Alpha फिल्म रिव्यू: YRF स्पाई यूनिवर्स की सबसे कमज़ोर कड़ी क्यों है?

Alpha फिल्म रिव्यू: YRF स्पाई यूनिवर्स की सबसे कमज़ोर कड़ी क्यों है?

अनुराग कश्यप ने एक इंटरव्यू में बहुत सटीक बात कही थी:

“यहां सिनेमा उन्हीं लोगों के हाथ में है जो ट्रायल रूम में पले-बढ़े हैं। उन्होंने जिंदगी नहीं जी। तो उनका सिनेमा का रेफरेंस भी सिनेमा से ही आता है। जो स्क्रीन पर नहीं है वो उनके लिए सिनेमा भी नहीं।”

YRF की Alpha देखकर यह बात और भी गहरी लगती है।

यह फिल्म धुरंधर के बाद आई है — और धुरंधर ने जो स्तर सेट किया, उससे तुलना तो होगी ही। लेकिन सच यह है कि Alpha अगर धुरंधर से भी पहले आई होती तो भी आउटडेटेड लगती। क्योंकि फिल्म में कोई सोल ही नहीं है।

यह एक सिनेमैटिक विश्लेषण है। पूरा पढ़ें — क्योंकि अंत तक आते-आते YRF स्पाई यूनिवर्स की असली समस्या साफ हो जाएगी।

पहला प्रभाव: हॉलीवुड का टेम्पलेट, भारतीय अनुभव का अभाव

Alpha की सबसे बड़ी समस्या शुरुआत में ही दिख जाती है।

फिल्म के शुरुआती मिनटों में ही Calvin Klein और Ching Noodles के विज्ञापन इंटीग्रेट किए गए हैं। यह बताता है कि क्रिएटिव ब्रेनस्टॉर्मिंग असल में कहां हुई — फिल्म की कहानी और किरदारों पर नहीं, बल्कि ब्रांड डीलिंग पर।

कहानी की बात करें तो ऐसा लगता है कि निर्माताओं ने हॉलीवुड की कई फिल्मों के टेम्पलेट मिक्स करके Alpha बना दी। Tomb Raider, La Femme Nikita, Ballerina, Black Widow — इन सबकी झलकियां दिखती हैं। लेकिन जो चीज कहीं नहीं दिखती वो है — भारतीय दर्शकों से भावनात्मक कनेक्शन।

एक्शन फिल्मों में इमोशनल फैक्टर होना बेहद जरूरी होता है। मतलब जब एक्शन हो रहा हो तो दर्शक को स्टेक्स फील होने चाहिए — जिंदगी और मौत का खतरा। तब दर्शक उस दृश्य में डूबता है।

Alpha का मुख्य दोष यही है — वो डर, वो तनाव, वो एक्शन में वो जान — कहीं नहीं है। और जब यही नहीं है तो एक्शन फिल्म का पूरा उद्देश्य ही विफल हो जाता है।

लेखन की विफलता: जब स्क्रिप्ट ही डूबी हो

Alpha की पटकथा की जिम्मेदारी थी उदय चोपड़ा की — हां, वही उदय चोपड़ा जो धूम में अली का किरदार निभाने के लिए जाने जाते हैं। बचपन का पसंदीदा किरदार।

लेकिन उदय जी, आपकी Alpha की कहानी बेहद दोहराव से भरी है। इसके पैर नहीं हैं।

फिल्म में हर 15 मिनट पर वही पैटर्न दोहराया जाता है:

  • एक किरदार को कुछ रियलाइज होता है
  • दूसरा किरदार बताता है कि पास्ट में जो हुआ वो झूठ था
  • फिर दोनों किरदार किसी अज्ञात डर से भागते दिखते हैं

यह सिलसिला पूरी फिल्म में चलता रहता है — बिना किसी वास्तविक घटनाक्रम के, बिना किसी भावनात्मक विकास के।

डायलॉग लिखे हैं इशिता मोहित्रा ने, जिन्होंने हाल ही में सनी संस्कारी और नादानिया जैसी फिल्मों के डायलॉग लिखे हैं। अब आप खुद अंदाजा लगाइए।

स्क्रीनप्ले के को-राइटर हैं श्रीधर राघवन — जो अभी रामायण की पटकथा भी लिख रहे हैं। यह जानकर थोड़ी चिंता जरूर होती है।

निर्देशन किया है राहुल रवेल ने — यह उनकी पहली फीचर फिल्म है। इससे पहले उन्होंने The Railway Men वेब सीरीज बनाई थी। पहली फीचर के लिए इतना बड़ा YRF स्पाई यूनिवर्स प्रोजेक्ट संभालना — चुनौती थी और यहां वो चूक गए।

आलिया भट्ट: इंटेंसिटी है, लेकिन निर्देशन ने डुबो दिया

आलिया भट्ट के बारे में ईमानदारी से कहें तो — एक्शन हीरोइन के रूप में उनके किरदार में थोड़ी इंटेंसिटी दिखी।

