कोहिनूर की पूरी कहानी: खोज से लेकर ब्रिटेन तक का सफर

कोहिनूर की पूरी कहानी: खोज से लेकर ब्रिटेन तक का सफर

कोहिनूर की पूरी कहानी: खोज से लेकर ब्रिटेन तक का सफर

इंडिया, पाकिस्तान, ईरान, अफगानिस्तान — यहाँ तक कि तालिबान भी — सभी ने एक ही हीरे पर दावा किया है। यह हीरा है कोहिनूर। दुनिया का सबसे मशहूर, सबसे विवादित और शायद सबसे श्रापित हीरा। कोहिनूर के बारे में कहा जाता है कि जिस भी पुरुष के पास यह गया उसके बुरे दिन शुरू हो गए। राजा गिरे, साम्राज्य टूटे और जानें गईं। लेकिन सिर्फ स्त्रियाँ और देवता इसे बिना नुकसान के धारण कर सकते हैं।

यह कोहिनूर की कहानी है — एक हीरे की नहीं, बल्कि सदियों के इतिहास, लालच, युद्ध, धोखे और विरासत की।

कोहिनूर की खोज — 1306, गोलकोंडा

आज के आंध्रप्रदेश के गुंटूर जिले में, साल 1306 में, जब यह पूरा इलाका गोलकोंडा का हिस्सा था, कृष्णा नदी के किनारे काम करने वाले खनिकों को एक असाधारण हीरा मिला। यह गोलकोंडा इलाका उस समय दुनिया का एकमात्र स्थान था जहाँ से हीरे निकाले जाते थे।

कोहिनूर उस समय 793 कैरेट का था — यानी 158.6 ग्राम। इसकी शुद्धता असाधारण थी। आज के मानकों से यह D-ग्रेड का हीरा होता। जब खनिकों को यह मिला तो उन्होंने काकतीय वंश के शासक को सौंप दिया।

इस तरह काकतीय वंश के शासक कोहिनूर के पहले दस्तावेजी मालिक बने।

वैज्ञानिक आधार भी इसकी पुष्टि करता है। कोहिनूर एक टाइप IIA हीरा है जिसमें नाइट्रोजन की कोई अशुद्धि नहीं है। भूविज्ञानी हर्ष के. गुप्ता और अन्य विशेषज्ञों ने आधिकारिक रूप से पुष्टि की है कि कोहिनूर गोलकोंडा क्षेत्र का है। 2023 में जर्नल ऑफ अर्थ सिस्टम साइंस ने एक शोध प्रकाशित किया जिसमें बताया गया कि कोहिनूर कोल्लूर की किम्बरलाइट पाइप से निकला था।

देवी की आँख में कोहिनूर — श्राप की शुरुआत

काकतीय शासक देवी भद्रकाली के परम भक्त थे। उनकी राजधानी वारंगल में भद्रकाली का विशाल मंदिर था। जब उन्हें यह असाधारण हीरा मिला तो उन्होंने इसे देवी की बाईं आँख में स्थापित किया।

यहीं से एक अंधविश्वास फैला — जिसके पास भी कोहिनूर होगा, वह शक्तिशाली तो बनेगा लेकिन दुर्भाग्य उसका पीछा नहीं छोड़ेगा। इसे केवल देवी और स्त्रियाँ ही बिना हानि के धारण कर सकती हैं।

अलाउद्दीन खिलजी और कोहिनूर — पहला छल

काकतीय साम्राज्य अपने चरम पर था। धन, शक्ति, बंदरगाह, मजबूत प्रशासन — कोई उन्हें पास से भी नहीं हरा सकता था। लेकिन कोहिनूर आने के कुछ समय बाद दिल्ली सल्तनत के अलाउद्दीन खिलजी ने सेनापति मलिक काफूर को वारंगल पर आक्रमण के लिए भेजा।

काकतीय वंश हार गया। सारा खजाना, जिसमें कोहिनूर भी था, दिल्ली ले जाया गया। जब खिलजी के सामने यह हीरा आया तो उन्होंने पूछा — इसकी कीमत क्या है? खजाने के अधिकारी ख्वाजा हाजी ने कहा — यह अद्वितीय है, इसकी कीमत आंकी नहीं जा सकती।

लेकिन कोहिनूर का श्राप तुरंत सक्रिय हुआ। खिलजी की मृत्यु हुई, मलिक काफूर ने उनके बच्चों को मरवाया और खुद भी मर गया। खिलजी वंश समाप्त हो गया। फिर कोहिनूर तुगलक वंश के पास गया — वे भी हारे।

