लिस्ट से बाहर रखा गया है। मुख्य रूप से टेक्सटाइल, गारमेंट, फुटवियर और ज्वेलरी पर असर पड़ेगा।
FIEO यानी एक्सपोर्टर्स बॉडी के मुताबिक करीब 55 प्रतिशत शिपमेंट प्रभावित होगी। यानी मोटे तौर पर 48 बिलियन डॉलर के व्यापार पर सीधा असर।
भारत इस नुकसान की भरपाई के लिए अलग-अलग देशों के साथ FTA साइन कर रहा है।
निष्कर्ष
टैरिफ का यह खेल सदियों पुराना है। निशातुम से शुरू होकर ट्रंप के टैरिफ तक — हर बार एक ही मकसद रहा है, अपनी इंडस्ट्री बचाना और दूसरे का बाजार कब्जाना।
भारत जानता है कि अगर उसने कृषि और डेयरी बाजार खोला, तो PL 480 वाला इतिहास फिर दोहराया जाएगा। मेक्सिको, हैती और नाइजीरिया की तरह भारत के किसान भी तबाह हो जाएंगे।
इसीलिए भारत ने दशकों से यह दरवाजा बंद रखा है। और आज भी, चाहे ट्रंप कितना भी दबाव बनाएं — यह दरवाजा नहीं खुलेगा।
क्योंकि इस दरवाजे के पीछे 40 करोड़ लोगों की रोजी है, भारत की खाद्य सुरक्षा है, और एक राष्ट्र की संप्रभुता है।
पाकिस्तान-अफगानिस्तान युद्ध: क्या भारत है इस जंग का असली मास्टरमाइंड?
