वो गाँव जहाँ इंग्लिश स्कूल भी नहीं था
भारत का नंबर एक स्टॉकब्रोकर। हर तीन नई SIP में से एक जिसके जरिए बनाई जाती है। हजारों करोड़ की कंपनी।
और इसे बनाने वाला एक किसान का बेटा — जो मध्यप्रदेश के एक ऐसे गाँव से आया था जहाँ इंग्लिश मीडियम स्कूल तक नहीं था।
ललित केशरे का जन्म मध्यप्रदेश के लेपा नाम के एक पिछड़े गाँव में हुआ था। गाँव इतना पिछड़ा था कि बेहतर शिक्षा के लिए माता-पिता को उन्हें मात्र सात साल की उम्र में खरगोन शहर भेजना पड़ा। वहाँ वो अपने नाना-नानी के साथ रहे।
सौभाग्य से उसी साल खरगोन में पहला इंग्लिश मीडियम स्कूल खुला और ललित उसके 42वें छात्र बने।
शुरुआत में वो एक औसत छात्र थे। लेकिन दूसरी कक्षा में उन्होंने पूरी क्लास में टॉप किया। दादाजी ने सिर्फ एक शब्द में तारीफ की — “अच्छा।”
बस यही एक शब्द उन्हें पूरी जिंदगी बेहतर करने के लिए प्रेरित करता रहा।
Groww की पूरी कहानी: एक किसान के बेटे ने बना दिया भारत का नंबर 1 स्टॉकब्रोकर
IIT का नाम सुना — और ठान लिया
स्कूल की लाइब्रेरी में एक दिन ललित को एक मोटी किताब दिखी। प्रिंसिपल ने बताया कि यह IIT-JEE की तैयारी के लिए है — भारत की सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक।
उस दिन तक न ललित ने IIT का नाम सुना था, न उनके किसी सहपाठी ने।
लेकिन जैसे ही पता चला कि यह “जटिल परीक्षा” है — ललित ने ठान लिया कि यही करना है।
उन्होंने Brilliant Tutorials के पोस्टल कोचिंग प्रोग्राम में दाखिला लिया। हर महीने डाक से स्टडी मटीरियल आता था। न कोई कोचिंग सेंटर, न कोई गाइडेंस — पूरी तरह अकेले।
नतीजा — IIT बॉम्बे में माइक्रोइलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग में दाखिला।
IIT में एलर्जी से बना एंटरप्रेन्योर
IIT में जहाँ बाकी छात्र प्लेसमेंट और ग्रेड पर ध्यान देते थे, ललित का नजरिया अलग था।
कैंपस में पराग (pollen) की वजह से उन्हें एलर्जी होती थी। तो उन्होंने इंजीनियरिंग की जानकारी का इस्तेमाल करके एक एलर्जन डिटेक्टर डिवाइस बनाया जो पहले से आगाह कर दे।
IIT ने उन्हें शेयर बाजार से भी परिचित कराया। उन्होंने अपनी स्कॉलरशिप के पैसों से 80 रुपये का एक शेयर खरीदा।
उस जमाने में Demat अकाउंट खुलवाने का मतलब था — लंबी कतारें, ढेर सारी कागजी कार्रवाई और भारी ब्रोकरेज फीस।
ललित को तब नहीं पता था कि एक दिन वो पूरे देश के लिए इसी समस्या का समाधान बनेंगे।
पहला स्टार्टअप — Eduflix — सही आइडिया, गलत वक्त
IIT से ग्रेजुएट होने के बाद ललित ने Ittiam Systems जॉइन की। यह एक भारतीय कंपनी थी जो Google और Netflix जैसे वीडियो स्ट्रीमिंग सॉफ्टवेयर बनाती थी।
