चारा घोटाला: लालू यादव के उत्थान और पतन की पूरी सच्ची कहानी 2026

चारा घोटाला: लालू यादव के उत्थान और पतन की पूरी सच्ची कहानी 2026

भैंस के सींग चमकाने के लिए 15 लाख रुपये की सरसों तेल की फर्जी बिल बनाई गई। ट्रक नंबर की जांच हुई तो वह स्कूटर का नंबर निकला। आईएएस अफसरों से पान की पीकदान तक उठवाई गई। यह सुनने में किसी कॉमेडी फिल्म का सीन लगता है, लेकिन यह बिहार के उस चारा घोटाले का हिस्सा है, जिसने न सिर्फ राज्य के खजाने को खोखला किया बल्कि भारतीय राजनीति के सबसे रंगीन और विवादित किरदारों में से एक, लालू प्रसाद यादव के करियर को भी हमेशा के लिए बदल दिया।

यह लेख उसी चारा घोटाले की पूरी कहानी बताता है, कि कैसे एक गरीब परिवार में जन्मा बच्चा बिहार का मुख्यमंत्री बना, कैसे पशुपालन विभाग के जरिए सैकड़ों करोड़ रुपये का घोटाला हुआ, और आखिरकार अदालत ने इस मामले में क्या फैसला सुनाया।

चारा घोटाला: लालू यादव के उत्थान और पतन की पूरी सच्ची कहानी 2026

गोपालगंज के एक गांव से शुरू हुई कहानी

साल 1948 में बिहार के गोपालगंज जिले के फुलवरिया गांव में, जहां जातिगत भेदभाव अपने चरम पर था, कुंदन राय और मरछिया देवी के घर एक बेटे का जन्म हुआ, जिसका नाम रखा गया लालू प्रसाद यादव। यह परिवार अहीर-यादव समुदाय से था और गाय-भैंस पालकर दूध बेचने का काम करता था। लालू अपने आठ भाई-बहनों में छठे नंबर पर थे। बचपन में साफ-सुथरे कपड़े पहनने और कभी-कभार मवेशी चराते वक्त किताब साथ रखने की उनकी आदत की वजह से गांव के जमींदार उन्हें ताना मारते हुए “गंवार बैरिस्टर” कहकर बुलाते थे।

पटना के एक वेटेनरी कॉलेज में दूध सप्लाई करने वाले उनके चाचा यदुनंद राय की मदद से 1954 में लालू पटना आ गए, जहां उन्होंने मिलर हाई स्कूल में पढ़ाई शुरू की। स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद 1966 में उन्होंने पटना यूनिवर्सिटी के बिहार नेशनल कॉलेज में बीए पॉलिटिकल साइंस में दाखिला लिया, यही वह कॉलेज था जहां से आगे चलकर जयप्रकाश नारायण और मौजूदा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जैसे नेता भी निकले।

छात्र राजनीति से मुख्यमंत्री बनने तक का सफर

कॉलेज में लालू की बोलने की अनोखी शैली की वजह से बहस प्रतियोगिताओं में भारी भीड़ जुटने लगी। इसी को देखते हुए समाजवादी पार्टी के एक कार्यकर्ता ने उन्हें पार्टी की छात्र इकाई में शामिल कर लिया, और 1967 में लालू पटना यूनिवर्सिटी स्टूडेंट यूनियन के महासचिव चुने गए। 1973 में जब पटना कॉलेज के छात्र चुनाव होने थे, तो एबीवीपी के सुशील मोदी को एक ओबीसी उम्मीदवार की जरूरत थी, और उन्होंने लालू को चुना। समस्या यह थी कि लालू तब तक कॉलेज छोड़ चुके थे, इसलिए उन्हें एक असामान्य तरीके से पटना यूनिवर्सिटी के एलएलबी कोर्स में पिछली तारीख से दाखिला दिलाया गया ताकि वे चुनाव लड़ सकें। लालू यह चुनाव जीत गए और छात्र संघ के अध्यक्ष बन गए।