बाबर, हुमायूँ और कोहिनूर — मुगल काल

कई वंशों से गुजरते हुए कोहिनूर अंततः बाबर के पास पहुँचा। जब हुमायूँ ने पूछा — इसमें ऐसा क्या है? तो बाबर ने कहा — यह हीरा दुनिया के सभी लोगों का एक दिन का पेट भर सकता है।

उस समय इसे कोहिनूर नहीं, “बाबर डायमंड” कहते थे।

26 दिसंबर 1530 को बाबर की मृत्यु हुई। हुमायूँ गद्दी पर बैठे लेकिन शेरशाह सूरी ने हमला किया और हुमायूँ हारने लगे। जुलाई 1544 में जान बचाने के लिए वे फारस यानी आज के ईरान भाग गए — लेकिन किसी तरह कोहिनूर अपने पास रखने में सफल रहे।

एक रोचक घटना भी हुई। नमाज के दौरान वुजू के लिए खड़े होते वक्त हुमायूँ ने कोहिनूर वहीं रख छोड़ा और भूल गए। लेकिन उनके दरबारी जौहर को यह मिल गया और वापस कर दिया।

फारस में हुमायूँ ने शाह तहमास्प से पनाह माँगी। सालों बाद जब देने के लिए कुछ नहीं बचा तो उन्होंने कोहिनूर तहमास्प को दे दिया। पहली बार कोहिनूर भारत से बाहर गया।

शाहजहाँ और मयूर सिंहासन — कोहिनूर का सबसे शानदार दौर

कई हाथों से होते हुए 7 जुलाई 1656 के आसपास कोहिनूर शाहजहाँ के पास पहुँचा। वे इस पर इतने मोहित हो गए कि उन्होंने इसे एक विशेष शाही पिटारे में अलग रखा।

शाहजहाँ ने प्रसिद्ध हीरा तराशने वाले हॉर्टेंसियो बोर्गियो को बुलाया और कहा — किसी भी कीमत पर इसे और सुंदर बनाओ। बोर्गियो ने हीरे में ज्यादा रोशनी लाने के लिए इसे काटा और पॉलिश किया — लेकिन इस प्रक्रिया में 793 कैरेट का कोहिनूर घटकर 280 कैरेट का रह गया। शाहजहाँ इतने क्रोधित हुए कि उन्होंने पारिश्रमिक देने की बजाय बोर्गियो पर 10,000 रुपये का जुर्माना लगा दिया।

इसके बाद शाहजहाँ ने दुनिया का सबसे महंगा सिंहासन बनवाया — तख्त-ए-ताऊस यानी मयूर सिंहासन। ताजमहल से भी महंगा यह सिंहासन 500 पाउंड से ज्यादा अनमोल पत्थरों से सजा था। और इसमें कोहिनूर भी जड़ा गया।

1658 में औरंगजेब ने शाहजहाँ को कैद किया और खुद राजा बने। लेकिन औरंगजेब ने एक असाधारण काम किया — उन्होंने कभी कोहिनूर वाले मयूर सिंहासन पर नहीं बैठे। कुछ लोग कहते हैं इसीलिए वे लंबे समय तक जिए।

नादिर शाह और कोहिनूर का नाम — पगड़ी की कहानी

औरंगजेब के बाद मुगल साम्राज्य कमजोर पड़ता गया। मुहम्मद शाह रंगीला के शासनकाल में फारस के नादिर शाह ने 1738 में हमला किया। नादिर शाह भारत पर राज नहीं करना चाहता था — सिर्फ खजाना चाहिए था।

मुहम्मद शाह ने सब कुछ दे दिया लेकिन कोहिनूर अपनी पगड़ी में छिपा लिया। लेकिन दरबार की नर्तकी नूर बाई ने चुपके से नादिर शाह को बता दिया।

नादिर शाह ने पुरानी परंपरा का उपयोग किया — “हमें पगड़ियाँ बदलनी चाहिए।” बहुत मना करने के बाद मुहम्मद शाह को मानना पड़ा। और जैसे ही पगड़ी बदली — कोहिनूर गिर पड़ा।

नादिर शाह ने तुरंत कहा — “कोहिनूर!” यानी “रोशनी का पहाड़।”

यहीं से यह नाम — कोहिनूर — इतिहास में दर्ज हुआ। इसका पहला आधिकारिक उल्लेख आलम अराई नादिर में मिलता है।

नादिर शाह कोहिनूर लेकर फारस गए। लेकिन जल्द ही उनके बुरे दिन शुरू हुए — वे मारे गए और उनका खजाना लूट लिया गया।