काम करते हुए उन्हें एहसास हुआ कि वीडियो कंटेंट कितना शक्तिशाली है। उन्हें याद आया कि बचपन में बेहतर शिक्षा के लिए उन्हें माँ-बाप से दूर रहना पड़ा था और IIT की तैयारी भी बिना किसी गाइडेंस के की थी।
2011 में उन्होंने Eduflix शुरू किया — शिक्षा के लिए Netflix। भारत के बेहतरीन शिक्षकों को ऑनलाइन लाकर लाइव स्ट्रीमिंग के जरिए पूरे देश में अच्छी शिक्षा पहुँचाने का सपना।
हैरानी की बात — यह आइडिया Unacademy, BYJU’S और PW से कई साल पहले आया था।
लेकिन यही इसके असफल होने की वजह भी बनी।
उस वक्त भारत का इंफ्रास्ट्रक्चर बड़े पैमाने पर वीडियो स्ट्रीमिंग को सपोर्ट करने के लिए तैयार नहीं था। न हर घर में लैपटॉप था, न स्मार्टफोन।
तीन साल की मेहनत के बाद Eduflix बंद हो गया।
लेकिन इस नाकामी ने एक बड़ा सबक सिखाया — एक स्टार्टअप में टाइमिंग ही सब कुछ होती है।
Flipkart — राखी और एक घंटे की डिलीवरी का सपना
करारी हार के बाद ललित ने भारत के सबसे बड़े स्टार्टअप Flipkart जॉइन किया।
वहाँ एक रक्षाबंधन के दौरान एक घटना हुई जिसने उनकी सोच बदल दी।
एक तकनीकी गड़बड़ी की वजह से राखी के कई ऑर्डर कैंसिल हो गए। Flipkart चाहता तो बस एक माफी वाला ईमेल भेज सकता था।
लेकिन उस रात 10-15 इंजीनियर ऑफिस में रुके रहे, खुद अपने हाथों से राखियाँ पैक कीं और यह पक्का किया कि ग्राहकों को रक्षाबंधन के दिन ही राखी मिले।
इससे ललित ने सीखा कि सफल बिजनेस के लिए ग्राहकों के प्रति जुनून सबसे जरूरी है।
और तभी उनके मन में एक विचार आया — तीन दिन, दो दिन या एक दिन की डिलीवरी नहीं — बल्कि एक घंटे की डिलीवरी।
उन्होंने “Flipkart Quick” नाम से एक पायलट प्रोजेक्ट चलाया। जिस कॉन्सेप्ट का आज Zepto, Swiggy और Blinkit इस्तेमाल कर रहे हैं, ललित ने उसे 2015 में ही पायलट कर लिया था।
लेकिन फिर वही समस्या — इंफ्रास्ट्रक्चर।
Flipkart शानदार था लेकिन ललित के सपने इससे भी बड़े थे।
रविवार की नाश्ते की मीटिंग — और Groww का जन्म
ललित ने अपने साथ तीन काबिल को-फाउंडर्स को जोड़ा — हर्ष जैन, नीरज सिंह और ईशान बंसल। तीनों उस वक्त Flipkart में थे।
हर रविवार ये चारों नाश्ते पर मिलते। और हर बार एक ही बात होती — शेयर बाजार और निवेश।
वो बार-बार यही सवाल पूछते —
Demat अकाउंट खुलवाना इतना मुश्किल क्यों है? म्यूचुअल फंड इतने पेचीदे क्यों हैं? 20 करोड़ भारतीयों के पास निवेश के पैसे हैं तो सिर्फ 2 करोड़ लोग ही म्यूचुअल फंड में निवेश क्यों कर रहे हैं?