अगले ही साल, 1974 में जयप्रकाश नारायण के भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन में लालू ने बतौर छात्र नेता हिस्सा लिया, और 1975 में आपातकाल के दौरान उन्हें मीसा के तहत जेल भी जाना पड़ा। आपातकाल हटने के बाद बनी जनता पार्टी के टिकट पर लालू सांसद चुने गए, और बाद में लोक दल (बिहार) के टिकट पर विधायक भी बने। इसी दौर में पटना के वेटेनरी कॉलेज परिसर में रहते हुए उनकी मुलाकात एक एमआर, आर.के. रंजन (आरके राणा) से हुई, जिसने आगे चलकर उन्हें बिहार के पशुपालन विभाग के अधिकारियों डॉ. राम राज और डॉ. एस.बी. सिन्हा से मिलवाया, यहीं से चारा घोटाले की नींव पड़ी।

1990 में हुए बिहार विधानसभा चुनाव के बाद जब जनता दल की सरकार बनी, तो वीपी सिंह दलित नेता राम सुंदर दास को मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे। लेकिन चुनाव न लड़ने के बावजूद लालू ने अंदरूनी वोटिंग में बाजी पलट दी, कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक एस.बी. सिन्हा और आर.के. राणा ने विधायकों का समर्थन जुटाने में मदद की थी, और लालू प्रसाद यादव बिहार के मुख्यमंत्री बन गए।

लालू का सामाजिक समीकरण और लोकप्रियता

मुख्यमंत्री बनते ही लालू ने एक स्पष्ट रणनीति अपनाई। 1931 की जनगणना के मुताबिक बिहार में करीब 13-14% सवर्ण, 64% ओबीसी-एससी-एसटी और 14% मुस्लिम आबादी थी। लालू ने पिछड़ी जातियों और मुस्लिमों को साथ लाकर करीब 78% वोट बैंक तैयार किया। उन्होंने खुद को पिछड़े वर्ग का प्रतिनिधि बताया, मुख्यमंत्री आवास में हफ्तों नहीं गए और अपने भाई के साथ वेटेनरी कॉलेज के एक छोटे कमरे में रहकर सरकार चलाई। उन्होंने चरवाहा विद्यालय खोले, मंडल कमीशन की सिफारिशों को बिहार में लागू किया, और लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा को रोककर उन्हें गिरफ्तार करवाया, जिससे मुस्लिम समुदाय में भी उनकी पकड़ मजबूत हुई।

लालू का प्रशासनिक तरीका भी पारंपरिक नौकरशाही से बिल्कुल अलग था। मीडिया में उनकी ऐसी तस्वीरें छपती थीं जिनमें वे आराम से पैर टेबल पर रखे बैठे होते और आईएएस अधिकारी सामने खड़े नजर आते। एक साल के भीतर 384 में से 144 आईएएस अधिकारियों ने तबादले के लिए आवेदन दे दिया था। इसी दौर में बिहार में अपहरण उद्योग भी काफी फल-फूल रहा था, आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक कुल 24,338 मामले दर्ज हुए, यानी औसतन रोज़ाना 6 अपहरण, जिसका सालाना कारोबार करीब 24 करोड़ रुपये आंका गया।

लालू की छवि हमेशा एक ऐसे नेता की रही जो अपनी सादगी और देसीपन पर गर्व करता था। एक मशहूर किस्सा है कि जब वे एक बार सिंगापुर के दौरे पर गए, तो एक पत्रकार ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में तंज कसते हुए पूछा कि आप खुद को गरीब और पिछड़ा बताते हैं, फिर भी विदेश यात्रा कैसे कर रहे हैं। इसके जवाब में लालू ने सबके सामने अपना पायजामा नीचे कर अपनी धारीदार अंडरवियर दिखाते हुए कहा कि “लालू आज भी देसी है”। यह किस्सा उस दौर में लालू की लोकप्रिय, जमीन से जुड़ी छवि को अच्छी तरह दर्शाता है, भले ही यह पत्रकारों और आलोचकों के बीच काफी विवादित भी रहा।

घोटाले की पहली चेतावनियां जो अनसुनी रह गईं

पशुपालन विभाग में गड़बड़ी की पहली आधिकारिक जानकारी 1985 में सामने आई, जब भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) टी.एन. चतुर्वेदी ने तत्कालीन मुख्यमंत्री बिंदेश्वरी दुबे को पत्र लिखकर विभाग में चल रही अनियमितताओं की जानकारी दी। इस पत्र को नजरअंदाज कर दिया गया। 1987 में विधायक रामेश्वर पासवान ने भी इसी तरह की शिकायत की, यहां तक कि उन्होंने सटीक आंकड़ा भी बताया कि अब तक करीब 7 लाख रुपये का घोटाला हो चुका है। फिर भी कोई कार्रवाई नहीं हुई।