अफगानिस्तान से पंजाब — महाराजा रणजीत सिंह तक

नादिर शाह के भरोसेमंद सेनापति अहमद शाह दुर्रानी कोहिनूर लेकर अफगानिस्तान गए और दुर्रानी साम्राज्य की स्थापना की। साल 1800 में कोहिनूर शाह शुजा दुर्रानी के पास पहुँचा।

जैसे ही उन्हें कोहिनूर मिला — उनके चचेरे भाइयों ने विद्रोह कर दिया। भयभीत होकर उन्होंने कोहिनूर अपनी पत्नी वफा बेगम को देकर महाराजा रणजीत सिंह की शरण में भेजा।

वफा बेगम ने महाराजा से मदद माँगी और अपने पति को बचाने के बदले कोहिनूर देने का वादा किया। जब महाराजा ने पूछा — कोहिनूर की कीमत क्या है? तो वफा बेगम ने कहा — अगर पाँच शक्तिशाली पहलवान चारों दिशाओं में और एक आसमान की ओर पत्थर फेंकें और जितनी दूरी तय हो वह क्षेत्र सोने से भर दिया जाए — तो भी वह कोहिनूर की कीमत नहीं होगी।

डील हुई। लेकिन शाह शुजा और वफा बेगम बहाने बनाने लगे। अंततः अक्टूबर 1813 में शाह शुजा ने कोहिनूर महाराजा रणजीत सिंह को सौंप दिया।

महाराजा रणजीत सिंह रोज बाहर जाते तो कोहिनूर बाँह पर बाँध लेते। बाद में इसे शाही खजाने में रखा और विशेष अवसरों पर पहनते थे।

1838 में बीमार पड़ने पर उन्होंने बड़े पैमाने पर दान करना शुरू किया। उन्होंने कोहिनूर जगन्नाथ मंदिर को दान करने की इच्छा जताई। लेकिन खजांची बेलीराम ने इनकार किया — यह सिख साम्राज्य की संपत्ति है, व्यक्तिगत नहीं।

27 जून 1839 को महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु हुई। उनके बाद जो भी कोहिनूर का मालिक बना — उसका बुरा हश्र हुआ। खड़क सिंह को जहर दिया गया। नौनिहाल सिंह पर गेट गिरा। शेर सिंह को मार दिया गया।

अंग्रेज और कोहिनूर — लाहौर की संधि

महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद सिख साम्राज्य में एक के बाद एक मौतें हुईं। 1843 में पाँच साल के दलीप सिंह को शासक बनाया गया और उनकी माँ जिंद कौर ने प्रशासन सँभाला।

11 दिसंबर 1845 को अंग्रेजों ने सिख साम्राज्य पर हमला किया और कब्जा कर लिया। जिंद कौर को नजरबंद किया और 7 साल के दलीप सिंह से लाहौर की संधि पर हस्ताक्षर करवाए।

इस संधि के आर्टिकल 3 में साफ लिखा था कि कोहिनूर अंग्रेजों को सौंपा जाएगा। 7 दिसंबर 1849 को एक समारोह में कोहिनूर ऑफिशियली अंग्रेजों को सौंपा गया।

कोहिनूर इंग्लैंड पहुँचा — दुर्भाग्य साथ लेकर

2 फरवरी 1850 को कोहिनूर को लाहौर किले से बॉम्बे ले जाया गया। 6 अप्रैल 1850 को HMS मेडिया जहाज पर इंग्लैंड के लिए रवाना हुआ।

रास्ते में जहाज पर हैजा फैला, दो क्रू मेंबर मरे, तूफान में फँसे। किसी तरह 2 जुलाई 1850 को पोर्ट्समाउथ पहुँचे।

और जिस दिन कोहिनूर इंग्लैंड पहुँचा — उसी दिन ब्रिटिश प्रधानमंत्री रॉबर्ट पील घोड़े से गिरकर मर गए। रानी विक्टोरिया पर रॉबर्ट फ्रांसिस ने लोहे की छड़ से हमला किया। अखबारों में एक साथ कोहिनूर के आगमन और ये दुखद घटनाएँ छपीं।

3 जुलाई 1850 को जब रानी को कोहिनूर मिला — तो उनकी एक आँख काली थी और सिर पर चोट का निशान था।

रानी को इसका आकार पसंद नहीं आया। डेविड ब्रूस्टर — “आधुनिक प्रयोगात्मक ऑप्टिक्स के जनक” — को 8000 ब्रिटिश पाउंड में कोहिनूर को फिर से काटने का काम दिया गया। इसके बाद कोहिनूर का वजन घटकर सिर्फ 105.6 कैरेट यानी 21.12 ग्राम रह गया।