और इसी दौर में भारत में Digital India, Aadhaar eKYC और Jio की एंट्री हो रही थी।
इस बार इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार था।
2017 में Groww लॉन्च हुआ।
शुरुआत — न ऐप था, न बड़ा बजट, सिर्फ एक वेबसाइट
शुरुआत में उनके पास ऐप बनाने के पैसे नहीं थे। सिर्फ एक वेबसाइट लॉन्च की गई।
Groww वेबसाइट पर सिर्फ म्यूचुअल फंड मिलते थे। फंड मैनेजर की प्रोफाइल, खर्च का अनुपात, पिछले 1-3-5-10 सालों का प्रदर्शन, रिस्क रेटिंग — सारी जानकारी एक जगह। यूजर्स खुद फैसला ले सकते थे।
उन्होंने सोचा — अगर पहले महीने में 100 यूजर्स भी मिल गए तो जारी रखेंगे।
पहले ही महीने बिना किसी पेड मार्केटिंग के 600 यूजर्स जुड़ गए।
यह छोटी सी सफलता उनके लिए बहुत बड़ी उपलब्धि थी।
वो फैसला जिसने Groww को अलग बना दिया
Groww बाजार में अकेला नहीं था। Zerodha, Upstox और 5paisa जैसे खिलाड़ी पहले से थे।
मुकाबले के लिए Groww ने कुछ अनोखा किया।
उन्होंने देखा कि सभी प्रतिद्वंद्वी सीधे स्टॉक ट्रेडिंग पर ध्यान दे रहे थे क्योंकि वहाँ सबसे ज्यादा कमाई थी।
Groww ने ठीक उल्टा किया।
उन्होंने सबसे आसान प्रोडक्ट से शुरुआत की — म्यूचुअल फंड। और एक और बड़ा फैसला लिया — रेगुलर म्यूचुअल फंड देना बंद करके सिर्फ डायरेक्ट फंड देंगे।
रेगुलर फंड में प्लेटफॉर्म 1 से 1.5% ज्यादा कमीशन रखता था। Groww ने अपना कमीशन पूरी तरह जीरो कर दिया।
नतीजा — 2017 से 2021 तक चार सालों में लगभग कोई खास राजस्व नहीं।
लेकिन उस दौरान उन्होंने 2 करोड़ रजिस्टर्ड यूजर्स का भरोसेमंद आधार बना लिया।
पहले दिन ही 1.8 लाख Demat अकाउंट
जब Groww ने आखिरकार स्टॉक ट्रेडिंग शुरू की तो पहले ही दिन 1.8 लाख Demat अकाउंट खुल गए।
Groww ने अकाउंट खोलने की कोई फीस नहीं ली। न कोई सालाना मेंटेनेंस चार्ज — जबकि प्रतिद्वंद्वी अभी भी ये दोनों चार्ज ले रहे थे।
सिर्फ खरीदने-बेचने के ट्रांजेक्शन पर ब्रोकरेज लिया।
एक-एक करके नए प्रोडक्ट आते रहे — ETFs, IPOs, इंट्राडे ट्रेडिंग, F&O और बहुत कुछ।
और जब राजस्व आना शुरू हुआ तो रफ्तार चौंकाने वाली थी — FY21 के 52.7 करोड़ से बढ़कर FY25 में 4062 करोड़ — सिर्फ चार सालों में 77 गुना बढ़ोतरी।
ग्राहक के प्रति जुनून — यही असली रहस्य है
Groww की सफलता का असली राज सिर्फ प्रोडक्ट नहीं था।
CEO ललित केशरे आज भी रोजाना दो घंटे Groww ऐप खुद इस्तेमाल करते हैं। सीधे ग्राहकों से बात करते हैं। हर कर्मचारी — चाहे इंजीनियर हो, डिजाइनर हो या CEO — रेगुलर तौर पर कस्टमर सपोर्ट में काम करता है।
अगर किसी यूजर को eKYC में दिक्कत आती है तो Groww के कर्मचारी खुद उनके घर जाकर सिग्नेचर लेते हैं।
2023 में SEBI ने एक रिपोर्ट जारी की जिसमें बताया गया कि F&O में ट्रेडिंग करने वाले 90% लोग पैसे गँवा रहे थे।
Groww ने तुरंत ऐसे फीचर पेश किए जिनसे यूजर्स का फायदा हो — भले ही कंपनी को राजस्व का नुकसान हो।