इस दौरान घोटाले का असली सूत्रधार माना जाने वाला आर.के. राणा खुद पशुपालन विभाग का महासचिव नियुक्त हो गया, और उसी की सिफारिश पर डॉ. राम राज को विभाग का निदेशक बनाया गया, जबकि उनका नाम पहले से ही घोटाले में उछल रहा था। 1992 में रांची हवाई अड्डे पर आयकर विभाग की एक औचक छापेमारी में पशुपालन विभाग के एक कर्मचारी के पास से 1 करोड़ रुपये नकद बरामद हुए। इसी साल विजिलेंस अधिकारी बिधु भूषण द्विवेदी ने आईजी विजिलेंस को पत्र लिखकर पहली बार आधिकारिक तौर पर तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू यादव का नाम भी घोटाले में शामिल बताया, हालांकि दबाव में यह पत्र बाद में बदलवा दिया गया और खुद द्विवेदी को धमकियां मिलने लगीं, उनका तबादला कर दिया गया और बाद में निलंबित भी कर दिया गया।

इसके कुछ समय बाद आयकर विभाग की एक और जांच में पशुपालन विभाग के करीब 80 प्रमुख अधिकारियों को 25 करोड़ रुपये के साथ पकड़ा गया, जिसे इस मामले में पहली बड़ी आधिकारिक कार्रवाई माना गया। लेकिन हैरानी की बात यह रही कि छापेमारी करने वाले सभी आयकर अधिकारियों का ही कुछ ही दिनों में तबादला कर दिया गया, जिससे जांच फिर ठंडे बस्ते में चली गई। यह पैटर्न बार-बार दोहराया गया, जैसे ही कोई मामला तूल पकड़ता, किसी न किसी बहाने से जांच को धीमा या दबा दिया जाता।

घोटाला कैसे अंजाम दिया जाता था

पशुपालन विभाग की कार्यप्रणाली को समझें तो राज्य के अलग-अलग क्षेत्रीय दफ्तर पशुओं की दवा, चारा और स्वास्थ्य से जुड़े खर्च का ब्यौरा निदेशक को भेजते थे, जो आगे वित्त विभाग को भेजा जाता, वहां से विधानसभा में पास होकर बजट आवंटन (एलॉटमेंट लेटर) जारी होता। इसी एलॉटमेंट लेटर के आधार पर अधिकृत वेंडर कंपनियों से सामान मंगवाया जाता और भुगतान होता।

घोटालेबाजों ने इस पूरी प्रक्रिया में फर्जीवाड़ा किया। उन्होंने अपने रिश्तेदारों और परिचितों के नाम पर सैकड़ों फर्जी वेंडर कंपनियां बनाईं, जो कागजों पर ही मौजूद थीं। फर्जी एलॉटमेंट लेटर तैयार किए गए, और असल जरूरत से कई गुना ज्यादा रकम के बिल बनाए गए। जांच में पाया गया कि जिस “भारती एंटरप्राइजेज” के नाम पर बिल बने थे, वह असल में एक कोल्ड ड्रिंक की दुकान थी, और एक कंपनी जो जानवरों की दवा सप्लाई करने का दावा करती थी, उसकी रसीदों पर इंसानों की दवाओं के नाम लिखे मिले। जिन ट्रकों से चारा और मवेशी लाए जाने का दावा किया गया, उनके रजिस्ट्रेशन नंबर जांचने पर वे स्कूटर और मोटरसाइकिल के निकले। एक मामले में तो भैंसों के सींग चमकाने के लिए सरसों तेल की 15 लाख रुपये की फर्जी बिल तक बनाई गई।