कम से कम उनका किरदार पूरी फिल्म में एक जैसा रहता है — सीरियस, फोकस्ड। बीच में कहीं बेवजह गाना नहीं गाने लग जाता। कोई रोमांटिक एंगल नहीं थोपा गया जो कहानी से अलग हो।

यह सराहनीय है।

लेकिन उनका एंट्री सीन बेहद pretentious लगता है। वो एक्शन कर रही हैं, लोगों को बम से उड़ा रही हैं, और बैकग्राउंड में बजता है — “वही तो अग्नि है रे।”

यह “spoon-feeding” वाला तरीका अब काम नहीं करता। 2010 में शायद चलता। लेकिन आज दर्शक ज्यादा समझदार हो गए हैं।

जैसा Donald Trump ने एक बार India’s Got Latent में कहा था (मज़ाक की बात) — “She is an actress. Somebody give her a script and a director.”

आलिया को एक बेहतर निर्देशक की जरूरत थी। जिगरा में वसन बाला ने उन्हें कितने अच्छे से निर्देशित किया था — वहां एक परफॉर्मेंस निकलकर आती है। Alpha में परफॉर्मेंस के नाम पर कुछ नहीं है — और इसकी जिम्मेदारी लेखन और निर्देशन की है, आलिया की नहीं।

शरवरी का किरदार: पुराने ढांचे की नई पैकेजिंग

शरवरी का किरदार Alpha में एक पुराने बॉलीवुड क्लिशे का उदाहरण है।

पूरी फिल्म में उनके किरदार को आलिया के बिल्कुल विपरीत दिखाया गया है — ताकि फिल्म में:

  • गाने हों
  • डांस हो
  • जोक्स हों
  • स्केटबोर्डिंग हो (और वो भी 360° समरसॉल्ट के बाद)

एक “urban world character” जो फिल्म की नीरस रंग-टोन में थोड़ा रंग भरे।

यह उन दर्शकों को पसंद आ सकता है जो शरवरी के प्रशंसक हैं और फिल्म में थोड़ी सांस लेने की जगह चाहते हैं। फिल्म में कुछ अच्छे गाने भी हैं — एक पंजाबी ट्रैक और “Massacre” नाम का एक ट्रैक जिसकी बीट अच्छी लगती है। हालांकि इन्हें प्रमोट उतना नहीं किया गया।

लेकिन एक्टिंग के लिहाज से शरवरी के पास देने के लिए कुछ खास नहीं था — किरदार ही ऐसा लिखा गया था।

बॉबी देओल का विलेन: लुक तो है, किरदार नहीं

बॉबी देओल लुक वाइज तो अपने रोल के लिए एकदम सही लगते हैं। आजकल जो डार्क और सीरियल किरदार वो कर रहे हैं, उसमें वो बेहतरीन हैं।

लेकिन Alpha में उनका विलेन भी खराब किरदार लेखन का शिकार है।

और क्लाइमेक्स में उनका जो “reveal” है — वो बेहद निराशाजनक है। इतना कमज़ोर कि बताने से पहले ही आधे दर्शक अंदाजा लगा लेते हैं।

ऋतिक रोशन का कैमियो: कबीर का अपमान

यह Alpha की सबसे बड़ी ग़लती है।

ऋतिक रोशन का कैमियो है फिल्म में। कबीर — YRF स्पाई यूनिवर्स का सबसे पसंदीदा किरदार।

लेकिन इस कैमियो में कबीर को एक मक के हाइडआउट में दिखाया गया है। आलिया और शरवरी उनके सामने दुश्मनों से लड़ रही हैं — और ऋतिक रोशन बस वहां बैठे हुए हुडी पहनकर एक monk की तरह बैठे हैं।

बस इतना।

ऋतिक रोशन इतने दयालु हैं कि उन्होंने इस कैमियो के लिए मना नहीं किया। लेकिन कबीर जैसे iconic किरदार के साथ यह क्या हुआ?

एक अच्छा कैमियो वो होता है जो कहानी को आगे ले जाए, जो किसी narrative graph को push करे। लेकिन इस कैमियो का एकमात्र उद्देश्य था — fan service और कुछ टिकट बेचना।

ChatGPT भी इससे बेहतर कैमियो सीन लिख सकता था।

वो एक दृश्य जो सच में अच्छा था

पूरी फिल्म में एक सीन था जो वाकई प्रभावशाली लगा।

जब आलिया भट्ट और शरवरी के किरदार आपस में एक-दूसरे से भिड़ते हैं — रसोई में।

यह face-off इसलिए दिलचस्प था क्योंकि commercial Bollywood फिल्मों में महिला किरदारों को इस तरह एक-दूसरे से लड़ते बहुत कम देखा है। वो intensity थी उस सीन में।

Kill Bill का जो वाइब है — खासकर रसोई में होने वाले उस सीन का — वो feel यहां भी थी। यह नहीं कह रहे कि यह उससे inspired है। लेकिन वो energy वहां थी।