अगर किसी यूजर को लगातार नुकसान होता था तो Groww अपने आप उनकी ट्रेडिंग रोक देता था। बाजार ज्यादा अस्थिर हो तो F&O ट्रेडिंग रोकने की सुविधा। सुरक्षित सीमा से आगे निकलने पर चेतावनी।
इसी का नतीजा है कि आज Groww के 70-80% यूजर्स सिर्फ एक-दूसरे की सिफारिश पर इस प्लेटफॉर्म से जुड़ते हैं।
मार्केटिंग नहीं — शिक्षा
Groww की मार्केटिंग देखकर लगता ही नहीं कि यह मार्केटिंग है।
जहाँ दूसरी कंपनियाँ TV विज्ञापनों, सेलिब्रिटी प्रचार और इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग पर करोड़ों खर्च करती थीं, Groww ने पूरी तरह शिक्षा पर ध्यान दिया।
आज वो 19 शैक्षणिक YouTube चैनल चलाते हैं। मुख्य चैनल के 2.4 मिलियन सब्सक्राइबर हैं। सात क्षेत्रीय भाषाओं में चैनल हैं — तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, मराठी, गुजराती और बंगाली — ताकि Tier 2 और Tier 3 शहरों के लोग भी जुड़ सकें।
इंटरनेट पर 60,000 से ज्यादा शैक्षणिक पेज हैं। 200 से ज्यादा कैलकुलेटर हैं। हजारों स्टॉक पेज हैं जिन पर रियल टाइम डेटा है।
जब कोई “म्यूचुअल फंड क्या है,” “TCS शेयर की कीमत” या “SIP कैलकुलेटर” सर्च करता है तो Groww का पेज सबसे पहले आता है। हर महीने लाखों लोग Groww की वेबसाइट पर आते हैं, जानकारी लेते हैं और धीरे-धीरे भरोसा बनाते हैं।
2020 में “अब इंडिया करेगा इन्वेस्ट” कैंपेन के तहत 250 से ज्यादा शहरों में मुफ्त वर्कशॉप हुई — जिनमें 60% Tier 2 और Tier 3 शहर थे।
Groww ने मार्केटिंग की जगह शिक्षा को अपनाया। जब लाखों यूजर्स ने पहली बार Groww से निवेश की बुनियादी बातें सीखीं तो इस ब्रांड पर उनका भरोसा बहुत गहरा हो गया।
आज का Groww — 98% पिन कोड, 27% मार्केट शेयर
आज Groww भारत के 98% पिन कोड में काम करता है। करीब 27% मार्केट शेयर के साथ यह भारत का नंबर एक स्टॉकब्रोकर है।
लेकिन सबसे कमाल की बात यह है कि Groww ने यह सब ग्राहकों का फायदा उठाकर नहीं, बल्कि उन्हें शिक्षित करके हासिल किया।
एक इंटरव्यू में ललित केशरे ने कहा — वो यह कंपनी आज या अगले साल के लिए नहीं, बल्कि आने वाले दशकों के लिए बना रहे हैं।
निष्कर्ष — एक सबक जो हर स्टार्टअप को सीखना चाहिए
ललित केशरे की कहानी सिर्फ Groww की कहानी नहीं है।
यह उस सोच की कहानी है जो दादाजी के एक शब्द “अच्छा” से जागी थी।
यह उस जिद की कहानी है जिसने बिना किसी कोचिंग सेंटर के IIT की परीक्षा पास की।
यह उन दो असफलताओं की कहानी है — Eduflix और Flipkart Quick — जिन्होंने सिखाया कि सही आइडिया सही वक्त पर ही काम करता है।
और यह उस भरोसे की कहानी है जो चार साल तक बिना मुनाफे के 2 करोड़ लोगों के साथ बनाया गया।
Groww ने साबित किया — अगर आप ग्राहक का भला करें, तो ग्राहक आपका भला खुद-ब-खुद करता है।
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