एक क्षेत्रीय निदेशक ने अपने पिता के नाम पर “विश्वकर्मा एजेंसी” नाम की एक फर्जी कंपनी बनाकर अकेले एक ही वित्तीय वर्ष में करीब 2.2 करोड़ रुपये की हेराफेरी की। जांच में पूरे बिहार में ऐसी 250 से ज्यादा फर्जी वेंडर कंपनियां मिलीं। घोटाले से मिलने वाली रकम को आमतौर पर 80:20 के अनुपात में बांटा जाता था, फर्जी वेंडर कंपनियां 20% अपने पास रखतीं और बाकी 80% सरकारी अधिकारियों व राजनेताओं में बंट जाता। कुछ अनुमानों के मुताबिक पूरे घोटाले का आकार करीब 950 करोड़ रुपये तक पहुंच गया था।

यह ध्यान रखना जरूरी है कि जांच के दौरान गिरफ्तार हुए एस.बी. सिन्हा ने सीबीआई के सामने यह भी दावा किया था कि लालू यादव के अलावा उन्होंने मौजूदा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को भी 1 करोड़ रुपये दिए थे। हालांकि यह सिर्फ एक सह-आरोपी का बयान है, इसे अदालत में स्वतंत्र रूप से साबित नहीं किया जा सका, और नीतीश कुमार को इस मामले में कभी आरोपी नहीं बनाया गया। इसलिए इसे एक अप्रमाणित आरोप के तौर पर ही देखा जाना चाहिए, न कि स्थापित तथ्य के तौर पर।

1996 में घोटाला सार्वजनिक होना

लंबे समय तक दबा रहने के बाद यह मामला तब खुलकर सामने आया जब बिहार सरकार के पास सभी विभागों के लिए पैसे की भारी कमी हो गई, यहां तक कि शिक्षकों और सरकारी कर्मचारियों को वेतन तक नहीं मिल पा रहा था। जनवरी 1996 में महालेखाकार कार्यालय ने वित्त विभाग से हिसाब मांगा, और वित्त आयुक्त वी.एस. दुबे की जांच में साफ हो गया कि पशुपालन विभाग ही इस पूरी गड़बड़ी की जड़ है।

इसी दौरान लालू यादव की अपनी पार्टी से अलग हुए शिवानंद तिवारी और सरयू राय जैसे नेताओं ने महालेखाकार कार्यालय से घोटाले के दस्तावेज निकालकर पटना हाईकोर्ट में जनहित याचिकाएं दायर कीं और सीबीआई जांच की मांग की। कुल नौ याचिकाएं दाखिल हुईं, और इसी मामले को “चारा घोटाला” नाम मिला। जनवरी 1996 के अंत में उप विकास आयुक्त अमित खरे के नेतृत्व में पशुपालन विभाग के दफ्तरों पर छापेमारी शुरू हुई, जिसमें कर्मचारियों को दस्तावेज जलाते और फाड़ते हुए भी पाया गया, फिर भी बड़ी संख्या में सबूत जब्त कर लिए गए। यहीं से पहली बार आधिकारिक एफआईआर दर्ज हुई।

छापों के दौरान निचले दर्जे के कर्मचारियों के घरों से भी बड़ी मात्रा में नकदी और गहने बरामद हुए, जबकि उनका वेतन बहुत मामूली था। मार्च 1996 में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि इस मामले की जांच सीबीआई करेगी और पूरी निगरानी हाईकोर्ट करेगा, जिससे राज्य सरकार का इसमें हस्तक्षेप खत्म हो गया।

लालू का इस्तीफा और रबड़ी देवी का मुख्यमंत्री बनना

जुलाई 1997 में सीबीआई की विशेष अदालत से लालू यादव के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी हुआ। शुरुआत में लालू ने इस्तीफा देने से इनकार किया और आरोपों को राजनीतिक साजिश बताया, लेकिन जब राज्यपाल ए.आर. किदवई ने साफ कर दिया कि इस्तीफा न देने पर सरकार बर्खास्त कर दी जाएगी, तो 25 जुलाई 1997 को लालू ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। इसके तुरंत बाद विपक्षी दल बीजेपी के मुख्यालय में मिठाइयां बांटी गईं, यह मानते हुए कि अब चुनाव होंगे।

लेकिन लालू ने एक और चौंकाने वाला कदम उठाया, उन्होंने अपनी पत्नी रबड़ी देवी को कांग्रेस और झारखंड मुक्ति मोर्चा के समर्थन से मुख्यमंत्री बना दिया, भले ही उस वक्त इस फैसले को लेकर काफी आलोचना हुई। 30 जुलाई 1997 को लालू ने सीबीआई की विशेष अदालत में सरेंडर कर दिया।