दुर्भाग्य से यह एक सीन पूरी फिल्म को नहीं बचा सकता।

YRF स्पाई यूनिवर्स की असली समस्या: The Trial Room Effect

अनुराग कश्यप की बात वापस याद करें।

YRF स्पाई यूनिवर्स की फिल्में जो बना रहे हैं — वो लोग सिनेमा को सिनेमा के जरिए ही जानते हैं। उन्होंने जिंदगी नहीं जी। उनका संदर्भ उनकी अपनी देखी हुई हॉलीवुड फिल्मों से आता है।

इसीलिए जब वो spy universe बनाते हैं तो वो Hollywood templates को भारतीय नाम और चेहरे लगाकर पेश करते हैं। लेकिन उसमें भारतीयता नहीं होती — न सोच में, न भावनाओं में, न कहानी में।

Alpha उसी का नतीजा है:

  • Black Widow की भारतीय नकल
  • Nikita style का training backdrop
  • Tomb Raider जैसा protagonist setup
  • Kill Bill की झलक (कम से कम एक सीन में)

और इन सबके ऊपर — कोई emotional core नहीं, कोई genuine stakes नहीं।

धुरंधर से तुलना: क्यों YRF पीछे रह गया?

धुरंधर के बाद हर नई स्पाई फिल्म की तुलना उससे होगी — यह स्वाभाविक है।

लेकिन असली सवाल यह नहीं कि Alpha धुरंधर से कितनी खराब है। असली सवाल यह है कि Alpha अगर धुरंधर से पहले भी आती तो क्या better होती?

जवाब है — नहीं।

धुरंधर में एक emotional grounding थी। किरदारों में depth था। दर्शक को स्टेक्स feel होते थे। एक्शन meaningful था।

Alpha में यह सब missing है — और यह missing भाग किसी और फिल्म की तुलना से नहीं आया। यह फिल्म की अपनी कमज़ोरी है।

किसके लिए है यह फिल्म?

यह सवाल जरूरी है।

Alpha न mass audience के लिए काम करती है, न cinephiles के लिए, न even hardcore YRF fans के लिए।

जो दर्शक spy thrillers के लिए जाते हैं — वो emotional investment चाहते हैं।

जो cinephiles हैं — वो original storytelling चाहते हैं।

जो YRF के hardcore fan हैं — वो कबीर का अपमान देखकर निराश होते हैं।

और जो casual moviegoer है — वो 2-3 घंटे के entertainment के लिए पैसे देता है। Alpha उसे भी fully entertain नहीं कर पाती।

बॉलीवुड में महिला-नेतृत्व एक्शन फिल्मों की बड़ी तस्वीर

Alpha की विफलता से एक बड़ा सवाल उठता है — क्या Bollywood में महिला-नेतृत्व एक्शन फिल्में बनाना अभी भी एक unsolved challenge है?

सही मायने में देखें तो यह challenge casting की नहीं, लेखन की है।

जिगरा में आलिया भट्ट को वसन बाला ने जो space दिया — वो काम किया। Alpha में वही आलिया भट्ट एक hollow template में फंसी दिखती हैं।

हॉलीवुड में Atomic Blonde, Haywire, Mad Max: Fury Road जैसी फिल्मों ने दिखाया है कि महिला-नेतृत्व एक्शन तब काम करता है जब किरदार में depth हो, vulnerability हो और genuine stakes हों।

भारतीय सिनेमा में यह formula तब तक नहीं आएगा जब तक writers खुद यह नहीं समझेंगे।

रिव्यू का निष्कर्ष: बेहतरी की जरूरत है

देखो — stylish spy movies अच्छी लगती हैं। हॉलीवुड फिल्मों से inspired होना बुरा नहीं। लेकिन जब भारत में उन्हें replicate करें तो कम से कम Bollywood tropes के साथ सही तरीके से पेश करें।

दर्शक अब artificial spy movies नहीं देखना चाहते। वो evolved हो गए हैं। और अगर फिर भी ऐसी फिल्में बना रहे हो — तो कम से कम इतना entertaining बनाओ कि जो दर्शक 2-3 घंटे invest कर रहा है, वो enjoy कर सके।

YRF की Alpha और उनकी recent spy universe movies में वो entertainment value नहीं है — न mass audience के लिए, न cinephiles के लिए। और यह एक बड़ी विफलता है।

Alpha की रेटिंग: 2/5

अगर YRF spy universe को आगे बढ़ाना है तो उन्हें अपने लेखन पर, अपने किरदारों पर और सबसे जरूरी — दर्शकों से भावनात्मक जुड़ाव पर काम करना होगा।

नहीं तो जो Ek Tha Tiger से शुरू हुआ एक शानदार सफर, वो Alpha जैसी फिल्मों से ख़त्म हो जाएगा।


आपकी इस समीक्षा से सहमति या असहमति हो सकती है — और यह बिल्कुल ठीक है। लोकतांत्रिक बहस स्वागत योग्य है। कमेंट में बताइए — आपकी पसंदीदा महिला-नेतृत्व एक्शन फिल्म कौन सी है? या फिर YRF spy universe कहां गलत जा रहा है?

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