1861 में रानी विक्टोरिया के पति प्रिंस अल्बर्ट की भी मृत्यु हो गई। तब से कहानी यह बन गई कि कोहिनूर सिर्फ स्त्रियाँ ही पहन सकती हैं। इसलिए इसे ब्रिटिश रॉयल फैमिली के ताज में जड़ा गया ताकि केवल महिलाएँ इसे पहनें।

भारत की कोहिनूर वापसी की लड़ाई

1947 में आजादी के बाद भारत ने कोहिनूर वापस माँगा — इनकार कर दिया गया। 1953 में रानी एलिजाबेथ के राजतिलक पर फिर माँगा — फिर इनकार।

1976 में पाकिस्तान भी इस विवाद में कूद पड़ा — दावा किया कि लाहौर की संधि से कोहिनूर मिला था इसलिए यह लाहौर की धरोहर है। फिर तालिबान ने दावा किया — दुर्रानी साम्राज्य का हिस्सा था। ईरान ने भी दावा किया। ब्रिटेन ने सबको मना कर दिया।

1997 में पत्रकार और राज्यसभा सांसद कुलदीप नैयर ने 50 अन्य सांसदों के साथ पिटीशन पर हस्ताक्षर किए — इनमें डॉ. मनमोहन सिंह भी थे। तत्कालीन विदेश मंत्री जसवंत सिंह ने कहा कोहिनूर वापस आएगा — लेकिन मामला वहीं रुक गया।

2002 में रानी एलिजाबेथ की माँ के ताबूत पर कोहिनूर जड़े ताज को रखा गया और भारत में लाइव टेलीकास्ट हुई। सिख समुदाय नाराज हुआ। जगन्नाथ मंदिर के अधिकारियों ने मांग की। कोर्ट में PIL दायर हुईं।

2016 में ऑल इंडिया ह्यूमन राइट्स एंड सोशल जस्टिस फ्रंट की PIL पर सरकार के सॉलिसिटर जनरल रंजीत कुमार ने कहा — कोहिनूर स्वेच्छा से दिया गया था, चुराया नहीं गया।

जनता के आक्रोश के बाद सरकार ने स्टैंड बदला — कहा कि कोहिनूर भारत का है लेकिन कानूनी दिक्कतें हैं।

कोहिनूर वापस क्यों नहीं आ सकता — कानूनी उलझनें

1972 का एंटीक्विटीज एंड आर्ट ट्रेजर्स एक्ट सिर्फ 1972 के बाद की चीजों पर लागू होता है — कोहिनूर इसके दायरे से बाहर है।

UNESCO कन्वेंशन का आर्टिकल 7 भी सिर्फ 1970 के बाद की वस्तुओं के लिए वैध है।

आर्टिकल 1 कहता है कि सांस्कृतिक विरासत का मूल स्थान साबित करना होगा — लेकिन कोहिनूर भारत, ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान से होकर गुजरा है। देश और राज्य बदलते रहे।

ब्रिटेन का तर्क है — लाहौर की संधि के आर्टिकल 3 से कानूनी तौर पर कोहिनूर मिला। 150 साल से यह ताज का हिस्सा है। अगर कोहिनूर लौटाया तो दुनिया भर के संग्रहालय खाली हो जाएंगे। और किसे दें — इंडिया, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान — सब दावेदार हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने PIL खारिज करते हुए कहा — हम किसी दूसरे देश को कोहिनूर लौटाने का आदेश नहीं दे सकते।

कोहिनूर का श्राप — आज भी जारी

8 सितंबर 2022 को रानी एलिजाबेथ की मृत्यु के बाद किंग चार्ल्स राजा बने। 2024 में उन्हें कैंसर हुआ। एक बार फिर कोहिनूर के श्राप की चर्चा शुरू हो गई।

और कुछ लोग यह भी कहते हैं कि जब कोहिनूर इंग्लैंड आया था तो ब्रिटिश साम्राज्य में सूरज कभी नहीं डूबता था — एशिया, अफ्रीका, यूरोप, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया सब आता था। आज ब्रिटेन एक छोटा सा द्वीप देश है।

कोहिनूर आज भी टावर ऑफ लंदन में रखा है। भारत आज भी इसे अपनी विरासत मानता है। और यह विवाद — इतिहास, कानून, भावनाओं और राजनीति का — अभी अनसुलझा है।

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