अदालती फैसले: कई मामले, कई सजाएं

चारा घोटाले से जुड़े मुकदमे झारखंड (जहां पशुपालन विभाग के मुख्यालय थे) और बिहार, दोनों जगह चले, और सालों तक खिंचते रहे। कुल मिलाकर लालू यादव पर पांच अलग-अलग ट्रेजरी से जुड़े मामलों में मुकदमा चला, चाईबासा (दो मामले), देवघर, दुमका और डोरंडा।

पहला फैसला 30 सितंबर 2013 को आया, जब सीबीआई की विशेष अदालत ने चाईबासा ट्रेजरी मामले में लालू यादव को दोषी करार दिया, जिसमें उन्हें 5 साल की सजा और 25 लाख रुपये का जुर्माना हुआ। जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत इस सजा से उनकी संसद सदस्यता खत्म हो गई और उन्हें कई सालों के लिए चुनाव लड़ने से रोक दिया गया, हालांकि दिसंबर 2013 में उन्हें सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिल गई। इसके बाद दिसंबर 2017 में देवघर ट्रेजरी मामले में भी उन्हें दोषी ठहराया गया, जिसमें उन्हें साढ़े तीन से सात साल तक की अलग-अलग सजाएं सुनाई गईं, इसी मामले में पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा को बरी कर दिया गया। इसके बाद दुमका ट्रेजरी और डोरंडा ट्रेजरी मामलों में भी अलग-अलग समय पर उन्हें दोषी ठहराया गया, डोरंडा मामला सबसे बड़ा था, जिसमें करीब 139 करोड़ रुपये की अवैध निकासी का आरोप था।

समय के साथ लालू को हर मामले में जमानत मिलती गई, ज्यादातर मामलों में सजा का आधा हिस्सा जेल में पूरा करने के आधार पर। जुलाई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने देवघर मामले में झारखंड हाईकोर्ट द्वारा दी गई उनकी जमानत को बरकरार रखा, जिससे सीबीआई की उस याचिका को खारिज कर दिया गया जिसमें जमानत रद्द करने की मांग की गई थी। यानी वर्तमान में लालू यादव सभी पांचों मामलों में जमानत पर बाहर हैं, लेकिन दोषसिद्धि की वजह से उनके चुनाव लड़ने पर रोक अब भी बरकरार है।

घोटाले से जुड़ी संदिग्ध मौतें

इस मामले की जांच के दौरान कई अहम गवाहों और आरोपियों की मौत संदिग्ध परिस्थितियों में हुई, जिसे लेकर उस दौर में काफी चर्चा हुई। पशुपालन विभाग के एक सप्लायर हरीश खंडेलवाल का शव रेल पटरी पर मिला था, उनके पास से एक चिट्ठी बरामद हुई जिसमें सीबीआई के दबाव का जिक्र था, हालांकि विपक्षी नेताओं ने इसे सुनियोजित हत्या करार दिया। इसी तरह पशुपालन विभाग के एक क्षेत्रीय निदेशक ए.के. तूडू जेल की कोठरी में मृत पाए गए, पूर्व मंत्री भोला राम तूफानी चाकू से खुद को घायल कर मृत पाए गए, और घोटाले के मुख्य किरदार माने जाने वाले एस.बी. सिन्हा की भी संदिग्ध हालात में मौत हुई। इन मौतों की परिस्थितियां आज तक पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पाई हैं।

इस घोटाले से जुड़े जरूरी सबक

चारा घोटाला सिर्फ पैसों की हेराफेरी की कहानी नहीं है, यह इस बात का भी उदाहरण है कि कैसे प्रशासनिक निगरानी तंत्र में कमजोरियां, राजनीतिक संरक्षण और नौकरशाही की मिलीभगत मिलकर दशकों तक एक बड़े घोटाले को छुपाए रख सकते हैं। CAG और विजिलेंस अधिकारियों की शुरुआती चेतावनियों को अगर गंभीरता से लिया गया होता, तो शायद यह घोटाला इतना बड़ा नहीं होता। यह मामला आज भी भारत में सरकारी खर्च की पारदर्शिता और जवाबदेही से जुड़ी बहसों में एक अहम संदर्भ के तौर पर याद किया जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

चारा घोटाला क्या है? यह बिहार के पशुपालन विभाग में 1990 के दशक में हुआ एक बड़ा वित्तीय घोटाला है, जिसमें फर्जी बिलों और फर्जी वेंडर कंपनियों के जरिए राज्य के खजाने से सैकड़ों करोड़ रुपये गबन किए गए।

चारा घोटाले में लालू यादव को कब सजा हुई? लालू यादव को पांच अलग-अलग मामलों में अलग-अलग समय पर सजा सुनाई गई, पहला फैसला सितंबर 2013 में आया, और आखिरी मामलों में फैसले 2017 से 2022 के बीच आए।

क्या लालू यादव अभी जेल में हैं? नहीं, जुलाई 2026 तक की जानकारी के मुताबिक लालू यादव सभी पांचों मामलों में जमानत पर बाहर हैं, हालांकि दोषसिद्धि की वजह से उन्हें चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं है।

चारा घोटाले का खुलासा कैसे हुआ? शुरुआती चेतावनियां 1985 और 1987 में ही दी गई थीं, लेकिन इन्हें नजरअंदाज किया गया। 1996 में जब राज्य सरकार के पास पैसों की भारी कमी हो गई, तब जांच में यह घोटाला पूरी तरह उजागर हुआ और सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सीबीआई जांच शुरू हुई।

चारा घोटाले का कुल आकार कितना बताया जाता है? अलग-अलग रिपोर्ट्स में यह आंकड़ा अलग-अलग बताया गया है, कुछ अनुमानों के मुताबिक यह घोटाला करीब 950 करोड़ रुपये तक का था।

क्या नीतीश कुमार भी चारा घोटाले में आरोपी थे? नहीं। जांच के दौरान गिरफ्तार हुए एस.बी. सिन्हा ने यह दावा जरूर किया था कि उन्होंने नीतीश कुमार को भी पैसे दिए थे, लेकिन यह दावा अदालत में स्वतंत्र रूप से साबित नहीं हो सका और नीतीश कुमार को इस मामले में कभी आरोपी नहीं बनाया गया। इसे एक अप्रमाणित आरोप के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।

निष्कर्ष

लालू प्रसाद यादव की कहानी एक गरीब परिवार से निकलकर बिहार की राजनीति के सबसे ताकतवर किरदारों में शुमार होने की कहानी है, लेकिन यह कहानी चारा घोटाले के बिना अधूरी है। यह मामला दिखाता है कि कैसे प्रशासनिक व्यवस्था में मौजूद खामियां, राजनीतिक संरक्षण और जवाबदेही की कमी मिलकर वर्षों तक जनता के पैसे की लूट को अनदेखा होने देती हैं। आज भी जब भारत में सरकारी योजनाओं और खर्च की पारदर्शिता की बात होती है, तो चारा घोटाला एक ऐतिहासिक उदाहरण के तौर पर याद किया जाता है कि निगरानी तंत्र के कमजोर पड़ने पर कितना बड़ा नुकसान हो सकता है।

यह भी दिलचस्प है कि इतने बड़े घोटाले और सजा के बावजूद, लालू यादव और उनकी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल आज भी बिहार की राजनीति में एक बड़ी ताकत बनी हुई है। उनके बेटे तेजस्वी यादव पार्टी की कमान संभाल रहे हैं, और लालू खुद भले ही चुनाव न लड़ पाएं, लेकिन पार्टी की रणनीति और प्रचार में उनकी भूमिका आज भी अहम मानी जाती है। यह इस बात का एक दिलचस्प उदाहरण है कि भारतीय राजनीति में सामाजिक समीकरण और जनाधार कई बार कानूनी उलझनों से भी ज्यादा टिकाऊ साबित होते हैं।

(यह लेख अदालती फैसलों, सीबीआई चार्जशीट और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध समाचार रिपोर्ट्स पर आधारित है। कुछ घटनाओं, खासकर संदिग्ध मौतों से जुड़े विवरण, को तथ्य के तौर पर नहीं बल्कि उस दौर की रिपोर्टिंग के हवाले से बताया गया है।)

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